दक्षिण भारत की धार्मिक सहिष्णुता | The Voice TV

Quote :

"खुद पर विश्वास करने की शक्ति ही हमें हर मुश्किल को पार करने की हिम्मत देती है।"

Travel & Culture

दक्षिण भारत की धार्मिक सहिष्णुता

Date : 03-Feb-2026

उत्तर और दक्षिण भारत में मंदिरों के आसपास खान-पान को लेकर स्पष्ट सांस्कृतिक अंतर देखने को मिलता है। उत्तर भारत में जहां मंदिरों के आसपास भोजन संबंधी नियम अपेक्षाकृत सख्त होते हैं और शाकाहार को धार्मिक शुद्धता से जोड़ा जाता है, वहीं दक्षिण भारत में लोग इस विषय को अधिक व्यवहारिक और स्थानीय संदर्भों में देखते हैं। यही कारण है कि कई दक्षिण भारतीय मंदिरों के आसपास शाकाहारी के साथ-साथ मांसाहारी भोजन भी आसानी से उपलब्ध होता है।

दक्षिण भारत में धार्मिक आस्था गहरी और सशक्त है, लेकिन भोजन को धार्मिक अशुद्धता से जोड़ने की परंपरा अपेक्षाकृत कम रही है। यहां मंदिर परिसर के अंदर अनुष्ठानिक शुद्धता का पालन सख्ती से किया जाता है, जबकि मंदिर के बाहर लोगों की व्यक्तिगत, सांस्कृतिक और आर्थिक आवश्यकताओं को अलग दृष्टि से देखा जाता है।

केरल और बंगाल के साथ-साथ दक्षिण भारत के कई समुदायों—जैसे नायर, रेड्डी, बोक्कालिगा, थेवर और कुछ ब्राह्मण समूहों—में ऐतिहासिक रूप से मांस और मछली का सेवन होता रहा है। इन क्षेत्रों में मांसाहार को धार्मिक अपवित्रता नहीं, बल्कि सांस्कृतिक पहचान और परंपरा का हिस्सा माना जाता है।

उत्तर और दक्षिण भारत के मंदिरों में यह अंतर उनके प्रशासनिक ढांचे में भी दिखता है। उत्तर भारत में कई मंदिर राजनीतिक या सामाजिक संगठनों के प्रभाव में संचालित होते हैं, जहां शाकाहार को धार्मिक अनुशासन का हिस्सा बनाया जाता है। वहीं दक्षिण भारत में अधिकांश मंदिर देवस्थानम बोर्डों या मठों के अधीन होते हैं, जो स्थानीय समाज और परंपराओं का प्रतिनिधित्व करते हैं। इससे खान-पान को लेकर कठोर नियम बनाना आम नहीं है।

द्रविड़ आंदोलन, अंबेडकरवादी विचारधारा और स्थानीय राजनीति ने भी दक्षिण भारत में धार्मिक मामलों में व्यक्तिगत स्वतंत्रता को बढ़ावा दिया है। इसी कारण मंदिरों के आसपास खाने-पीने को लेकर लोगों पर विशेष प्रतिबंध नहीं लगाए जाते।

रामेश्वरम और श्रीशैलम जैसे मंदिर नगरों में स्थानीय समुदाय—विशेषकर मछुआरे—अपनी आजीविका के लिए मांसाहारी भोजन की बिक्री पर निर्भर हैं। ऐसे में इन दुकानों को हटाने की अपेक्षा न केवल अव्यावहारिक है, बल्कि नैतिक रूप से भी प्रश्न उठाती है।

तटीय क्षेत्रों में मछली और मांस की सहज उपलब्धता तथा प्राचीन द्रविड़ पाक परंपराओं के कारण दक्षिण भारत में मांसाहार सामान्य जीवन का हिस्सा बना रहा है। इसके अलावा, कई ग्रामीण और स्थानीय शैव व शाक्त परंपराओं में मांस और मछली का अर्पण भी किया जाता है, जिससे मंदिरों के पास मांसाहारी दुकानों का विरोध प्रायः देखने को नहीं मिलता।

दक्षिण भारत की धार्मिक सोच में दूसरों को नियंत्रित करने की बजाय भक्ति, आत्मिक शुद्धता और आंतरिक साधना पर अधिक जोर दिया जाता है। यही कारण है कि वहां धार्मिक सहिष्णुता और खान-पान को लेकर स्वीकार्यता अधिक दिखाई देती है।

ऐतिहासिक रूप से भी चोल और पांड्य जैसे शासक, जो मंदिर संरक्षण के लिए प्रसिद्ध थे, स्वयं मांसाहार करते थे। इससे स्पष्ट होता है कि धार्मिक आस्था और मांसाहारी भोजन एक-दूसरे के विरोधी नहीं रहे हैं।

आंकड़ों के अनुसार, गुजरात, हरियाणा, पंजाब और राजस्थान जैसे राज्यों में शाकाहारी आबादी अधिक है, जबकि आंध्र प्रदेश, तमिलनाडु, केरल, कर्नाटक और तेलंगाना में मांसाहार करने वालों की संख्या अधिक पाई जाती है।

दक्षिण भारत के कई प्रमुख मंदिर—जैसे रामेश्वरम का ज्योतिर्लिंग, मदुरै का मीनाक्षी मंदिर, चिदंबरम नटराज मंदिर, तिरुवन्नामलाई का अरुणाचलेश्वर मंदिर और आंध्र प्रदेश का श्रीशैलम—ऐसे क्षेत्र में स्थित हैं जहां मंदिर के बाहरी हिस्सों में शाकाहारी और मांसाहारी दोनों प्रकार के भोजन उपलब्ध हैं।
हालांकि, तिरुपति बालाजी मंदिर एक अपवाद है, जहां मंदिर क्षेत्र में मांसाहार पूरी तरह प्रतिबंधित है, लेकिन निचले शहर में यह आसानी से मिल जाता है।


RELATED POST

Leave a reply
Click to reload image
Click on the image to reload









Advertisement