स्वतंत्रता के बाद जन आंदोलन में दो वर्ष जेल में रहे|
भारतीय स्वाधीनता संग्राम में कुछ ऐसे सेनानी हुये जिनका पूरा जीवन संघर्ष में बीता । पहले स्वतंत्रता के लिये अंग्रेजों से संघर्ष किया और स्वतंत्रता के बाद जन समस्याओं के निवारण के लिये अपनी ही सरकार से । सुप्रसिद्ध स्वतंत्रता संग्राम सेनानी डॉ.गया प्रसाद कटियार ऐसे ही संघर्षशील सेनानी थे । स्वतंत्रता के लिये वे दोनों संघर्ष में सहभागी रहे । अहिसंक आँदोलन में भी और क्राँतिकारी गतिविधियों में भी ।
ऐसे विलक्षण स्वाधीनता संग्राम सेनानी डाक्टर गया प्रसाद कटियार का जन्म 20 जून 1900 को उत्तर प्रदेश के कानपुर जिला अंतर्गत बिल्हौर तहसील के ग्राम जगदीशपुर में हुआ था। उनके पिता मौजीराम भारतीय औषधियों के वैद्य थे और माता नंदरानी भारतीय परंराओं के अनुरूप अपना जीवन निर्वाह करने वाली सुघड़ गृहस्थ थीं । परिवार आर्यसमाज से जुड़ा था । हाई स्कूल की शिक्षा पूरी करने के बाद उन्होंने कानपुर में मेडिसिनल प्रैक्टिस कोर्स किया और नाम के आगे डाक्टर उपाधि लगी । अपनी आजीविका और जनसेवा के लिये उन्होंने कानपुर में चिकित्सक व्यवसाय अपनाया । 1919 में उनका विवाह रज्जो देवी से हुआ । परिवार दायित्व और चिकित्सा व्यवसाय के साथ वे कानपुर आर्यसमाज शाखा से जुड़े । उन दिनों कानपुर आर्यसमाज भारतीय स्वाधीनता आँदोलन केलिये एक वैचारिक केन्द्र था । यहाँ उनकी भेंट अनेक स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों से हुई और वे अहिसंक आँदोलन से जुड़ गये । कानपुर में होने वाली प्रभात फेरी एवं सभाओं के आयोजन में सक्रिय हुये । असहयोग आँदोलन आरंभ हुआ तो डाक्टर गयाप्रसाद ने आँदोलन में भाग लिया और गिरफ्तार हुये । तभी चौरी चौरा काँड हुआ और गाँधीजी ने आँदोलन स्थगित कर दिया । डाक्टर गयाप्रसाद कटियार गाँधी जी के इस निर्णय से सहमत नहीं हुये । वे संघर्ष निरन्तर रखना चाहते थे । कानपुर आर्य समाज में उनका परिचय उस समय के सुप्रसिद्ध पत्रकार गणेशशंकर विद्यार्थी से हुआ था। विद्यार्थी प्रताप समाचार पत्र के संपादक थे । यह समाचार पत्र क्राँतिकारियों का एक प्रमुख मिलन केन्द्र था । विद्यार्थी के माध्यम से डाक्टर गयाप्रसाद जी क्राँतिकारी आँदोलन से जुड़े। यहाँ उनका परिचय क्राँतिकारी आँदोलन का नेतृत्व कर रहे चंद्रशेखर आजाद, भगत सिंह और राजगुरु जैसे क्राँतिकारियों से बना और डा गयाप्रसाद कटियार का चिकित्सा केन्द्र भी इस क्राँतिकारी आँदोलन का गुप्त केन्द्र बन गया । डाक्टर गयाप्रसाद जी के लगभग सभी क्राँतिकारियों से गहरे संबंध थे । भगत सिंह और राजगुरु दोनों होली मनाने के लिए 20 मार्च, 1926 को डॉ. गया प्रसाद के गाँव जगदीशपुर भी गए थे ।
क्रांतिकारियों ने गया प्रसाद को बम तथा अन्य हथियार बनाने की फैक्ट्री बनाने का काम सौंपा। डा कटियार ने क्राँतिकारी बीएस निगम के नाम को आगे करके औषधि निर्माण कारखाने के नाम पर यह बम फैक्ट्री शुरू की । यह फैक्ट्री 10 अगस्त 1928 से 9 फरवरी 1929 तक चालू रही । कारखाने में छ्द्म नाम से अन्य क्रांतिकारी भी सक्रिय रहे जैसे क्राँतिकारी शिव वर्मा का नाम राम नारायण कपूर, चन्द्रशेखर आजाद का संबोधन पंडित जी, सुखदेव को बलेजर, महावीर सिंह को प्रताप सिंह, जयगोपाल को गोपाल और बच्चू की भूमिका में विजय कुमार सिन्हा के रूप में पहचान बनी । कहने के लिये यह औषधालय था पर इसका उपयोग बम बनाने के लिए था। कारखाने से अक्सर रासायनों की गंध आती थी पर पड़ोसी समझते थे कि यह औषधियों के निर्माण से उठने वाली गंध है ।
