उनका राजनैतिक जीवन सन 1905 से प्रारम्भ हुआ जब बंगाल विभाजन के विरोध में पूरे देश में आंदोलन हो रहा था। बंगभंग आंदोलन के दौरान उन्होंने विदेशी वस्तुओं का बहिष्कार प्रारम्भ किया और स्वदेशी अपनाने का प्रण किया। अपने विद्यार्थी जीवन में वे कांग्रेस पार्टी के सदस्य बन गए थे। 1906 में, पुरुषोत्तम दास टंडन ने अखिल भारतीय कांग्रेस समिति का इलाहाबाद में प्रतिनिधित्व किया था। वे लोक सेवक संघ का हिस्सा भी रहे। जालियां वाला बाग कांड के जांच के लिए जो समिति बनाई थी उसमें पुरुषोत्तम दास टंडन भी शमिल थे। 1920 और 1930 के दशक में उन्होंने असहयोग आन्दोलन और नमक सत्याग्रह में भाग लिया था और जेल भी गए। सन 1931 में गांधी जी के लंदन गोलमेज आंदोलन से वापस आने से पहले गिरफ्तार किए गए नेताओं में वे भी थे। पुरुषोत्तम दास टंडन लाला राजपत राय द्वारा स्थापित लोक सेवा बोर्ड के अध्यक्ष भी थे। वे कृषक आंदोलन से भी जुड़े रहे और वे बिहार क्षेत्रीय किसान सभा के अध्यक्ष भी रहे। वह उत्तर प्रदेश के विधान सभा का 13 साल (1937-1950) तक अध्यक्ष रहे। उन्हें 1946 में भारत की संविधान सभा में भी सम्मिलित किया गया।
पुरुषोत्तम दास टंडन ने साहित्य में भी अपना योगदान दिया हैं | विचारो की मदद से स्वतंत्रता प्राप्त करना उनका पहला लक्ष्य था | “यदि हिंदी भारतीय स्वतंत्रता के आड़े आएगी तो मै स्वयं उसका गला घोंट दूँगा”। उनका प्रवेश स्वन्त्रत्र्ता की लड़ाई में साहित्य के कारण ही हुआ था | उन्होंने ग्वालियर कालेज में हिंदी के लेक्चरर के रूप में कार्य किया। 10 अक्टूबर 1990 को काशी में हिंदी साहित्य सम्मलेन का प्रथम अधिवेशन महामना मालवीय जी की अध्यक्षता में हुआ और टंडन जी सम्मलेन के मंत्री नियुक्त हुए।
तदनन्तर हिंदी साहित्य सम्मेलन के माध्यम से हिंदी की अत्यधिक सेना की। टंडन जी ने हिंदी के प्रचार-प्रसार के लिए हिंदी विद्यापीठ प्रयाग की स्थापना की। इस पीठ की स्थापना का उद्देश्य हिंदी शिक्षा का प्रसार और अंग्रेजी वर्चस्व को समाप्त करना था। सन 1949 में जब सविंधान सभा में राजभाषा संबंधी प्रश्न उठाया गया तो उस समय एक विचित्र स्थिति थी। महात्मा गांधी तो हिंदुस्तानी के समर्थक थे ही, पंडित नेहरू और डॉ.राजेंद्र प्रसाद तथा अन्य नेता भी हिंदुस्तानी के पक्षधर थे, पर टंडन जी हारे नही, झुके नहीं। परिणामतः बिजय भी उनकी हुई। 11 से 14 दिसंबर 1949 को गरमागरम बहस के बाद हिंदी और हिंदुस्तानी को लेकर कांग्रेस में मतदान हुआ, हिंदी को 62 और हिंदुस्तानी को 32 मत मिले। अंततः हिंदी राष्ट्रभाषा और देवनागरी राजलिपि घोषित हुई। हिंदी को राष्ट्रभाषा और वंदेमातरम को राष्ट्रगीत स्वीकृत करने के लिए टंडन जी ने अपने सहयोगियों के साथ एक और अभियान चलाया था |
पत्रकारिता :-
पत्रकारिता के क्षेत्र में टण्डन जी अंग्रेजी के भी उद्भट विद्वान थे। श्री त्रिभुवन नारायण सिंह जी ने उल्लेख किया है कि सन 1950 में जब वे कांग्रेस के सभापति चुने गए तो उन्होंने अपना अभिभाषण हिंदी में लिखा और अंग्रेजी अनुवाद मैं किया। श्री सम्पूर्णानंद जी ने भी उस अंग्रेजी अनुवाद को देखा, लेकिन तब टंडन जी ने उस अंग्रेजी अनुवाद को पढ़ा, तो उसमे कई पन्नों को फिर से लिखा। तब तब मुझे इस बात की अनुभूति हुई कि जहां वे हिंदी के विद्वान थे, वहीं अंग्रेजी साहित्य पर भी उनका बड़ा अधिकार था।
मृत्यु :-
पुरुषोत्तम दास टंडन का 1 जुलाई 1962 को उनका स्वर्गवास हो गया और प्रत्येक वर्ष 1 जुलाई के दिन पुरुषोत्तम दास टंडन की पुण्यतिथि मनाया जाता है।
