रायपुर, 04 अक्टूबर 2024 | मुख्यमंत्री श्री विष्णु देव साय ने दंतेवाड़ा प्रवास के दौरान सर्किट हाऊस परिसर में एक पेड़ मां के नाम अभियान के अंतर्गत केसर आम का पौधा लगाया। इस दौरान छत्तीसगढ़ विधानसभा के अध्यक्ष डॉ. रमनसिंह ने आम एवं वन मंत्री श्री केदार कश्यप ने नारियल का पौधा लगाया। इस अवसर पर सांसद बस्तर श्री महेश कश्यप ने बादाम एवं विधायक श्री चैतराम अटामी द्वारा कटहल का पौधा लगाया गया।
उल्लेखनीय है कि देश के प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी के आह्वान पर एक पेड़ माँ के नाम अभियान के अंतर्गत लगातार पौधरोपण किया जा रहा है। इसी क्रम में दंतेवाड़ा जिले में अब तक 12 लाख से अधिक पौधे लगाए गए हैं।
छत्तीसगढ़ के नीति निर्धारकों को दो कारकों पर विशेष ध्यान रखना पड़ता है एक तो यहां की आदिवासी बहुल आबादी और दूसरी यहां की कृषि प्रधान अर्थव्यस्था। राज्य की नीतियां तय करते समय इन दोनांे की अनदेखी नहीं की जा सकती, दोनों को ही बराबर महत्व देना पड़ता है। हाल ही में केन्द्रीय गृह मंत्री श्री अमित शाह ने छत्तीसगढ़ सहित देश में माओवादी आतंक के खात्मे के प्रति केन्द्र सरकार की प्रतिबद्धता को दोहराया है। केन्द्र के इस फैसले ने राज्य को समृद्धि के रास्ते में आगे जाने के संकल्प को और मजबूती दी है।
छत्तीसगढ़ में डबल इंजन की सरकार बनते ही यहां मुख्यमंत्री श्री विष्णु देव साय के नेतृत्व में राज्य सरकार ने विकसित भारत और विकसित छत्तीसगढ़ के संकल्प को लेकर काम करना शुरू कर दिया है। लगभग तीन करोड़ की आबादी वाला यह राज्य आत्मनिर्भर और विकसित भारत के निर्माण में योगदान दे रहा है। साय सरकार ने छत्तीसगढ़ की बागडोर संभालते ही राज्य के विकास की दिशा को तय करने वाले दो प्रमुख कारकों आदिवासी समुदाय और किसान दोनों पर शुरू से ही ध्यान दिया है। राज्य में लोगों को स्वच्छ और पारदर्शी प्रशासन के वायदे को लेकर आयी साय सरकार आई.टी. और ए.आई आधारित प्रणाली को पूरी प्रतिबद्धता के साथ अपनाना शुरू कर दिया है।
राज्य में कृषक उन्नति योजना खेती-किसानी के लिए एक नया संबल बनी है। इसके चलते कृषि समृद्ध और किसान खुशहाल हुए हैं। राज्य में खेती-किसानी को नई ऊर्जा मिली है। राज्य में उन्नत खेती को बढ़ावा मिल रहा है। राज्य सरकार के किसान हितैषी फसलों का असर अब खेती-किसानी में साफ दिखाई देने लगा है। उन्नत कृषि यंत्रों का उपयोग खेती-किसानी में बढ़ा है। बीते खरीफ विपणन वर्ष में किसानों से 145 लाख मीट्रिक टन धान समर्थन मूल्य पर खरीदा गया है, जिसके एवज में 32 हजार करोड़ रूपए भुगतान किया गया है। छत्तीसगढ़ सरकार ने अपने संकल्प के अनुरूप राज्य के किसानों को दो साल के धान की बकाया बोनस राशि 3716 करोड़ रूपए का भुगतान किया। कृषक उन्नति योजना के अंतर्गत किसानों को धान की मूल्य की अंतर राशि के रूप में 13 हजार 320 करोड़ रूपए का भुगतान किया गया है। इस तरह किसानों को कुल मिलाकर 49 हजार करोड़ रूपए सीधे उनके बैंक खातों में अंतरित किए गए।
