रत्नाकरधौतपादां हिमालयकिरीटिनिम्।
क्या आपको ऐसा नहीं लगता कि रोशन रंगीनियों के जमाने में अपने देश की तस्वीर कुछ ज्यादा ही श्वेत-श्याम बनकर उभर रही है?
प्रतिवर्ष की भांति एक और गणतंत्र दिवस हमारी चौखट पर दस्तक दे चुका है। इसमें कोई संदेह नहीं कि प्रत्येक राष्ट्रप्रेमी के लिए यह गर्व का दिन है क्योंकि भारत ने देश की आजादी के बाद स्वयं का संविधान बनाकर 26 जनवरी 1950 के दिन इसे लागू कर इसी दिन प्रभुत्ता सम्पन्न सार्वभौमिक प्रजातंत्रात्मक गणराज्य बनने का गौरव हासिल किया था। 26 जनवरी का दिन गणतंत्र दिवस के रूप मनाने की शुरूआत के पीछे मूल भावना यही थी कि देश का प्रत्येक नागरिक इस दिन संविधान की मर्यादा की रक्षा करने, स्वयं को देशसेवा में समर्पित करने तथा राष्ट्रीय हितों के प्रति आस्था का संकल्प ले, साथ ही इन पर अमल करे लेकिन विडम्बना है कि गौरवान्वित कर देने वाले इस विशेष अवसर पर ऐसे संकल्पों को प्रतिवर्ष दोहरा कर या स्मरण मात्र करते हुए हम अपने कर्त्तव्यों और उत्तरदायित्वों की इतिश्री कर लेते हैं।
सही मायनों में गणतंत्र की मूल भावना को हमने आज तक समझा ही नहीं। ‘गणतंत्र’ का अर्थ है शासन तंत्र में जनता की भागीदारी। हालांकि हम कह सकते हैं कि शासन तंत्र में जनता को पूर्ण भागीदारी मिली है किन्तु क्या यह वाकई पूर्ण सत्य है? देश का संविधान लागू होने के इन 75 वर्षों में भी क्या वास्तव में शासन तंत्र में जनता की भागीदारी सुनिश्चित हुई है? जनता को यह तो अधिकार है कि मतदान के जरिये वह अपना जनप्रतिनिधि चुने किन्तु एक बार संसद अथवा विधानसभा के लिए निर्वाचित होने के बाद अगले पांच वर्षों तक इन जनप्रतिनिधियों पर उसका क्या कोई अंकुश रह जाता है? वास्तविकता यही है कि इसी प्रावधान का लाभ उठाते हुए राजनीतिक दल देश की जनता का चुनाव के समय महज एक वोटबैंक के रूप में इस्तेमाल करते आए हैं और अपना मतलब निकलने पर जनप्रतिनिधियों पर जनता के दुख-दर्द के बजाय अपने लिए सुख-सुविधाओं का अंबार जुटाने की चिंता सवार हो जाती है और वे इसी कवायद में जुट जाते हैं कि येन-केन-प्रकारेण अगले चुनाव के लिए कैसे करोड़ों रुपयों का इंतजाम किया जाए।
अहम सवाल यह है कि जिस राष्ट्र में जनता की भागीदारी चुनाव में सिर्फ वोट डालने और उसके बाद चुने हुए जनप्रतिनिधियों के आचरण से शर्मसार होकर आंसू बहाने तक सीमित रह गई हो, वहां ‘गणतंत्र’ का भला क्या महत्व रह गया है? खासतौर से ऐसी स्थिति में, जब गरीबी व भुखमरी से त्रस्त करोड़ों लोग चंद रुपयों की खातिर या लाखों लोग महज दो-चार शराब की बोतलों के लिए अपने वोट बेच डालते हों या ईवीएम के दौर में भी कुछ मतदान केन्द्रों पर गुंडागर्दी के बल पर वोट डलवाये जाते हों?