सावन को पवित्र महीना माना जाता है। मान्यता है कि सावन में माता पार्वती ने भगवान शिव की तपस्या करके उन्हें पाया था। सावन दक्षिणायन में आता है जिसके देवता शिव हैं। इसीलिए इन दिनों उन्हीं की आराधना शुभ फलदायक होती है। सावन के महीने में बहुत वर्षा होती है। इसलिये इसे वर्षा ऋतु का महीना या पावस ऋतु भी कहा जाता है। तुम्हें गीतों में ढालूंगा सावन को आने दो । ऐसे गाने सावन आते ही लोगों की जुबान पर खुद-ब-खुद आ जाते हैं। पहले सावन शुरू होते ही गांव की गलियों से लेकर शहरों तक झूले पड़ते थे। महिलाएं झूला झूलतीं और गाती थीं। सावन व भादो का महीना हमें प्रकृति के और निकट ले जाता है। झूले झूलने के दौरान गाये जाने वाले गीत मन को सुकून देते हैं। झूले गांव के बागीचों, मंदिर के परिसरों में डाले जाते थे।
भारतीय संस्कृति में झूला झूलने की परम्परा वैदिक काल से ही चली आ रही है। श्री कृष्ण राधा संग झूला झूलते और गोपियों संग रास रचाते थे। मान्यता है कि इससे प्रेम बढ़ने के अलावा प्रकृति के निकट जाने एवं उसकी हरियाली बनाये रखने की प्रेरणा मिलती है। एक दौर था जब लोगों को सावन के महीने का बेसब्री से इंतजार रहता था। लड़कियां ससुराल से मायके आती थीं। लेकिन अब ये परंपरा खत्म होती जा रही है। अब न तो झूले पड़ते हैं और न गीत सुनाई देते हैं। सावन शुरू हो गया है लेकिन इसका एहसास ही नहीं हो रहा है। उमंग और खुमारी का संगम इसी महीने में हरियाली तीज पर खत्म होता था। सखियों को सुख-दुख बांटने, साथ बैठकर मेहंदी लगाने की परंपरा फिर गीत गाना सब गुम हो चुका है। बच्चे अब झूले नहीं वीडियो गेम में मस्त रहते हैं।
महिला संगठन भी अब किटी पार्टी जैसे आयोजनों तक सीमित हैं। झूले की परम्परा लुप्त होने के पीछे सबसे प्रमुख वजह मनोरंजन के भरपूर साधनों का होना भी हैं। सावन के आते ही गली-कूचों और बगीचों में मोर, पपीहा और कोयल की मधुर बोली के बीच युवतियां झूले का लुत्फ उठाया करती थीं। अब न तो पहले जैसे बाग-बगीचे रहे और न ही मोर की आवाज सुनाई देती है। अब बिना झूला झूले ही सावन गुजर जाता है। वन माफिया के चलते गांवों में भी बाग-बगीचे नहीं बचे हैं। जहां युवतियां झूला डाल कर झूल सके। अब समय के साथ पेड़ गायब होते गए और उनके स्थान पर बहुमंजिला इमारतों के बनने से आंगन का अस्तित्व समाप्त हो गया। ऐसे में सावन के झूले भी यादें बनकर हमारी परम्परा से गायब हो रहे हैं। जन्माष्टमी पर मंदिरों में सावन की एकादशी के दिन भगवान को झूला झुलाने की परम्परा जरूर अभी भी निभाई जा रही है। आज के समय में सावन के झूले नजर नहीं आने का कारण जनसंख्या घनत्व में वृद्धि के साथ ही वृक्षों की कटाई हैं।
लोग अब घर की छत पर या आंगन में लोहे के झूले पर झूलकर मन को संतुष्ट कर रहे हैं। बुद्धिजीवी वर्ग सावन के झूलों के लुप्त होने की प्रमुख वजह सुख सुविधा और मनोरंजन के साधनों में वृद्धि को मान रहे हैं। सावन में झूला झूलना मात्र आनंद की अनुभूति नहीं कराता अपितु यह स्वास्थ्यवर्धक प्राचीन योग भी है। सावन में चारों तरफ हरियाली छाई होती है। हरा रंग आंखों पर अनुकूल प्रभाव डालता है। इससे नेत्र ज्योति बढ़ती है। झूला झूलते समय श्वांस-उच्छवास लेने की गति में तीव्रता आती है। इससे फेफड़े सुदृढ़ होते हैं। इसके साथ ही झूलते समय श्वांस अधिक भरा, रोका एवं वेग से छोड़ा जाता है। इससे नवीन प्रकार का प्राणायाम पूर्ण हो जाता है जो स्वास्थ्य वर्धक है। झूलते समय रस्सी पर हाथों की पकड़ सुदृढ़ होती है। इसी प्रकार खड़े होकर झूलते समय झूले को गति देने बार-बार उठक-बैठक लगानी पड़ती हैं। इन क्रियाओं से एक ओर हाथ, हथेलियों और उंगलियों की शक्ति बढ़ती है वहीं दूसरी ओर हाथ-पैर और पीठ-रीढ़ का व्यायाम हो जाता है।
