दिल्ली के कॉमनवेल्थ खेलगांव के पास स्थित अक्षरधाम मंदिर को स्वामीनारायण मंदिर के नाम से भी जाना जाता है। भारत के दिल में स्थित, नई दिल्ली, अक्षरधाम मंदिर वास्तुकला का एक चमत्कार है जो हजारों वर्षों की सांस्कृतिक विरासत को उजागर करता है 'अक्षरधाम' का अर्थ है भगवान का दिव्य निवास। इसे भक्ति, पवित्रता और शांति का शाश्वत स्थान माना जाता है। नई दिल्ली में स्वामीनारायण अक्षरधाम एक मंदिर है - भगवान का निवास, एक हिंदू पूजा घर और भक्ति, शिक्षा और सद्भाव के लिए समर्पित एक आध्यात्मिक और सांस्कृतिक परिसर। कालातीत हिंदू आध्यात्मिक संदेश, जीवंत भक्ति परंपराएं और प्राचीन वास्तुकला सभी इसकी कला और वास्तुकला में प्रतिबिंबित होती हैं। यह मंदिर हिंदू धर्म के अवतारों, देवों और महान संतों, भगवान स्वामीनारायण (1781-1830) को एक विनम्र श्रद्धांजलि है। पारंपरिक शैली वाले परिसर का उद्घाटन परम पूज्य स्वामी महाराज के आशीर्वाद और कुशल कारीगरों और स्वयंसेवकों के समर्पित प्रयासों के माध्यम से 6 नवंबर 2005 को किया गया था।
अक्षरधाम का प्रत्येक तत्व आध्यात्मिकता से गूंजता है - मंदिर, प्रदर्शनियाँ और यहाँ तक कि उद्यान भी।अक्षरधाम मंदिर में दो सौ से अधिक मूर्तियाँ हैं, जो कई सहस्राब्दियों से कई आध्यात्मिक दिग्गजों का प्रतिनिधित्व करती हैं। अक्षरधाम का आध्यात्मिक आधार यह है कि प्रत्येक आत्मा संभावित रूप से दिव्य है। चाहे हम परिवार की सेवा कर रहे हों, देश की, पड़ोसियों की या दुनिया भर के सभी जीवित प्राणियों की, प्रत्येक सेवा व्यक्ति को देवत्व की ओर बढ़ने में मदद कर सकती है। प्रत्येक प्रार्थना स्वयं को बेहतर बनाने और ईश्वर के करीब जाने का आह्वान है।
अक्षरधाम की यात्रा आध्यात्मिक रूप से समृद्ध अनुभव है। चाहे वह प्रार्थना की शक्ति को महसूस करने में हो, अहिंसा की ताकत को महसूस करने में हो, हिंदू धर्म के प्राचीन सिद्धांतों की सार्वभौमिक प्रकृति के बारे में जागरूक होने में हो, या सिर्फ पृथ्वी पर भगवान के निवास की सुंदरता की प्रशंसा करने में हो - प्रत्येक तत्व का आध्यात्मिक महत्व है . अक्षरधाम मंदिर के आंतरिक भाग को नौ मंडपम या विषयगत स्थानों में विभाजित किया जा सकता है। ये नौ मंडप जटिल नक्काशीदार मूर्तियों और स्तंभों से भरे हुए हैं और अद्वितीय गुंबदों और छत से ढके हुए हैं। इन मंडपों के माध्यम से यात्रा करते हुए, व्यक्ति प्रसिद्ध भक्तों, महान अवतारों और आनंदित दिव्य प्राणियों से मिलता है। मंडपों के अलंकृत डिजाइन और जटिल नक्काशी भगवान की अकल्पनीय सुंदरता और सृष्टि में उनके द्वारा प्रेरित सुंदरता के प्रतिबिंब को प्रेरित करती है।
पारंपरिक पत्थर से बने मंदिर के बाहरी हिस्से को मंडोवर के नाम से जाना जाता है। स्वामीनारायण अक्षरधाम का मंडोवर पिछले आठ सौ वर्षों में भारत में बनाया गया सबसे बड़ा, सबसे जटिल नक्काशीदार मंडोवर है। यह 25 फीट ऊंचा, 611 फीट लंबा है और इसमें हिंदू धर्म के कई महान ऋषियों, साधुओं, भक्तों, आचार्यों और अवतारों की 200 मूर्तियां हैं। मंडोवर के आधार को जगती कहा जाता है। इस परत में हमारी रोजमर्रा की दुनिया के जीवित प्राणियों की नक्काशी मिलती है। सबसे पहले, हमारे पास हाथी है जो शक्ति का प्रतीक है, फिर शेर है, जो बहादुरी और क्रूरता का प्रतीक है। इसके बाद, व्यक्ति को व्याल (एक पौराणिक जानवर) मिलता है जो गति के लिए प्रसिद्ध था।
