भारत के पूर्व प्रधानमंत्री, प्रखर स्वतंत्रता सेनानी और दृढ़ इच्छाशक्ति के धनी मोरारजी देसाई (1896-1995) की पुण्यतिथि को उनके द्वारा स्थापित उच्च नैतिक सिद्धांतों और राष्ट्र सेवा के प्रति अटूट निष्ठा की स्मृति में संपूर्ण देश द्वारा अत्यंत श्रद्धा के साथ मनाया जाता है। उन्हें भारतीय राजनीति के एक ऐसे शिखर पुरुष और 'लौह पुरुष' के रूप में पहचाना जाता है, जिनके द्वारा सत्य, अनुशासन और शुचिता के साथ कभी भी समझौता नहीं किया गया। उनके जीवन को भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में एक ऐसी महान यात्रा के रूप में देखा जाता है, जहाँ सत्ता का उद्देश्य केवल व्यक्तिगत उपभोग नहीं, बल्कि जनकल्याण और नैतिक मूल्यों की स्थापना रहा। उनके द्वारा शासन-प्रशासन में जिस पारदर्शिता और मितव्ययता के आदर्श स्थापित किए गए, उन्हें आज भी सार्वजनिक जीवन जीने वाले प्रत्येक व्यक्ति के लिए अनुकरणीय और मार्गदर्शक माना जाता है।
ऐतिहासिक पृष्ठभूमि की दृष्टि से, मोरारजी देसाई का जन्म 29 फरवरी, 1896 को गुजरात के वलसाड जिले के 'भदेली' गाँव में हुआ था। उनके द्वारा अपनी शिक्षा के पश्चात तत्कालीन ब्रिटिश शासन में एक सिविल सेवक के रूप में कार्य प्रारंभ किया गया था। किंतु, महात्मा गांधी के विचारों और स्वतंत्रता आंदोलन की पुकार ने उन्हें अपनी सुरक्षित नौकरी त्यागने और राष्ट्र सेवा के कठिन मार्ग को चुनने के लिए प्रेरित किया। उनके द्वारा वर्ष 1930 में सविनय अवज्ञा आंदोलन में सक्रिय भागीदारी निभाई गई, जिसके कारण उन्हें कई बार जेल की यातनाएँ सहन करनी पड़ीं। उनके व्यक्तित्व को गांधीवादी दर्शन के एक कठोर अनुपालक के रूप में पहचाना जाता है, जहाँ अहिंसा और सत्य केवल शब्द नहीं, बल्कि जीवन जीने की अनिवार्य पद्धति थे। उनके द्वारा बॉम्बे प्रेसीडेंसी (अब महाराष्ट्र और गुजरात) के मुख्यमंत्री के रूप में जिस कुशलता के साथ कार्य किया गया, उसने उनकी प्रशासनिक क्षमता का लोहा संपूर्ण देश में मनवाया।
मोरारजी देसाई के राजनीतिक जीवन का सबसे महत्वपूर्ण कालखंड वह माना जाता है जब उनके द्वारा देश के चौथे प्रधानमंत्री के रूप में शपथ ली गई। वर्ष 1977 में आपातकाल के काले साये के पश्चात, उनके नेतृत्व में जनता पार्टी की सरकार द्वारा लोकतंत्र की पुनर्स्थापना के लिए ऐतिहासिक कदम उठाए गए। उनके द्वारा यह सुनिश्चित किया गया कि भविष्य में कोई भी सत्ता का दुरुपयोग कर देश के नागरिकों के मौलिक अधिकारों का हनन न कर सके। उनके द्वारा संविधान के 44वें संशोधन के माध्यम से उन अलोकतांत्रिक प्रावधानों को हटाया गया, जो आपातकाल के दौरान थोपे गए थे। इस कार्य को भारतीय लोकतंत्र के 'पुनर्जन्म' के रूप में स्वीकार किया गया है, जिसने न्यायपालिका और प्रेस की स्वतंत्रता को पुनः स्थापित किया।
उनके द्वारा आर्थिक नीतियों के क्षेत्र में भी अत्यंत दूरगामी और साहसी निर्णय लिए गए। मितव्ययता और सादगी केवल उनके व्यक्तिगत जीवन का हिस्सा नहीं थी, बल्कि इसे उनके द्वारा सरकारी व्यय में भी कड़ाई से लागू किया गया। उनके द्वारा सोने के नियंत्रण (Gold Control Act) और विमुद्रीकरण जैसे कदम उठाए गए ताकि अर्थव्यवस्था में व्याप्त काले धन और भ्रष्टाचार पर लगाम लगाई जा सके। उनके द्वारा बजट निर्माण की प्रक्रिया में पारदर्शिता लाने और सामान्य नागरिकों पर करों के बोझ को संतुलित करने के निरंतर प्रयास किए गए। उन्हें एक ऐसे वित्त मंत्री और प्रधानमंत्री के रूप में याद किया जाता है, जिनके लिए राष्ट्र की वित्तीय स्थिरता किसी भी राजनीतिक लोकप्रियता से ऊपर थी।
