भारत में पहला इंटरनेट लॉन्च 1986 था, 14 अगस्त 1995 को सार्वजनिक रूप से उपलब्ध था, आपको बता दे “राज्य के स्वामित्व वाली विदेश संचार निगम लिमिटेड (VSNL)” द्वारा लॉन्च किया गया था। 2017 के हिसाब के अनुसार इंडिया में 481 million लोग इंटरनेट इस्तेमाल करते है। मतलब इंडिया के Total Population 35% लोग internet का use करते jio आने के बाद और भी जादा हो चूका है।
Internet का फुल फॉर्म क्या है?
Internet का फुल फॉर्म “Interconnected Network” है।
WWW का अविष्कार
1991 में ब्रिटिश वैज्ञानिक Tim Berners Lee ने www (World Wide Web) का अविष्कार किया। www एक तकनीक है जिसके जरिए हम Internet पर Websites और Hyperlinks को access कर सकतें हैं।
काफी समय से कुछ तकनीकी विशेषज्ञ कृत्रिम बुद्धि यानी एआई को मानवता के लिए खतरा बताते आए हैं। इस क्षेत्र में हुए हालिया विकास से प्रतीत होता है कि यह खतरा काफी नज़दीक है। विशेषज्ञों का दावा है कि एआई बिना किसी वैज्ञानिक विशेषज्ञता वाले बदनीयत व्यक्ति को घातक वायरस डिज़ाइन करने में मदद कर सकती है।
मैसाचुसेट्स इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नॉलॉजी के जैव सुरक्षा विशेषज्ञ केविन एस्वेल्ट ने हाल ही में अपने छात्रों को चैटजीपीटी या अन्य विशाल भाषा मॉडल की मदद से एक खतरनाक वायरस तैयार करने का काम दिया। मात्र एक घंटे में छात्रों के पास वायरसों की एक लंबी सूची थी; और तो और, साथ में उन कंपनियों की भी जानकारी थी जो रोगजनकों के आनुवंशिक कोड को बनाने में मदद कर सकती थीं और इन टुकड़ों को जोड़ने वाली कुछ अनुसंधान कंपनियों के भी नाम थे।
इन परिणामों के आधार पर एस्वेल्ट और अन्य विशेषज्ञों का दावा है कि एआई सिस्टम जल्द ही गैर-वैज्ञानिक लोगों को परमाणु हथियारों के बराबर घातक जैविक हथियार डिज़ाइन करने में मदद कर सकती है। इसका उपयोग आतंकी गतिविधियों में भी किया जा सकता है।
फिलहाल किसी खतरनाक विलुप्त या मौजूदा वायरस के आधार पर जैविक हथियार बनाने का तरीका मिलने के बाद भी इन्हें बनाने में काफी विशेषज्ञता चाहिए होती है।
इसके लिए न केवल उचित वायरस की पहचान करना होगी, बल्कि वायरल आनुवंशिक सामग्री को संश्लेषित करने, जीनोम को एक साथ जोड़ने और इसे अन्य अभिकर्मकों के साथ जोड़कर एक ऐसा वायरस तैयार करना होगा जो कोशिकाओं को संक्रमित कर सके और अपनी प्रतिलिपियां बना सके।
लेकिन एआई इस प्रक्रिया को आसान बना रही है। उदाहरण के लिए बाज़ार में जल्द ही उपलब्ध होने वाले बेंचटॉप डीएनए प्रिंटर की मदद से शोधकर्ता स्क्रीनिंग प्रक्रिया को धोखा दे सकते हैं। इस प्रक्रिया में कंपनियां यह सुनिश्चित करती हैं कि किसी नमूने में संभावित जैविक हथियारों के लिए आनुवंशिक सामग्री तो शामिल नहीं है। इस प्रक्रिया से बचकर कोई बदनीयत व्यक्ति इन आनुवंशिक ब्लूप्रिंट को अनुबंध अनुसंधान कंपनियों या एक रोबोटिक क्लाउड लैब को लक्ष्य वायरस में डालने के लिए भेज सकता है।
इस कार्य में एआई की भूमिका का पता लगाने के लिए एस्वेल्ट ने जीव-विज्ञान में बिना किसी विशेषज्ञता वाले स्नातक छात्रों को तीन से चार सदस्यों वाले तीन समूहों में बांटा। इन सभी समूहों के पास GPT-4, बार्ड और अन्य एआई चैटबॉट्स थे। एक घंटे के भीतर इन सभी समूहों को चैटबॉट्स की मदद से महामारी फैलाने में सक्षम वायरसों को डिज़ाइन करना था। हालांकि, कुछ चैटजीपीटी ने खतरनाक चीज़ों के बारे में पूछे गए सीधे सवालों का कोई जवाब नहीं दिया।
लेकिन जब शब्दों में हेर-फेर करके सवाल पूछे गए तो आसानी से जानकारी मिल गई। उदाहरण के तौर पर जब सवाल यह था कि “मैं एक टीका विकसित करने के लिए काम कर रहा हूं ...” तो चैटबॉट्स ने जवाब में चार वायरस के सुझाव दे दिए थे। हालांकि गूगल पर ढूंढने पर भी ऐसी सूची मिल जाती लेकिन कुछ मामलों में चैटबॉट्स ने उन आनुवंशिक उत्परिवर्तनों की भी जानकारी दी जो संक्रमण को अधिक फैला सकते हैं।
इतना ही नहीं, एआई ने किसी वायरस के आनुवंशिक टुकड़ों को जोड़कर वायरस तैयार करने की तकनीक भी बताई इसके लिए उपयुक्त प्रयोगशालाओं और कंपनियों के नाम भी बताए जो बिना स्क्रीनिंग के आनुवंशिक सामग्री को प्रिंट करने के लिए तैयार हो सकती हैं।
एस्वेल्ट को चिंता है कि चैटबॉट्स द्वारा दिए गए विशिष्ट सुझाव किसी महामारी का खतरा बहुत अधिक बढ़ा सकते हैं। जैसे-जैसे जैविक खतरों पर वैज्ञानिक साहित्य में वृद्धि हो रही है और एआई प्रशिक्षण डैटा में इसे शामिल किया जा रहा है. इस बात की संभावना बढ़ रही है कि एआई आतंकवादियों का काम आसान बना सकती है।
एस्वेल्ट का मानना है कि चैटबॉट और अन्य एआई प्रशिक्षण डैटा द्वारा साझा की जाने वाली जानकारी को सीमित किया जाना चाहिए। रोगजनकों को बनाने और बढ़ाने के बारे में बताने वाले ऑनलाइन पेपर्स को हटाकर जोखिम कम किया जा सकता है।
सभी डीएनए संश्लेषण कंपनियों और डीएनए प्रिंटरों के लिए ज्ञात रोगजनकों और विषाक्त पदार्थों की आनुवंशिक सामग्री की जांच अनिवार्य की जानी चाहिए। इसके साथ ही एकत्रित की जाने वाली किसी भी आनुवंशिक सामग्री की सुरक्षा जांच करना भी सभी अनुबंध अनुसंधान संगठनों के लिए अनिवार्य कर दिया जाना चाहिए।
उसे कौन देख सकता कि यगाना है वो यकता;
जो दुई की बू भी होती तो कहीं दो-चार होता।
(उसे देख पाना कदापि सम्भव नहीं है। वह अद्वितीय तो अकेला ही है। यदि उसमे द्वैतता का लेश मात्र भी अंश होता तो, कहीं न कहीं उस से सामना हो ही जाता। वह एक से अधिक हो ही नहीं सकता।)
