काबा ने शांति से यह सब सुना और फिर नम्रता से शपथ करते हुए कहा- "महाराज ! आज से डकैती का पेशा मेरे लिए हराम है |" यह कहकर उसने अपने सभी शस्त्रास्त्र संत रविदास के चरणों में डाल दिए और उनके चरणों में नतमस्तक हो गया | संत ने उसका हाथ पकड़कर उठाया और उसे ह्रदय से लगा लिया | उसी दिन से क्रूर काबाजी डाकू सरल हृदय भक्त बन गया और तब से पहाड़ी रास्तों में उसका स्थान संतों का आतिथ्यधाम बन गया|
कबीर कब पैदा हुए कब मरे, हिंदू की कोख से कि मुसलमान की, उन्हें दफनाया गया कि मुखाग्नि दी गई, इसका सही-सही लेखा जोखा किसी के पास नहीं। फिर भी उनकी जयंती ढलते जेठ की उमस भरी तपन के बीच पड़ती है। जबकि कबीर वैशाख की दोपहर के सूरज की तरह तीक्ष्ण और ज्वलनशील थे जिसके ताप को आज भी महसूस कर सकते हैं।
प्रतिवर्ष 21 जून को दुनियाभर के 170 से भी ज्यादा देश अंतरराष्ट्रीय योग दिवस के रूप में मनाते हैं और योग को अपनी दिनचर्या का हिस्सा बनाने का संकल्प लेते हैं। संयुक्त राष्ट्र ने संयुक्त राष्ट्र महासभा के 69वें सत्र में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी द्वारा रखे गए प्रस्ताव के जवाब में 11 दिसंबर 2014 को अंतरराष्ट्रीय योग दिवस की स्थापना की और वैश्विक स्तर पर पहला अंतरराष्ट्रीय योग दिवस 21 जून 2015 को मनाया गया । इस वर्ष पूरी दुनिया 'स्वयं और समाज के लिए योग' थीम के साथ 10वां अंतरराष्ट्रीय योग दिवस मना रही है। प्रतिवर्ष यह दिवस मनाने का उद्देश्य योग को एक ऐसे आंदोलन के रूप में बढ़ावा देना है।
वैसे तो योग को विश्वस्तर पर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के सतत प्रयासों के चलते वर्ष 2015 में अपनाया गया, किंतु भारत में योग का इतिहास सदियों पुराना है। माना जाता रहा है कि पृथ्वी पर सभ्यता की शुरुआत से ही योग किया जा रहा है लेकिन साक्ष्यों की बात करें तो योग करीब पांच हजार वर्ष पुरानी भारतीय परंपरा है। करीब 2700 ईसा पूर्व वैदिक काल में और उसके बाद पतंजलि काल तक योग की मौजूदगी के ऐतिहासिक प्रमाण मिलते हैं। महर्षि पतंजलि ने अभ्यास तथा वैराग्य द्वारा मन की वृत्तियों पर नियंत्रण करने को ही योग बताया था। हिंदू धर्म शास्त्रों में भी योग का व्यापक उल्लेख मिलता है। विष्णु पुराण में कहा गया है कि जीवात्मा तथा परमात्मा का पूर्णतया मिलन ही अद्वेतानुभूति योग कहलाता है।
इसी प्रकार भगवद्गीता बोध में वर्णित है कि दुःख-सुख, पाप-पुण्य, शत्रु-मित्र, शीत-उष्ण आदि द्वंदों से अतीतय मुक्त होकर सर्वत्र समभाव से व्यवहार करना ही योग है। भारत में योग को निरोगी रहने की करीब पांच हजार वर्ष पुरानी मानसिक, शारीरिक और आध्यात्मिक पद्धति के रूप में मान्यता प्राप्त है, जो भारतीयों की जीवनचर्या का अहम हिस्सा है। सही मायनों में योग भारत के पास प्रकृति