हालांकि इसमें संशय नहीं कि हमें विशुद्ध रूप में एक प्रजातांत्रिक संविधान प्राप्त हुआ है, जिसमें प्रत्येक वर्ग, प्रत्येक समुदाय, प्रत्येक सम्प्रदाय के लोगों के लिए बराबरी के अधिकार के साथ-साथ व्यक्तिगत एवं सामूहिक रूप से कुछ मूलभूत स्वतंत्रताओं की व्यवस्था भी की गई है, प्रत्येक नागरिक के लिए मूल अधिकारों का प्रावधान किया गया है किन्तु गणतांत्रिक भारत में पिछले 75 वर्षों के हालात का विवेचन करें तो यही पाते हैं कि हमारे कर्णधार एवं नौकरशाह किस प्रकार संविधान के कुछ प्रावधानों के लचीलेपन का अनावश्यक लाभ उठाकर कदम-कदम पर लोकतांत्रिक मूल्यों को तार-तार करते रहे हैं। निःसंदेह इससे लोकतंत्र की गरिमा प्रभावित होती रही है। संविधान निर्माताओं ने कभी इस बात की कल्पना नहीं की होगी कि जिन लोगों के कंधों पर संविधान को लागू कराने की जिम्मेदारी होगी, वही इसके प्रावधानों का मखौल उड़ाते नजर आएंगे। ऐसी दयनीय परिस्थितियों को देखकर निश्चित रूप से संविधान निर्माताओं की आत्मा खून के आंसू रोती होगी।
संसद-विधानसभाओं में एक-दूसरे के साथ मारपीट, घूंसेबाजी, चप्पल, माइक इत्यादि से प्रहार, कुर्सियां फेंकने जैसी घटनाएं भारतीय लोकतंत्र में शर्मनाक पैठ बना चुकी हैं। वक्त-बेवक्त संसद और विधानसभाओं के भीतर होती गुंडागर्दी सरीखी घटनाएं दुनियाभर में हमें शर्मसार करती रही हैं। जिस राष्ट्र में कानून बनाने वाले और देश चलाने वाले लोग ही ऐसी असभ्य हरकतें करने लगें, वहां अपराधों पर अंकुश लगाने की किससे अपेक्षा की जाए? संसद-विधानसभा सरीखे लोकतंत्र के सर्वोच्च मंदिरों में अपराधियों व बाहुबलियों का निर्बाध प्रवेश क्या एक स्वस्थ लोकतंत्र का संकेत है? चुनाव जीतने के लिए आज हर राजनीतिक दल में ऐसे लोगों को पार्टी में शामिल करने, चुनाव जीतने के लिए उनका इस्तेमाल करने के अलावा उन्हें ही पार्टी के टिकट पर चुनाव लड़वा कर अपनी सीटें बढ़ाने के फेर में ऐसे दागी लोगों को लोकतंत्र के मंदिरों में प्रवेश दिलाने की होड़-सी लगी है। अदालतें जब भी संसद या विधानसभाओं में आपराधिक तत्वों का प्रवेश रोकने की दिशा में कुछ सार्थक पहल करने की कोशिश करती हैं, तमाम राजनीतिक दल उसे संसद के अधिकार क्षेत्र में न्यायिक दखलंदाजी करार देते हुए हो-हल्ला मचाने लगते हैं।
राष्ट्रीय महत्व के मुद्दों पर सांसदों-विधायकों की रुचि लगातार कम हो रही है। प्रत्येक संसद सत्र में हंगामा व शोरशराबा करके संसद का बेशकीमती समय नष्ट कर देना जैसे एक परम्परा बन चुकी है। सदन से बहुत से सदस्य लंबे-लंबे समय तक गैरहाजिर रहते हैं। सर्वसम्मति के अभाव में देशहित से जुड़े अनेक महत्वपूर्ण बिल लंबे समय तक लटके पड़े रहते हैं लेकिन आश्चर्य की बात है कि जब जनप्रतिनिधियों के वेतन-भत्ते अथवा अन्य ऐशोआराम की सुविधाएं बढ़ाने की बात आती है तो पूरा सदन एकजुट हो जाता है और ऐसे मामलों में पलक झपकते ही सर्वसम्मति बन जाती है। तब सदन में सदस्यों की उपस्थिति संख्या भी देखते ही बनती है। एक समय था, जब संसद में राष्ट्रीय महत्व के मुद्दों पर दलगत राजनीति से ऊपर उठकर सकारात्मक बहस होती थी लेकिन अब हर संसद सत्र हंगामे और शोरशराबे की भेंट चढ़ जाता है।