गांवों की बुजुर्ग महिलायें बताती हैं कि सावन आते ही बेटियां ससुराल से मायके बुला ली जाती थीं और पेड़ों पर झूला डाल कर झूलती थीं। त्योहार में बेटियों को ससुराल से बुलाने की परम्परा तो आज भी चली आ रही है। लेकिन जगह के अभाव में न तो कोई झूला झूल पाता है और न ही अब मोर, पपीहा व कोयल की सुरीली आवाज ही सुनने को मिलती हैं। दस साल पहले तक यहां रक्षाबंधन तक झूले का आनंद लिया जाता था। गांव के पेड़ पर मोटी रस्सी से झूला डाला जाता था और सारे गांव की बहन-बेटियां झूलती थीं। अब पेड़ ही नहीं हैं तो झूला कहां डालें। सावन के महीने में नवविवाहित महिलाओं को अपने मायके जाने की परम्परा राजस्थान में तो आज भी चली आ रही है। अब वक्त ने ऐसी करवट ली है कि सावन तो आता है पर अपने रंग नहीं बिखेर पाता। जिस सावन के आते ही नववधु ससुराल से मायके पहुंच जाती थी। अब वैसा सावन नहीं होता है। झूले की परम्परा लुप्त होने के साथ ही सावन भादों की खुशबू अब कहीं नहीं दिखती है। कुछ स्थानों को छोड़ कर लोग इसका आनंद नहीं ले पा रहे हैं। झूलों के नहीं होने से हमें लोक संगीत भी सुनने को नहीं मिलता है।
आधुनिकता की दौड़ में प्रकृति के संग झूला झूलने की बात अब कहीं नहीं दिखती है। आज से दो दशक पहले तक झूलों और मेहंदी के बिना सावन की परिकल्पना भी नही होती थी। झूला झूलने के खत्म हुए रिवाज के लिए गांवों में फैल रही वैमनष्यता भी जिम्मेदार हैं। पहले गांव के लोग हर बहन-बेटी को अपनी मानते थे लेकिन अब जमाना बदल गया है। जिसके हाथ में रक्षा सूत्र बांधा जाता है वही भक्षक बन जाता है। बाग-बगीचों के खात्मे के साथ जहां मोर-पपीहों की संख्या घटी है वहीं भाईचारे में कमी आई है। नतीजतन झूला-झूलने की परम्परा को ग्रहण लग गया है। पहले संयुक्त परिवार में बड़े-बूढ़ों के सानिध्य में लोग एक दूसरे के घरों में एकत्रित होते थे। आज बढ़ती एकल परिवार की प्रवृति ने आपसी स्नेह को खत्म कर दिया है। महिलाएं सामुदायिक केन्द्रों में जाकर पर्व मनाती हैं। शहरों में अब झूले डालने के लिए जगह की तलाश करनी पड़ती है। अब तो पारम्परिक पहनावा भी आधुनिकता की भेंट चढ़ गया है। अब छुट्टी के दिन लोग परिवार के साथ बाग-बगीचों में जाकर सावन का त्यौहार मनाने की रस्म पूरी करते हैं। वर्षा ऋतु में सावन की खूबियां अब किताबों तक ही सीमित रह गई हैं। अब प्रकृति के साथ जीने की परम्परा भी थमती सी जा रही है।
लेखक:- रमेश सर्राफ धमोरा
स्वतंत्रता संग्राम सेनानी और सुविख्यात वेदान्त विभूति श्रीपाद दामोदर सातवलेकर का निधन
भारत राष्ट्र के सांस्कृतिक गौरव का मूल वेद-वेदांग है । इसलिए विदेशी आक्रांताओं ने वेदों और उनकी महत्ता को धूमिल करने का प्रयत्न किया किंतु समय समय पर ऐसी विलक्षण विभूतियों ने जन्म लिया जिन्होंने अपना वेद-वेदांग के माध्यम से भारत राष्ट्र के सांस्कृतिक और आध्यात्मिक गौरव को पुर्नप्रतिष्ठित करने का काम किया। श्रीपाद दामोदर सातवलेकर ऐसी ही विभूति थे ।
भारत सरकार ने 1968 में उन्हें 'साहित्य एवं शिक्षा' के क्षेत्र में पद्म भूषण से सम्मानित भी किया था।