छत्तीसगढ़ में किसानों से धान खरीदी शुरू से ही चुनौतीपूर्ण रही है। मुख्यमंत्री श्री विष्णु देव साय की सरकार ने समर्थन मूल्य पर 14 नवम्बर से धान खरीदी करने जा रही है। धान उपार्जन केन्द्रों में छत्तीसगढ़ सरकार के दिशा-निर्देश के मुताबिक सभी तैयारियां की जा रही है। इस साल राज्य में बेहतर बारिश एवं अनुकूल मौसम के चलते धान के विपुल उत्पादन की उम्मीद है। इसको देखते हुए राज्य में समर्थन मूल्य पर 160 लाख मीटरिक टन धान उपार्जन अनुमानित है। राज्य में किसानों से 31 जनवरी 2025 तक धान की खरीदी की जाएगी।
राज्य के किसानों को खेती-किसानी के लिए वर्तमान खरीफ सीजन में 6500 करोड़ रूपए के अल्पकालीन ऋण बिना ब्याज के दिए जा चुके हैं। अधिक से अधिक किसानों को किसान क्रेडिट कार्ड की सुविधा उपलब्ध कराई जा रही है। यहां के किसान अब ई-नाम पोर्टल (कृषि बाजार) के माध्यम से अपने उपज का अधिकतम मूल्य प्राप्त कर सकेंगे। किसानों के हित में छत्तीसगढ़ सरकार ने एक महत्वपूर्ण फैसला लेते हुए छत्तीसगढ़ कृषि उपज मंडी अधिनियम में संशोधन किया है। इसके तहत अन्य प्रदेश के मंडी बोर्ड अथवा समिति के एकल पंजीयन अथवा अनुज्ञप्तिधारी व्यापारी एवं प्रसंस्करणकर्ता, राज्य के किसानों से उनकी उपज खरीद सकेंगे, इससे उत्पादक किसानों को लाभ होगा। किसानों को उन्हें पंजीयन की जरूरत नहीं होगी।
राज्य के बस्तर और अन्य हिस्सों में माओवादी आतंक को समाप्त करने के लिए सख्ती से कदम उठाए गए हैं। इसमें केन्द्र और राज्य सरकार आपसी तालमेल बनाए हुए हैं। माओवादी आतंक भी अब कुछ ही क्षेत्रों में सिमट कर रह गया है। यहां नियद नेल्लानार जैसी नवाचारी योजना से लोगों का सरकार के प्रति फिर से विश्वास लौट रहा है।
माओवादी आतंक से प्रभावित क्षेत्रों में सुरक्षा कैम्प के आस-पास के दायरे में लोगों की मूलभूत सुविधाओं के साथ-साथ केन्द्र और राज्य सरकार के शासकीय योजनाओं का लाभ दिलाया जा रहा हैं। माओवादी आतंक से प्रभावित जिलों में युवाओं को तकनीकी व्यवासायिक पाठ्यक्रम में पढ़ाई के लिए ब्याज मुक्त ऋण की सुविधा दी जा रही हैं। इस पहल से आदिवासी समुदाय की युवाओं को आगे बढ़ने का अवसर मिलेगा।
वनवासियों की आय बढ़ाने के लिए वनोपज के संग्रहण और प्रसंस्करण पर सरकार विशेष ध्यान दे रही हैं। लघु वनोपज की खरीदी समर्थन मूल्य पर हो रही है। इन लघु वनोपजों का वनधन केन्द्रों में प्रसंस्करण भी किया जा रहा है। वनवासियों को तेन्दूपत्ता पारिश्रमिक भी बढ़ाकर 5500 रूपए प्रति मानक बोरा किया गया है। महिलाओं के सशक्तीकरण के लिए महतारी वंदन योजना में 70 लाख महिलाओं को हर महीने एक-एक हजार रूपए की राशि उनके बैंक खाते में सीधे अंतरित की जा रही है। अब तक इसकी नौ किस्त जारी की जा चुकी है।