इस तथ्य को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता कि संसद का एक-एक मिनट बहुमूल्य होता है। संसद के प्रत्येक मिनट के कामकाज पर ढाई लाख रुपये से अधिक खर्च होते हैं अर्थात् आठ घंटे की संसद की कार्रवाई पर बारह करोड़ रुपये से भी अधिक खर्च होते हैं। आए दिन इसी तरह संसद में हंगामे होने, सदन की कार्यवाही का बहिष्कार करने या सदन की कार्यवाही दिनभर के लिए स्थगित होने से देश को कितना आर्थिक नुकसान होता है, इसका अनुमान सहजता से लगाया जा सकता है। संसद अथवा विधानसभाओं की कार्यवाही पर होने वाला यह भारी-भरकम खर्च जनप्रतिनिधियों की जेबों से नहीं निकलता बल्कि इसका सारा बोझ देश की आम जनता वहन करती है।
बहरहाल, सबसे बड़ा सवाल यही है कि ‘गणतंत्र’ की जो तस्वीर हमारे जनप्रतिनिधियों द्वारा प्रस्तुत की जा रही है, क्या हम उस पर गर्व कर सकते हैं? गणतंत्र दिवस जैसे महत्वपूर्ण अवसर को इतनी धूमधाम से मनाए जाने का सही लाभ तभी है, जब न केवल देश का प्रत्येक नागरिक बल्कि बड़े-बड़े राजनेता और नौकरशाह भी संविधान की गरिमा को समझें और उसके अनुरूप अपने आचरण में पारदर्शिता भी लाएं।
लेखक - योगेश कुमार गोयल
इस एकादशी का पारण समय 26 जनवरी को सुबह 7.12 मिनट से लेकर 9.21 मिनट तक होगा |
ॐ नमो नारायण। श्री मन नारायण नारायण हरि हरि।
v सुबह जल्दी उठकर स्नान करें और स्वच्छ कपड़े पहनें।
v घर के मंदिर में दीपक जलाकर भगवान विष्णु की पूजा की तैयारी करें।
v भगवान विष्णु का गंगाजल से अभिषेक करें।
v श्रीहरि को पुष्प, तुलसी दल, और तिल अर्पित करें।
v इस दिन भगवान विष्णु के साथ मां लक्ष्मी की भी पूजा करें।
v उड़द और तिल से बनी खिचड़ी भगवान को भोग स्वरूप अर्पित करें।
v रात में तिल का उपयोग कर 108 बार 'ऊँ नमो भगवते वासुदेवाय स्वाहा' मंत्र के साथ हवन करें।
v अंत में भगवान विष्णु की आरती करें और उनका आशीर्वाद प्राप्त करें।
v व्रत से एक दिन पहले मांसाहार और तामसिक भोजन का सेवन पूरी तरह त्याग दें।
v भले ही व्रत न रखा हो, इस दिन बैगन और चावल का सेवन नहीं करना चाहिए।
v भगवान विष्णु की पूजा में तिल का विशेष रूप से प्रयोग करें और तिल का भोग अर्पित करें।
v धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इस दिन तिल का उबटन लगाना शुभ माना जाता है।
v स्नान के समय पानी में तिल डालकर स्नान अवश्य करें।
v व्रत रखने वाले व्यक्ति फलाहार में तिल से बनी चीजें और तिल मिला हुआ पानी ग्रहण करें।