प्रदत्त ऐसी अमूल्य धरोहर है, जिसका भारत सदियों से शारीरिक और मानसिक लाभ उठाता रहा है, लेकिन कालांतर में इस दुर्लभ धरोहर की अनदेखी का ही नतीजा है कि लोग तरह-तरह की बीमारियों के मकड़जाल में जकड़ते गए। वैसे तो स्वामी विवेकानंद ने भी अपने शिकागो सम्मेलन के भाषण में सम्पूर्ण विश्व को योग का संदेश दिया था लेकिन कुछ वर्षों पूर्व योग गुरु स्वामी रामदेव द्वारा योग विद्या को घर-घर तक पहुंचाने के बाद ही इसका व्यापक प्रचार-प्रसार संभव हो सका और आमजन योग की ओर आकर्षित होते गए। देखते ही देखते कई देशों में लोगों ने इसे अपनाना शुरू किया। आज की भागदौड़ भरी जीवनशैली में योग का महत्व कई गुना बढ़ गया है।
योग न केवल कई गंभीर बीमारियों से छुटकारा दिलाने में मददगार साबित होता है बल्कि मानसिक तनाव को खत्म कर आत्मिक शांति भी प्रदान करता है। दरअसल यह एक ऐसी साधना, ऐसी दवा है, जो बिना किसी लागत के शारीरिक एवं मानसिक बीमारियों का इलाज करने में सक्षम है। यह मस्तिष्क की सक्रियता बढ़ाकर दिनभर शरीर को ऊर्जावान बनाए रखता है। यही कारण है कि अब युवा एरोबिक्स व जिम छोड़कर योग अपनाने लगे हैं। माना गया है कि योग तथा प्राणायाम से जीवनभर दवाओं से भी ठीक न होने मधुमेह रोग का भी इलाज संभव है। यह वजन घटाने में भी सहायक माना गया है।
योग की इन्हीं महत्ताओं को देखते हुए प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने 27 सितम्बर 2014 को संयुक्त राष्ट्र महासभा से आह्वान किया था कि दुनियाभर में प्रतिवर्ष योग दिवस मनाया जाए ताकि प्रकृति प्रदत्त भारत की इस अमूल्य पद्धति का लाभ पूरी दुनिया उठा सके। यह भारत के बेहद गर्व भरी उपलब्धि रही कि संयुक्त राष्ट्र महासभा में प्रधानमंत्री के इस प्रस्ताव के महज तीन माह के भीतर 177 देशों ने अंतरराष्ट्रीय योग दिवस मनाए जाने के प्रस्ताव पर स्वीकृति की मोहर लगा दी, जिसके उपरांत संयुक्त राष्ट्र महासभा द्वारा 11 दिसम्बर 2014 को घोषणा कर दी गई कि प्रतिवर्ष 21 जून का दिन दुनियाभर में अंतरराष्ट्रीय योग दिवस के रूप में मनाया जाएगा।
अंतरराष्ट्रीय योग दिवस के लिए 21 जून का ही दिन निर्धारित किए जाने की भी खास वजह रही। दरअसल यह दिन उत्तरी गोलार्ध का पूरे कैलेंडर वर्ष का सबसे लंबा दिन होता है। इस दिन की तिथि को ग्रीष्म संक्रांति के साथ मेल खाने के लिए बनाया गया था, जो उत्तरी गोलार्ध में वर्ष का सबसे लंबा दिन होता है और प्रकाश और स्वास्थ्य का प्रतीक है। भारतीय संस्कृति के नजरिये से देखें तो ग्रीष्म संक्रांति के बाद सूर्य दक्षिणायन हो जाता है तथा यह समय आध्यात्मिक सिद्धियां प्राप्त करने में लाभकारी माना गया है। आधुनिक चिकित्सा विज्ञान भी योग के महत्व को स्वीकारने लगा है। इसलिए स्वस्थ जीवन जीने के लिए जरूरी है कि योग को अपनी दिनचर्या का अटूट हिस्सा बनाया जाए। बहरहाल, योग केवल एक व्यायाम नहीं है बल्कि यह शरीर और मन के साथ-साथ स्वयं को सशक्त बनाने का एक बेहतरीन तरीका है।