प्रदेश में नई शिक्षा नीति भी लागू कर दी गई है। राज्य में मातृभाषा में बच्चों को शिक्षा देने के लिए नए पाठ्यक्रम तैयार किए जा रहे हैं। जनजातीय समुदाय के बच्चों के लिए बेेहतर शिक्षा उपलब्ध कराने के लिए 75 एकलव्य आदर्श आवासीय विद्यालय संचालित किए जा रहे हैं। माओवादी प्रभावित क्षेत्र के बच्चों के लिए 15 प्रयास आवासीय विद्यालय का संचालन किया जा रहा है। इन विद्यालयों में मेधावी विद्यार्थियों को अखिल भारतीय मेडिकल और इंजीनियरिंग प्रवेश परीक्षा की तैयारी कराई जा रही हैं। नई दिल्ली में संघ लोक सेवा आयोग की परीक्षा की तैयारी के लिए संचालित यूथ हॉस्टल में सीटों की संख्या 50 से बढ़ाकर 185 कर दी गई है।
जगदलपुर। 1 नवंबर 2000 को मध्यप्रदेश से अलग होकर नया राज्य छत्तीसगढ़ बना, बस्तर वासियों को अपने कामों के लिए पहले 1500 किलोमीटर दूर राजधानी भोपाल जाना पड़ता था, लेकिन राज्य गठन के बाद बस्तर मुख्यालय जगदलपुर से राजधानी की दूरी 300 किलोमीटर हो गई। आज छत्तीसगढ़ ने अपने 24 साल पूरा कर लिए हैं, इन 24 सालों में पिछड़ा क्षेत्र कहे जाने वाले आदिवासी बाहुल्य क्षेत्र बस्तर में हुए विकास का आंकलन करना आश्यक है। बस्तर की सबसे बड़ी उपलब्धि के पैमाने पर देखा जाये ताे बस्तर में स्टील का उत्पादन करने के लिए एनएमडीसी से अपना स्टील प्लांट बस्तर जिले के नगरनार में शुरू किया है। इस स्टील प्लांट से उत्पादन काफी बड़ी मात्रा में होने लगी है।
स्टील प्लांट से स्थापित होने से बस्तर के लोगों को काफी रोजगार भी मिला है। वहीं शिक्षा के क्षेत्र में आंशिक प्रगति हुई है। बस्तर में स्वास्थ्य सुविधा के क्षेत्र में मेडिकल कॉलेज बड़ी उपलब्धि माना जा सकता है, वहीं सुपर स्पेशिलिटी हॉस्पिटल का निर्माण फिलहाल अधूरा है, जिसके कारण इसका शुभारंभ नहीं हो पाया है, जिसे भी बड़ी उपलब्धि माना जा सकता है। 108 संजीवनी एक्सप्रेस, 102 महतारी एक्सप्रेस और डायल 112 ग्रामीण इलाकाें के लिए वरदान साबित हाे रहा है। बस्तर के सातों जिलों में लगातार पुल-पुलियों सड़कों का निर्माण जारी है, हजारों किलोमीटर सड़कों का निर्माण पूरे बस्तर संभाग में हुआ है, लेकिन वर्तमान की स्थिति में कई ऐसे गांव है जो आज भी जुड़ नहीं पाए हैं। बस्तर का एयर कनेक्टिविटी का लाभ नही मिल रहा है। बस्तर को राजधानी रायपुर से जोड़ने के लिए लंबे समय से रावघाट रेल लाइन की मांग की जा रही है, जिसका कार्य अधूरा है जिसे लेकर लाेगाें में भारी नाराजगी है। पर्यटन की असीम संभावनाओं का बस्तर पर ग्रहण लगा हुआ है। कुल मिलाकर छग. निर्माण के 24 सालों में आदिवासी बाहुल्य बस्तर में हुए विकास आशानरूप प्रतीत नही हाेता, बस्तर में और भी तेजी से विकास की आवश्यकता है।