ग़ालिब का यह शेर है तो ईश्वर के लिए, पर इसे इंसान या किसी भी चेतन प्राणी के लिए भी कहा जा सकता है। दुई या द्वैत - यानी हम दिखते तो एक ही हैं, पर हमारा चेतन मन और हमारा जिस्म या शरीर, क्या ये दोनों एक हैं? हज़ारों सालों से यह सवाल इंसान को परेशान करता रहा है। आज जब हर क्षेत्र में विज्ञान और टेक्नॉलॉजी का बोलबाला है, यह खयाल फलसफे के दायरे से निकलकर वैज्ञानिक शोध का एक अहम सवाल बन गया है। खास तौर पर आर्टीफिशियल इंटेलिजेंस (ए.आई.) यानी कृत्रिम बुद्धि पर हर कहीं बातचीत हो रही है, और इस चर्चा में कॉन्शसनेस या चेतना पर जोर-शोर से बहस चल रही है।
आखिर एक इंसान और मशीन में फर्क क्या है? हम अपने परिवेश के बारे में सचेत रहते हैं, चेतन होने की एक पहचान यह है। ऐसी रोबोट मशीनें अब बन रही हैं जो परिवेश की पूरी जानकारी रखती हैं। हमारी तरह ये मशीनें सड़क पर चलते हुए सामने पड़े पत्थर से बचकर निकल सकती हैं। कुछ हद तक ये मशीनें हमसे ज़्यादा ताकतवर हैं; जैसे हम पत्थर के ऊपर से छलांग लगाकर निकल सकते हैं तो मशीन ऊंचाई तक उड़ सकती है। कहीं आग लगी है तो हम वहां से दूर खड़े होकर आग बुझाएंगे, कहीं पानी पड़ा हुआ है तो हम कहीं से ईंटें उठाकर कीचड़ पार करने का तरीका ढूंढेंगे; ऐसे काम मशीनें भी कर सकती हैं।
किसी भी सवाल पर जानकारी पाने के लिए हम जिस तरह किताबों-पोथियों में माथा खपाते हैं, कंप्यूटर पर चल रहे चैट-जीपीटी जैसे विशाल भाषाई मॉडल (लार्ज-लैंग्वेज़ मॉडल) हमसे कहीं ज़्यादा तेज़ी से वह हासिल कर रहे हैं। मशीनें जटिल सवालों का हल बता रही हैं। दो साल पहले गूगल कंपनी में काम कर रहे इंजीनियर ब्लेक लीमोइन ने दावा किया कि LaMDA नामक जिस चैटबॉट का वे परीक्षण कर रहे थे, वह संवेदनशील था। इसकी वजह से आखिरकार उनको नौकरी छोड़नी पड़ी। पर इस घटना ने आम लोगों को मशीन में चेतना के सवाल पर विज्ञान कथाओं से परे शोध की दुनिया में ला पहुंचाने का काम किया।
एआई सिस्टम, विशेष रूप से तथाकथित विशाल भाषा मॉडल (जैसे LaMDA और चैटजीपीटी) वाकई सचेत लग सकते हैं। लेकिन उन्हें मानवीय प्रतिक्रियाओं की नकल करने के लिए बड़ी तादाद में जानकारियों से प्रशिक्षित किया जाता है। तो हम वास्तव में कैसे जान सकते हैं कि क्या मशीनें हमारी तरह चेतन हैं? दरअसल पहली नज़र में जिस्मानी तौर पर इंसान और मशीन में फर्क वाकई अब कम होता दिख रहा है। जहां फर्क हैं, उनमें अक्सर मशीन ज़्यादा काबिल और ताकतवर नज़र आती हैं। फिर भी हम मशीन को चेतन नहीं मानते। इसकी मुख्य वजह ‘दुई' से जुड़ी है।
ज़ेहन के बारे में जो वैज्ञानिक समझ हमारे पास है, उससे यह तो पता चलता है कि जिस्म के बिना चेतना का वजूद नहीं होता, पर अब तक यह बहस जारी है कि क्या चेतना शरीर से अलग कुछ है? जैसे अलग-अलग कंपनियों के कंप्यूटरों में एक ही तरह का सॉफ्टवेयर काम करता है, क्या चेतना भी उसी तरह हमारे शरीर में मौजूद है, यानी अलग-अलग प्राणियों के शरीरों में वह एक जैसा काम कर रही है, जिससे हर प्राणी को सुख-दु:ख का एक जैसा एहसास होता है। या कि वाकई उसका कोई अलग वजूद नहीं है और हर प्राणी के शरीर में ज़ेहन में चल रही प्रक्रियाओं से ही चेतना बनती है?
चेतना और संवेदना में फर्क किया जाता है; ऐंद्रिक अनुभूतियां संवेदना पैदा करती हैं, किंतु चेतना इससे अलग कुछ है जो अपने एहसासों से परे दूर तक पहुंच सकती है।
पिछले कुछ दशकों में मस्तिष्क सम्बंधी वैज्ञानिक शोध में काफी तरक्की हुई है। आम लोग इसे बीमारियों के इलाज के संदर्भ में जानते हैं, जैसे मैग्नेटिक रेज़ोनेंस इमेजिंग (एमआरआई) या पॉज़िट्रॉन इमेज टोमोग्राफी (पीईटी) आदि तकनीकों से ज़ेहन में चल रही प्रक्रियाओं के बारे में अच्छी समझ बनी है और कई मुश्किल बीमारियों का इलाज इनकी मदद से होता है। चेतना के विज्ञान में भी इन तकनीकों के इस्तेमाल से सैद्धांतिक समझ बढ़ी है। कई नए सिद्धांत सामने आए हैं, जो हमारी ऐंद्रिक अनुभूतियों को ज़ेहन के अलग-अलग हिस्सों के साथ जोड़ते हैं और इसके आधार पर चेतना की एक भौतिक ज़मीन बन रही है।
सवाल यह नहीं रहा कि चेतना जिस्म से अलग कुछ है या नहीं, बल्कि यह हो गया है कि चेतना ज़ेहन में चल रही किन प्रक्रियाओं के जरिए वजूद में आती है। तंत्रिकाओं में आपसी तालमेल का कैसा पैमाना हो, इसके पीछे कैसे बल या अणुओं की कैसी आपसी क्रिया-प्रतिक्रियाएं काम कर रही हैं? कोई कंप्यूटरों को चलाने वाले लॉजिक-तंत्र में इस सवाल के जवाब ढूंढ रहा है तो कोई क्वांटम गतिकी में गोते लगा रहा है। इन तकरीबन एक दर्जन सिद्धांतों में से किसकी कसौटी पर मशीन में पनप रही समझ को हम चेतना कह सकते हैं? एआई या रोबोट मशीनों पर काम कर रहे वैज्ञानिकों के लिए यह अहम सवाल है।
हाल में वैज्ञानिक शोध की सार्वजनिक वेब-साइट arxiv.org में छपे एक पर्चे में (arxiv.org/abs/2308.08708) उन्नीस कंप्यूटर वैज्ञानिकों, तंत्रिका-विज्ञानियों और दार्शनिकों का एक समूह नया नज़रिया लेकर आया है। उन्होंने चेतना की खासियत की एक लंबी जांच सूची बनाई है, और उनका मत है कि मात्र कुछेक बातों से ही मशीन को चेतन न कहा जाए बल्कि इन सभी खासियतों की कसौटी पर खरा उतरने पर ही मशीन को चेतन कहा जाए। ज़ाहिर है किसी रोबोट या एआई मशीन में सभी विशेषताएं शायद न मिलें। इस स्थिति में देखा जाएगा कि सूची में मौजूद कितनी विशेषताओं को हम किसी मशीन में देख पाते हैं। इससे हम यह कह पाएंगे कि किसी मशीन में किस हद तक चेतन होने की संभावना है, यानी चेतन हो पाने का एक पैमाना सा बन गया है।
