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खूंटी नगर पंचायत चुनाव : 27 फरवरी को खुलेगा 80 प्रत्याशियों के भाग्य का पिटारा

Date : 24-Feb-2026

 
खूंटी, 24 फ़रवरी । खूंटी नगर पंचायत चुनाव में अध्यक्ष पद के लिए किस्मत आजमा रहीं तीन प्रत्याशियों समेत वार्ड पार्षद पद के 77 उम्मीदवारों के भाग्य का फैसला 27 फरवरी को होगा। हालांकि मतगणना अभी शेष है, लेकिन शहरी क्षेत्र में चुनाव परिणाम को लेकर अटकलों का बाजार गर्म है। प्रत्याशी ही नहीं, उनके समर्थक भी अपने-अपने समीकरण के आधार पर जीत-हार के दावे कर रहे हैं।

नगर पंचायत का यह चुनाव भले ही गैर-दलीय आधार पर संपन्न हुआ हो, लेकिन स्थानीय स्तर पर प्रमुख राजनीतिक दलों ने खुलकर अपने-अपने समर्थित उम्मीदवारों के पक्ष में माहौल बनाया। अध्यक्ष पद के लिए भारतीय जनता पार्टी ने रानी टूटी को समर्थन दिया है, जबकि झारखंड मुक्ति मोर्चा ने सोनम बागे के पक्ष में ताकत झोंकी है। वहीं कांग्रेस ने मनोनीत बोदरा को अपना समर्थन दिया है।

इंडी गठबंधन में दिखी दरार

इस चुनाव की सबसे बड़ी राजनीतिक विशेषता यह रही कि लोकसभा और विधानसभा चुनाव साथ लड़ने वाले इंडी गठबंधन के दो प्रमुख दल—झामुमो और कांग्रेस—ने यहां अलग-अलग प्रत्याशियों को समर्थन दिया। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि इससे गठबंधन की जमीनी एकजुटता पर सवाल खड़े हुए हैं। शहरी मतदाताओं के बीच यह चर्चा का विषय बना हुआ है कि क्या इस विभाजन का असर सीधे चुनाव परिणाम पर पड़ेगा।

भाजपा को मिल सकता है फायदा?

स्थानीय राजनीति पर पैनी नजर रखने वाले विश्लेषकों का कहना है कि कांग्रेस और झामुमो के अलग-अलग चुनावी रणनीति अपनाने से वोटों का बिखराव संभव है। खासकर आदिवासी और ईसाई मतदाताओं के बीच यदि समर्थन बंटता है तो इसका सीधा लाभ भाजपा समर्थित प्रत्याशी को मिल सकता है।

हालांकि दूसरी ओर कुछ जानकार यह भी मानते हैं कि नगर निकाय चुनाव में स्थानीय मुद्दे, व्यक्तिगत छवि और जनसंपर्क अधिक प्रभावी भूमिका निभाते हैं। ऐसे में अंतिम परिणाम पूरी तरह से जमीनी समीकरण और मतदाताओं की प्राथमिकताओं पर निर्भर करेगा।

शहरी राजनीतिक पकड़ की होगी परीक्षा

राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, यह चुनाव परिणाम स्पष्ट करेगा कि खूंटी शहरी क्षेत्र में किस दल की वास्तविक पकड़ मजबूत है। अध्यक्ष पद के साथ-साथ वार्ड पार्षदों के परिणाम भी भविष्य की राजनीतिक दिशा तय करने में अहम संकेत देंगे।

अब सबकी निगाहें 27 फरवरी की मतगणना पर टिकी हैं, जब यह साफ हो जाएगा कि शहरी मतदाताओं ने किसे अपना भरोसा सौंपा है और किसके समीकरण सही साबित हुए हैं।


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