उनका जन्म महाराष्ट्र में सह्याद्रि पर्वत शृंखला के दक्षिणी छोर पर स्थित सावंतवाड़ी क्षेत्र के एक छोटे से गांव 'कोलगांव' में 19 सितंबर 1868 को हुआ था । यह गांव अब रत्नागिरि जिला के अंतर्गत आता है । इनके परिवार में वैदिक वातावरण था । पिता श्री दामोदर भट्ट, पितामह श्री अनंत भट्ट और प्रपितामह श्री कृष्ण भट्ट भी ऋग्वेदिक वैदिक परंपरा के मूर्धन्य विद्वान रहे हैं। इसलिए बालक श्रीपाद भी बचपन से वेदों का अध्ययन करने लगे । आठ वर्ष की आयु में उन की विद्यालयीन शिक्षा आरंभ हुई। आचार्य श्री चिंतामणि शास्त्री केलकर संस्कृत आचार्य बने । संस्कृत और वैदिक अध्ययन केसाथ उन्होंने चित्रकला सीखी । वहां उन्हें मालवणकर जी गुरु के रूप में मिले । उनके पिता श्री दामोदर भट्ट भी चित्रकला में प्रवीण थे। अत: घर की दीवारों पर श्रीपाद की चित्रकारी निखरने लगी। मूर्तिकला में भी उनका कोई सानी नहीं था। चित्रकला में निपुण होकर उन्होंने हैदराबाद में अपनी चित्रशाला स्थापित की। अपने व्यवसाय के साथ-साथ उन्होंने स्वतंत्रता आंदोलन में भी उत्साहपूर्वक भाग लेना आरंभ किया। और अपने लेखों के माध्यम से समाज जागरण आरंभ किया । उनके लेखन का आधार वेद ही होते थे । बंदी बनाये गए और तीन वर्ष कारावास में रहे । जेल से मुक्त हुये तो परिवार ने उनका विवाह कर दिया । उन्हे वैदिक विद्वान साधले परिवार की
पुत्री सरस्वती देवी पत्नि के रूप में मिली । विवाह के एक वर्ष बाद श्रीपाद जी आजीविका के लिये मुम्बई पहुंचे। लेकिन चित्रकारी वेद-वेदांग का अध्ययन यथावत रहा । चित्रकारी और शिल्पकला में उन्हे दो बार सर्वोत्तम "मेयो पदक" पुरुस्कार मिला । 1893 में मुम्बई के जे.जे. स्कूल ऑफ आर्ट में शिक्षक के रूप में नियुक्ति हो गयी ।
सन् 1900 में श्रीपाद मुम्बई छोड़कर वापस हैदराबाद आ गए । वे यहाँ तेरह वर्ष रहे। और अपने समय के सुप्रसिद्ध चित्रकार देउस्कर जी की सहायता से एक स्टूडियो बनाया। यहीं उनका संपर्क वे आर्य समाज से हुआ । वे आर्य समाज की वेदांत गोष्ठियों में भाग लेने लगे। उनकी व्याख्या और तर्क से समूचा वैदिक विद्वान समाज प्रभावित हुआ । उन्होंने आर्य समाज केलिये "सत्यार्थ प्रकाश", "ऋग्वेदादि भाष्य भूमिका" व "योग तत्वादर्श" का मराठी में अनुवाद भी किया।
वेदों के अर्थ और आशय का जितना गंभीर अध्ययन और विश्लेषण श्रीपाद सातवलेकर जी ने किया उतना कदाचित् ही किसी अन्य भारतीय ने किया हो। वैदिक साहित्य के संबंध में उन्होंने अनेक लेख लिखे और उन्होंने विवेक वर्धिनी नामक शिक्षा संस्थान भी स्थापना किया । राष्ट्रीय विचारों से ओतप्रोत आपकी ज्ञानोपासना निजाम प्रशासन को अच्छी न लगी । उनपर दबाब आया और हैदराबाद छोड़ देना पड़ा। वे हैदराबाद से चलकर हरिद्वार पहुँचे। विद्वानों से मिले और 1918 मे औंध पहुँचे । यहाँ वे पुनः स्वतंत्रता आंदोलन और भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस से जुड़े वे स्वदेशी पर व्याख्यान देने शुरू किये। 1919 में उन्होंने औंध में "स्वाध्याय मण्डल" की स्थापना की। ऋग्वेद, सामवेद, यजुर्वेद और अथर्ववेद का अनुवाद करना आरंभ किया। जो प्रकाशित भी हुआ। 1919 में ही उन्होंने हिन्दी में "वैदिक धर्म" मासिक और 1924 में मराठी "पुरुषार्थ" पत्रिकाओं का प्रकाशन शुरू किया। पंडित सातवलेकर ने छात्रों तथा सामान्य पाठकों के लिए वेदों की भाषा को सरलता पूर्वक समझ सकने योग्य बनने हेतु "संस्कृत स्वयं शिक्षक" पुस्तकमाला का लेखन किया।