बाद की परतों में, फूलों की नक्काशी मिलती है जो सुंदरता और सुगंध का प्रतीक है। मंडोवर के मध्य में, जिसे विभूति के नाम से जाना जाता है, अवतारों, ऋषियों, देवों, आचार्यों और भक्तों की मूर्तियां हैं। और इस परत के शीर्ष पर समरान हैं जो लोगों को जीवन में आध्यात्मिक ऊंचाई के लिए प्रयास करने के लिए प्रोत्साहित करते हैं। संपूर्ण मंडोवर एक व्यक्ति को अपने जीवन को सांसारिक सुखों के बंधनों से मुक्त करने और ईश्वर-प्राप्ति की अंतिम स्थिति तक पहुंचने के लिए प्रेरित करता है।
सम्मान और प्रार्थना के संकेत के रूप में प्रदक्षिणा या परिक्रमा करना एक प्राचीन हिंदू परंपरा है। श्रद्धालु इस विश्वास को मजबूत करने के लिए मंदिरों के चारों ओर दक्षिणावर्त घूमते हैं कि भगवान को किसी के जीवन का केंद्र होना चाहिए।
अक्षरधाम मंदिर में, इन परिक्रमाओं को करने का मार्ग तीन 60 फीट लंबे कांस्य पैनलों से सजाया गया है। ये पैनल भगवान स्वामीनारायण के जीवन की दिव्य घटनाओं का वर्णन करते हैं और इन मार्गों पर चलने वाले श्रद्धालुओं को परिक्रमा करते समय भगवान को याद करने में मदद करते हैं। मंदिर की वह परत जहां ये पैनल स्थापित हैं, नारायण पीठ के नाम से जानी जाती है।
परीक्षार्थियों के मानसिक तनाव और अन्य तरह के अवसाद को दूर करने का 'परीक्षा पे चर्चा' कार्यक्रम सबसे सशक्त माध्यम बनकर उभरा है। सामाजिक सरोकार से जुड़ा यह कार्यक्रम युवाओं के ही नहीं, उनके माता-पिता के दिलों में घर घर चुका है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने 29 जनवरी के अपने इस कार्यक्रम के बारे में एक्स हैंडल पर लिखा है 'मैं परीक्षा के तनाव को दूर करने के तरीकों पर सामूहिक रूप से रणनीति बनाने के लिए परीक्षा योद्धाओं की सबसे यादगार सभा 'परीक्षा पे चर्चा' का उत्सुकता से प्रतीक्षा कर रहा हूं। आइए, हम परीक्षा से जुड़ी उन निराशाओं को अवसरों की एक खिड़की में बदल दें...।' प्रधानमंत्री ने उन्होंने परीक्षाओं को मनोरंजक और तनाव मुक्त बनाने से संबंधित पिछले कार्यक्रम के विषयों और व्यावहारिक सुझावों को भी साझा किया।
इस बारे में पत्र सूचना कार्यालय (पीआईबी) की लखनऊ इकाई ने इस कार्यक्रम पर विस्तार से चर्चा की है। इसमें कहा गया है कि यदि किसी राष्ट्र के नेता राजकाज के अतिरिक्त अपनी जनता के लिए एक अभिभावक की भी भूमिका अपना लें तो उस राष्ट्र के लोग निश्चित रूप से सौभाग्यशाली हैं। राम राज्य की भी यही तो सबसे प्रधान विशेषता थी। हमारे प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी जी समस्त भारतवासियों को अपना परिवार मानकर कुछ ऐसा ही सफल प्रयास कर रहे हैं। अभिभावक के रूप में नरेन्द्र मोदी की भूमिका की एक अच्छी मिसाल उनका 'परीक्षा पे चर्चा' कार्यक्रम है जिसके माध्यम से वह किशोर और युवा विद्यार्थियों की समस्याओं को समझ कर उनका मार्गदर्शन करते हैं।
'परीक्षा पे चर्चा' कार्यक्रम विद्यार्थियों के लिए तनाव मुक्त माहौल बनाने, वैचारिक और अकादमिक उपलब्धि में सकारात्मक वृद्धि करने के लिए प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में बड़े आंदोलन 'एग्जाम वॉरियर्स' का हिस्सा है। यह एक ऐसा आंदोलन है जो अभिभावकों, शिक्षकों और समाज को एक साथ लाता है। इस कार्यक्रम का संदेश स्पष्ट है कि प्रत्येक विद्यार्थी अपने जीवन के उद्देश्यों को प्राप्त करने का प्रयास तो करे ही, साथ ही साथ उन उद्देश्यों की प्राप्ति में आने वाले तनाव का सुव्यवस्थित ढंग से प्रबंधन करे। हम अपने आसपास देखते हैं कि कुछ विद्यार्थी परीक्षा का नाम सुनते ही भयभीत हो जाते हैं। कुछ परीक्षा पूर्व या परीक्षा के दौरान बीमार पड़ जाते हैं। कई विद्यार्थी तो निराशा, अवसाद आदि में चले जाते हैं। यही स्थिति विद्यार्थियों के साथ-साथ उनके माता-पिता या अभिभावकों की भी होती है।
