आगरा, 08 जनवरी।
इंसानों के लिए मुल्कों की सरहद पार करना एक बाधा हो सकती है लेकिन हवा के झोंकों और परिंदों के लिए मुल्कों की सरहदें कभी उन्हें रोक नहीं पाई। ठंड अपने पूरे शवाब पर है, विदेशी परिंदे प्रतिदिन हजारों किलोमीटर की दूरी तय कर आगरा के बाह रेंज स्थित चंबल सेंचुरी में पहुंच चुके हैं, इन पक्षियों की दिनचर्या को देखने कोतुहल वश बड़ी संख्या पर्यटक चंबल वर्ल्ड सेंचुरी पहुंच रहे हैं। आगरा के बाह क्षेत्र में ही यमुना नदी के तट पर स्थित बटेश्वर भी धार्मिक पर्यटन का एक बड़ा लेंड मार्क है। चंबल सेंचुरी की बाह रेंज आगरा मुख्यालय से करीब 80 किलोमीटर दूर स्थित है।
चंबल बर्ड सेंचुरी के निदेशक आर पी सिंह ने बताया कि आगरा के बाह क्षेत्र में चंबल सेंचुरी देसी घड़ियालों और इंडियन स्कीमर का मूल स्थान माना जाता है।
घड़ियाल और इंडियन स्कीमर के घर में कड़कड़ाती सर्दी के साथ पेंटेड स्टॉर्क, ब्लैक हेडेड आईबिस, व्हिसलिंग टील, रुडी शेल्डक, ग्रे हेरॉन आदि प्रवासी पक्षियों ने भी डेरा जमा लिया है। चंबल की आबोहवा सर्दी के मौसम में ठंड के बढ़ते ही प्रवासी परिंदों को यहां खींचकर लाती है। इस मौसम में देसी और विदेशी पक्षियों की अठखेलियों को देखने के लिए पर्यटक और पक्षी प्रेमियों में रोमांच और कोतुहल बना रहता है और वे बड़ी संख्या में वहां इकट्ठे होते हैं
बाह रेंज के रेंजर कुलदीप सहाय पंकज से पक्षियों के संबंध में जानकारी ली गई तो उन्होंने बताया कि देसी परिंदों में इंडियन स्कीमर, रुडी शेल्डक, रिवर टर्न, ब्लैक बेलीड टर्न आदि चिड़ियां यहां प्रजनन कर अपना कुनबा बढ़ा रही हैं। विदेशी प्रवासी पक्षियों में
ब्लैक हेडेड आइबिस,पेंटेड स्टॉर्क,रुडीशेल्डक,व्हिसलिंग टील हर वर्ष आने वाली मेहमान पक्षी हैं,
ब्लैक हेडेड आइबिस:-
प्रवासी पक्षी जो इस समय चंबल में मौजूद है ब्लैक हेडेड आइबिस (सफेद बुज्जा) जल में पाए जाने वाले सांपों को निगल लेता है। मछली, मेंढक, जलीय कीड़े-मकोडे़ इनका भोजन होते हैं। इसका वैज्ञानिक नाम थ्रेसकिओर्निस मेलानोसेफेलस है। आइबिस का सिर, गर्दन और पैर काले होते हैं। पंख सफेद होते हैं। चोंच नीचे की ओर मुड़ी होती है। इनकी लंबाई करीब 70 सेंटीमीटर होती है। एक किलो ग्राम से अधिक वजन वाले आइबिस करीब एक मीटर तक पंख फैलाते हैं।
पेंटेड स्टॉर्क:-
हिमालय क्षेत्र से चंबल पहुंचे पीली चोंच वाले सारस पेंटेडेड स्टॉर्क देखने में बहुत ही खूबसूरत लगते हैं इनकी खूबसूरती ही पर्यटकों के मन पर राज करती है। उनके रूप रंग को देखकर लगता है जैसे किसी चित्रकार ने अपने रंगों से इन्हे सजाया हो। इसका वैज्ञानिक नाम मायक्टेरिया ल्यूकोसेफला है। लंबी, पतली टांग, नुकीली चोंच दूसरे पक्षियों से पेंटेड स्टार्क को अलग करती है। पेंटेड स्टार्क पानी में सात सेमी की गहराई तक घुसकर अपना शिकार पकड़ लेते हैं। इनकी लंबाई औसतन एक मीटर, पंखों का फैलाव औसतन डेढ़ मीटर, वजन 2 से 3.5 किलो होता है।
रुडी शेल्डक:-
यूरोप, एशिया एवं अफ्रीका से चंबल आने वाली रुडी शेल्डक (ब्रह्मनी डक) का बहुरंगी रूप बहुत ही मनमोहक है।स्थानीय लोग इस चिड़िया को सुरखाब और चकवा-चकवी के नाम से पुकारते हैं। इसका वैज्ञानिक नाम टैडोरना फेरूजीनिया है। अंकुर, कलियां, घास, पत्तियां एवं कीट पतंगे इनका भोजन होते हैं। इनकी लंबाई 60-70 सेमी, वजन 1200-1600 ग्राम होता है। गला सिर तक पीला होता है।
ग्रे हेरॉन:-
ग्रे हेरॉन यूरोप, एशिया, अफ्रीका से लंबी दूरी तय करके चंबल पहुंची है, इनके उड़ने का अंदाज रोमांचित कर देता है। वैज्ञानिक नाम अर्डिया सिनेरिया तथा स्थानीय नाम भूरा बगुला है। इनके सिर पर मुकुट, गाल, ठुड्डी और गर्दन के किनारे सफेद होते हैं। चोंच लंबी नारंगी और पैर गुलाबी होते हैं। इनकी लंबाई करीब एक मीटर, वजन एक से डेढ़ किलोग्राम, पंख फैलाव 175-200 सेमी होता है।
व्हिसलिंग टील:-
सर्द मौसम में इंडोनेशिया, सिंगापुर, मलेशिया, थाईलैंड, वियतनाम और म्यांमार से चलकर चंबल में डेरा जमाने वाली व्हिसलिंग टील की सीटी सी आवाज स्थानीय लोगों को आकर्षित करती है। इनका स्थानीय नाम सिली (सिल्ही) है। वैज्ञानिक नाम डेंड्रोसाइग्ना जावनिका है। शिकार मुद्रा में इनकी जलक्रीड़ा पर्यटकों को रोमांचित कर देती है। इनकी चोंच और पैर स्लेटी नीले-भूरे रंग के होते हैं। करीब 40 सेमी आकार वाली चिड़ियों का वजन 500-600 ग्राम होता है।
