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बस्तर में हजारों साल पुराना इतिहास मिलता है श्रीगणेश पूजा का

Date : 19-Sep-2023

श्रीगणेश चतुर्थी के महापर्व पर आज हम आपको ऐसे गणेश प्रतिमा की दर्शन करा रहे हैं जो विश्व विख्यात है। इस मंदिर को बारसूर गणेश मंदिर के नाम से जाना जाता है। मंदिर को लेकर बताया जाता है छत्तीसगढ़ के दंतेवाड़ा जिले के बारसूर ग्राम में स्थित यह मंदिर 11वीं शताब्दी में छिंदक नागवंश के राजा बाणासुर ने स्थापित किया था। जहां भगवान गणेश की विश्व की तीसरी सबसे बड़ी प्रतिमा स्थित है। कहा जाता है पूरे विश्व में केवल बारसूर में ही भगवान गणेश की जुड़वा प्रतिमा है, जिसे देखने केवल देश से ही नहीं बल्कि विदेशों से भी बड़ी संख्या में पर्यटक यहां पहुंचते हैं। बस्तर संभाग में भगवान श्रीगणेश के पूजा की परंपरा हजारों सालों से चली आ रही है।


पुरातत्वविदों के अनुसार बस्तर संभाग में प्राय: हर स्थान से श्रीगणेश की प्रतिमाएं मिली हैं, इसमें कई प्रतिमाएं तो अत्यंत दुर्लभ हैं। बस्तर में बारसूर के श्रीगणेश की प्रतिमाएं ऐतिहासिक है। बारसूर का इतिहास एक हजार वर्ष से भी अधिक पुराना है, जहां ग्यारहवीं शताब्दी की सबसे बड़ी श्रीगणेश की प्रतिमा होने के साथ ही श्रीगणेश की जुडवा प्रतिमा केवल यहीं हैं। इसी प्रकार ढोलकाल, बड़ांजी, छिन्दगांव, बीजापुर एवं दंतेवाड़ा के दंतेश्वरी मंदिर में भी श्रीगणेशजी की विशाल प्रतिमाएं स्थापित हैं।


पुरातत्व विभाग के द्वारा संरक्षित दंतेवाड़ा जिले के बारसूर में बलुआ पत्थरों से निर्मित श्रीगणेशजी की दो विशालकाय प्रतिमाएं स्थापित हैं। दो विशाल प्रतिमाओं में श्रीगणेशजी की बड़ी मूर्ति लगभग साढ़े सात फीट की है और छोटी प्रतिमा की ऊंचाई साढ़े पांच फीट है। इसे दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी गणेश प्रतिमा मानी जाती है। पुराणों के अनुसार असुर राजा बाणासुर के नाम पर ही इस नगर का नाम बारसूर पड़ा, कहा जाता है कि असुर राज बाणासुर ने ही इन श्रीगणेश की युगल प्रतिमाओं को स्थापित किया था।


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