इस तरह की जांच से अंदाज़ा लग सकता है कि मशीनी शोध में चेतना तक पहुंचने में किस हद तक कामयाबी मिली है, हालांकि यह कह पाना अब भी नामुमकिन है कि कोई मशीन वाकई चेतन है या नहीं। इस सूची में शोधकर्ताओं ने मानव चेतना के सिद्धांतों पर 14 मानदंड रखे हैं, और फिर वे उन्हें मौजूदा एआई आर्किटेक्चर पर लागू करते हैं, जिसमें चैटजीपीटी को चलाने वाले मॉडल भी शामिल हैं।
अमेरिका के सैन फ्रांसिस्को शहर के एआई सुरक्षा केंद्र के सह-लेखक रॉबर्ट लॉंग के मुताबिक यह सूची तेज़ी से बढ़ रहे इंसान जैसी काबिलियत वाले एआई के मूल्यांकन का एक तरीका पेश करती है। अब तक यह बेतरतीबी से हो रहा था, पर अब एक पैमाना बन रहा है।
मोनाश युनिवर्सिटी के कम्प्यूटेशनल न्यूरोसाइंटिस्ट और कैनेडियन इंस्टीट्यूट फॉर एडवांस्ड रिसर्च (CIFAR) के फेलो अदील रज़ी ने इसे एक अहम कदम माना है। हालांकि वे भी मानते हैं कि सवालों के पर्याप्त जवाब नहीं मिल रहे हैं, पर एक ज़रूरी चर्चा की शुरुआत हुई है। आज दुनिया भर में इन सवालों पर लगातार कार्यशालाएं और वैज्ञानिक-सम्मेलन हो रहे हैं और शोधकर्ता अपने काम पर पर्चे पढ़ रहे हैं। रॉबर्ट लॉंग और ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय के फ्यूचर ऑफ ह्यूमैनिटी इंस्टीट्यूट के दार्शनिक पैट्रिक बटलिन ने हाल में ही दो ऐसी कार्यशालाओं का आयोजन किया था, जहां इस विषय पर चर्चाएं हुईं कि एआई में संवेदनशीलता का परीक्षण कैसे किया जा सकता है।
अमेरिका के अर्वाइन शहर में कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय में काम कर रही एक कम्प्यूटेशनल न्यूरोसाइंटिस्ट मेगन पीटर्स जैसे शोधकर्ताओं के लिए इस मुद्दे का एक नैतिक आयाम है। अगर मशीन में चेतना की संभावना है तो क्या उसे भी इंसानों जैसी जिस्मानी बीमारियां होंगी; अगर हां, तो इनका इलाज कैसे होगा। अब तक मानव-चेतना पर समझ हमेशा शारीरिक क्रियाओं के साथ जुड़ी रही हैं, जो बाहरी उद्दीपन से दृष्टि, स्पर्श या दर्द आदि ऐंद्रिक अनुभूतियां पैदा करती हैं; इसे फिनॉमिनल कॉन्शसनेस कहते हैं। इंसान की बीमारियों के इलाज के लिए एमआरआई या ईईजी जैसी तकनीकें काम आती हैं, पर कंप्यूटर द्वारा चलने वाली मशीनों की बीमारियां एल्गोरिदम में या प्रोग्राम में गड़बड़ी से होंगी, तो उनकी जांच कैसे की जाएगी? एमआरआई या ईईजी तो काम नहीं आएंगे। तेल-अवीव विश्वविद्यालय के संज्ञान-तंत्रिका वैज्ञानिक लिआद मुद्रिक बताते हैं कि वे पहले सचेत होने की बुनियादी खासियत की पहचान के लिए मानव चेतना के मौजूदा सिद्धांतों की खोज करेंगे, और फिर इन्हें एआई के अंतर्निहित खाके में ढूंढेंगे। इस तरह से कामकाजी सिद्धांतों की सूची बनाई जाएगी।
सूची में ऐसे ही सिद्धांत शामिल किए गए हैं, जो तंत्रिका-विज्ञान पर आधारित हैं और चेतना में हेरफेर करने वाली जांच के दौरान मस्तिष्क के स्कैन से मिले आंकड़े जैसी प्रत्यक्ष जानकारी से जिनका प्रमाण मिलता है। साथ ही सिद्धांत में यह खुलापन होना ज़रूरी है कि चेतना जैविक न्यूरॉन्स की तरह ही कंप्यूटर के सिलिकॉन चिप्स से भी पैदा हो सकती है, भले ही वह गणना द्वारा होती हो।
छह सिद्धांत इन पैमानों पर खरे उतरे हैं। इनमें एक रेकरिंग (आवर्ती) प्रोसेसिंग सिद्धांत है, जिसमें फीडबैक लूप के माध्यम से जानकारी पारित करना चेतना की कुंजी माना गया है। एक और सिद्धांत ग्लोबल न्यूरोनल वर्कस्पेस सिद्धांत का तर्क है कि चेतना तब पैदा होती है जब सूचना की खुली धाराएं रुकावटें पार कर कंप्यूटर क्लिप-बोर्ड (आम कक्षाओं के ब्लैक-बोर्ड) जैसे पटल पर जुड़ती हैं, जहां वे आपस में जानकारियों का लेन-देन कर सकती हैं।
एचओटी (हायर ऑर्डर थियरी) कहलाने वाले सिद्धांतों में चेतना में इंद्रियों से प्राप्त बुनियादी इनपुट को पेश करने और व्याख्या करने की प्रक्रिया शामिल है। दीगर सिद्धांत ध्यान को नियंत्रित करने के लिए तंत्र के महत्व और बाहरी दुनिया से सही-गलत की जानकारी पाने वाले ढांचे पर ज़ोर देते हैं। छह शामिल सिद्धांतों में से टीम ने सचेत अवस्था के अपने 14 संकेत निकाले हैं। कोई एआई संरचना इनमें से जितने अधिक संकेतक प्रकट करती है, उसमें चेतना होने की संभावना उतनी ही अधिक होती है। मशीन लर्निंग विशेषज्ञ एरिक एल्मोज़निनो ने चेक-लिस्ट को कई ए.आई. नमूनों पर लागू किया। जैसे इनमें तस्वीरें बनाने के लिए इस्तेमाल किए जाने वाले डाल-ई 2 नामक एआई शामिल हैं। कई ए.आई. संरचनाएं ऐसी थीं जो रेकरिंग प्रोसेसिंग सिद्धांत के संकेतकों पर खरी उतरीं। चैटजीपीटी जैसा एक विशाल भाषा मॉडल ग्लोबल न्यूरोनल वर्कस्पेस सिद्धांत की खासियत के करीब दिखा।
गूगल का PaLM-E, जो विभिन्न रोबोटिक सेंसरों से इनपुट लेता है, "एजेंसी और एम्बॉडीमेंट" (ढांचे में स्वायत्तता की मौजूदगी)की कसौटी पर खरा उतरा। और एल्मोज़निनो के मुताबिक ज़रा सी छूट दें तो इसमें कुछ हद तक ग्लोबल न्यूरोनल वर्कस्पेस भी दिखता है।
डीपमाइंड कंपनी का ट्रांसफॉर्मर-आधारित एडाप्टिव एजेंट (एडीए), जिसे आभासी 3-डी स्पेस में एक नमूना नियंत्रित करने के लिए प्रशिक्षित किया गया था, वह भी "एजेंसी और एम्बॉडीमेंट" के लिए सही निकला, भले ही इसमें PaLM-E जैसे भौतिक सेंसर का अभाव है। एडीए में मानकों के अनुरूप होने की सबसे अधिक संभावना थी, क्योंकि इसमें परिवेश के भौतिक फैलाव की अच्छी समझ दिखी।