1936 में सतारा आये यहाँ उनका संपर्क राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से के संस्थापक डाक्टर हेडगेवार से हुआ और वे संघ से जुड़ गये । उन्हें औंध रियासत के संघचालक का दायित्व मिला । उन्होंने पूरे क्षेत्र में प्रवास कल नयी शाखाएं आरम्भ कीं। सोलह वर्षों तक उन्होंने संघ का काम देखा और कार्य विस्तार किया । इसी बीच 1942 में "अंग्रेजो भारत छोड़ो" नाम से स्वाधीनता आंदोलन म का आव्हान हुआ । श्रीपाद जी इस आँदोलन में सक्रिय हो गये । गिरफ्तार हुये जेल गये । अथक परिश्रम के कारण उनकी शारीरिक शक्ति क्षीण होने लगी थी। वे अस्वस्थ भी रहने लगे थे। अस्वस्थता के कारण रिहा कर दिये गये । जेल से आकर वे पूरी तरह वेद-वेदांग में लग गये । सातवलेकर जी ने कोई 409 ग्रंथों की रचना की। इनमें सर्वाधिक प्रतिष्ठा उनके वेद-भाष्यों को मिली है। आचार्य सायण के वेद-भाष्य के बाद इन्हीं का वेद-भाष्य हिन्दी में सर्वाधिक प्रमाणिक माना जाता है। आपके द्वारा संकलित "वैदिक राष्ट्रगीत" तो अद्भुत ग्रंथ है। यह एक साथ ही मराठी एवं हिंदी भाषाओं मुम्बई और प्रयागराज दोनों स्थानों से प्रकाशित हुआ। उनके द्वारा सृजित राष्ट्रशत्रु का विनाश करने में सक्षम वैदिक मंत्रों के इस संग्रह से उन शक्तियों को गहरी ठेस लगी जो भारत में भारतीयों को भ्रमित कर मतान्तरण का षड्यंत्र कर रहीं थीं। इनमें कुछ मिशनरीज शक्ति आगे थी । उनके दबाब में अंग्रेजी सत्ता ने इस ग्रंथ पर प्रतिबंध लगाया और इसकी सभी प्रतियाँ जब्त करके नष्ट करने का आदेश दे दिया। जिनपर से प्रतिबंध स्वतंत्रता के बाद ही उठ सका ।
उनके द्वारा ऋग्वेद का सुबोध भाष्य चार खण्डों में, यजुर्वेद का सुबोध भाष्य दो खण्डों में,
सामवेद का सुबोध अनुवाद
अथर्ववेद का सुबोध भाष्य चार खण्डों में प्रकाशित हुआ । इनके अतिरिक्त ऋग्वेद मूल संहिता, यजुर्वेद मूल संहिता, सामवेद मूल संहिता, अथर्ववेद मूल संहिता, यजुर्वेदीय काठक संहिता, यजुर्वेदीय मैत्रायणी संहिता, यजुर्वेदीय काण्व संहिता तथा
कृष्ण यजुर्वेदीय तैत्तिरीय संहिता उनके प्रमुख ग्रंथ हैं। उन्हें 9 जून 1968 को पक्षाघात हुआ और 31 जुलाई 1968 को एक सौ एक वर्ष की आयु में उन्होंने संसार से विदा ली ।
आज वे हमारे बीच नहीं हैं पर वैदिक साहित्य को पुनप्रतिष्ठित करने में उनका जो योगदान है उसके प्रति भारतीय सनातन समाज सदैव ऋणी रहेगा ।
लेखक - रमेश शर्मा
उधम सिंह भारत के स्वतन्त्रता संग्राम के महान सेनानी एवं क्रान्तिकारी थे I सरदार उधम सिंह का जन्म 28 दिसंबर 1899 को पंजाब के संगरूर जिले के सुनाम गांव में हुआ था, उनके पिता का नाम टहल सिंह और माता का नाम नारायण कौर था। उन्होंने उनका नाम शेर सिंह रखा। जन्म के दो साल बाद ही उनकी मां का निधन हो गया। कुछ साल बाद यानी 1907 में उनके पिता की भी मौत हो गई माता पिता के मृत्यु के बाद उधम और उनके भाई को अमृतसर के सेंट्रल खालसा अनाथालय में भेज दिया था अनाथालय में लोगो ने दोनों भाइयो को नया नाम दिया । शेर सिंह बन गए उधम सिंह और मुखता सिंह बन गए साधू सिंह । सरदार उधम सिंह ने भारतीय समाज की एकता के लिए अपना नाम बदलकर राम मोहम्मद सिंह आज़ाद रख लिया था, जो भारत के तीन प्रमुख धर्मो का प्रतीक है। साल 1917 में उधम के भाई की भी मौत हो गयी। 1918 में उधम ने मैट्रिक पास किए।साल 1919 में उन्होने अनाथालय छोड़ दिया, उधम सिंह,सहिद भगत सिंह को अपना गुरु मानते थे।
1919 जालियावाला बाग हत्याकांड