मोरारजी देसाई को विश्व के उन दुर्लभ राजनेताओं में गिना जाता है, जिन्हें भारत के सर्वोच्च नागरिक सम्मान 'भारत रत्न' और पाकिस्तान के सर्वोच्च नागरिक सम्मान 'निशान-ए-पाकिस्तान' से विभूषित किया गया है। यह गौरव उनके शांतिप्रिय व्यक्तित्व, तटस्थता और पड़ोसियों के साथ मधुर संबंधों की कूटनीतिक सफलता का प्रत्यक्ष प्रमाण है। उनके द्वारा विदेश नीति में 'वास्तविक गुटनिरपेक्षता' (Genuine Non-Alignment) के सिद्धांत को अपनाया गया, जिससे शीत युद्ध के उस दौर में भी भारत की स्वतंत्र पहचान और प्रतिष्ठा वैश्विक स्तर पर अक्षुण्ण रही। उनके द्वारा शांति और परमाणु निरस्त्रीकरण के लिए जो वैश्विक आह्वान किए गए, उन्हें आज भी अंतर्राष्ट्रीय शांति समझौतों के लिए प्रेरणादायक माना जाता है।
सामाजिक सुधारों के प्रति उनकी प्रतिबद्धता अटूट थी। उनके द्वारा नशामुक्ति और शराबबंदी जैसे कार्यक्रमों को एक राष्ट्रीय आंदोलन का रूप दिया गया। उनके अनुसार, एक स्वस्थ और समृद्ध राष्ट्र का निर्माण केवल व्यसनमुक्त समाज के माध्यम से ही संभव है। उनके द्वारा प्राकृतिक चिकित्सा और योग के महत्व को न केवल स्वयं के जीवन में अपनाया गया, बल्कि इसे जन-जन तक पहुँचाने के लिए निरंतर कार्य किया गया। उनकी दीर्घायु और निरंतर सक्रियता का रहस्य उनकी अनुशासित जीवनशैली और सात्विक आहार को ही माना जाता है। उनके द्वारा छुआछूत जैसी कुरीतियों के विरुद्ध भी समाज के विभिन्न वर्गों को संगठित किया गया ताकि एक समतामूलक भारत का स्वप्न साकार हो सके।
वर्तमान वैश्विक परिदृश्य (वर्ष 2026) के संदर्भ में, मोरारजी देसाई की प्रासंगिकता और भी अधिक बढ़ गई है। आज जब राजनीति में शुचिता और सादगी की कमी महसूस की जाती है, तब उनके जीवन के उदाहरण एक प्रकाश स्तंभ की भाँति कार्य करते हैं। डिजिटल युग में उनकी प्रशासनिक पारदर्शिता के सिद्धांतों को 'गुड गवर्नेंस' के नए मानकों के रूप में अपनाया जा रहा है। उनके द्वारा लिखित संस्मरण 'द स्टोरी ऑफ माई लाइफ' (मेरी जीवन कथा) को आज भी राजनीति विज्ञान के विद्यार्थियों के लिए एक अनिवार्य संदर्भ ग्रंथ माना जाता है। उनके जीवन से युवाओं को यह शिक्षा प्राप्त होती है कि निर्भीकता और आत्म-विश्वास के बल पर कठिन से कठिन राजनीतिक और व्यक्तिगत चुनौतियों का सामना किया जा सकता है।
पुण्यतिथि के पावन अवसर पर विभिन्न कार्यक्रमों, संगोष्ठियों और प्रार्थना सभाओं के माध्यम से उनके 'गांधीवादी' जीवन दर्शन पर व्यापक चर्चा की जाती है। उनके समाधि स्थल 'अभय घाट' (अहमदाबाद) पर हज़ारों की संख्या में लोग एकत्रित होकर उस निर्भीक नेता को श्रद्धा सुमन अर्पित करते हैं। उनके द्वारा छोड़ी गई लोकतांत्रिक विरासत को संजोने के लिए विभिन्न अभिलेखागारों और संग्रहालयों द्वारा प्रदर्शनी आयोजित की जाती है, जहाँ उनके द्वारा उपयोग की गई वस्तुओं और उनके ऐतिहासिक भाषणों के माध्यम से नई पीढ़ी को उनके योगदान से परिचित कराया जाता है। उन्हें एक ऐसे निस्वार्थ राष्ट्रभक्त के रूप में याद किया जाता है, जिन्होंने पद और प्रतिष्ठा से ऊपर उठकर सदैव राष्ट्रहित को सर्वोपरि माना।