छत्तीसगढ़ राज्य गठन के दौरान बस्तर संभाग में स्कूलों की संख्या काफी कम थी,.अंदरूनी क्षेत्रों में शिक्षा का स्तर नीचे था, अंदरूनी क्षेत्रों में शिक्षा व्यवस्था को सुधारने के लिए पोटाकेबिन, आश्रम और छात्रावास शुरू किया गया। इनमें छात्रों के लिए सुविधाएं मुहैया कराई गई, ताकि अंदरूनी क्षेत्रों के आदिवासी बच्चे इन आश्रम शालाओं में रहकर पढ़ाई पूरी कर सकें। हालांकि नक्सली वरदात के कारण इन 24 सालों में अंदरूनी क्षेत्रों के कुछ स्कूल बंद हुए, लेकिन कुछ स्कूलों को फिर शुरू किया गया। बेहद अंदरूनी इलाकों में आदिवासी पढ़े लिखे युवाओं को सरकार ने शिक्षादूत बनाया, अभी भी कई स्थानों में झोपड़ी बनाकर शिक्षादूत बच्चों का भविष्य सुधार रहे हैं।
बस्तर में स्वास्थ्य सुविधा सबसे बड़ी चुनौती है, पिछड़ा क्षेत्र होने के कारण बेहतर तरीके से स्वास्थ्य सुविधा बस्तरवासियों को नहीं मिल पा रही है। हालांकि इन 24 सालों में सरकार सुविधा को बढ़ाने के लिए निरन्तर प्रयास में जुटी हुई है। बस्तर में स्वास्थ्य सुविधा बेहतर करने के लिए एक मेडिकल कॉलेज शुरू किया गया है, साथ ही बस्तर में जल्द स्वास्थ्य सुविधा मिले इसके लिए 108 संजीवनी एक्सप्रेस, 102 महतारी एक्सप्रेस और डायल 112 भी शुरू किया गया है। वहीं अंदरूनी इलाकों में जहां चार पहिया एम्बुलेंस नहीं पहुंच पाती है. उन क्षेत्रों के लिए बाइक एम्बुलेंस की सुविधा उपलब्ध कराई गई है। बस्तर जिले के डिमरापाल में एक सुपर स्पेशिलिटी हॉस्पिटल का निर्माण कराया गया है, अस्पताल फिलहाल अधूरा है, जिसके कारण इसका शुभारंभ नहीं हो पाया है।
बस्तर के सातों जिलों में लगातार सड़कों का निर्माण जारी है, हजारों किलोमीटर सड़कों का निर्माण पूरे बस्तर संभाग में हुआ है। बस्तर में सबसे चुनाैतीपूर्ण सड़कें सुकमा-कोंटा, दोरनापाल-जगरगुंडा, पल्ली-बारसूर, नारायनपुर-ओरछा, बीजापुर-बासागुड़ा, जगदलपुर-सुकमा, दंतेवाड़ा-बीजापुर, बीजापुर-भोपालपट्टनम हैं. इसके अलावा ब्लॉक मुख्यालय से ग्राम पंचायतों तक सड़कों का निर्माण संभव हुआ है। हालांकि वर्तमान की स्थिति में कई ऐसे गांव है जो आज भी जुड़ नहीं पाए हैं। वहीं बड़े-बड़े पुल-पुलियों का निर्माण बस्तर में हुआ है। इनमें भोपालपट्टनम में इंद्रावती नदी पर बना पुल महाराष्ट्र और तेलंगाना को जोड़ता है, साथ ही अबूझमाड़ के छिंदनार में बना पुल शामिल हैं, वहीं कई छोटे बड़े पुल का निर्माण भी हुआ है। बस्तर एयर कनेक्टिविटी से जुड़ गय, हालांकि शेड्यूल को लेकर इंडिगो ने जगदलपुर से रायपुर की सेवा बंद की है, जिसे जल्द शुरू करने की मांग बस्तर के जनप्रतिनिधियों और आम नागरिकों ने की है। इसके अलावा जगदलपुर से रेल पड़ोसी राज्य आंध्रप्रदेश के विशाखापट्टनम और कोलकाता जैसे महानगर से जुड़ गया है। साथ ही इसके अलावा बस्तर को राजधानी रायपुर से जोड़ने के लिए लंबे समय से रावघाट रेल लाइन की मांग की जा रही है, जिसका कार्य अधूरा है जिसे लेकर लाेगाें में भारी नाराजगी है।