शिक्षा और सीखने के द्वारा उपरोक्त समस्याओं के तो उत्तर मिलने ही चाहिए, साथ ही साथ जीवन को आनंददायी तरीके एवं कुशलता से जीने के कौशल भी प्राप्त होने चाहिए। इस बारे में प्रधानमंत्री मोदी का कथन है कि "सीखना एक आनंददायक, संतुष्टिदायक और अंतहीन यात्रा होनी चाहिए। इसीलिए राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 रट्टामार पद्धति से कहीं अलग एक ऐसी पद्धति है जिसमें छात्रों को उन्मुख करने का प्रयास है। जहां छात्र सिद्धांत से कम और व्यवहार से ज्यादा समझ सकें और अध्ययन के दौरान अधिक उत्सुकता और आनंद से अपनी भागीदारी सुनिश्चित करें। आनंददायी शिक्षा के लिए सबसे बड़ी बाधा परीक्षा ही प्रतीत होती है। परीक्षा पर गहराई से विचार करें तो यह विद्यार्थी जीवन में विद्यार्थियों के आकलन का केंद्र तो है, लेकिन साथ ही साथ विद्यार्थियों में तनाव पैदा करने का एक मुख्य स्रोत भी रही है। जबकि होना यह चाहिए कि परीक्षा केवल परीक्षा नहीं, सीखने की एक आनंददायक प्रक्रिया भी हो। जहां विद्यार्थी ने जो सीखा है एवं उसके अनुभव में जो वृद्धि हुई है. उसे उन अनुभवों के स्वतंत्र और व्यवस्थित अभिव्यक्ति के रूप में देखा जाये।
प्रधानमंत्री मोदी जी इन्हीं बातों को ध्यान में रखकर 'परीक्षा पे चर्चा' कार्यक्रम में एक उन्मुक्त मंच पर विद्यार्थियों से अपनी बात रखते हैं। कार्यक्रम में मुख्य रूप से तनाव न लेने की बात पर चर्चा होती है। तनाव को कम करने के व्यावहारिक माध्यम क्या हो सकते हैं? परीक्षा के प्रति विद्यार्थियों का दृष्टिकोण कैसा हो? आदि मुद्दों पर चर्चा भी प्रधानमंत्री करते हैं। कई कार्यक्रमों में सार्वजनिक रूप से कह चुके हैं कि यही विद्यार्थी हमारे देश का भविष्य हैं और जब हमारे देश का भविष्य ही चिंताग्रस्त होगा, तनावग्रस्त होगा, या किसी अन्य प्रकार के मनोवैज्ञानिक दबाव में होगा तो ऐसी स्थिति में वह अपना सर्वश्रेष्ठ नहीं दे सकता। विद्यार्थी को इस अवस्था से बाहर निकालने के लिए उन्होंने मुख्य रूप से शिक्षक, परिवार एवं अभिभावकों की भूमिका पर बल दिया है, जिससे छात्र मुस्कुराहट के साथ परीक्षा दे सकें।
कई बार ऐसा देखने में आता है कि अपनी महत्वाकांक्षा की छाया तले माता-पिता अपने बच्चों की तुलना किसी दूसरे बच्चे से करते हैं। स्वाभाविक है कि एक बच्चे के ऊपर इसका नकारात्मक असर पड़ेगा और वह परीक्षा से दूर भागेगा। कई बार शिक्षक भी कक्षा के दूसरे बच्चों से अध्ययन में कमजोर किसी बच्चे की तुलना करते हैं। ऐसी स्थिति में वह बच्चा अध्ययन के प्रति उदासीन हो जाता है। ऐसी ही स्थितियों को टालने के लिए यह सशक्त मंच है। यह मंच शिक्षकों और माता-पिता के लिए भी एक संदेश है कि कैसे परीक्षा से निबटा जाए। यदि हमने बच्चों के अंदर परीक्षा के प्रति आत्मविश्वास जगाया और उसे इस बात का विश्वास दिलाया कि परीक्षा के परिणाम जो भी आएं इस परिणाम से उसे सीख कर तथा निरंतर आगे उत्तरोत्तर प्रगति करते रहना है तो वह बच्चा परीक्षा से दूर नहीं भागेगा। आज हम बड़े शहरों में देख रहे हैं कि परीक्षाओं की काउंसलिंग के नाम पर बड़े और महंगे सेंटर्स की भरमार है। ऐसी काउंसलिंग प्रधानमंत्री बड़ी सहजता के साथ बातचीत में ही करते चलते हैं।