डाक्टर गयाप्रसाद कटियार को क्राँतिकारी आँदोलन के प्रमुख रणनीतिकारों में थे । माना जाता है कि सांडर्स वध की योजना एवं क्राँतिकारी भगतसिंह का नाम और स्वरूप बदलकर गुप्त केंद्रीय कार्यालय संचालन करने की रणनीति डा कटियार ने ही बनाई थी । दिल्ली की पार्लियामेंट में फेंके गए बम निर्माण आदि कार्यों में भी उनका महत्वपूर्ण योगदान रहा ।
सेलुलर जेल से रिहा हुये तब शारीरिक रूप से बहुत कमजोर थे । उन्हें स्वस्थ होने में लगभग दो वर्ष लगे ।
स्वस्थ होने के बाद वे सामाजिक कार्यों में सक्रिय हुये और समाजवादी आँदोलन से जुड़ गये । इसके माध्यम से उन्होंने किसानों और श्रमिकों के अधिकारों के लिए संघर्ष आरंभ किया। इन आँदोलनों में वे दो बार जेल गये । पहली बार 1958 में 6 महीने के लिए और फिर 1966 में डेढ़ साल के लिए। जेल से रिहा होकर उन्हें अनेक बीमारियों ने घेर लिया इससे सामाजिक आयोजनों में उनकी सक्रियता कम हुई और अंततः एक लंबी बीमारी के बाद 10 फरवरी 1993 को 93 वर्ष की आयु में उन्होंने संसार से विदा ली ।
भारत सरकार ने 26 दिसंबर 2016 को उनकी स्मृति में डाक टिकट जारी किया। इसके लिये आयोजित कार्यक्रम की अध्यक्षता केन्द्रीय स्वास्थ्य और परिवार कल्याण राज्य मंत्री सुश्री अनुप्रिया पटेल ने की थी ।
लेखक - रमेश शर्मा
संघशक्ति के सहयोग, मोदीजी के संकल्प से साकार हुआ संतो के संघर्ष का सपना
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ शक्ति की सहभागिता
संतों द्वारा आरंभ किये गये जन्म स्थान पर प्रतिष्ठापना संघर्ष को राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की सहभागिता से निर्णायक गति मिली । पूरे देश की भावनाएँ तो थीं पर उन भावनाओं को संगठित कर दिशा देने का काम राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने किया । यूँ तो राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ अपनी स्थापना के साथ ही संतों के अभियान का समर्थक रहा है फिर भी माना जाता है कि 1966 में आरंभ हुये गौरक्षा आँदोलन से गति तेज हुई । राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के द्वितीय सरसंघचालक गुरु गोलवलकर जी की गोरखपुर और काशी यात्रा में संतों ने उनके सामने अयोध्या का विषय रखा । चर्चा है कि 1961 में सुन्नी बक्फ बोर्ड की सक्रियता बढ़ने से संतों में चिंता बढ़ी और संतों ने संघ से सहयोग की अपेक्षा की । संघ के बारे में कहा जाता है कि वह अचानक कोई विषय नहीं उठाता । पहले विषय को समझता है, जन भावनाओं का अध्ययन करता है फिर आगे बढ़ने की तैयारी होती है । संभवतः भारत पाकिस्तान युद्ध, जेपी आँदोलन और फिर आपातकाल आदि के चलते कोई निर्णायक योजना न बन सकी । माना