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4 फरवरी - बलिदान दिवस "भगवा की विजय और सिंह की पूर्णाहुति : महा महारथी तानाजी मालुसरे

Date : 04-Feb-2025

 महा महारथी श्रीयुत तानाजी मालुसरे के बलिदान पर छत्रपति शिवाजी महाराज ने कहा कि "गढ़ आला पण सिंह गेला"

अनादि काल से भारत वीर प्रसूता वसुंधरा के नाम से सुविख्यात है है। भारत के मध्य कालीन इतिहास में महाराणा प्रताप से लेकर छत्रपति शिवाजी महाराज, गुरु गोविंद सिंह जी सहित अनेक महारथी हुए जो अपनी मातृभूमि की रक्षा के लिए अपनी अंतिम सांस तक लड़े आज हम इतिहास के उन वीरों की बलिदान भूल रहे हैं, इन्हीं योद्धाओं में एक योद्धा जन्मे थे तानाजी मालुसरे। तानाजी मालुसरे मराठा साम्राज्य में एक सेनापति थे, आज जब भी मराठा साम्राज्य का उल्लेख होता है तो सब के सामने छत्रपति शिवाजी महाराज का ही नाम आता है, आना भी चाहिए, परंतु वो तानाजी मालुसरे ही थे, जिनके सहयोग से शिवाजी ने मुगलों के समय के सबसे मजबूत सिंहगढ़ पर विजय हासिल की थी।

तानाजी को शिवाजी के बचपन की दोस्ती व अपने कार्य के प्रति कर्तव्यनिष्ठा के लिए जाना जाता है। मराठा सम्राज्य में तानाजी, शिवाजी के विदेशी आंक्रातांओं से मुक्त भारत बनाने में सूबेदार की भूमिका में थे।  शिवाजी महाराज के बचपन के दोस्त व मराठा सम्राज्य के सबसे विश्वसनीय योद्धा तानाजी मालुसरे का जन्म महाराष्ट्र के सतारा जिले के एक छोटे से गांव गोदोली ( जावली तालुका ) में हुआ था। तानाजी का जन्म एक हिंदू कोली परिवार में हुआ था। तानाजी के पिता का नाम सरदार कलोजी व माता का नाम पार्वतीबाई था। तानाजी को बचपन से ही तलवारबाजी का अत्याधिक शौक था। यही वजह रही की उनकी मित्रता शाहजी भोंसले के पुत्र शिवाजी से हो गई। शिवाजी ने आगे चलकर अपने साम्राज्य में तानाजी की कुशलता को देखकर अपनी सेना का सेनापती व मराठा साम्राज्य का मुख्य सुबेदार नियुक्त कर दिया।

तानाजी के जीवन में सबसे महत्वपूर्ण युद्धों (तोरण द्वार, संगमनेर, उंबरखिंद और सिंहगढ के युद्ध) में एक युद्ध था सिंहगढ़ का युद्ध ( कोंढाणा ) यह युद्ध 1670 में मराठा साम्राज्य व मुगलो के बीच लड़ा गया। जब इस युद्ध की शुरुआत होने वाली थी तब तानाजी और उनकी सहधर्मचारिणी सावित्री अपने पुत्र रायबा के विवाह में व्यस्त थे। विवाह के बीच ही जब उनके पास मराठा साम्राज्य से इस युद्ध की जानकारी मिली तब वो उसी क्षण अपने मामा शेलार मामा के साथ स्व की विजय के लिए प्रयाण किया। तानाजी मालुसरे शिवाजी महाराज के घनिष्ठ मित्र और वीर निष्ठावान सरदार थे। उनके पुत्र के विवाह की तैयारी हो रही थी। चारों ओर उल्लास का वातावरण था। तभी शिवाजी महाराज का संदेश उन्हें मिला- "माता जीजाबाई ने प्रतिज्ञा की है कि जब तक कोंढाना दुर्ग पर मुसलमानों के हरे झंडे को हटा कर भगवा ध्वज नहीं फहराया जाता, तब तक वे अन्न-जल ग्रहण नहीं करेंगी। तुम्हें सेना लेकर इस दुर्ग पर आक्रमण करना है और अपने अधिकार में लेकर भगवा ध्वज फहराना है।"

यह संदेश मिलते ही तानाजी ने सबको आदेश दिया- विवाह के बाजे बजाना बन्द करो, युद्ध के नगाड़े बजाओ।"सगे संबंधियों ने तानाजी से कहा- "अरे! पुत्र का विवाह तो हो जाने दो, फिर शिवाजी महाराज के आदेश का पालन कर लेना।" परन्तु तानाजी ने उच्च स्वर में कहा- "नहीं, पहले कोंढाना (कोंढाणा) दुर्ग की विजय होगी , बाद में पुत्र का विवाह। यदि मैं जीवित नहीं भी रहा तो शिवाजी महाराज हमारे पुत्र का विवाह करेंगे।" बस, युद्ध निश्चित हो गया।