और यह भी सुखद है कि परीक्षा पे चर्चा कार्यक्रम आज केवल दिल्ली के ऑडिटोरियम तक सीमित नहीं रहा गया है। धीरे-धीरे इस कार्यक्रम ने संपूर्ण शिक्षा जगत एवं सभी हितधारकों को अपने साथ जोड़ा है। आज देश ही नहीं, दुनिया के कई देशों के छात्र और अभिभावक बड़े मनोयोग से इस कार्यक्रम का हिस्सा बन रहे हैं। इस कार्यक्रम पर विभिन्न अध्ययन हुए हैं। इनका निष्कर्ष है कि इस कार्यक्रम के अंतर्गत शिक्षकों एवं परामर्शदाताओं की पहल से आशातीत परिणाम प्राप्त हुए है एवं परीक्षा को उत्सव के रूप में मनाने का दौर प्रारंभ हुआ है। विद्यार्थी तनावरहित होकर अब पूरी तैयारी के साथ परीक्षा में बैठते हैं और सफलतापूर्वक उज्ज्वल भविष्य की ओर अपना मार्ग प्रशस्त करते हैं। देश के प्रधान अभिभावक के रूप में प्रधानमंत्री मोदी ने 'परीक्षा पे चर्चा कार्यक्रम के माध्यम से किशोरों और युवाओं के जीवन में नई आशा का संचार किया है।
लेखक - मुकुंद
स्वाधीनता का संघर्ष केवल राजनैतिक या सत्ता केलिये ही नहीं होता । वह स्वत्व, स्वाभिमान, आर्थिक, सामाजिक, सांस्कृतिक और मानसिक अस्मिता के लिये भी होता है । इस सिद्धांत के लिये अपना पूरा जीवन समर्पित करने वाले थे पंजाब केशरी लाला लाजपतराय। उनका जन्म 28 जनवरी 1865 को पंजाब के फिरोजपुर में हुआ था । उनका परिवार आर्यसमाज से जुड़ा था । अपने क्षेत्र के सुप्रसिद्ध व्यवसायी उनके पिता मुंशी राधा कृष्ण आजाद संस्कृत के विद्वान थे उन्हे फारसी और उर्दू का भी ज्ञान था । माता गुलाब देवी भी विदुषी थीं। वे एक आध्यात्मिक और धार्मिक मूल्यों केलिये महिला थीं। अध्ययन और लेखन परिवार की परंपरा थी । इसीलिए सांस्कृतिक मूल्यों के प्रति समर्पण के संस्कार लाला लाजपतराय जी को बचपन से मिले थे । आर्य समाज से संबंधित होने के कारण वे अपनी बात को तथ्य और तर्क के साथ रखना उनके स्वभाव में आ गया था । घर में आध्यात्मिक और धार्मिक पुस्तकों का मानों भंडार था । इनके अध्ययन के साथ उन्होंने वकालत की परीक्षा उत्तीर्ण की और रोहतक तथा हिसार आदि नगरों में वकालत करने लगे थे । उनका बचपन केवल अध्ययन में नहीं बीता था । उनमें छात्र जीवन से ही मित्रों की टोली बनाकर असामाजिक तत्वों से मुकाबला करने की प्रवृत्ति रही । वे जहाँ भी रहे, जिस भी विद्यालय में पढ़े, उन्होंने ऐसी टोलियाँ बनाईं और असामाजिक तत्वों की गतिविधियों का प्रतिकार किया । जब बड़े हुये, सामाजिक और वकालत के जीवन में आये तब प्रतिकार का यह दायरा और बढ़ा । अब वे असामाजिक तत्वों के साथ शासकीय कर्मचारियों द्वारा जन सामान्य के साथ किये जाने वाले शोषण पूर्ण व्यवहार का भी खुलकर प्रतिकार करते थे । इससे उनकी ख्याति बढ़ी । वे अपने जिले में ही नहीं पंजाब में लोकप्रिय हो गये ।
ज्ञानवापी मस्जिद पर भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) की रिपोर्ट क्या सार्वजनिक हुई। ऑल इंडिया मजलिस ए इत्तेहादुल मुस्लिमीन (एआईएमआईएम) के मुखिया असदुद्दीन ओवैसी की खुलकर मंशा और हिन्दू विरोधी भड़ास एक बार फिर बाहर आई है। वैसे प्राय: वह बातें संविधान के हवाले से करने का दावा करते हैं, किंतु उनके आचरण से यही साबित होता रहा है कि वे इसी संविधान का जब देखो तब मजाक बनाते हैं। कई अवसरों पर वे बता भी चुके हैं कि उन्हें संवैधानिक व्यवस्थाओं पर भरोसा नहीं है। राममंदिर का निर्णय उच्चतम न्यायालय से आया, किंतु आज भी वे बार-बार मुसलमानों के साथ अन्याय होने का जिक्र कर रहे हैं। वे कोई कसर नहीं छोड़ते मुसलमानों को भड़काने का। इससे भी सिद्ध होता है कि उनका न्यायालय और भारतीय संविधान पर कोई भरोसा नहीं। अब कह रहे हैं कि हिंदुत्व की गुलाम है एएसआई।