जाता है कि आपातकाल के बाद संघ के तृतीय सरसंघचालक बाला साहब देवरस जी के समय इस विषय पर गंभीरता से विचार मंथन हुआ और 1984 से इस संघर्ष संघ की खुली सहभागिता देखी गई। चर्चा है कि तब देवरस जी ने संघ के प्रचारकों से बहुत स्पष्ट शब्दों में कमसेकम तीन दशक तक यह संघर्ष चलाने की तैयारी करने का संकेत किया था । इतनी मानसिक तैयारी के साथ संघ इस आँदोलन में खुलकर सामने आया । लेकिन संघ की यह भूमिका या सहभागिता श्रेय लेने की नहीं थी अपितु संतों को पूरी शक्ति से सहयोग करने की ही रही । इसकी झलक आठ अप्रैल 1984 को नई दिल्ली के विज्ञान भवन में आयोजित पहली धर्मसंसद में दिखती है । जिसमें संघ की भूमिका केवल सेवा प्रबंधन में थी । इस धर्म संसद में 76 मत एवं पंथ के कुल 558 धर्माचार्य और संत उपस्थित थे । जिसमें राम जन्मभूमि मुक्ति यज्ञ समिति का गठन हुआ । समिति के अध्यक्ष महंत अवैधनाथ, महामंत्री दाउदयाल खन्ना मुख्य महामंत्री तथा महंत नृत्य गोपाल दास, महंत रामंचद्र दास, ओंकार भावे, महेश नारायण सिंह और दिनेश त्यागी को महामंत्री घोषित हुये। समिति ने देश व्यापी जन जागरण अभियान चलाने का निर्णय लिया । विश्व हिंदू परिषद को इस आंदोलन के संचालन का दायित्व सौंपा गया । इसके बाद युवाओं को जोडऩे के लिये हिंदू युवा सम्मेलनों का आयोजन आरंभ हुये ।
इसी वर्ष युवाओं को जोडऩे के लिए बजरंग दल का गठन हुआ। विनय कटियार इसके प्रथम राष्ट्रीय संयोजक बने। बजरंग दल ने आठ अक्तूबर 1984 को अयोध्या से लखनऊ तक श्रीराम रथयात्रा का आयोजन किया जिसमें नारा लगा
"बजरंग दल की है ललकार, ताला खोले यह सरकार" इस पदयात्रा में हजारों की संख्या में साधु-संत, युवा चल पड़े और "आगे बढ़ो जोर से बोलो, जन्मभूमि का ताला खोलो", "जबतक ताला नहीं खुलेगा, तब तक हिंदू चैन न लेगा" आदि नारे भी लगे । विश्व हिन्दू परिषद, बजरंग दल और रामजन्म भूमि मुक्ति अभियान समिति ने 1984 में तालों में बंद रामलला के बड़े-बड़े बैनर 40 ट्रकों पर लगाए और उन्हें पूरे उत्तर प्रदेश में यात्रा निकालकर सामाजिक जागरण किया । देशभर में राम शिलापूजन आरंभ हुआ जो देश के तीन लाख से ज्यादा गांवों और कस्बों तक पहुँचा । भारतीय जनता पार्टी ने 1989 से राममंदिर का मुद्दा अपने एजेण्डे में लिया । यह माना जाता है कि संघ की सलाह पर ही भाजपा ने राम मंदिर को अपने एजेण्डे में लिया होगा । जिस प्रकार राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से संबंधित संगठनों की सक्रियता से संतों के रामजन्म स्थान मुक्ति संघर्ष को गति मिली उसी प्रकार भारतीय जनता पार्टी के खुलकर सामने आने के बाद इस मुक्ति आंदोलन को गति मिली । इसके साथ कारसेवा आरंभ हुई और भाजपा के वरिष्ठ नेता श्री लाल कृष्ण आडवाणी जी ने रथ यात्रा भी आरंभ की । 1990 के गोलीकांड में बलिदान होने वाले कारसेवकों में अधिकांश राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के स्वयं सेवक थे । और अंत में छै दिसम्बर को विवादास्पद ढांचा गिर गया ।
संतों और संघ से संबंधित संगठनों के अतिरिक्त कोई अन्य संगठन यह बात खुलकर नहीं कह पाया कि वहाँ राममंदिर था और राममंदिर ही बनना चाहिए।