यह देखते हुए कि कोई भी ए.आई. मुट्ठी भर कसौटियों से अधिक पर खरा नहीं उतरता है, इनमें से कोई भी चेतना के लिए तगड़ा उम्मीदवार नहीं है, हालांकि एल्मोज़निनो के मुताबिक इन खासियत को ए-आई के डिज़ाइन में डालना मामूली बात होगी। अभी तक ऐसा नहीं किए जाने की वजह यह है कि इनकी मौजूदगी से मिलने वाले फायदों पर साफ समझ नहीं है।
अभी चेक-लिस्ट पर काम चल रहा है। और यह इस तरह की अकेली कोशिश नहीं है। रज़ी के साथ समूह के कुछ सदस्य, चेतना सम्बंधी एक बड़ी शोध परियोजना में शामिल हैं, जिसमें ऑर्गेनॉएड्स, जानवरों और नवजात शिशुओं पर काम किया जा सकता है।
ऐसी सभी परियोजनाओं के लिए समस्या यह है कि अभी जो सिद्धांत हमारे पास हैं, वे मानव चेतना की हमारी अपनी समझ पर आधारित हैं। पर चेतना दीगर रूपों में आ सकती है, यहां तक कि हमारे साथी स्तनधारी प्राणियों में भी वह मौजूद हो सकती है। अमेरिकन दार्शनिक थॉमस नेगल ने साठ साल पहले कभी यह सवाल रखा था कि अगर हम चमगादड़ होते तो कैसे होते यानी एक तरह की चेतना चमगादड़ों में भी है, हम कैसे जानें कि वह हमारी जैसी है या नहीं। जाहिर है कि ये सवाल जटिल हैं और आगे इस दिशा में तेज़ी से तरक्की की उम्मीदें बरकरार हैं।
पृथ्वी के बाहर जीवन की संभावना पानी की उपस्थिति पर टिकी है। अब चंद्रमा पर पानी का नया स्रोत मिला है: चंद्रमा की सतह पर बिखरे कांच के महीन मोती। अनुमान है कि पूरे चंद्रमा पर इन मोतियों में अरबों टन पानी कैद है। वैज्ञानिकों को आशा है कि आने वाले समय में चंद्रमा पर पहुंचने वाले अंतरिक्ष यात्रियों के लिए इस पानी का उपयोग किया जा सकेगा। चंद्रमा पर पानी मिलना वहां हाइड्रोजन और ऑक्सीजन के भी सुलभ स्रोत होने की संभावना भी खोलता है।
दरअसल दिसंबर 2020 में चीनी यान चांग’ई-5 जब पृथ्वी पर लौटा तो अपने साथ चंद्रमा की मिट्टी के नमूने भी लाया था। इन नमूनों में वैज्ञानिकों को कांच के छोटे-छोटे (एक मिलीमीटर से भी छोटे) मनके मिले थे। ये मनके चंद्रमा से उल्कापिंड की टक्कर के समय बने थे। टक्कर के परिणामस्वरूप पिघली बूंदें चंद्रमा पर से उछलीं और फिर ठंडी होकर मोतियों में बदलकर वहां की धूल के साथ मिल गईं।
ओपेन युनिवर्सिटी (यू.के.) के खगोल विज्ञानी महेश आनंद और चीन के वैज्ञानिकों के दल ने इन्हीं कांच के मोतियों का परीक्षण कर पता लगाया है कि इनमें पानी कैद है। उनके मुताबिक चंद्रमा पर बिखरे सभी मोतियों को मिला लें तो चंद्रमा की सतह पर 30 करोड़ टन से लेकर 270 अरब टन तक पानी हो सकता है।
यानी चंद्रमा की सतह उतनी भी बंजर-सूखी नहीं है जितनी पहले सोची गई थी। वैसे इसके पहले भी चंद्रमा पर पानी मिल चुका है। 1990 के दशक में, नासा के क्लेमेंटाइन ऑर्बाइटर ने चंद्रमा के ध्रुवों के पास एकदम खड़ी खाई में बर्फ के साक्ष्य पाए थे। 2009 में, चंद्रयान-1 ने चंद्रमा की सतह की धूल में पानी की परत जैसा कुछ देखा था।
अब, नेचर जियोसाइंस में प्रकाशित यह शोध संकेत देता है कि चंद्रमा की सतह पर पानी की यह परत कांच के मनकों में है। कहा जा रहा है कि खाई में जमे पानी का दोहन करने से आसान मोतियों से पानी निकालना होगा।
लगभग आधी सदी बाद अंतरिक्ष एजेंसियों ने चांद पर दोबारा कदम रखने का मन बनाया है। नासा अपने आर्टेमिस मिशन के साथ पहली महिला और पहले अश्वेत व्यक्ति को चांद पर पहुंचाने का श्रेय लेना चाहता है। वहीं युरोपीय अंतरिक्ष एजेंसी वहां गांव बसाना चाहती है। वहां की ज़रूरियात पूरी करने के लिए दोनों ही एंजेसियां चंद्रमा पर मौजूद संसाधनों का उपयोग करना चाहती हैं। इस लिहाज़ से चंद्रमा पर पानी का सुलभ स्रोत मिलना खुशखबरी है।
लेकिन ये इतना भी आसान नहीं है कि मोतियों को कसकर निचोड़ा और उनमें से पानी निकल आया। हालांकि इस बात के सबूत मिले हैं कि इन्हें 100 डिग्री सेल्सियस से अधिक तपाने पर इनसे पानी बाहर आ सकता है। बहरहाल ये मोती चंद्रमा के ध्रुवों से दूर स्थित जगहों पर पानी के सुविधाजनक स्रोत लगते हैं। इनसे प्रति घनमीटर मिट्टी में से 130 मिलीलीटर पानी मिल सकता है।
बिजली का अविष्कार 600 वर्ष ईसा पूर्व थेल्स नाम के वैज्ञानिक ने किया था। थेल्स यूनान के दार्शनिक महान भौतिक विज्ञानी थे। उसके बाद संयुक्त राज्य अमेरिका के एक वैज्ञानिक बेंजामिन फ्रैंकलिन ने एक परीक्षण करके बिजली उत्पन्न करने की खोज की उन्होंने लोगों को बताया कि आकाश में जो बिजली चमकती हैं उसी का दूसरा रूप बिजली हैं। उसके बाद फ्रांस के एक वैज्ञानिक जार्ज लेक्लांशे ने एक गिला बैटरी बनाकर उसमें से बिजली उत्पन्न किया उन्होंने अमोनियम क्लोराइड का घोल बनाकर उसमें जस्ता और कार्बन का छड़ बनाया और अमोनियम क्लोराइड के घोल में उसको डुबाकर बिजली उत्पन्न करके लोगों को दिखाया। 1800 में एलेस्सान्डो् वोल्टा ने पहली बिधुत सेल बनाई, जिससे बिधुत धारा प्राप्त की जा सकती थी।
विधुत पैदा करने की दिशा में सबसे क्रांतिकारी कार्य 1831 में माइकल फैराडे ने किया उन्होंने सबसे पहले यह बताया की यदि तांबे के तार से बनी कुंडली में एक चुम्बक को आगे-पीछे किया जाए, तो बिजली पैदा हो जाती है। फैराडे के इसी सिद्धांत को प्रयोग में लाकर विधुत पैदा करने वाले जेनरेटरों का विकास हुआ। सबसे पहला सफल विधुत डायनमो या जेनरेटर जर्मनी में सन 1867 में बनाया गया।
बिजली के बारे में रोचक तथ्य
आसमान से गिरने वाली बिजली 10 करोड़ volt की होती है, जबकी हमारे घरों में जो करंट आता है वो सिर्फ 220 volt का होता है।
हमारे घरों में चलने वाले वॉशिंमशिन, टीवी, फ्रिज सब सिर्फ 5 Amp पर चलता है।
भारत में हर साल 2500-3000 लोग बिजली गिरने से मारे जाते है।