लेखक:- योगेश कुमार गोयल
देश में प्रायः हर उस चुनाव के बाद विद्युतीय मतदान मशीन (इलेक्ट्रानिक वोटिंग मशीन) पर सवाल उठते रहे हैं, जब किसी भी विपक्ष की सरकार नहीं बन पाती। इस बार भी लोकसभा चुनाव के बाद देर से ही सही, लेकिन (इलेक्ट्रानिक वोटिंग मशीन) ईवीएम पर सवाल उठने लगे हैं। हालांकि अभी स्वर इसलिए भी धीमे हैं, क्योंकि लोकसभा चुनाव में विपक्ष के राजनीतिक दलों ने अपनी ताकत बढ़ाकर एक मजबूत विपक्ष बनने का रास्ता तैयार कर लिया है। देश के राजनीतिक इतिहास में ऐसा दृश्य पहली बार दिख रहा है, जब विपक्ष सरकार बनाने से दूर रहकर भी अपनी विजय का अहसास करा रहा है। इसके विपरीत सत्ता पाने वाले राजग इस बात की समीक्षा कर रहा है कि उसकी सीटें कम कैसे हो गईं। जबकि यह समीक्षा विपक्षी दलों को करना चाहिए। खैर… बात हो रही थी ईवीएम की। इस लोकसभा चुनाव से पूर्व भी भाजपा के नेतृत्व में दो बार केंद्र में सरकार बनी, तब भी विपक्ष का यही मानना था कि ईवीएम की गड़बड़ी के कारण ही भाजपा ने विजय प्राप्त की है। हालांकि इन दस वर्ष के दौरान कई बार ऐसे चुनाव परिणाम भी आए हैं, जिसमें भाजपा को हार का सामना करना पड़ा। लेकिन विसंगति यही है कि इसके बाद विपक्ष की ओर से ईवीएम पर कोई सवाल नहीं उठाए गए। ऐसी स्थिति में यही कहा जा सकता है कि विपक्ष की ओर से स्थिति देखकर ही सवाल उठाए जाते हैं।
विपक्षी राजनीतिक दलों को ऐसा ही लगता है कि भाजपा के पास कोई जनाधार नहीं है। वे मात्र ईवीएम के सहारे ही जीतते हैं। जबकि विपक्ष के किसी राजनीतिक दल को किसी राज्य में सत्ता प्राप्त हो जाए तो फिर ईवीएम पर सवाल नहीं उठाए जाते। हम जानते हैं कि विपक्ष को केवल भाजपा की जीत से परहेज है। वे भाजपा की जीत को पचा नहीं पाते, जबकि दिल्ली और पंजाब में आम आदमी पार्टी को छप्पर फाड़ समर्थन मिला था, लेकिन तब ईवीएम पर कोई सवाल नहीं उठा। हमें स्मरण होगा कि सन 2014 के लोकसभा चुनाव परिणाम के बाद विपक्षी दलों के अधिकतर नेताओं ने एक स्वर में ईवीएम पर सवाल खड़े किए थे। तब इन सवालों का जवाब देने के लिए चुनाव आयोग ने सारे राजनीतिक दलों को बुलाया था कि ईवीएम को कोई हैक करके दिखाए। लेकिन उस समय ज्यादा विरोध करने वाले कोई भी राजनेता चुनाव आयोग के बुलावे पर नहीं पहुंचे। इसका तात्पर्य यही है कि विपक्ष के ईवीएम पर आरोप का कोई पुष्ट आधार नहीं है। इस बार भी केवल आशंका के आधार पर ईवीएम को निशाने पर लाने की कोशिश की जाने लगी है।