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का संकल्प
अयोध्या में भगवान राम जन्मस्थान के गौरव की प्रतिष्ठापना यदि संतों के संघर्ष और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की सक्रिय सहभागिता से हो सकी तो इसमें तीसरा महत्वपूर्ण आयाम है प्रधानमंत्री श्रीनरेंद्र मोदी की संकल्प शक्ति। मोदी जी प्रधानमंत्री तो 2014 में बने । पर वे लगभग तैंतीस वर्ष पहले भाजपा के वरिष्ठ नेता श्रीलालकृष्ण आडवाणी की रामजन्म मुक्ति संकल्प रथ यात्रा के समन्वयक थे । बिहार में रथयात्रा के रोके जाने के बाद मोदीजी श्री मुरली मनोहर जोशी के साथ अयोध्या आये और संकल्प व्यक्त किया कि अब जन्मस्थान की मुक्ति के बाद ही अयोध्या आयेंगे। मोदीजी ने प्रचार से दूर रहकर लगभग पूरे भारत की यात्रा की और जन जागरण किया । न्यायालयों के निर्णय तो इससे पहले भी आये थे लेकिन तब प्रत्येक सरकार ने उनके क्रियान्वयन में तुष्टीकरण का संतुलन बिठाने का प्रयास किया । यही नहीं ढांचा ढहने के बाद तत्कालीन प्रधानमंत्री ने वहाँ पुनः मस्जिद बनाने की ही बात संसद में कही थी । लेकिन प्रधान मंत्री नरेन्द्र मोदी ने न्यायालय के निर्णय को यथारूप में ही क्रियान्वयन करने की दिशा में कदम बढ़ाया। मोदी ने सबका साथ सबका विश्वास, सबका समन्वयक और सहमति की भावना के अनुरूप जन्मस्थान मंदिर निर्माण के प्रति पूरी दृढ़ता व्यक्त की । वे इस विषय पर सदैव चिंतित रहे । उन्होंने पिछले चार वर्षों में अयोध्या के विकास पर लगभग दो दर्जन बैठकें कीं । वस्तुतः मोदी जी अयोध्या में मंदिर का निर्माण के साथ उस स्थल के आध्यात्मिक केन्द्र बनाने के लिये प्रयत्नशील रहे जो उनकी ग्यारह दिनों की साधना तथा वहाँ अनुष्ठान से स्पष्ट है ।
जिस प्रकार प्रातःकालीन सूर्योदय के निमित्त हजारों पलों की आहूति होती है । उसी प्रकार लाखों संतों और भक्तों का बलिदान हुआ, जिस प्रकार ब्रह्म मुहूर्त प्रातःकालीन यात्रा के लिये मार्ग बनाता है उसी प्रकार राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की शक्ति ने पूरे देश में वातावरण बनाया और मानों ऊषाकाल अपनी विनती से भगवान सूर्यदेव को प्रकट करते हैं उसी प्रकार प्रधानमंत्री श्रीनरेंद्र मोदी की संकल्प शक्ति से अंततः समस्त विश्व ने अपने जन्मस्थान पर रामलला विराजमान होते हुये देखा ।
लेखक: रमेश शर्मा
भारत आज अर्थ के विभिन्न क्षेत्रों में नित नई ऊंचाईयां छू रहा है। दिसम्बर 2023 के प्रथम सप्ताह में भारत ने फ्रान्स एवं ब्रिटेन को पीछे छोड़ते हुए शेयर बाजार के पूंजीकरण के मामले में पूरे विश्व में पांचवा स्थान हासिल किया था। भारत से आगे केवल अमेरिका, चीन, जापान एवं हांगकांग थे। परंतु, अब दो माह से भी कम समय में भारत ने शेयर बाजार के पूंजीकरण के मामले में हांगकांग को पीछे छोड़ते हुए विश्व में चौथा स्थान प्राप्त कर लिया है। भारतीय शेयर बाजार का पूंजीकरण 4.35 लाख करोड़ अमेरिकी डॉलर से भी अधिक का हो गया है। अब ऐसा आभास होने लगा है कि भारत अर्थ के क्षेत्र में वैश्विक स्तर पर अपनी खोई हुई