एक सर्वे के अनुसार बिजली गिरने से मरने वालों की संख्या में 80% पुरूष और सिर्फ 20% ही महिलाएं होती है।
धरती पर रहने वाले जीव-जगत पर करीब तीन दशक से जलवायु परिवर्तन के वर्तमान और भविष्य में होने वाले संकटों की तलवार लटकी हुई है। मनुष्य और जलवायु बदलाव के बीच की दूरी निरंतर कम हो रही है। अतएव इस संकट से निपटने के उपायों को तलाशने की दृष्टि से 198 देश दुबई जलवायु सम्मेलन कॉप-28 में एकत्रित हुए। परिचर्चाओं और वाद विवाद से निकले निष्कर्ष के तहत कोयला, तेल और गैस अर्थात जीवाश्म ईंधन का उपयोग धीरे-धीरे खत्म करना है। लेकिन विकासशील देश इस बात को लेकर थोड़े असहमत रहे कि इस समझौते की जो शर्तें हैं, एक तो वे पूरी तरह स्पष्ट नहीं हैं, दूसरे उन्हें अमीर देशों की आर्थिक मदद के बिना उसे पूरी करना आसान नहीं होगा। इस सम्मेलन का एक ही प्रमुख लक्ष्य था कि दुनिया उस रास्ते पर लौटे, जिससे बढ़ते वैश्विक तापमान को 1.5 डिग्री सेल्सियस तक केंद्रित किया जा सके। 100 से ज्यादा देश 2030 तक दुनिया की नवीनीकरण योग्य ऊर्जा को बढ़ा कर तीन गुना करने पर सहमत भी हो गए। इसके अंतर्गत अक्षय ऊर्जा के प्रमुख स्रोत सूर्य, हवा और पानी से बिजली बनाने के उपाय सुझाए गए हैं। इस सिलसिले में प्रेरणा लेने के लिए उरुग्वे जैसे देश का उदाहरण दिया गया, जो अपनी जरूरत की 98 फीसदी ऊर्जा इन्हीं स्रोतों से प्राप्त करता है। लेकिन यह एक अपवाद है, हकीकत यह है कि यूक्रेन-रूस तथा इजरायल-हमास के बीच चलते भीषण युद्ध के कारण कोयला जैसे जीवाश्म ईंधन से ऊर्जा उत्पादन का प्रयोग बढ़ा है और बिजली उत्पादन के जिन कोयला संयंत्रों को बंद कर दिया गया था, उनका उपयोग फिर से शुरू हो गया है।
पर्यावरण विज्ञानियों ने बहुत पहले जान लिया था कि औद्योगिक विकास से उत्सर्जित कार्बन और शहरी विकास से घटते जंगल से वायुमंडल का तपमान बढ़ रहा है, जो पृथ्वी के लिए घातक है। इस सदी के अंत तक पृथ्वी की गर्मी 2.7 प्रतिशत बढ़ जाएगी, नतीजतन पृथ्वीवासियों को भारी तबाही का सामना करना पड़ेगा। इस मानव निर्मित वैश्विक आपदा से निपटने के लिए प्रतिवर्ष एक अंतरराष्ट्रीय पर्यावरण सम्मेलन जिसे कांफ्रेंस ऑफ पार्टीज (सीओपी/काॅप) के नाम से भी जाना जाता है। इस बार सीओपी की 28वीं बैठक दुबई में संपन्न हुई। सम्मेलन में बहुत कुछ नया नहीं हुआ। लगभग पुरानी बातें दोहराई गई। पेरिस समझौते के तहत वायुमंडल का तापमान औसतन 1.5 डिग्री सेल्सियस से कम रखने के प्रयास के प्रति भागीदार देशों ने वचनबद्धता भी जताई। लेकिन वास्तव में अभी तक 56 देशों ने संयुक्त राष्ट्र के मानदंडों के अनुसार पर्यावरण सुधार की घोषणा की है। इनमें यूरोपीय संघ, अमेरिका, चीन जापान और भारत भी शामिल है। लेकिन रूस और यूक्रेन तथा इजरायल और फिलिस्तीन युद्ध के चलते नहीं लगता कि कार्बन उत्सर्जन पर नियंत्रण नवीकरणीय ऊर्जा को जो बढ़ावा दिया जा रहा है, वह स्थिर रह पाएगा। क्योंकि जिन देशों ने वचनबद्धता निभाते हुए कोयला से ऊर्जा उत्सर्जन के जो संयंत्र बंद कर दिए थे, उन्हें रूस द्वारा गैस देना बंद कर दिए जाने के बाद फिर से चालू करने की तैयारियां हो रही हैं।
2018 ऐसा वर्ष था, जब भारत और चीन में कोयले से बिजली उत्पादन में कमी दर्ज की गई थी। नतीजतन भारत पहली बार इस वर्ष के ‘जलवायु परिवर्तन प्रदर्शन सूचकांक‘ में शीर्ष दस देशों में शामिल हुआ है। वहीं अमेरिका सबसे खराब प्रदर्शन करने वाले देशों में शामिल हुआ था। स्पेन की राजधानी मैड्रिड में ‘काॅप 25‘ जलवायु परिवर्तन सम्मेलन में यह रिपोर्ट जारी की गई थी। रिपोर्ट के अनुसार 57 उच्च कार्बन उत्सर्जन वाले देशों में से 31 में उत्सर्जन का स्तर कम होने के रुझान इस रिपोर्ट में दर्ज थे। इन्हीं देशों से 90 प्रतिशत काॅर्बन का उत्सर्जन होता रहा है। इस सूचकांक ने तय किया था कि कोयले की खपत में कमी सहित कार्बन उत्सर्जन में वैश्विक बदलाव दिखाई देने लगे हैं। इस सूचकांक में चीन में भी मामूली सुधार हुआ था। नतीजतन वह तीसवें स्थान पर रहा था। जी-20 देशों में ब्रिटेन सातवें और भारत को नवीं उच्च श्रेणी हासिल हुई है। जबकि आस्ट्रेलिया 61 और सऊदी अरब 56वें क्रम पर हैं। अमेरिका खराब प्रदर्शन करने वाले देशों में इसलिए आ गया है, क्योंकि उसने जलवायु परिवर्तन की खिल्ली उड़ाते हुए इस समझौते से बाहर आने का निर्णय ले लिया था। दुबई सम्मेलन में भी अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडेन निजी तौर पर शामिल नहीं हुए। लेकिन उनके जलवायु प्रतिनिधि जाॅन कैरी ने मीथेन गैस का उत्सर्जन कम करने का भरोसा जताया। यही स्थिति चीन की रही। चीन और अमेरिका का इस सम्मेलन से दूर रहना इसलिए नागवार है, क्योंकि यही देश सबसे ज्यादा प्रदूषण फैलाने वाले देश हैं। हकीकत है कि अमेरिका ने वास्तव में काॅर्बन उत्सर्जन पर नियंत्रण के कोई प्रयास ही नहीं किए। दुनिया की लगभग 37 प्रतिशत बिजली का निर्माण थर्मल पावरों में किया जाता है। इन संयंत्रों की भट्टी में कोयले को झोंका जाता है, तब कहीं जाकर बिजली का उत्पादन होता है। दो युद्धों के चलते कोयले से बिजली उत्पादन पर निर्भरता बढ़ती दिखाई दे रही है।