स्वाधीनता संघर्ष केवल राजनैतिक या सत्ता के लिये ही नहीं होता। वह स्वत्व, स्वाभिमान, आर्थिक, सामाजिक, सांस्कृतिक और मानसिक अस्मिता के लिये भी होता है। इस सिद्धांत के लिये अपना पूरा जीवन समर्पित करने वाले थे पंजाब केसरी लाला लाजपतराय। उनका जन्म 28 जनवरी 1865 को फिरोजपुर में हुआ था। उनका परिवार आर्यसमाज से जुड़ा था। अपने क्षेत्र के सुप्रसिद्ध व्यवसायी उनके पिता मुंशी राधा कृष्ण आजाद संस्कृत के विद्वान थे, उन्हें फारसी और उर्दू का भी ज्ञान था। माता गुलाब देवी भी विदुषी थीं। सांस्कृतिक मूल्यों के प्रति समर्पण के संस्कार लाला लाजपतराय को बचपन से मिले थे। आर्य समाज से संबंधित होने के कारण वे अपनी बात को तथ्य और तर्क के साथ रखना उनके स्वभाव में आ गया था। घर में आध्यात्मिक और धार्मिक पुस्तकों का मानों भंडार था। इनके अध्ययन के साथ उन्होंने वकालत की परीक्षा उत्तीर्ण की और रोहतक तथा हिसार आदि नगरों में वकालत की। वे जहां भी रहे, उन्होंने ऐसी टोलियां बनाईं और असामाजिक तत्वों की गतिविधियों का प्रतिकार किया। सामाजिक और वकालत के जीवन में प्रतिकार का यह दायरा और बढ़ा। वे असामाजिक तत्वों के साथ शासकीय कर्मचारियों द्वारा जन सामान्य के साथ किये जाने वाले शोषणपूर्ण व्यवहार का भी खुलकर प्रतिकार करते थे। इससे उनकी ख्याति बढ़ी। इससे वे लोकप्रिय हो गये।
निजी जीवन में उन्होंने स्वामी दयानन्द सरस्वती से विधिवत दीक्षा ली और आर्य समाज के विस्तार में भी उनकी भूमिका महत्वपूर्ण रही। उन्होंने लाला हंसराज एवं कल्याण चन्द्र दीक्षित के साथ मिलकर महर्षि दयानन्द एंग्लो वैदिक विद्यालयों की मानो एक शृंखला ही स्थापित की। इनमें से अनेक संस्थान आज भी संचालित हैं। आज इन्हें डीएवी स्कूल्स व कालेज के नाम से जाना जाता है। 1890 से 1900 के बीच देश के अनेक स्थानों पर किसी महामारी का प्रकोप आया। लालाजी ने इस पीड़ित मानवता की सेवा के लिये और अनेक स्थानों पर शिविर लगाए और स्वयंसेवकों की टोलियां बनाकर पीडितों की सेवा की। 1893 में अखिल भारतीय कांग्रेस का अधिवेशन लाहौर में हुआ। इसकी अध्यक्षता दादाभाई नौरोजी ने की। लालाजी इस अधिवेशन में कांग्रेस के सदस्य बने और समाज सेवा के साथ वे राजनैतिक क्षेत्र में भी सक्रिय हुये। कांग्रेस का यह पहला अधिवेशन ऐसा था, जिसमें स्वतंत्रता की भी बात उठी और इस बात को उठाने वाले लाला लाजपतराय थे। पर तब इस बात को गंभीरता से नहीं लिया गया। चूंकि कांग्रेस तब नागरिक अधिकार और समानता की ही बात कर रही थी। जब कांग्रेस अधिवेशन में स्वायत्ता पर एकराय न बन सकी तो लालाजी ने नौजवानों को संगठित कर स्वायत्ता का वातावरण बनाने का अभियान छेड़ा। लालाजी चाहते थे कि भारतीय नौजवान अपने इतिहास के महापुरुषों और आदर्श चरित्र को समझें। इसके लिये उन्होंने स्वयं साहित्य रचना की इन रचनाओं में शिवाजी महाराज, भगवान श्रीकृष्ण, मैजिनी, गैरिबॉल्डी एवं कई अन्य महापुरुषों की जीवनी हिन्दी में लिखीं। उन्होंने देश में और विशेषतः पंजाब में हिन्दी के प्रचार-प्रसार का भी अभियान चलाया। देश में संपर्क भाषा के रूप में हिन्दी को स्थापित करने के लिये एक हस्ताक्षर अभियान भी चलाया और संकल्प पत्र भी भरवाये।
अंग्रेजों ने जब साम्प्रदायिक आधार पर बंगाल का विभाजन किया गया था तो लाला लाजपत राय ने बंगाल के सुप्रसिद्ध नेताओं सुरेंद्रनाथ बनर्जी और विपिनचंद्र पाल से मिलकर पूरे देश में एक बड़ा आंदोलन खड़ा किया। इसी आंदोलन के बाद "त्रिदेवों" एक टोली बनी जिसमें लाजपतराय, विपिन चंद्र पाल बाल गंगाधर तिलक थे। इस टोली को इतिहास ने "लाल, बाल, पाल" के नाम से जाना। इस तिकड़ी ने मानो ब्रिटिश शासन की नाक में दम कर दिया था। इस टोली ने स्वतंत्रता संग्राम में वो नये नये नारे दिये, असहमति और विरोध के स्वर मुखर किये तथा भारतीय समाज में स्वत्व और स्वाभिमान जागरण का अभियान चलाया । इसके चलते इस लाल-बाल-पाल को पूरे देश में भारी समर्थन मिला। स्वदेशी अपनाने और विदेशी वस्तुओं के बहिष्कार की अपील 1906 में इसी तिकड़ी ने की थी जिसे बाद में गांधी जी ने अपनाया। ब्रिटेन में तैयार हुए सामान का बहिष्कार और व्यावसायिक संस्थाओं में हड़ताल का यह क्रम 1906 से ही आरंभ हो गया था।