प्रतिष्ठा को पुनः प्राप्त करता हुआ दिखाई दे रहा है। एक ईसवी से लेकर 1750 ईसवी तक आर्थिक दृष्टि से पूरे विश्व में भारत का बोलबाला था। इस खंडकाल में विश्व के कुल विदेशी व्यापार में भारत की हिस्सेदारी 32 प्रतिशत से भी अधिक की रही है क्योंकि उस समय पर भारत में सनातन संस्कृति का पालन करते हुए व्यापार किया जाता था। भारत में कर्म एवं अर्थ के कार्यों को धर्म का पालन करते हुए करने की प्रथा का पुरातन शास्त्रों में वर्णन मिलता है। भारत में चूंकि आज एक बार पुनः सनातन संस्कृति का पालन करते हुए विभिन्न क्षेत्रों में कार्य सम्पन्न हो रहे हैं अतः पूरे विश्व का भारत पर विश्वास बढ़ रहा है अतः न केवल विदेशी वित्तीय संस्थान बल्कि विदेशी नागरिक भी भारत के पूंजी (शेयर) बाजार में अपने निवेश को लगातार बढ़ाते जा रहे हैं।
मातोश्री रमाबाई का जन्म 07 फ़रवरी 1898 वणंदगाव, रत्नागिरी में हुआ था। मातोश्री’ रमाबाई-भीमराव आम्बेडकर बाबा साहेब की पत्नी थीं। आज भी लोग उन्हें ‘मातोश्री’ रमाबाई के नाम से जानते हैं। 7 फ़रवरी 1898 को जन्मी रमा के परिवार की आर्थिक स्थिति बहुत अच्छी नहीं थी। बचपन में ही उनके माता-पिता का देहांत हो गया था। ऐसे में उनके मामा ने उन्हें और उनके भाई-बहनों को पाला।
वर्ष 1906 में 9 वर्ष की उम्र में उनका विवाह बॉम्बे (अब मुंबई) में 14-वर्षीय भीमराव से हुआ। रमाबाई को भीमराव प्यार से ‘रामू’ बुलाते थे और वो उन्हें ‘साहेब’ कहकर पुकारतीं थीं। विवाह के तुरंत बाद से ही रमा को समझ में आ गया था कि पिछड़े तबकों का उत्थान ही बाबा साहेब के जीवन का लक्ष्य है। और यह तभी संभव था, जब वे खुद इतने शिक्षित हों कि पूरे देश में शिक्षा की मशाल जला सके।बाबा साहेब के इस संघर्ष में रमाबाई ने अपनी आख़िरी सांस तक उनका साथ दिया। बाबा साहेब ने भी अपने जीवन में रमाबाई के योगदान को बहुत महत्वपूर्ण माना है। उन्होंने अपनी किताब ‘थॉट्स ऑन पाकिस्तान’ को रमाबाई को समर्पित करते हुए लिखा, कि उन्हें मामूली-से भीमा से डॉ. आम्बेडकर बनाने का श्रेय रमाबाई को जाता है।
इतिहास की पुस्तकों में इस संघर्ष का सबसे कम विवरण
"वो सब अपराधी हैं,जिन्होंने आपको विस्मृत किया"
माघ मास में आने वाली षटतिला एकादशी का विशेष महत्व है मान्यता हैं कि व्रत के प्रभाव से मनुष्य को मृत्यु के बाद मोक्ष की प्राप्ति के साथ ही स्वर्ग में समस्त सुखों की प्राप्ति होती है l इस दिन भगवान विष्णु की उपासना और तिल के भोग का खास महत्व है l
ज्योतिष के अनुसार, षटतिला एकादशी पर तिल का भोग बहुत लाभकारी है l इस व्रत में तिल से स्नान, तिल का उबटन लगाना, तिल से हवन, तिल से तर्पण, तिलों का दान और तिलों से बनी चीजों का सेवन करना अत्यंत शुभ माना गया हैl
प्रात:काल स्नान के बाद भगवान विष्णु की पूजा करें और उन्हें पुष्प, धूप आदि अर्पित करें. इस दिन व्रत रखने के बाद रात को भगवान विष्णु की आराधना करें, साथ ही रात्रि में जागरण और हवन करें. इसके बाद द्वादशी के दिन प्रात:काल उठकर स्नान के बाद भगवान विष्णु को भोग लगाएं और पंडितों को भोजन कराने के बाद स्वयं अन्न ग्रहण करें.