बस्तर में पहले केवल तीरथगढ़, चित्रकोट, तामड़ाघूमर, मेन्द्रीघुमर, कुटुमसरगुफा का ही दीदार पर्यटक करते थे. लेकिन इन 24 सालों में कई पर्यटन क्षेत्र बस्तर में मिले हैं, जिसे देखने के लिए हजारों से संख्या में पर्यटक देश विदेश से बस्तर पहुंचते हैं। इनमें हांदावाड़ा जलप्रपात, झारालावा जलप्रपात, फुलपाड जलप्रपात, नीलमसरई जलप्रपात, नम्बी जलप्रपात, जलप्रपात, मंडवा जलप्रपात, बिजाकसा जलप्रपात, टोपर जलप्रपात, दंडक गुफा, हरी गुफा, मादरकोंटा गुफा, कैलाश गुफा, मिचनार हिल्स स्टेशन, जैसे कई जलप्रपात और गुफाएं शामिल हैं. इसके अलावा बस्तर की संस्कृति से रूबरू करवाने के लिए होम स्टे के साथ ही बैम्बू राफ्टिंग, कयाकिंग जैसे एडवेंचर पर्यटन स्थल भी शुरू किया गया है।लेकिन पर्यटकाें के लिए पर्याप्त सुविधाओं के अभाव में पर्यटकाें काे परेशानी का सामना करना पड़ता है, जिसके लिए काेई कार्ययाेजना अब तक नहीं बनाया जाना पर्यटन की असीम संभावनाओं का बस्तर पर ग्रहण लगा हुआ है।
स्वतंत्रता के पश्चात पंजाब में तो हरियाणवी की घोर उपेक्षा हुई ही, भाषा के आधार पर, पंजाब से अलग राज्य बनने के बाद भी, हरियाणा की सरकारों ने न तो हरियाणवी भाषा की सुध ली और न ही इसके विकास की कोई ठोस कार्ययोजना बनाई। यह कहना है हरियाणवी साहित्य के पुरोधा के रूप में विख्यात वरिष्ठ साहित्यकार डॉ. रामनिवास 'मानव' का। हरियाणा दिवस के सुअवसर पर दिए गए साक्षात्कार में डॉ. 'मानव' ने कहा कि पंजाब से अलग हरियाणा राज्य का गठन ही भाषा के आधार पर हुआ था, लेकिन सरकारों की उपेक्षा के चलते हरियाणवी पिछड़ती चली गई।
उन्होंने स्पष्ट किया कि 'हरियाणा में कल्चर के नाम पर सिर्फ एग्रीकल्चर है' का झूठा नैरेटिव चलाने वाले और हरियाणवी-विरोधी मानसिकता से ग्रस्त कथित साहित्यकारों ने सत्ता के सहयोग से पहले भाषा विभाग पर और फिर हरियाणा साहित्य अकादमी पर आधिपत्य जमा लिया। परिणाम? स्वतंत्रता के समय जो पंजाबी हरियाणवी से उन्नीस थी, वह न केवल संविधान की आठवीं सूची में शामिल होकर राष्ट्रीय भाषा का दर्जा पाने में सफल रही, बल्कि अब ब्रिटेन, कनाडा, अमेरिका, आस्ट्रेलिया आदि देशों में बसे करोड़ों पंजाबी भाषी लोगों के कारण विश्व भाषा बनने की ओर अग्रसर है। किंतु जो हरियाणवी अपने दम पर शताब्दियों पूर्व सुदूर दक्षिण भारत, नेपाल, तजाकिस्तान, कजाकिस्तान तथा कई यूरोपीय देशों तक पहुंच गई थी, स्वतंत्रता-प्राप्ति के 77 और हरियाणा गठन के 68 वर्ष बाद भी अपनी पहचान को बचाए रखने के लिए संघर्ष कर रही है।
हरियाणा के हिंदी और हरियाणवी साहित्य के शोध और संरक्षण में अपने जीवन के पचास महत्वपूर्ण वर्ष खपा देने वाले डॉ. 'मानव' हरियाणवी की वर्तमान स्थिति से बहुत निराश हैं और व्यथित स्वर में कहते हैं कि अब तक हरियाणवी के विकास के लिए जितने भी प्रयास हुए हैं, उनमें से अधिकतर निजी स्तर पर हुए हैं, राज्य सरकार या राज्य की किसी अकादमी का शायद ही कोई योगदान उनमें रहा हो। यही कारण है कि आज तक न तो हरियाणवी का मानक रूप तय हो पाया है, न हरियाणा में हरियाणवी साहित्य अकादमी का गठन हुआ है और न हरियाणवी में कोई पत्रिका निकलती है। फिर हरियाणवी भाषा का समुचित विकास कैसे संभव है!