लालाजी के विचारों में स्पष्टवादिता थी। वे स्वावलंबन और स्वाधीनता की बात खुलकर करते थे। कांग्रेस में एक समूह ऐसा था जो नागरिक सम्मान और नागरिक अधिकार की बात तो करता था किन्तु स्वाधीनता की बात खुलकर नहीं करता था। इसलिये तब कांग्रेस में दो दल माने गये। एक नरम दल और दूसरा गरम दल। लालाजी गरम दल के नेता थे। वे इसी नाम से लोकप्रिय हुए। लाला लाजपत राय अक्टूबर 1917 में अमेरिका गए, वहां उन्होंने न्यूयॉर्क में "इंडियन होम रूल लीग ऑफ अमेरिका" नामक संगठन की स्थापना की। यह संगठन अमेरिका में भारतीय जनों की स्वाधीनता की आवाज उठाने का माध्यम बना। लालाजी तीन साल अमेरिका रहे। उन्होने वहाँ रहने वाले भारतीयों और भारतीय जनों से सद्भाव रखने वाले लोगों को जोड़ा। तीन साल बाद फरवरी 1920 को लाला जी भारत लौटे। वे देशवासियों के महान नायक बन चुके थे। 1920 में उन्होंने कलकत्ता में आयोजित कांग्रेस अधिवेशन में एक खास सत्र की अध्यक्षता की। जलियांवाला बाग हत्याकांड के खिलाफ उन्होंने पंजाब में एक बड़ा आंदोलन किया। उन्होंने पंजाब में 1920 में असहयोग आंदोलन का नेतृत्व किया। लेकिन लालाजी असहयोग आंदोलन में खिलाफत आंदोलन को जोड़ने के पक्ष में नहीं थे। इसलिये उन्होंने कांग्रेस इंडिपेंडेंस पार्टी का गठन किया।
साइमन कमीशन 3 फरवरी 1928 को भारत पहुंचा। उसका विरोध करने वालों में लालाजी अग्रणी थे। यह कमीशन भारत में संवैधानिक सुधारों की समीक्षा एवं रपट तैयार करने के लिए बनाया गया था, इसमें कुल सात सदस्य थे। कहने के लिये यह संवैधानिक सुधार आयोग था पर उसका उद्देश्य भारत में एक ऐसा संवैधानिक ढांचा तैयार करना था जो अंग्रेजों की मंशा के अनुरूप काम करे और भारतीय समाज और व्यवस्था पर अपना नियंत्रण और मजबूत कर सके। इसलिए इसका पूरे देश में भारी विरोध हुआ। लोग सड़कों पर निकल कर धरना प्रदर्शन करने लगे । "साइमन वापस जाओ" का नारा पूरे देश में गूंज उठा। 30 अक्टूबर, 1928 को लाहौर में साइमन कमीशन के विरोध में एक प्रदर्शन का आयोजन हुआ। जिसका नेतृत्व लालाजी कर रहे थे। प्रदर्शन में भारी जनसैलाब उमड़ा। इसे देखकर अंग्रेज अधिकारी सैंड्रस बुरी तरह बौखलाया। उसने प्रदर्शन कारियों पर लाठीचार्ज का आदेश दे दिया। पुलिस ने प्रदर्शन कारियों को बुरी तरह पीटना आरंभ कर दिया। लाला लाजपत राय ने पुलिस को रोकना चाहा। इससे अंग्रेज अफसर और भड़के तथा लालाजी पर ही प्रहार आरंभ कर दिये दिया उन्हें घेरकर लाठियों से बुरी तरह पीटा गया। इससे लालाजी घायल हो गए। किसी प्रकार उन्हे उठाकर ले जाया गया। शरीर का ऐसा कोई अंग न था जहां चोट न लगी हो। उनका स्वास्थ्य बिगड़ने लगा और 17 नवंबर, 1928 को उन्होंने संसार से विदा ले ली।
लेखक:- रमेश शर्मा
भारतीय सेना का नेतृत्व करने वाले भारतीय लेफ्टिनेंट जनरल के.एम. करिअप्पा, भारतीय कमांडर के पहले चीफ थे| इनका जन्म 28 जनवरी 1900 को कर्नाटक में हुआ था |1942 में करियप्पा लेफ्टिनेंट कर्नल का पद पाने वाले पहले भारतीय अफसर बने |1944 में उन्हें ब्रिगेडियर बनाया गया और बन्नू फ्रंटियर ब्रिगेड को कमांडर के तौर पर तैनात किया गया|