षटतिला एकादशी व्रत के 5 महत्व-
1. षटतिला एकादशी का व्रत करने से सभी पापों से मुक्ति मिलती है.
2. भगवान विष्णु की कृपा पाने से व्यक्ति को जीवन के अंत में वैकुंठ में स्थान प्राप्त होता है.
3. षटतिला एकादशी के दिन पानी में तिल डालकर स्नान करने से सेहत अच्छी रहती है.
4. माघ माह में जो भी व्यक्ति गंगा स्नान या संगम स्नान करता है, उसे सहज ही भगवान विष्णु की कृपा प्राप्त हो जाती है.
5. षटतिला एकादशी पर जो व्यक्ति जितना तिल दान करता है, उतने ही वर्ष स्वर्ग में रहने का सौभाग्य प्राप्त होता है.
षटतिला एकादशी की व्रत कथा –
चिरकाल में एक बार नारद जी ने भगवान श्रीहरि विष्णु जी से षटतिला एकादशी व्रत की महिमा और कथा जानने की इच्छा जताई। उस समय विष्णु जी ने कहा-हे महर्षि! एक समय की बात है। पृथ्वी लोक पर एक ब्राह्मणी नित्य-प्रतिदिन मेरी पूजा-आराधना करती थी। वह सभी नियमों का पालन करती थी। उस ब्राह्मणी की भक्ति से मैं बहुत प्रसन्न था। एक बार ब्राह्मणी ने एक महीने तक लगातार मेरी कठिन भक्ति की। इस दौरान ब्राह्मणी ने पूजा, जप और तप किया, लेकिन दान नहीं किया। कठिन भक्ति की वजह से वह दुर्बल हो गई।
उस समय मैंने सोचा-कठिन भक्ति से ब्राह्मणी ने वैकुण्ठ लोक तो प्राप्त कर ली है, लेकिन दान न देने की वजह से विष्णुलोक में तृप्ति नहीं मिलेगी। यह जान मैं साधु रूप धारण कर उसके पास भिक्षा मांगने गया। उस समय ब्राह्मणी ने मुझे दान में मिटटी का एक पिंड दिया। कुछ दिनों के बाद ब्राह्मणी की मृत्यु हो गई। जब वह वैकुंठ पहुंची, तो उसे एक कुटिया मिला, लेकिन कुटिया में कुछ भी नहीं था।
यह देख ब्राह्मणी बोली-हे प्रभु! मैंने आपकी इतनी भक्ति की और वैकुंठ में केवल कुटिया दिया गया। तब मैंने उस ब्राह्मणी से कहा-हे देवी! आपने पूजा, भक्ति तो की, लेकिन किसी को दान नहीं दिया। अतः आपको वैकुंठ में केवल कुटिया मिला। उस समय ब्राह्मणी ने उपाय जानना चाहा। यह सुन भगवान विष्णु बोले-जब देव कन्याएं आएं, तो उनसे षटतिला एकादशी व्रत करने की विधि पूछना। कालांतर में ब्राह्मणी ने षटतिला एकादशी व्रत किया। इस व्रत के पुण्य-प्रताप से ब्राह्मणी को वैकुंठ में सभी चीजों की प्राप्ति हुई। यह सुन नारद जी-आपकी लीला अपरंपार है, प्रभु! नारायण, नारायण!