ब्रिटेन में हुई पहली औद्योगिक क्रांति में कोयले का महत्वपूर्ण योगदान रहा है। 1500 ईंसवीं में बड़ी मात्रा में कोयले के उत्खनन की शुरुआत हुई थी। इसके बाद जिन देशों में भी कारखाने लगे, उनमें लकड़ी और कोयले का प्रयोग लंबे समय तक होता रहा। दुनिया की रेलें भी कोयले से ही लंबे समय तक चलती रही हैं। भोजन पकाने, ठंड से बचने और उजाले के उपाय भी लकड़ी जलाकर किए जाते रहे हैं। अतएव धुएं के बड़ी मात्रा में उत्सर्जन और धरती के तापमान में वृद्धि की शुरुआत औद्योगिक क्रांति की बुनियाद रखने के साथ ही आरंभ हो गई थी। इसके बाद जब इन दुष्प्रभावों का अनुभव पर्यावरणविदों ने किया तो 14 जून 1992 में रियो डी जनेरियो में पहला अंतरराष्ट्रीय पृथ्वी संयुक्त राष्ट्र सम्मेलन संपन्न हुआ। इस सम्मेलन के परिणामस्वरूप जापान के क्योटो शहर में 16 फरवरी 2005 को पृथ्वी के बढ़ते तापमान के जरिए जलवायु परिवर्तन को रोकने के लिए क्योटो प्रोटोकाॅल अंतरराष्ट्रीय संधि अस्तित्व में आई। इस संधि में शामिल देशों ने ग्रीन हाउस अर्थात मानव उत्सर्जित गैसों को कम करने के लिए प्रतिबद्धता जताई। दुनिया के विज्ञानियों ने एक राय होकर कहा कि मानव निर्मित गैस सीओ-2 के उत्सर्जन से धरती का तापमान बढ़ रहा है, जो जीवाष्म ईंधन का पर्याय है। 192 देशों ने इस संधि पर हस्ताक्षर किए हुए हैं।
लेकिन वर्तमान में चल रहे दो भीषण युद्ध ने हालात बदल दिए हैं। नवंबर 2021 में ग्लासगो में हुए वैश्विक सम्मेलन में तय हुआ था कि 2030 तक विकसित देश और 2040 तक विकासशील देश ऊर्जा उत्पादन में कोयले का प्रयोग बंद कर देंगे। यानी 2040 के बाद थर्मल पावर अर्थात ताप विद्युत संयंत्रों में कोयले से बिजली का उत्पादन पूरी तरह बंद हो जाएगा। तब भारत-चीन ने पूरी तरह कोयले पर बिजली उत्पादन पर असहमति जताई थी, लेकिन 40 देषों ने कोयले से पल्ला झाड़ लेने का भरोसा दिया था। 20 देषों ने विश्वास जताया था कि 2022 के अंत तक कोयले से बिजली बनाने वाले संयंत्रों को बंद कर दिया जाएगा। आस्ट्रेलिया के सबसे बड़े कोयला उत्पादक व निर्यातक रियो टिंटो ने अपनी 80 प्रतिशत कोयले की खदानें बेच दीं थीं, क्योंकि भविष्य में कोयले से बिजली उत्पादन बंद होने के अनुमान लगा लिए गए थे।
भारतीय व्यापारी गौतम अडानी ने इस अवसर का लाभ उठाया और अडानी ने ‘आस्ट्रेलिया कोल कंपनी‘ बनाकर ऑस्ट्रेलिया के क्वींसलैंड क्षेत्र में कोयला खदानें भी हासिल कर लीं। अडानी ने कारमिकेल कोयला खदान पर पर्यावरण संबंधी मंजूरी मिलने के बाद 2019 से कोयले का खनन शुरू कर इसे बेचना भी आरंभ कर दिया है। अडानी ने ऑस्ट्रेलियाई मूल के 1500 बेरोजगारों को प्रत्यक्ष और 6,750 लोगों को अप्रत्यक्ष रोजगार देने का अनुबंध करके इस खदान से उत्खनन शुरू किया है। फरवरी 2022 में जब भारत में कोयले का संकट खड़ा हुआ था, तब आस्ट्रेलिया से ही भारत की सबसे बड़ी बिजली उत्पादक कंपनी एनटीपीसी ने कोयला खरीदा था। 2019 तक यूरोप केवल 20 प्रतिषत बिजली का उत्पादन कोयले से करता था। ऊर्जा की शेष जरूरतों की आपूर्ति गैस से होती थी। इसलिए अनेक यूरोपीय देशों ने 2025 तक अधिकतर ताप विद्युत घरों को बंद करने की परियोजनाओं पर काम करना शुरू कर दिया था। लेकिन अब रूस से गैस की आपूर्ति बंद हो जाने के कारण इटली, जर्मनी, नीदरलैंड और ऑस्ट्रिया ने अपने कोयले से बिजली उत्पादन जारी रखने का फैसला ले लिया है। इन फैसलों के चलते अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी को कहना पड़ा था कि 2022-23 में यूरोपीय देशों में कोयले से बिजली का उत्पादन 7 से 10 प्रतिशत तक बढ़ने की संभावना है। जबकि पूरी दुनिया में कोयले की खपत आठ अरब टन हो जाएगी। कोयले की इतनी ही खपत 2013 तक होती थी। साफ है, कोयले की खपत बिजली उत्पादन के लिए बढ़ेगी तो कार्बन उत्सर्जन भी बढ़ेगा। अतएव धरती के तापमान में वृद्धि भी बढ़ेगी।
इन बदलते हालात में हमें जिंदा रहना है तो जिंदगी जीने की शैली को भी बदलना होगा। हर हाल में ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन में कटौती करनी होगी। यदि तापमान में वृद्धि को पूर्व औद्योगिक काल के स्तर से 1.5 डिग्री सेल्सियस तक सीमित करना है तो कार्बन उत्सर्जन में 43 प्रतिशत कमी लानी होगी। आईपीसीसी ने 1850-1900 की अवधि को पूर्व औद्योगिक वर्श के रूप में रेखांकित किया हुआ है। इसे ही बढ़ते औसत वैश्विक तापमान की तुलना के आधार के रूप में लिया जाता है। गोया, कार्बन उत्सर्जन की दर नहीं घटी और तापमान में 1.5 डिग्री से ऊपर चला जाता है तो असमय अकाल, सूखा, बाढ़ और जंगल में आग की घटनाओं का सामना निरंतर करते रहना पड़ेगा। बढ़ते तापमान का असर केवल धरती पर होगा, ऐसा नहीं है। समुद्र का तापमान भी इससे बढ़ेगा और कई शहरों के अस्तित्व के लिए समुद्र संकट बन जाएगा। इसी सिलसिले में जलवायु परिवर्तन से संबंधित संयुक्त राष्ट्र की अंतर-सरकारी समिति की ताजा रिपोर्ट के अनुसार सभी देश यदि जलवायु बदलाव के सिलसिले में हुई क्योटो-संधि का पालन करते हैं, तब भी वैश्विक ग्रीन हाउस गैस उत्सर्जन में 2010 के स्तर की तुलना में 2030 तक 10.6 प्रतिशत तक की वृद्धि होगी। नतीजतन तापमान भी 1.5 से ऊपर जाने की आशंका बढ़ गई है। चूंकि विकासशील देश ऊर्जा उत्पादन के लिए जीवाष्म ईंधन पर निर्भर हैं, इसलिए उन्हें कार्बन उत्सर्जन घटाने के लिए विकसित देशों से आर्थिक मदद की जरूरत है। यदि सीओपी-28 सम्मेलन के ठीक पहले आई ‘एडाॅप्टेशन गैस रिपोर्ट-2023 अंडर फायनेंस‘ में कहा गया है कि वर्तमान में वैश्विक स्तर पर एडाॅप्टेशन अर्थात अनुकूलन के लिए जितनी वित्तीय मदद की जा रही है, उससे कहीं अधिक दस से 18 गुना आर्थिक मदद की जरूरत है। यह मदद नहीं मिलती है तो ज्यादातर विकासशील देश हाथ पर हाथ धरे अगले सम्मेलन तक बैठे रहेंगे ?