वास्तव में औप्निवेशिक शासन के दौरान भारतीय सैनिकों को सेना में उच्च पदों से वंचित रखा गया था | ब्रिटिश इंडियन आर्मी में सेना की उच्च अधिकारी पदों पर केवल अंग्रेज अधिकारियों को ही नियुक्त किया जाता था| भारतीय सेना दिवस का ब्रिटिश शासन से स्वतंत्रता मिलने के बाद 1949 में पहली बार भारतीय सेना के अध्यक्ष पद पर नियुक्त किया गया | भारत के स्वतंत्रता के बाद पहली बार 15 जनवरी 1949 को भारतीय लेफ्टिनेंट जनरल केएम करिअप्पा को भारतीय सेना अध्यक्ष पद की कमान दी गई थी | इससे पहले इस पद पर चीफ जनरल फ्रांसिस बुचर थे | लेफ्टिनेंट जनरल केएम करिअप्पा को भारतीय सेना के प्रथम भारतीय नागरिक थे | इस दिन को याद करने के लिए 15 जनवरी को भारतीय थल दिवस के रूप में मनाया जाता है |
1965 के युद्ध की है जब भारत-पाक के युद्ध का आखिरी दिन था |इस दिन स्क्वाड्रन लीडर केसी करियप्पा, एएस सहगल और कुक्के सुरेश को पाकिस्तानी ठिकानों पर बमबारी करने के आदेश दिए गए थे। लेकिन बमबारी के पहले चक्कर में ही पाकिस्तानी सैनिकों ने एंटी एयरक्राफ्ट गन से एएस सहदल के विमान पर हमला कर दिया | हालांकि इस हमले में एएस सहगल तो बच गए लेकिन उन्हें वापस बेस कैंप जाना पड़ा था | उनके जाने के बाद मैदान में केसी करियप्पा और कुक्के डटे रहे और अपने दुश्मनों के ठिकानों को तहस-नहस करने में जुटे हुए हैं| लेकिन इसी बीच करियप्पा का विमान लगातार पाकिस्तानी गोलियों का शिकार हो गया| करियप्पा विमान क्षतिग्रस्त हो गया और आग के गोले की तरह भारतीय इलाके में जा गिरा लेकिन करियप्पा का शरीर पाकिस्तान के हिस्से में गिरा| गिरने के बाद पाकिस्तानी सैनिकों ने उन्हें घेरकर हिरासत में ले लिया| जब केसी करियप्पा पकड़े गए तब उनसे पूछा गया कि क्या वे केएम करियप्पा के संबंधी हैं तो उन्हें पाकिस्तानियों को केवल अपना नाम और रैंक बताया|
जैसे ही पाकिस्तान के राष्ट्रपति अयूब खां को पता चला कि केएम करियप्पा के बेटे केसी करियप्पा को पाकिस्तान ने अपने हिरासत में ले लिया है तो उन्होंने तुरंत रेडियो से अनाउंसमेंट करा दी कि केएम करियप्पा के बेटे को हिरासत में ले लिया गया है। उन्होंने भारत में पाकिस्तानी उच्चायुक्त के जरिए केएम करियप्पा तक जानकारी पहुंचाई कि यदि वे चाहे तो उनके बेटे को छोड़ा जा सकता है लेकिन अपने उसूलों के पक्के केएम करियप्पा ने मना कर दिया| उन्होंने कहा कि केसी करियप्पा केवल उनका नहीं पूरे देश का बेटा है अत: उसके साथ भी अन्य युद्धबंदियों जैसा ही व्यवहार किया जाए लेकिन अगर उसे छोड़ना है तो अन्य युद्धबंदियों को भी छोड़ना होगा| अन्य युद्धबंदी भी मेरे बेटे जैसे ही हैं| कई दिनों तक केसी करियप्पा पाकिस्तान की गिरफ्त में रहे और बाद में उन्हें अन्य कैदियों के साथ ही छोड़ा गया|
अनुशासन पसंद करियप्पा
करियप्पा का सबसे बड़ा योगदान था कि उन्होंने भारतीय सेना को राजनीति से दूर रखा | शायद यही कारण था कि उन्होंने आईएनए के सैनिकों को भारतीय सेना में लेने से इंकार कर दिया| उनका मानना था कि अगर वो ऐसा करते हैं तो भारतीन सेना राजनीति से अछूती नहीं रह सकेगी| अनुशासन का पालन करने में करियप्पा का कोई तुल्य नहीं था| यही कारण था कि उनके नजदीकी दोस्त भी उनसे आजादी लेने में थोड़े झिझकते थे|
मेजर जनरल वी के सिंह अपनी किताब 'लीडरशिप इन इंडियन आर्मी' में लिखते हैं, 'एक बार श्रीनगर में जनरल थिमैया जो उनके साथ दूसरे विश्व युद्ध और कश्मीर में साथ काम कर चुके थे, उनके साथ एक ही कार में बैठ कर जा रहे थे| थिमैया ने सिगरेट जला कर पहला कश ही लिया था कि करियप्पा ने उन्हें टोका कि सैनिक वाहन में धूम्रपान करना वर्जित है| थोड़ी देर बाद आदतन जनरल थिमैया ने एक और सिगरेट निकाल ली, लेकिन फिर करियप्पा की बात को याद करते हुए वापस पैकेट में रख दिया| करियप्पा ने इसको नोट किया और ड्राइवर को आदेश दिया कि वो कार रोकें ताकि थिमैया सिगरेट पी सकें|'
