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दिल्ली के अक्षरधाम मंदिर में पूरे विधि-विधान से स्थापित की गयी नीलकंठ वर्णी की 108 फुट ऊंची प्रतिमा

Date : 26-Mar-2026

 नई दिल्ली, 26 मार्च। दिल्ली के अक्षरधाम मंदिर में भगवान स्वामीनारायण के बाल तपस्वी स्वरूप का प्रतिनिधित्व करती नीलकंठ वर्णी की पंचधातु से बनी 108 फुट ऊंची प्रतिमा की प्राण प्रतिष्ठा समारोह गुरुवार को सम्पन्न हो गया। प्राण प्रतिष्ठा बीएपीएस स्वामीनारायण संस्था के प्रमुख महंतस्वामी महाराज के सान्निध्य में वैदिक विधियों और अनुष्ठान के साथ किया गया। समारोह में देश-विदेश के श्रद्धालुओं ने भाग लिया।

अक्षरधाम परिसर में आज सुबह 6 बजे नीलकंठ वर्णी की प्रतिष्ठा के अनुष्ठानों का शुभारम्भ हुआ और प्राचीन वैदिक परंपराओं के अनुसार पूर्ण श्रद्धा और पवित्रता के साथ सम्पन्न हुआ। इसके अन्य अनुष्ठानों की शुरूआत 25 मार्च से ही शुरू हाे गए थे। बुधवार को महंतस्वामी महाराज की उपस्थिति में विश्व शांति महायज्ञ हुआ था, जिसमें बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं ने भाग लिया। शांति के प्रतीक सफेद कबूतरों को आकाश में छोड़कर पश्चिम एशिया में युद्ध विराम के लिए प्रार्थना की गई।

प्राण प्रतिष्ठा के बाद महंतस्वामी महाराज ने कहा कि यह सबसे सुंदर मूर्ति है। यह सम्पूर्ण विश्व में शांति का प्रसार करेगी। जो भी यहां नीलकंठ वर्णी के दर्शन करने आएगा, वह सद्गुणों की प्रेरणा पाएगा और कल्याण को प्राप्त करेगा। यह मूर्ति श्रद्धालुओं की भावनाओं और शुभ मनोकामनाओं को भी पूर्ण करेगी। अक्षरधाम मंदिर परिसर में स्थापित नीलकंठ वर्णी 108 फुट ऊंची यह प्रतिमा श्रद्धा, संयम और आध्यात्मिक साधना का सशक्त प्रतीक है। स्वामीनारायण के बाल तपस्वी स्वरूप का प्रतिनिधित्व करती यह प्रतिमा नीलकंठ वर्णी को एक चरण पर गहन ध्यानमग्न मुद्रा में दर्शाती है।

कौन हैं तपोमूर्ति नीलकंठ वर्णी

भगवान स्वामीनारायण ने मात्र 11 वर्ष की आयु में गृह त्याग कर मानव कल्याण के लिए पूरे भारत में आध्यात्मिक यात्रा शुरू की थी। सात वर्षों में उन्होंने करीब 12,000 किलोमीटर की यात्रा की और हिमालय, बद्रीनाथ, केदारनाथ, कैलाश-मानसरोवर, मुक्तिनाथ (नेपाल), कामाख्या, जगन्नाथ पुरी, रामेश्वरम, नासिक, पंढरपुर और द्वारका जैसे तीर्थों का भ्रमण किया। इस दौरान उन्हें 'नीलकंठ वर्णी' के नाम से जाना गया।

प्रतिमा की विशेषता-

• एक चरण पर अडिग खड़ी विश्वभर में संभवत: एकमात्र सबसे विशाल प्रतिमा है। आठ फुट ऊंचे पृष्ठतल पर इसे स्थापित किया गया है।

• इसके निर्माण में तकरीबन एक वर्ष का समय लगा और इसका निर्माण पंचधातु से हुआ है, जिसमें मुख्य रूप से कांस्य धातु का उपयोग।

• इसको बनाने में अक्षरधाम के शिल्पी संतों, लगभग 50 कारीगरों ने सहयाेग किया है।

• पुलहाश्रम (मुक्तिनाथ) में स्वामीनारायण ने नीलकंठ वर्णी के रूप में चार मास तक एक पैर पर खड़े तपस्या करने का प्रतीक है।


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