बैसाखी के दिन 13 अप्रैल 1919 को अमृतसर के जलियांवाला बाग में एक सभा रखी गई, जिसमें कुछ नेता भाषण देने वाले थे। शहर में कर्फ्यू लगा हुआ था, फिर भी इसमें सैंकड़ों लोग ऐसे भी थे, जो बैसाखी के मौके पर परिवार के साथ मेला देखने और शहर घूमने आए थे और सभा की खबर सुन कर वहां जा पहुंचे थे। जब नेता बाग में पड़ी रोड़ियों के ढेर पर खड़े हो कर भाषण दे रहे थे, तभी ब्रिगेडियर जनरल रेजीनॉल्ड डायर 90 ब्रिटिश सैनिकों को लेकर वहां पहुँच गया। उन सब के हाथों में भरी हुई राइफलें थीं। नेताओं ने सैनिकों को देखा, तो उन्होंने वहां मौजूद लोगों से शांत बैठे रहने के लिए कहा। सैनिकों ने बाग को घेर कर बिना कोई चेतावनी दिए निहत्थे लोगों पर गोलियाँ चलानी शुरू कर दीं। १० मिनट में कुल 1650 राउंड गोलियां चलाई गईं। जलियांवाला बाग उस समय मकानों के पीछे पड़ा एक खाली मैदान था। वहाँ तक जाने या बाहर निकलने के लिए केवल एक संकरा रास्ता था और चारों ओर मकान थे। भागने का कोई रास्ता नहीं था। कुछ लोग जान बचाने के लिए मैदान में मौजूद एकमात्र कुएं में कूद गए, पर देखते ही देखते वह कुआं भी लाशों से पट गया। ब्रिटिश राज के अभिलेख इस घटना में 200 लोगों के घायल होने और 379 लोगों के शहीद होने की बात स्वीकार करते है जिनमें से 337 पुरुष, 41 नाबालिग लड़के और एक 6-सप्ताह का बच्चा था। अनाधिकारिक आँकड़ों के अनुसार 1000 से अधिक लोग मारे गए और 2000 से अधिक घायल हुए।
जब जलियांवाला बाग में यह हत्याकांड हो रहा था, उस समय उधमसिंह वहीं मौजूद थे और उन्हें भी गोली लगी थी। उन्होंने तय किया कि वह इसका बदला लेंगे।
इस घटना के बाद उधम सिंह क्रांतिकारी राजनीति में शामिल हो गए और स्वतंत्रता सेनानी भगत सिंह से प्रभावित हुए। वर्ष 1924 में उधम सिंह भारत में ब्रिटिश शासन को उखाड़ फेंकने के लिए ग़दर पार्टी में शामिल हो गए और इसके लिए विदेशों में भारतीयों को संगठित किया। 1927में भगत सिंह से आदेश मिलने के बाद उधम सिंह 25 साथियों और गोला-बारूद लेकर भारत आए। हालाँकि, जल्द ही उन्हें 25 साथियों के साथ गिरफ्तार कर लिया गया। उनकी गिरफ्तारी के समय, उनके पास से हथियार, गोला-बारूद और ग़दर पार्टी के प्रतिबंधित अख़बार "ग़दर-ए-गंज" की प्रतियाँ ज़ब्त की गईं, जिसके कारण उन्हें पाँच साल की जेल हुई।
1931 में रिहा होने के बाद उन्होंने उधम सिंह के नाम से पासपोर्ट बनवाया और इंग्लैंड की यात्रा की। द्वितीय विश्व युद्ध से पहले के वर्षों में उन्होंने कई यूरोपीय देशों का दौरा किया। युद्ध की शुरुआत क्रांतिकारियों के लिए एक प्रवेश बिंदु बन गई, जो मानते थे कि भारत में ब्रिटिश राज को उखाड़ फेंकने का यह सही समय है।
सन् 1934 में उधम सिंह लंदन पहुँचे और वहां 9, एल्डर स्ट्रीट कमर्शियल रोड पर रहने लगे। वह 6 सालों तक लंदन में रहे और 13 मार्च 1940 में सरदार उधम सिंह को उस नरसंहार का बदला लेने का मौका मिल ही गया।
जलियांवाला बाग हत्याकांड के 21 साल बाद 13 मार्च 1940 को रायल सेंट्रल एशियन सोसायटी की लंदन के काक्सटन हाल में बैठक थी जहां माइकल ओ'डायर भी वक्ताओं में से एक था। उधम सिंह उस दिन समय से ही बैठक स्थल पर पहुँच गए। अपनी रिवॉल्वर उन्होंने एक मोटी किताब में छिपा ली। इसके लिए उन्होंने किताब के पृष्ठों को रिवॉल्वर के आकार में उस तरह से काट लिया था, जिससे डायर की जान लेने वाला हथियार आसानी से छिपाया जा सके।
बैठक के बाद दीवार के पीछे से मोर्चा संभालते हुए उधम सिंह ने माइकल ओ'डायर पर गोलियां दाग दीं। दो गोलियां माइकल ओ'डायर को लगीं जिससे उसकी तत्काल मौत हो गई। उधम सिंह ने वहां से भागने की कोशिश नहीं की और अपनी गिरफ्तारी दे दी
ब्रिटेन में ही उन पर मुकदमा चला और 4 जून 1940 को उधम सिंह को हत्या का दोषी ठहराया गया और 31 जुलाई 1940 को उन्हें पेंटनविले जेल में फांसी दे दी गई.