v तिल का हवन और दान इस दिन अत्यंत महत्वपूर्ण और फलदायी माना जाता है।
v पूजा के समय षटतिला एकादशी व्रत कथा का पाठ या श्रवण अवश्य करें।
v व्रत कथा सुनने से व्रत का महत्व समझ में आता है और पुण्य फल की प्राप्ति होती है।
हमारा राष्ट्र पाकिस्तान, बांग्लादेश और चीन जैसे दुश्मनों से घिरा हुआ है, जो सीमाओं और अंतरराष्ट्रीय मंचों पर संचालन के विभिन्न तरीकों का उपयोग करके हमारे महान राष्ट्र को कमजोर करने के लिए अथक प्रयास कर रहे हैं। साथ ही विभिन्न राज्यों में उग्रवादी नक्सलियों को विकसित कर रहे हैं, विभिन्न राज्यों में अशांति पैदा करने के लिए बौद्धिक शहरी नक्सलियों को भी विकसित कर रहे हैं। हम पहले से जानते हैं कि यदि कोई देश सैन्य रूप से कमजोर है और उसके पास मजबूत हथियार, आयुध और गोला-बारूद की कमी है तो अन्य देश स्थिति का लाभ उठाएँगे, जैसा कि हमने 2014 से पहले देखा है। मोदी शासन के पिछले दस वर्षों में स्थिति बदल गई है। आईए देखें कि हमारी रक्षा स्थिति सैन्य और वित्तीय दोनों रूप से कैसे बदल गई।
रक्षा में आत्मनिर्भरता के प्रति भारत का समर्पण एक प्रमुख हथियार आयातक से स्वदेशी निर्माण के उभरते केंद्र में इसके परिवर्तन से प्रदर्शित होता है। वित्त वर्ष 2023-24 में रक्षा मंत्रालय ने रणनीतिक सरकारी नीतियों द्वारा संचालित घरेलू रक्षा उत्पादन में रिकॉर्ड 1.27 लाख करोड़ की वृद्धि दर्ज की। पहले अंतरराष्ट्रीय आपूर्तिकर्ताओं पर निर्भर रहने वाला भारत अब अपनी सुरक्षा मांगों को पूरा करने के लिए आत्मनिर्भर विनिर्माण को प्राथमिकता देता है, जो राष्ट्रीय लचीलापन सुधारने और बाहरी स्रोतों पर निर्भरता कम करने की उसकी महत्वाकांक्षा की पुष्टि करता है।
भारत के रक्षा उत्पादन में वृद्धि
वित्त वर्ष 2023-24 के दौरान मूल्य के संदर्भ में स्वदेशी रक्षा उत्पादन में अब तक की सबसे अधिक वृद्धि दर्ज की, जिसका श्रेय प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी द्वारा आत्मनिर्भरता प्राप्त करने के उद्देश्य से सरकारी नीतियों और कार्यक्रमों के सफल कार्यान्वयन को जाता है। डीपीएसयू, सार्वजनिक क्षेत्र की इकाइयों और निजी कंपनियों के आंकड़ों के अनुसार, रक्षा उत्पादन 2014-15 में 46,429 करोड़ रुपये से 174% बढ़कर 1,27,265 करोड़ रुपये के नए उच्च स्तर पर पहुंच गया है। ऐतिहासिक रूप से, भारत अपनी रक्षा जरूरतों के लिए बड़े पैमाने पर दूसरे देशों पर निर्भर रहा है, जिसमें लगभग 65-70% रक्षा उपकरण आयात किए जाते थे। हालाँकि, माहौल काफी बदल गया है, अब 65% से अधिक रक्षा उपकरण भारत में बनाए जाते हैं। यह परिवर्तन इस महत्वपूर्ण क्षेत्र में आत्मनिर्भरता के लिए देश की प्रतिबद्धता को दर्शाता है और इसके रक्षा औद्योगिक आधार की ताकत को उजागर करता है, जिसमें 16 रक्षा सार्वजनिक क्षेत्र की इकाइयाँ (DPSU), 430 से अधिक लाइसेंस प्राप्त कंपनियाँ और लगभग 16,000 सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यम (MSME) शामिल हैं।