 सन् 1665 में पुरंदर की संधि के कारण कोंढाना दुर्ग मुगलों को सौंपना पढ़ा था तब से ही मराठा सम्राट शिवाजी हर हालत में इस किले को एक बार पुनः हासिल करना चाहते थें। युद्ध की शुरुआत से पहले शिवाजी महाराज तानाजी को  कहते है कि “ कोंढाणा किले को मुगलों की कैद से मुक्त कराना अब उनकी अस्मिता का प्रश्न बन गया है।यदि हम इस किले को हासिल नहीं कर पाए तो आने वाली पीढ़ियां उन पर हंसेगी की हम हिंदूअपना घर भी मुगलों से मुक्त नहीं करा पाए।" जब यह बात तानाजी ने सुनी तो तभी उन्होंने कसम खाई की अब उनके जीवन का उद्देश्य केवल कोंढाणा किले को हासिल करना ही है।कोंढाणा किले की बनावट कुछ इस तरह से थी की इस पर हमला करने वाली सेना को सबसे ज्यादा विपरीत परिस्थितियों का सामना करना पड़ता था, वहीं शिवाजी इस किले को हर परिस्थिति भुलाकर इसे जीतना चाहते थे । तब किले पर करीब 5000 हजार मुगल सैनिकों का पहरा था व किले का सुरक्षा का जिम्मा उदयभान के हाथों में था। इन परिस्थितियों में कोंढाणा किले का एक ही भाग ऐंसा था जहां से मराठा सेना आसानी से किले में प्रवेश कर सके और वो भाग था किले की ऊंची पहाड़ियों का पश्चिमी भाग।

तानाजी की रणनीति के अनुसार उन्होंने यह तय किया की वो पश्चिमी भाग की चट्टानों पर गोहपड़ की सहायता से चढ़कर किले की सुरक्षा को भेजेंगे । जो गोह सरीसृप प्रजाति से है,यह एक बार में मुश्किल से मुश्किल चट्टान में भी मजबूती से चिपक जाती है। तानाजी के कोंढाणा किले में प्रवेश करने के बाद मराठा सैनिक एक के बाद एक किले में प्रवेश कर जाते है। तानाजी की इस गोहपड़ का नाम यशवंती था।मुगलों से कोंढाणा किले को मुक्त कराने के लिए करीब 342 सैनिकों के साथ तानाजी किले में प्रवेश कर जाते हैं । तब किले में सुरक्षा के लिए तैनात सेनापति उदयभान को इस बात की भनक लग जाती गई और कोंढाणा किले में मुगल व मराठा सैनिकों के बीच 4 फरवरी सन् 1670 के दिन भंयकर युद्ध छिड़ गया। मुगलों की तोपों को निष्क्रिय करते हुए तानाजी ने अनेक मुगल सैनिकों को मौत के घाट उतार देते हैं तदुपरांत उनका अत्यंत घायल अवस्था में, उदयभान से भयानक संग्राम हुआ। इस द्वंद्व युद्ध में तानाजी मालुसरे का अत्यंत घायल अवस्था में प्राणोत्सर्ग हुआ, परंतु इसके पूर्व तानाजी मालुसरे, ने उदयभान को भी मौत के घाट उतार दिया । अंत में महासंग्राम समाप्त हुआ, भगवा ध्वज फहराया और स्व के लिए पूर्णाहुति के साथ विजय हुई। एक बार फिर कोंढाणा(कोंधाना) किले पर मराठा साम्राज्य का अधिकार गया। 

कोंढाणा किले को जीतने के बाद मराठा सम्राट शिवाजी किले की जीत के बाद भी अत्यंत दुखी हो गए और बोले “ गढ़ आला पण सिंह गेला ” यानी गढ़ तो जीत लिया लेकिन मेरा सिंह तानाजी मुझे छोड़ कर चला गया "। 
मुगलों के अधीन से कोंढाणा  किले से मुक्त कराने के बाद शिवाजी महाराज ने कोंढाणा किले का नाम बदलकर अपने मित्र की याद में सिंहगढ़ रख दिया साथ ही पुणे नगर के “ वाकडेवाडी ” का नाम “ नरबीर तानाजी वाडी ” रख दिया। तानाजी की वीरता को देखते हुए शिवाजी ने उनकी याद में महाराष्ट्र में उनकी याद में कई स्मारक स्थापित किए।भारत सरकार ने भी तानाजी का सम्मान करते हुए सिंहगढ़ किले की तस्वीर के साथ एक डाक टिकट जारी की।

 तानाजी मालुसरे की वीरता व दृढ़ निश्चय की वीरता का उल्लेख मध्यकाल युग के कवि तुलसीदास ने “ पोवाडा ” कविता की रचना की थी।देश के समाजसेवी बनकर देश के लिए महत्वपूर्ण कार्य को आगे बढ़ाने वाले विनायक दामोदर सावरकर ने भी तानाजी के जीवन पर “ बाजीप्रभु” नामक गीत की रचना की। सावरकर की इस रचना पर ब्रिटिश सरकार ने रोक लगा दी लेकिन 24 मई 1946 को प्रतिबंध हटा दिया गया।वीर सावरकर ने तानाजी की सिंहगढ़ की वीरता को अपनी कविता में इस तरह उल्लेख किया
 
" जयोऽस्तु ते श्रीमहन्‌मंगले शिवास्पदे शुभदे ।
स्वतंत्रते भगवति त्वामहम् यशोयुतां वंदे ॥१॥
स्वतंत्रते भगवती या तुम्ही प्रथम सभेमाजीं ।
आम्ही गातसों श्रीबाजीचा पोवाडा आजी ॥२॥
चितूरगडिंच्या बुरुजानो त्या जोहारासह या ।
प्रतापसिंहा प्रथितविक्रमा या हो या समया ॥३॥
तानाजीच्या पराक्रमासह सिंहगडा येई ।
निगा रखो महाराज रायगड की दौलत आयी ॥४॥
जरिपटका तोलीत धनाजी संताजी या या ।
दिल्लीच्या तक्ताचीं छकलें उधळित भाऊ या ॥५॥
स्वतंत्रतेच्या रणांत मरुनी चिरंजीव झाले ।
या ते तुम्ही राष्ट्रवीरवर या हो या सारे ॥६॥ " 
-  वीर सावरकर 
 
लेखक -  डॉ आनंद सिंह राणा
 
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