हर वर्ष सावन माह के कृष्ण पक्ष की दशमी तिथि के अगले दिन कामिका एकादशी मनाई जाती है. यह पर्व भगवान विष्णु को समर्पित होता है. इस दिन भगवान विष्णु एवं धन की देवी मां लक्ष्मी की विशेष पूजा की जाती है. पुराणों में कहा गया है कि इस तिथि पर भगवान विष्णु की पूजा और व्रत करने से मनोकामनाएं पूरी होती हैं. सावन महीने के कृष्ण पक्ष में आने वाली इस एकादशी पर भगवान विष्णु को तुलसी पत्र चढ़ाने से जाने-अनजाने में हुए पाप खत्म हो जाते हैं. इस दिन तीर्थ स्नान और दान से कई गुना पुण्य फल मिलता है.
कामिका एकादशी की तिथि
पंचांग के अनुसार सावन माह के कृष्ण पक्ष की एकादशी तिथि 30 जुलाई को संध्याकाल 4:44 मिनट पर शुरू होगी और अगले दिन यानी 31 जुलाई को संध्याकाल 3:55 मिनट पर समाप्त होगी. सनातन धर्म में व्रत-त्योहार के लिए सूर्योदय के बाद से तिथि की गणना की जाती है, ऐसे 31 जुलाई को कामिका एकादशी मनाई जाएगी.
कामिका एकादशी क्यों किया जाता है?
कामिका एकादशी व्रत की कथा सुनना यज्ञ करने के समान है. इस व्रत के बारे में ब्रह्माजी ने देवर्षि नारद को बताया कि पाप से भयभीत मनुष्यों को कामिका एकादशी का व्रत अवश्य करना चाहिए. एकादशी व्रत से बढ़कर पापों के नाशों का कोई उपाय नहीं है. स्वयं प्रभु ने कहा है कि कामिका व्रत से कोई भी जीव कुयोनि में जन्म नहीं लेता. जो इस एकादशी पर श्रद्धा-भक्ति से भगवान विष्णु को तुलसी पत्र अर्पण करते हैं, वे इस समस्त पापों से दूर रहते हैं.
कामिका एकादशी का महत्व
कामिका एकादशी पर शंख, चक्र, गदाधारी भगवान विष्णु का पूजन होता है. भीष्म पितामह ने नारदजी को इस एकादशी का महत्व बताया है. उन्होंने कहा कि जो मनुष्य इस एकादशी को धूप, दीप, नैवेद्य आदि से भगवान विष्णु की पूजा करते हैं, उन्हें गंगा स्नान के फल से भी उत्तम फल की प्राप्ति होती है. इस एकादशी की कथा सुनने से ही वाजपेय यज्ञ का फल मिल जाता है.
भीष्म कहते हैं कि व्यतिपात योग में गंडकी नदी में और सूर्य-चन्द्र ग्रहण के दौरान स्नान करने से जितना पुण्य मिलता है. उतना ही महापुण्य सावन महीने में आने वाली कामिका एकादशी पर व्रत और भगवान विष्णु की पूजा करने से मिल जाता है.इस दिन तुलसी पत्र से भगवान विष्णु की पूजा करने का भी विधान बताया गया है.
कामिका एकादशी का शुभ योग
कामिका एकादशी पर ध्रुव योग का निर्माण हो रहा है. इस योग का संयोग दोपहर 02:14 मिनट तक है. ज्योतिष ध्रुव योग को बेहद शुभ मानते हैं.