उल्लेखनीय रूप से इस उत्पादन का 21% निजी क्षेत्र से आता है, जो भारत के आत्मनिर्भरता के मार्ग को बढ़ावा देता है। धनुष आर्टिलरी गन सिस्टम, एडवांस्ड टोड आर्टिलरी गन सिस्टम (एटीएजीएस), मुख्य युद्धक टैंक (एमबीटी) अर्जुन, लाइट कॉम्बैट एयरक्राफ्ट (एलसीए) तेजस, पनडुब्बियां, फ्रिगेट, कोरवेट और हाल ही में कमीशन किए गए आईएनएस विक्रांत जैसे प्रमुख रक्षा प्लेटफॉर्म मेक इन इंडिया पहल के हिस्से के रूप में विकसित किए गए हैं, जो भारत की बढ़ती रक्षा क्षेत्र की क्षमताओं को प्रदर्शित करते हैं। वार्षिक रक्षा उत्पादन ₹1.27 लाख करोड़ से अधिक हो गया है और चालू वित्त वर्ष में ₹1.75 लाख करोड़ को पार करने की उम्मीद है। भारत का लक्ष्य 2029 तक रक्षा उत्पादन को बढ़ाकर ₹3 लाख करोड़ करना है, जिससे वह खुद को दुनिया भर में विनिर्माण केंद्र के रूप में स्थापित कर सके। भारत का रक्षा निर्यात वित्त वर्ष 2013-14 में ₹686 करोड़ से बढ़कर वित्त वर्ष 2023-24 में ₹21,083 करोड़ हो गया है, यह उपलब्धि सरकार द्वारा किए गए प्रभावी नीतिगत सुधारों, पहलों और व्यापार करने में आसानी में सुधार का परिणाम है, जिसका लक्ष्य रक्षा में आत्मनिर्भरता हासिल करना है।
पिछले वित्त वर्ष की तुलना में रक्षा निर्यात में 32.5% की वृद्धि हुई, जो ₹15,920 करोड़ थी। भारत के निर्यात पोर्टफोलियो में उन्नत रक्षात्मक उपकरणों की एक विस्तृत श्रृंखला शामिल है, जैसे बुलेटप्रूफ जैकेट और हेलमेट, डोर्नियर (Do-228) विमान, चेतक हेलीकॉप्टर, त्वरित इंटरसेप्टर नौकाएं और हल्के टॉरपीडो। एक उल्लेखनीय विशेषता रूसी सेना के उपकरणों में 'मेड इन बिहार' बूटों को शामिल करना है, जो वैश्विक रक्षा बाजार में भारतीय उत्पादों के लिए एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर का प्रतिनिधित्व करता है, साथ ही देश के मजबूत विनिर्माण मानकों को भी प्रदर्शित करता है।
भारत वर्तमान में 100 से अधिक देशों को निर्यात करता है, जिसमें 2023-24 में रक्षा निर्यात के मामले में संयुक्त राज्य अमेरिका, फ्रांस और आर्मेनिया पहले से तीसरे स्थान पर हैं। रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह का लक्ष्य 2029 तक रक्षा निर्यात को 50,000 करोड़ रुपये तक बढ़ाना है l प्रमुख सरकारी पहल हाल के वर्षों में, भारत सरकार ने देश की रक्षा उत्पादन क्षमता बढ़ाने और आत्मनिर्भरता प्राप्त करने के उद्देश्य से कई परिवर्तनकारी परियोजनाएँ शुरू की हैं। इन नीतियों का उद्देश्य निवेश आकर्षित करना, घरेलू विनिर्माण में सुधार करना और खरीद प्रक्रियाओं को सुव्यवस्थित करना है। प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (FDI) की सीमाओं को उदार बनाने से लेकर स्वदेशी विनिर्माण को बढ़ावा देने तक, ये कदम भारत के रक्षा औद्योगिक आधार को मजबूत करने के लिए एक मजबूत प्रतिबद्धता को प्रदर्शित करते हैं।