पूर्व में हरियाणा साहित्य अकादमियों की कार्य-प्रणाली पर क्षोभ प्रकट करते हुए डॉ. 'मानव' ने कहा कि सत्ता के आशीर्वाद से हरियाणा की अकादमियों पर दशकों से कुंडली मारकर बैठे कुछ लोगों ने, अपने पद का दुरुपयोग करते हुए, न केवल चाटुकारिता की अपसंस्कृति को बढ़ावा दिया, बल्कि अकादमियों द्वारा दिए जाने वाले पुरस्कारों की प्रतिष्ठा को भी ठेस पहुंचाई। जो लोग ढाई हजार के पुरस्कार के योग्य नहीं थे, उन्हें ढाई-ढाई लाख के, जो पांच हजार के पुरस्कार के योग्य नहीं थे, उन्हें पांच-पांच लाख के और जो सात हजार के पुरस्कार के योग्य नहीं थे, उन्हें सात-सात लाख के नामित पुरस्कार थोक में बांटे गए। इससे भी दुखद और दुर्भाग्यपूर्ण बात यह रही कि अनेक सुयोग्य और पुरस्कारों के सच्चे अधिकारी साहित्यकारों की घोर उपेक्षा की गई।
हरियाणवी भाषा और साहित्य के विकास में हरियाणा साहित्य एवं संस्कृति अकादमी के वर्तमान कार्यकारी अध्यक्ष डॉ. कुलदीपचंद अग्निहोत्री और निदेशक डॉ. धर्मदेव विद्यार्थी की पहल को सराहनीय बताते हुए डॉ. 'मानव' ने आशा प्रकट की है कि उनके प्रयासों के सार्थक और संतोषजनक परिणाम सामने आएंगे। हरियाणवी को हिंदी का पूर्व रूप और केंद्रीय साहित्य अकादमी के शब्दों में 'हिंदी की सहभाषा' बताते हुए डॉ. 'मानव' ने कहा कि अलग से हरियाणवी साहित्य अकादमी का गठन, हरियाणवी पत्रिका का प्रकाशन, हरियाणवी भाषा का मानकीकरण और समकालीन हरियाणवी साहित्य का मूल्यांकन बहुत जरूरी है। हरियाणवी साहित्य को फूहड़ सांगों, अश्लील रागिनियों और भौंडे चुटकुलों तक सीमित कर देना उचित नहीं है।
उल्लेखनीय है कि साठ महत्वपूर्ण पुस्तकों के लेखक और संपादक डॉ. रामनिवास 'मानव' हरियाणा में रचित हिंदी-साहित्य के प्रथम शोधार्थी और अधिकारी विद्वान तो हैं ही, हरियाणा के समकालीन साहित्य की शोध-परंपरा के विधिवत शुभारंभ का श्रेय भी इन्हें प्राप्त है। 'हरियाणा में रचित सृजनात्मक हिंदी-साहित्य' और 'हरियाणा में रचित हिंदी-महाकाव्य' इनके दो चर्चित शोधग्रंथ हैं। 'हरियाणवी : बोली और साहित्य' तथा 'हरियाणवी' इनकी हरियाणवी पर केंद्रित दो शोधपरक और समीक्षात्मक पुस्तकें हैं। 'हरियाणवी' पुस्तक केंद्रीय साहित्य अकादमी के अनुरोध पर लिखी गई थी तथा इसे 'हिंदी की सहभाषा' शृंखला के अंतर्गत साहित्य अकादमी द्वारा ही प्रकाशित किया गया था।
लेखक:- डॉ. सत्यवान सौरभ
भारतीय जनमानस में दीपावली और मर्यादा पुरुषोत्तम राम के साथ महात्मा गांधी को याद करना अलग तरह का अनुभव है। जीवन का शायद ही कोई प्रश्न हो, जो गांधी से छूट गया हो। ऐसे में जबकि स्वाधीनता आंदोलन के इस महानायक पर भी सोशल मीडिया का एक अंश और कुछ लोग सवाल उठाने लगे हैं, दीपावली के बारे में उनके विचार जाने जा सकते हैं।