· इस योग में भगवान श्रीहरि विष्णु की पूजा करने से साधक को मनोवांछित फल की प्राप्ति होगी. साथ ही शुभ कार्यों में सिद्धि मिलेगी.
· इस दिन सर्वार्थ सिद्धि योग का भी संयोग बन रहा है. सर्वार्थ सिद्धि योग दिन भर है.
· शिववास योग
कामिका एकादशी पर देवों के देव महादेव कैलाश पर्वत पर विराजमान रहेंगे. इस समय में भगवान शिव का अभिषेक करने से साधक को सभी प्रकार के सुखों की प्राप्ति होगी. भगवान शिव दोपहर 03:55 मिनट तक कैलाश पर रहेंगे. इसके बाद नंदी पर सवार होंगे. दोनों समय अभिषेक के लिए अनुकूल है. इस समय में भगवान नारायण की भी पूजा करने से साधक के सुख और सौभाग्य में बढ़ोतरी होगी.
· व्रत का संकल्प
स्कंद पुराण में बताया गया है कि सावन महीने के कृष्ण पक्ष में आने वाली एकादशी पर व्रत, पूजा और दान से जाने-अनजाने में हुए पाप खत्म हो जाते हैं लेकिन, जानबूझकर दोबारा कोई पाप या अधर्म नहीं होगा, ऐसा संकल्प भगवान विष्णु के सामने लेने पर ही इसका फल मिलता है. ये व्रत साल की 24 एकादशियों में खास माना गया है.
· सावन में विष्णु पूजा का महत्व
महाभारत और भविष्य पुराण में बताया गया है कि सावन महीने के दौरान भगवान विष्णु की पूजा करनी चाहिए. इनके अलावा विष्णुधर्मोत्तर पुराण में भी जिक्र है कि सावन महीने में भगवान विष्णु की पूजा और व्रत-उपवास से मिलने वाला पुण्य कभी खत्म नहीं होता है. पंचामृत और शंख में दूध भरकर भगवान विष्णु का अभिषेक करने से जाने-अनजाने में हुए हर तरह के पाप खत्म हो जाते हैं.
· निर्जल व्रत
सावन महीने में आने वाली एकादशियों को पर्व भी कहा जाता है. सावन मास में भगवान नारायण की पूजा करने वालों से देवता, गंधर्व और सूर्य आदि सब पूजित हो जाते हैं. एकादशी के दिन स्नानादि से पवित्र होने के बाद पूजा का संकल्प लेना चाहिए. इसके बाद भगवान विष्णु की मूर्ति की पूजा करना चाहिए.
· भगवान विष्णु को फूल, फल, तिल, दूध, पंचामृत और अन्य सामग्री चढ़ाकर आठों प्रहर निर्जल रहना चाहिए यानी पूरे दिन बिना पानी पीए विष्णु जी के नाम का स्मरण करना चाहिए. एकादशी व्रत में ब्राह्मण भोजन एवं दक्षिणा का भी बहुत महत्व है. इस प्रकार जो यह व्रत रखता है उसकी कामनाएं पूरी होती हैं.
· गौ दान का पुण्य
पितामह ने बताया कि पूरे साल भगवान विष्णु की पूजा न कर सकें तो कामिका एकादशी का उपवास करना चाहिए. इससे बछड़े सहित गौदान करने जितना पुण्य मिल जाता है. सावन महीने के कृष्ण पक्ष की एकादशी पर भगवान विष्णु की पूजा और उपवास करने से सभी देवता, नाग, किन्नर और पितरों की पूजा हो जाती है. जिससे हर तरह के रोग, शोक, दोष और पाप खत्म हो जाते हैं.
· मिलता है स्वर्ग
कामिका एकादशी के व्रत के बारे में खुद भगवान ने कहा है कि मनुष्यों को अध्यात्म विद्या से जो फायदा मिलता है उससे ज्यादा फल कामिका एकादशी का व्रत करने से मिल जाता है. इस दिन व्रत करने से मनुष्य को यमराज के दर्शन नहीं होते हैं. बल्कि स्वर्ग मिलता है. जिससे नरक के कष्ट नहीं भोगने पड़ते.
· दीपदान
भीष्म ने नारदजी को बताया कि कामिका एकादशी की रात में जागरण और दीप-दान करने से जो पुण्य मिलता है. उसको लिखने में चित्रगुप्त भी असमर्थ हैं. एकादशी भगवान विष्णु के सामने घी या तिल के तेल का दीपक जलाना चाहिए। जो ऐसे दीपक लगाता है उसे सूर्य लोक में भी हजारों दीपकों का प्रकाश मिलता है. ऐसे लोगों के पितरों को स्वर्ग में अमृत मिलता है.