निम्नलिखित बिंदु उन महत्वपूर्ण सरकारी प्रयासों का सारांश देते हैं जिन्होंने रक्षा क्षेत्र में विकास और नवाचार को प्रोत्साहित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। उदारीकृत FDI नीति: 2020 में, रक्षा क्षेत्र में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (FDI) की सीमा को नए रक्षा औद्योगिक लाइसेंस चाहने वाली कंपनियों के लिए स्वचालित मार्ग के माध्यम से 74% तक बढ़ा दिया गया था और आधुनिक तकनीकों तक पहुँच की उम्मीद करने वालों के लिए सरकारी मार्ग के माध्यम से 100% तक बढ़ा दिया गया था। 9 फरवरी, 2024 तक, रक्षा फर्मों ने ₹5,077 करोड़ का एफडीआई घोषित किया है। रक्षा मंत्रालय का 2024-25 के लिए बजट आवंटन ₹6,21,940.85 करोड़ है, जो कि मौजूदा बजट सत्र के दौरान संसद में पेश की गई "अनुदान मांग" का हिस्सा है।
घरेलू खरीद को प्राथमिकता: रक्षा अधिग्रहण प्रक्रिया (डीएपी)-2020 घरेलू स्रोतों से पूंजीगत उत्पादों की खरीद पर जोर देती है।
सकारात्मक स्वदेशीकरण सूचियाँ: सेवाओं की कुल 509 वस्तुओं और रक्षा सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों (डीपीएसयू) से 5,012 वस्तुओं की पाँच 'सकारात्मक स्वदेशीकरण सूचियों' की अधिसूचना, निर्दिष्ट समय सीमा के बाद आयात पर प्रतिबंध के साथ तैयार की गई है।
सरलीकृत लाइसेंस प्रक्रिया: औद्योगिक लाइसेंस प्रक्रिया को सुव्यवस्थित करना और लंबी वैधता अवधि प्रदान करना। निष्कर्ष रक्षा में आत्मनिर्भरता के लिए भारत का मार्ग आयात पर निर्भरता से आत्मनिर्भर विनिर्माण केंद्र बनने की ओर एक क्रांतिकारी बदलाव को दर्शाता है। घरेलू उत्पादन और निर्यात में रिकॉर्ड परिणाम राष्ट्रीय सुरक्षा को मजबूत करने और मजबूत रक्षा उपायों के माध्यम से आर्थिक विकास को बढ़ावा देने के लिए सरकार की प्रतिबद्धता को प्रदर्शित करते हैं।
रणनीतिक नीतियों के साथ, स्वदेशीकरण पर बढ़ते जोर और एक संपन्न रक्षा औद्योगिक आधार के साथ, भारत न केवल अपनी सुरक्षा मांगों को पूरा करने के लिए अच्छी स्थिति में है बल्कि वैश्विक हथियार बाजार में एक प्रमुख खिलाड़ी के रूप में उभरने के लिए भी तैयार है। भविष्य के उत्पादन और निर्यात के लिए स्थापित किए गए ऊंचे लक्ष्य दुनिया भर में एक भरोसेमंद रक्षा भागीदार के रूप में देश की स्थिति को मजबूत करने के लिए एक मजबूत प्रतिबद्धता को प्रदर्शित करते हैं। भारत जैसे-जैसे उद्योगों में नवाचार और सहयोग करना जारी रखता है, वह वैश्विक रक्षा विनिर्माण में मजबूत खिलाड़ी के रूप में अपनी स्थिति को मजबूत करने की राह पर है।
लेखक:- पंकज जगन्नाथ जयस्वाल