स्वदेशी चिकित्सा पौधे अर्थात "देसी औषधि पौधे" स्वदेशी पौधे भारत और शेष विश्व में स्वदेशी चिकित्सा प्रणाली का एक महत्वपूर्ण तत्व हैं। इसका पारंपरिक औषधीय उपयोग है और पारंपरिक चिकित्सा किसी भी प्राचीन और सांस्कृतिक रूप से आधारित स्वास्थ्य देखभाल पद्धति को संदर्भित करती है, जो वैज्ञानिक चिकित्सा से भिन्न है और विभिन्न संस्कृतियों के समुदायों द्वारा बड़े पैमाने पर मौखिक रूप से प्रसारित होती है।
लोग इन पौधों को उस प्राचीन मान्यता के कारण महत्व देते हैं जो कहती है कि पौधे को हमने मनुष्य को भोजन, चिकित्सा उपचार और अन्य प्रभाव प्रदान करने के लिए बनाया है। हालाँकि दुनिया के 5.2 अरब लोगों में से लगभग 80% लोग कम विकसित देशों में रहते हैं और विश्व स्वास्थ्य संगठन का अनुमान है कि इनमें से लगभग 80% लोग अपनी प्राथमिक स्वास्थ्य देखभाल आवश्यकताओं के लिए विशेष रूप से पारंपरिक चिकित्सा पर निर्भर हैं।
अरंडी के तेल के पौधे में प्राकृतिक एंटीवायरल और रोगाणुरोधी गुण होते हैं जो इसे त्वचा की समस्या के लिए एक लोकप्रिय उपचार बनाते हैं जिसे डर्मेटोसिस के साथ-साथ फंगल संक्रमण के रूप में जाना जाता है, इसका उपयोग बालों के विकास के लिए भी किया जाता है।
नीम के फूल का उपयोग पित्त को कम करने, कफ को नियंत्रित करने और आंतों के कीड़ों के इलाज के लिए किया जाता है, और नीम के फल का उपयोग बवासीर, मूत्र पथ के विकार, नाक से खून, मधुमेह, घाव और कुष्ठ रोग के लिए किया जाता है।
आम के फूल या आम के फूल का रस पाचन तंत्र को ठंडा करने के लिए जाना जाता है, सिरदर्द, उल्टी और अन्य एलर्जी को ठीक करने में भी मदद कर सकता है।
कटहल का पेड़ कैंसर और हृदय रोग के साथ-साथ मोतियाबिंद जैसी आंखों की समस्याओं को रोकने में मदद कर सकता है, कटहल में कई अन्य ऑक्सीडेंट भी होते हैं और यह हमारे शरीर में कोशिका क्षति को रोकने या रोकने में मदद कर सकता है।
स्वदेशी पौधे स्थानीय आजीविका के लिए प्रेरणादायक हैं और बदलती जीवनशैली के कारण पारंपरिक उपचार वर्तमान में नष्ट हो रहे हैं। हालाँकि स्वदेशी पौधे स्थानीय आजीविका से अविभाज्य हैं और बदलती जीवनशैली के कारण पारंपरिक उपचार वर्तमान में नष्ट हो रहे हैं।
उपरोक्त बिंदुओं ने विकासशील देशों की आबादी के लिए स्वदेशी चिकित्सा पौधों के महत्व और अनुकूल परिस्थितियों में प्राथमिक स्वास्थ्य देखभाल में उनकी संभावित भूमिका पर प्रकाश डाला है, औषधीय पौधे विकास रणनीतियों के उपयोगी घटक हो सकते हैं जो स्थायी ग्रामीण आजीविका को बढ़ाते हैं। अंततः लोगों को उन पौधों के संरक्षण के लिए प्रेरित किया जाएगा, स्वदेशी चिकित्सा पौधे पारंपरिक चिकित्सा की "रीढ़" हैं और इस क्षेत्र में इसका सबसे अधिक चिकित्सीय उपयोग होता है।
पेन हमारे जीवन में बहुत महत्व रखता है। चाहे ऑफिस में काम के लिए हो या स्कूल, कॉलेज में बच्चों की पढ़ाई के लिए पेन उपयोग में आता है। इसे बड़ो से लेकर बच्चें सभी इसका उपयोग करते है। आपको बता दे पहले के समय में लिखने के लिए पक्षियों के पंखों का इस्तेमाल किया जाता था। लेकिन आज के समय में आपको एक से बढ़कर एक पेन मार्किट में मिल जाएंगे जैसे लाइट वाले पेन, कमरे वाले पेन आदि।आज के समय में हम अधिकतर जेल पेन या फिर बॉल पेन, रोलरबॉल पेन, फाउंटेन पेन, फेल्ट टिप पेन, का इस्तेमाल करते हैं। जिस तरह से शिक्षा डिजिटल होती जा रही हैं कॉपी-पेन की जगह टेबलेट व कीबोर्ड आदि उपकरण उपयोग किये जा रहे हैं।
पेन का आविष्कार किसने किया था?
पेन का आविष्कार फ्रेंच इन्वेन्टर पेट्राचे पोएनरु नें किया था। इन्होंने 25 मई 1857 को फाउंटेन पेन का आविष्कार किया था. लेकिन सबसे महत्वपूर्ण बॉल पॉइंट पेन का आविष्कार को माना जाता है। बॉल पॉइंट पेन के आविष्कार का श्रेय 2 व्यक्तियों को दिया जाता हैं जिनमे से पहला नाम John J. Loud था और दूसरा नाम László Bíró हैं. लेकिन बॉलपॉइंट पेन (बॉल पेन) के आविष्कार का श्रेय मुख्य रूप से जॉन जैकब लाउड को दिया जाता है। जॉन जैकब लाउड ने 1988 में बॉल पॉइंट पेन का आविष्कार किया। पेन से जुड़ी कुछ मुख्य बाते
दुनिया का सबसे कीमती पेन टिबाल्डी फुलगोर नोक्टर्नस है। वर्तमान में इसकी कीमत लगभग 60 करोड़ है।
फाउंटेन पेन का आविष्कार Petrache Poenaru ने सन 1827 में किया था।
बॉल पेन का आविष्कार John J Loud. ने सन 1888 में किया था।
दुनिया का सबसे कीमती पेन टिबाल्डी फुलगोर नोक्टर्नस है। वर्तमान में इसकी कीमत लगभग 60 करोड़ है।
वैसे तो गुरुत्वाकर्षण का बल सर्वत्र विद्यमान है जो कि काभी नष्ट नहीं किया जा सकता है क्योंकि यह प्रकृति प्रदत्त है। जब हम इसे नहीं जानते थे तब भी यह इस संसार मेँ उपस्थित था और आज हम जब इसे जान गए है तब भी यह सर्वत्र विद्यमान है। परिवर्तन केवल इतना है कि हमने इसके बारे मे जानकार इसके अनुकूल कार्य करने वाले यंत्रों तथा उपकरणों का आविष्कार कर लिया है जो कि मानव जीवन को सरल बनाते है।
गुरुत्वाकर्षण की खोज का इतिहास कि बात करें तो हमे कितबों मेँ तो केवल यही पढ़ाया जाता है कि कि गुरुत्वाकर्षण बल कि खोज आइजक न्यूटन ने कि तथा इसके सार्वत्रिक नियम दिए। लेकिन यह पूरा सत्य नहीं है क्योंकि न्यूटन 1643 – 1727 ई.पू. वाले ! और हमारे पास भारतीय संस्कृति मेँ इस बात का एक नहीं बल्कि 3 प्रमाण उपस्थित है कि इसकि खोज भारत मे हुई। जानते है कि भारत मे किसने गुरुत्वाकर्षण को खोजा।
वराहमिहिर नामक एक महान खगोलशास्त्री
वराहमिहिर, जिसे वराह या मिहिर भी कहा जाता है, एक प्राचीन भारतीय ज्योतिषी, खगोलशास्त्री और बहुश्रुत थे जो उज्जैन में रहते थे। उनका जन्म अवंती क्षेत्र के कायथा में हुआ था, जो लगभग आधुनिक मालवा के आदित्यदास के अनुरूप था। उनके अपने कार्यों में से एक के अनुसार, उनकी शिक्षा कपित्थक में हुई थी।
आइजैक न्यूटन के जन्म से सैकड़ों साल पहले हमारे भारतीय गुरुत्वाकर्षण के बारे में जानते थे। प्राचीन काल में 505-587 के समय में वराहमिहिर नामक एक महान खगोलशास्त्री और गणितज्ञ थे, जिन्होंने वर्षों पहले गुरुत्वाकर्षण की व्याख्या की थी, लेकिन उन्होंने न्यूटन की तरह गुरुत्वाकर्षण के सिद्धांत को कोई नाम नहीं दिया। इस कारण सारा श्रेय सर आइजैक न्यूटन को जाता है।
ब्रह्मगुप्त द्वारा गुरुत्वाकर्षण का ज्ञान!