चुनाव परिणाम के बाद इस बात की पूरी संभावना बन रही थी कि इस बार ईवीएम को आड़े हाथ लिया जाएगा। इसलिए चुनाव आयोग ने भी ईवीएम को लेकर उत्पन्न होने वाले भ्रम को दूर करने का प्रयास किया। लेकिन इतना होने के बाद भी यह भ्रम दूर नहीं हो सका और ईवीएम पर आरोप लगने शुरू हो गए हैं। यह विवाद कितनी दूर तक जाएगा, यह तो कहना मुश्किल है, लेकिन ज़ब धुआं उठने लगा है तो आग भी कहीं न कहीं लगी ही होगी। अब विपक्ष के निशाने पर चुनाव आयोग और ईवीएम दोनों ही हैं। विपक्ष की ओर से यह कई बार कहा गया कि चुनाव आयोग केंद्र सरकार के संकेत पर कार्य करता है। वास्तविकता यह है कि चुनाव आयोग एक स्वायत्त संस्था है, जिस पर न तो किसी सरकार का कोई प्रभाव रहता है और न ही किसी राजनीतिक दल का। फिर भी चुनाव आयोग को क्यों विवाद में घसीटा जाता है। यहां यह भी बताना बहुत महत्वपूर्ण है कि अगर विदेश का कोई व्यक्ति या संस्था भारत के बारे में कोई सवाल उठाता है तो हमारे देश के कुछ लोग उस पर आंख बंद करके विश्वास कर लेते हैं, जबकि हमारे देश के संस्थान केवल सफाई देते रहते हैं। अभी हाल ही में एलन मस्क द्वारा यह कहकर सनसनी फैलाने का ही काम किया है कि ईवीएम हैक हो सकती है। एलन मस्क ने यह बयान क्यों दिया, यह तो वही जानें, लेकिन विदेश के लोगों द्वारा भारत के बारे में ऐसे विवादित बयान कई बार दिए जा चुके हैं, जिसको आधार बनाकर भारत की राजनीति को प्रभावित करने का प्रयास किया गया। पाकिस्तान की तरफ से तो मोदी सरकार को सत्ता से हटाने के लिए एक अभियान सा चलता दिखाई दिया। बेहतर यही होता कि विदेश के किसी भी व्यक्ति को सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों तरफ से आईना दिखाने का कार्य किया जाता। क्योंकि यह भारत के अंदरुनी मामले हैं, जिनका समाधान कोई विदेशी कभी नहीं निकाल सकता।
ईवीएम पर सवाल उठाने से पहले यह सोचना होगा कि भारत एक बड़ा देश है। ईवीएम प्रणाली से समय की बचत तो होती ही है, साथ ही व्यय में भी कमी आती है। ईवीएम को लेकर जो सवाल अभी उठ रहे हैं, वे सवाल वास्तव में उस समय उठने चाहिए थे, ज़ब ईवीएम को भारत में लाया गया। उस समय की कांग्रेस की सरकार इसे लेकर आई। ऐसा लगता है कि उस समय यह ठीक थी, लेकिन बाद में उसी को बुराई के रूप में देखा जाने लगा। सत्यता यही है कि किसी भी विवाद में एक पक्ष को पराजित होना ही पड़ता है। यह पराजय भले ही न्यायपूर्ण हो, लेकिन जो हारता है उसे वह न्याय भी अन्याय जैसा ही लगता है। ईवीएम भी कुछ ऐसे ही वाकये का शिकार हो रही है। लोकसभा चुनाव के बाद देश में नई सरकार का गठन हो चुका है। परिणाम के बाद जो राजनीतिक स्थिति बनी है, उसके अनुसार भारतीय जनता पार्टी अन्य सभी दलों से बहुत आगे है। इसका तात्पर्य यही है कि भारत की जनता की पहली पसंद आज भी भाजपा ही है। इस सत्य को स्वीकार करना ही होगा। निराधार आरोप लगाने की राजनीति ने कभी देश का भला नहीं किया, इसलिए अब देश के बारे में सोचिए। यह समय की मांग है।
लेखक:- सुरेश हिन्दुस्तानी