दस्तावेजी तथ्य बताते हैं कि बापू ने 1921 में 09 अक्टूबर को दीपावली को राम की विजय का उत्सव कहा था। गुजराती भाषा के ‘नवजीवन’ में उनका लेख छपा था। वे लिखते हैं, “दीवाली के दिन राम के विजय का उत्सव मनाया जाता है। राम की विजय का अर्थ है धर्म की विजय। धर्म की विजय का उत्सव तो धर्म को पालन करने वाले ही मना सकते हैं। उसे वही राष्ट्र मना सकता है जो अपने स्वाभिमान की रक्षा करता हो और स्वाश्रयी हो। इसलिए मैं तो ऐसा समझता हूं कि हमारा कर्तव्य है कि जब तक हमें स्वराज नहीं मिल जाता, दीपावली के इन दिनों में हमें किसी प्रकार का आमोद-प्रमोद नहीं करना चाहिए और न मिष्टान्न भोजन करना चाहिए।”
स्पष्ट है कि गांधी ने स्वराज को जीवन का मुख्य लक्ष्य बना लिया था। सम्पूर्ण देश को भी वे इसी रास्ते पर बढ़ने के लिए प्रेरित करते रहे। इसी में वे आगे लिखते हैं, “जिस समय अपने धर्म और देश के लिए हजारों निर्दोष लोग जेल गये हों, उस समय हम किसी भी प्रकार के आनंद का उपभोग कैसे कर सकते हैं।” आज भी देखें तो वे कोई नई बात नहीं कहते। जब मन-मस्तिष्क उत्सव के अनुकूल न हो, बिना प्रेरणा हम उसमें मन नहीं लगा पाते। उस समय तो सम्पूर्ण देश अपनी आजादी के लिए राष्ट्रव्यापी आंदोलन में मशगूल था।
इसके पहले 1920 में भी गांधीजी इस त्योहार को देश की आजादी से ही जोड़कर देखते हैं। उस वर्ष अहमदाबाद में 31 अक्टूबर को वे महिलाओं की एक सभा को सम्बोधित कर रहे थे। यह भी गुजराती नवजीवन के 03 नवंबर के अंक में प्रकाशित हुआ है। उन्होंने कहा था, “दीपावली, राम सीता जी को छुड़कर लाए, इसकी खुशी का उत्सव है। राम ने रावण पर जैसी विजय प्राप्त की, वैसी हम फिर प्राप्त न कर सकें, तब तक हमे ऐशो-आराम करने या शृंगार करने, स्वाद लेने या पटाखे छुड़ाने का अधिकार नहीं है।”
दीपावली पर गांधीजी रावण को 10 सिर वाले राक्षस के रूप में बताते हुए विदेशी सत्ता को दस हजार सिर वाला बताते हैं। उन्होंने 27 अक्टूबर, 1920 को डाकोर में एक सभा को सम्बोधित किया था। नवजीवन के 03 नवंबर के अंक में प्रकाशित समाचार में उनका कथन इस तरह उद्धृत है- “आज भी हम दीपावली मनाते हैं, तो राम की रावण पर विजय मनाते हैं, परंतु यह विजय हम तभी मना सकते हैं जब हम इस दस नहीं, किंतु दस हजार सिरों वाले रावण को छिन्न-भिन्न नहीं कर सकें।”
आजादी के बाद भी दीपावली को देखने के गांधी के नजरिए में फर्क नहीं आता। विदेशी शासक से मुक्ति मिल चुकी थी, लेकिन गांधी के सपनों के भारत का निर्माण बाकी था। भारत सरकार की ओर से प्रकाशित सम्पूर्ण गांधी वांग्मय के खण्ड-90, पृष्ठ 18 पर दिल्ली की प्रार्थना सभा में 12 नवंबर, 1947 को छपा उनका भाषण है। उनका कहना था, “राम भलाई की ताकतों के प्रतीक थे और रावण बुराई की ताकतों का।........अफसोस है कि आज हिंदुस्थान में रामराज्य नहीं है। इसलिए हम दिवाली कैसे मना सकते हैं? वही आदमी इस दिन की खुशी मना सकता है जिसके दिल में राम हैं।” आज गांधी नहीं हैं, संदर्भ भी लगातार बदले हैं। फिर भी मुद्दा कायम है कि किसके दिल में राम हैं। जिसके दिल में राम हैं, वे स्वयं बता सकते हैं। दीपावली मनाने का अधिकार भी उन्हें ही होना चाहिए।
लेखक:- डॉ. प्रभात ओझा