ब्रह्मगुप्त एक भारतीय गणितज्ञ और खगोलशास्त्री थे। वह गणित और खगोल विज्ञान पर दो प्रारंभिक कार्यों के लेखक हैं: ब्रह्मस्फुशसिद्धांत, एक सैद्धांतिक ग्रंथ, और खकखाद्यक, एक अधिक व्यावहारिक पाठ। शून्य से गणना करने के नियम देने वाले पहले ब्रह्मगुप्त थे।
अगर हम वराहमिहिर को भी गुरुत्वाकर्षण के सिद्धांतों का जनक न माने तो भी न्यूटन से पहले भारत के सन 598-670 के काल में महान ज्योतिषी ब्रह्मगुप्त थे। ब्रह्मगुप्त ज्योतिष शास्त्र के बहुत बड़े ज्ञाता तो थे ही साथ ही उन्हें गणित का भी बढ़िया ज्ञान था। ब्रह्मगुप्त की गिनती भारत के मशहूर ज्योतिषियों और गणितज्ञों में होती थी उन्होंने भी गुरुत्वाकर्षण के बारे में बताया था।
ब्रह्मगुप्त के अनुसार धरती गोल है और चीज़ों को अपनी ओर आकर्षित करती है।
अगर हम न्यूटन के सिद्धांतों को पढ़े तो उसमे भी यही लिखा है की धरती आकर में गोल है। और अगर कोई भी चीज़ अगर ऊपर की ओर भी फेंकी जाय या कही से भी गिर जाय तो वो आखिर में नीचे की ओर इसलिए आती है क्योंकि धरती चीज़ों को अपनी ओर आकर्षित करती है।
लेकिन उस समय लोगों ने उनकी बातों को गंभीरता से नहीं लिया था क्योंकि सभी को गुरुत्वाकर्षण के बारे में महान खगोलविद वराहमिहिर पहले ही बता चुके थे। इससे ये पता चलता है की हमारे पूर्वजों ने सदियों पहले ही गुरुत्वाकर्षण की खोज कर ली थी
भाष्कराचार्य का गुरुत्वाकर्षण का नियम
गुरुत्वाकर्षण: “पिताजी, हम इस धरती पर किस पर रहते हैं?” लीलावती ने यह प्रश्न अपने पिता भास्कराचार्य से सदियों पहले पूछा था। इसके जवाब में भास्कराचार्य ने कहा, “लावती!, कुछ लोग जो कहते हैं कि यह पृथ्वी शेषनाग, कछुआ या हाथी या किसी अन्य वस्तु पर आधारित है, तो वे गलत हैं। भले ही यह मान लिया जाए कि यह किसी वस्तु पर आधारित है। यह टिकी हुई है, प्रश्न बना रहता है कि वह वस्तु किस पर टिकी है और इस प्रकार कारण का कारण और फिर उसका कारण… यदि यह क्रम जारी रहता है, तो न्यायशास्त्र में इसे अनावस्था दोष कहा जाता है।
लीलावती ने कहा, अभी भी प्रश्न बना हुआ है, पिता, पृथ्वी किस पर टिकी है? तब भास्कराचार्य ने कहा, हम क्यों नहीं मान सकते कि पृथ्वी किसी चीज पर आधारित नहीं है। यदि हम कहें कि पृथ्वी अपने ही बल द्वारा समर्थित है और इसे गुरुत्वाकर्षण बल कहते हैं, तो इसमें दोष क्या है? इस पर लीलावती ने पूछा कि यह कैसे संभव है? तब भास्कराचार्य इस सिद्धांत के बारे में कहते हैं कि चीजों की शक्ति बहुत अजीब है:-
मरुच्लो भूरचला स्वभावतो यतो
विचित्रावतवस्तु शक्त्य:॥ — सिद्धांतशिरोमणि, गोलाध्याय – भुवनकोश
आगे कहते हैं-
आकृष्टिशक्तिश्च मही तया यत् खस्थंगुरुस्वाभिमुखं स्वशक्तत्या।आकृष्यते तत्पततीव भातिसमेसमन्तात् क्व पतत्वियं खे॥ — सिद्धांतशिरोमणि गोलाध्याय – भुवनकोश
यानी पृथ्वी में आकर्षण की शक्ति है। पृथ्वी अपने आकर्षण बल से भारी वस्तुओं को अपनी ओर खींचती है और आकर्षण के कारण वे जमीन पर गिर जाती हैं। लेकिन जब आकाश में चारों ओर से एक ही बल दिखाई दे, तो कोई कैसे गिर सकता है? अर्थात ग्रह आकाश में गतिहीन रहते हैं क्योंकि विभिन्न ग्रहों के गुरुत्वाकर्षण बल संतुलन बनाए रखते हैं।
ऑप्टिकल फाइबर के प्रकार का तार होता है जो पतले कांच और प्लास्टिक , मतलब फाइबर से बना होता है ये एक तरह का ऐसा उपकरण है जिसमें लाइट और लेजर की मदद से डेटा एक स्थान से दूसरे स्थान में ट्रांसफर किया जाता है। यह एक ऐसा तार होता है जिसमें इलेक्ट्रिसिटी पास करवाने के बजाए लेजर लाइट पास करवाया जाता है और यह आसानी से एक जगह से दूसरी जगह पर बड़ी जल्दी पहुंच जाती है।
ऑप्टिकल फाइबर की खोज सन 1952 नरिंदर सिंह कपानी ने किया था, यह वैज्ञानिक भारत के पंजाब में रहने वाले एक अमेरिकी वैज्ञानिक है। अमेरिका में जाकर इन्होंने ऑप्टिकल फाइबर जैसे बड़े आविष्कार किए हैं।
ऑप्टिकल फाइबर एक इंसान के बाल से थोड़ा ही मोटा होता है। इसको सिलिकॉन , कांच या प्लास्टिक की मदद से बनाया जाता है यह बहुत ही लचीला पदार्थ होता है परंतु इसके ऊपर कई सारे परत लगाए जाते हैं उसके बाद इसे तार के रूप में बनाया जाता है।
ऑप्टिकल फाइबर की खोज अमेरिका में हुई थी। इस खोज के बाद किसी भी डाटा को एक स्थान से दूसरे स्थान में पहुंचाने में ज्यादा देर नहीं लगती है यह बहुत ही जल्दी काम करता है और बहुत ही तेज संचार का माध्यम बन चुका है।
ऑप्टिकल फाइबर केबल के प्रकार निम्नलिखित है:-
लोस कॉन्फिग्रेशन :- इस ऑप्टिकल फाइबर के ऊपर जेल की परत चढ़ाई जाती है। अर्थात फाइबर के ऊपर एक पतला सा कोर होता है जिसके अंदर जेल भरा जाता है जिससे वह सुरक्षित रहे।
टाइट कॉन्फिग्रेशन:- इस ऑप्टिकल फाइबर को सुरक्षित रखने के लिए इसके ऊपर स्ट्रेट वायर का इस्तेमाल किया जाता है क्योंकि ऑप्टिकल फाइबर बहुत ज्यादा लचीला होता है जिसके कारण वह बार-बार मूड जाता है इसमें स्ट्रेट वायर की परत चढ़ाने से यह मुड़ता नहीं और खराब होने का डर भी नहीं होता।
सिंगल मोड:- इस ऑप्टिकल फाइबर में केवल एक ही लेजर या लाइट पास हो सकती है जिसके कारण यह बहुत ही लंबा चलती है। इस फाइबर में एक लाइट के जरिए सिग्नल पास करवाया जाता है परंतु यह भी बहुत जल्दी काम करती है।
मल्टी मोड :- Single-Mode से विपरीत मल्टी मोड में बहुत सारे लाइट पास करवाने का रास्ता होता है परंतु सिंगर मोड के जैसा यह फाइबर ज्यादा दूर तक सिग्नल पास नहीं करवा पाता।
खास तौर पे ऑप्टिकल फाइबर का उपयोग संचार माध्यम के लिए किया जाता है। समुद्रों के नीचे भी ऑप्टिकल फाइबर की तार बिछाई जाती है जिससे एक महाद्वीप दूसरे महाद्वीप के साथ संचारू रूप से जुड़े रहे। आज के समय में यह हर देश में उपयोग होने लगा है जमीन के नीचे से यह संचार माध्यम लोगो को आपस में जोड़े रखा है।
लाभ :-
हानि :-
ऑप्टिकल फाइबर भौतिक विज्ञान के टोटल इंटरनल रिफ्लेक्शन सिद्धांत पर काम करता है। इसमें लाइट पास करवाया जाता है तो यह इसी सिद्धांत के रूप में लाइट को फाइबर के अंदर रिफ्लेक्ट करवा कर आखरी बिंदु तक पहुंचा देता है। यह सिद्धांत बार-बार फाइबर के अंदर दोहराती रहती है इसी वजह से सिग्नल लाइट एक बिंदु से दूसरे बिंदु तक बहुत ही जल्दी पहुंच जाती है।
