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भारत-बांग्लादेश सीमा पर शून्य-रेखा गांवों के पुनर्वास की तैयारी में बीएसएफ

Date : 02-Jun-2026

 कोलकाता, 02 जून । भारत-बांग्लादेश सीमा पर स्थित शून्य-रेखा (जीरो लाइन) गांवों के पुनर्वास की प्रक्रिया को तेज करने की दिशा में सीमा सुरक्षा बल (बीएसएफ) सक्रिय हो गया है। बीएसएफ का मानना है कि पश्चिम बंगाल में सरकार बदलने के बाद इस लंबे समय से लंबित मुद्दे के समाधान की संभावना बढ़ गई है।

बीएसएफ के वरिष्ठ अधिकारियों के अनुसार, केंद्रीय गृह मंत्रालय कई वर्षों से इन गांवों के पुनर्वास की पहल कर रहा है। इसके लिए प्रभावित परिवारों को पर्याप्त मुआवजा देने का प्रस्ताव भी तैयार है। अब राज्य सरकार को सीमा से सुरक्षित दूरी पर उपयुक्त भूमि चिह्नित कर उसका अधिग्रहण करना होगा। अधिकारियों का कहना है कि सीमा के निकट स्थित कृषि भूमि यथावत रखी जा सकती है और किसान दिन के समय वहां खेती-बाड़ी का काम कर सकेंगे।

शून्य रेखा गांव वे बस्तियां हैं जो अंतरराष्ट्रीय सीमा से 150 गज के भीतर स्थित हैं। इन गांवों की मौजूदगी के कारण सीमा पर प्रभावी बाड़बंदी करना मुश्किल हो जाता है। कुछ भारतीय गांव तो ऐसे भी हैं जो वर्तमान सीमा बाड़ के बाहर स्थित हैं।

बीएसएफ अधिकारियों के अनुसार, इन गांवों के निवासी रात के समय बाड़ के द्वार बंद हो जाने के बाद लगभग अलग-थलग पड़ जाते हैं। आपातकालीन सेवाओं तक उनकी पहुंच भी प्रभावित होती है। ग्रामीणों ने कई बार शिकायत की है कि वे सीमा पार से सक्रिय अपराधियों के खतरे का सामना कर रहे हैं और पुनर्वास के लिए तैयार हैं, लेकिन अब तक नागरिक प्रशासन की ओर से पर्याप्त पहल नहीं की गई।

भारत और बांग्लादेश के बीच 4,096.7 किलोमीटर लंबी अंतरराष्ट्रीय भूमि सीमा है, जिसमें से 2,216.7 किलोमीटर हिस्सा पश्चिम बंगाल से होकर गुजरता है। अधिकारियों के मुताबिक राज्य में लगभग 360 शून्य रेखा गांव हैं, जिनकी कुल आबादी करीब 70 हजार है। इनमें से अधिकांश गांव मालदा, मुर्शिदाबाद और कूचबिहार जिलों में स्थित हैं।

बीएसएफ का कहना है कि इन गांवों के कारण कई क्षेत्रों में सीमा पर बाड़बंदी नहीं हो सकी है, जिससे प्रभावी सीमा प्रबंधन प्रभावित होता है। तस्करी, अवैध घुसपैठ, मानव तस्करी और अन्य गैरकानूनी गतिविधियों में शामिल तत्व ऐसे गांवों का फायदा उठाते हैं। इसके अलावा, सीमा पर चौबीसों घंटे निगरानी बनाए रखने के लिए अतिरिक्त सुरक्षा बलों की तैनाती भी करनी पड़ती है।

अधिकारियों ने उम्मीद जताई है कि आने वाले कुछ वर्षों में पुनर्वास की प्रक्रिया पूरी कर इन गांवों को सुरक्षित स्थानों पर स्थानांतरित किया जा सकेगा, जिससे सीमा सुरक्षा व्यवस्था और अधिक मजबूत होगी।


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