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फर्टिलिटी क्लिनिक घोटालाः सुप्रीम कोर्ट ने मामला वापस लेने पर अटॉर्नी जनरल से मांगा स्पष्टीकरण

Date : 13-Dec-2025

 काठमांडू, 13 दिसंबर। उच्चतम न्यायालय ने नाबालिग लड़कियों के अंडाणुओं की अवैध खरीद–फरोख्त के एक मामले की सुनवाई करते हुए अटॉर्नी जनरल को मामला वापस लेने के कानूनी आधार को लेकर लिखित स्पष्टीकरण देने का निर्देश दिया है।

इन विट्रो फर्टिलाइजेशन (आईवीएफ) एक चिकित्सकीय प्रक्रिया है, जिसमें महिला के शरीर के बाहर प्रयोगशाला में निषेचन किया जाता है। हाल के वर्षों में बांझपन की समस्या बढ़ने के साथ नेपाल में आईवीएफ केंद्रों की संख्या तेजी से बढ़ी है, जो निःसंतान दंपतियों को आशा का वादा करते हैं। हालांकि, अब इस क्षेत्र पर कड़ी निगरानी शुरू हो गई है, क्योंकि आरोप लगे हैं कि नाबालिगों का शोषण किया गया और उनके अंडाणुओं को मुनाफे के लिए बेचा गया।

यह विवाद बाबरमहल स्थित होप फर्टिलिटी एंड डायग्नोस्टिक सेंटर और महाराजगंज स्थित एंजेल फर्टिलिटी क्लिनिक से जुड़ा है, जिनका संचालन प्रसिद्ध आईवीएफ विशेषज्ञ डॉ. स्वाती शर्मा करती थीं। अगस्त में आई रिपोर्टों में आरोप लगाया गया कि इन क्लिनिकों ने नाबालिग लड़कियों को फुसलाया, उनके अंडाणु निकाले और उन्हें ऊंची कीमत पर दाताओं को बेचा।

इन खुलासों के बाद नेपाल पुलिस के केंद्रीय अनुसंधान ब्यूरो (सीआईबी) ने डॉ. शर्मा सहित पांच अन्य लोगों को जांच के लिए गिरफ्तार किया था।

आरोपों की गंभीरता के बावजूद अटॉर्नी जनरल कार्यालय ने पर्याप्त साक्ष्य न होने का हवाला देते हुए मामला दर्ज न करने का निर्णय लिया। इस फैसले से व्यापक आक्रोश फैल गया, खासकर इसलिए क्योंकि मामला नाबालिगों के चिकित्सकीय शोषण से जुड़ा था।

पीड़ितों की ओर से अधिवक्ता अंकिता त्रिपाठी ने 30 नवंबर को सुप्रीम कोर्ट में रिट याचिका दायर की, जिसमें अटॉर्नी जनरल कार्यालय को भी प्रतिवादी बनाया गया। एक दिसंबर को याचिका की सुनवाई के बाद सुप्रीम कोर्ट ने कारण बताओ आदेश जारी करते हुए पूछा कि अभियोजन न करने के निर्णय को क्यों न पलटा जाए।

रिट याचिका में दलील दी गई है कि उम्र में हेरफेर करना, अभिभावक की सहमति के बिना प्रक्रियाएं करना, नाबालिगों को सात से नौ घंटे तक बिना भोजन और पानी के बेहोश रखना तथा जबरन चिकित्सकीय उपकरणों का प्रयोग करना, ये सभी कृत्य दुष्कर्म, मानव तस्करी और गंभीर अपराध की श्रेणी में आते हैं। कानूनी विशेषज्ञों ने अभियोजन न करने के फैसले को मनमाना और अनुचित बताया है।


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