कुछ रोचक तथ्य:-
28 जनवरी भारतीय राष्ट्रवादी नेता लाला लाजपत राय की जयंती है, जिन्हें प्यार से 'पंजाब केसरी' कहा जाता है। राय को स्वदेशी आंदोलन के दौरान उनकी भूमिका और शिक्षा की वकालत के लिए याद किया जाता है। 1928 में साइमन कमीशन के खिलाफ एक विरोध रैली के दौरान पुलिस द्वारा हमला किए जाने के बाद लाहौर में देशभक्त की मृत्यु हो गई।
1893 में कांग्रेस के लाहौर अधिवेशन के दौरान, राय की मुलाकात एक अन्य राष्ट्रवादी बाल गंगाधर तिलक से हुई और दोनों आजीवन सहयोगी बन गये। राय, तिलक और बिपिन चंद्र पाल (जिन्हें लाल-बाल-पाल कहा जाता है) ने 1905 में लॉर्ड कर्जन द्वारा बंगाल के विवादास्पद विभाजन के बाद स्वदेशी वस्तुओं के उपयोग और जन आंदोलन की जोरदार वकालत की।
1913 में, राय जापान, इंग्लैंड और संयुक्त राज्य अमेरिका के व्याख्यान दौरे के लिए निकले, लेकिन प्रथम विश्व युद्ध शुरू होने के बाद उन्हें विदेश में रहने के लिए मजबूर होना पड़ा और 1920 तक विदेश में ही रहे। अपनी यात्रा के दौरान, उन्होंने कई प्रवासी समुदायों से मुलाकात की और इसकी स्थापना की। 1917 में न्यूयॉर्क शहर में अमेरिका की इंडियन होम रूल लीग।
1928 में, साइमन कमीशन, ब्रिटिश द्वारा नियुक्त कानून निर्माताओं का एक समूह, भारत सरकार अधिनियम, 1919 (मोंटेगु-चेम्सफोर्ड सुधार) के कार्यान्वयन का अध्ययन करने के लिए भारत आया था। 7 लोगों के समूह में एक भी भारतीय सदस्य शामिल नहीं था, इस बात पर कांग्रेस को भारी नाराजगी थी। राय आयोग का विरोध करने वाले आंदोलन के नेताओं में से थे और 30 अक्टूबर, 1928 को लाहौर में एक विरोध प्रदर्शन के दौरान उन पर गंभीर लाठीचार्ज किया गया था। इसके बाद राय ने प्रसिद्ध रूप से कहा था, "आज मुझ पर जो वार किए गए, वे आखिरी कीलें होंगी।" भारत में ब्रिटिश शासन का ताबूत।” कुछ दिन बाद 17 नवंबर को उनकी मृत्यु हो गई।
राजनीति में सक्रिय भागीदारी के अलावा, राय ने अंग्रेजी और उर्दू में भी बड़े पैमाने पर लिखा। उनके महत्वपूर्ण कार्यों में शामिल हैं: 'द आर्य समाज', 'यंग इंडिया', 'इंग्लैंड का भारत पर ऋण', 'जापान का विकास', 'भारत की स्वतंत्रता की इच्छा', 'भगवत गीता का संदेश', 'भारत का राजनीतिक भविष्य' , 'भारत में राष्ट्रीय शिक्षा की समस्या', 'द डिप्रेस्ड ग्लासेस', और यात्रा वृतांत 'यूनाइटेड स्टेट्स ऑफ अमेरिका'।
भिखारिन ने उत्तर दिया- “बेटा दो दिन से भूखी हूं |”
मां ने मुस्कराकर कहा- “और ले लो बेटा, भगवान् ने बहुत दिया है हमें |”
बालक ने भगवान् का नाम सुना तो उसे संतोष हुआ | वह बोला- “भगवान् सबको देता है?”
मां ने कहा- “हाँ बेटा, उसके राज्य में कोई जीव भूखा नहीं रहता |”
नानक ने मां को भिखारिन के दो दिन भूखे रहने की बात नहीं बताई |
आज उसने कुछ नहीं खाया | मां से आज्ञा लेकर वह अपने पिता के खेतों और बागों में घूमने निकल पड़ा | वह मन-ही-मन सोचता जा रहा था- ‘ये सब खेत व बाग मेरे पिता को भगवान् ने दिए हैं | ये सब हैं तो भगवान् के ही |
इसलिए इन खेतों का अन्न भी भगवान् का है |
नानक ने देखा कुछ चिड़िया खेत में बिखरे दाने खा रही हैं |
उसने उन्हें मारा नहीं | वह मुस्करा दिया | उसके मुंह से निकल पड़ा –
‘रामजी की चिड़िया, रामजी का खेत,
खाओ री चिड़िया, भर-भर पेट |’
