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रूपनारायण में ड्रेजिंग से बालू मजदूरों पर संकट

Date : 25-Feb-2026

 मेदिनीपुर, 25 फ़रवरी। राज्य सरकार द्वारा रूपनारायण नदी में ड्रेजिंग कार्य आरंभ किए जाने के बाद कोलाघाट क्षेत्र के लगभग दो से ढाई सौ बालू मजदूरों के सामने आजीविका का गंभीर संकट उत्पन्न हो गया है। पीढ़ियों से नदी से बालू निकालकर जीवनयापन करने वाले इन परिवारों का काम नई व्यवस्था के कारण ठप हो गया है।

राज्य के सिंचाई विभाग की पहल पर एक बहुराष्ट्रीय कंपनी को ड्रेजिंग का दायित्व सौंपा गया है। प्रशासन ने स्पष्ट निर्देश दिया है कि अधिकृत एजेंसी के अतिरिक्त कोई भी व्यक्ति नदी से बालू नहीं निकाल सकेगा। नियमों का उल्लंघन करने के आरोप में हाल ही में एक मजदूर को गिरफ्तार किया गया तथा बालू निकालने में प्रयुक्त तीन नावों को जब्त कर लिया गया।

मारबेड़िया, नगुरिया, शालुका, पाइकरपाड़ी, छातिंदा और बेलकोठा सहित अनेक गांवों के लोग लंबे समय से नदी तटों से बालू निकालकर उसे बेचते रहे हैं। वर्षा ऋतु में मजदूर पानी में खड़े होकर बाल्टी से बालू निकालते हैं, जबकि शुष्क मौसम में फावड़े व अन्य औजारों की सहायता से बालू काटकर नावों में भरी जाती है। एक नाव बालू बेचने पर मजदूरों को औसतन तीन सौ से चार सौ रुपये की आय होती है।

सूत्रों के अनुसार घाटाल मास्टर प्लान के कार्य प्रारंभ होने के बाद “नो कॉस्ट” पद्धति से मशीनों द्वारा नदी में ड्रेजिंग की जा रही है। प्रारंभ में मजदूरों ने प्रशासन की चेतावनी को गंभीरता से नहीं लिया, किंतु गिरफ्तारी और नाव जब्ती की घटनाओं के बाद पिछले लगभग एक महीने से बड़ी संख्या में मजदूर बेरोजगार हो गए हैं।

आजीविका की रक्षा हेतु मजदूरों ने राज्य सचिवालय नवान्न को पत्र भेजकर नदी से बालू निकालने का पारंपरिक अधिकार लौटाने की मांग की है। उन्होंने पूर्व मेदिनीपुर जिला प्रशासन के विभिन्न विभागों के साथ-साथ विपक्ष के नेता शुभेंदु अधिकारी को भी ज्ञापन सौंपा है। मंगलवार शाम कोलाघाट के बीडीओ अमिय कुमार चांद ने बताया कि मजदूरों का आवेदन प्राप्त हुआ है और विषय भूमि विभाग को अग्रेषित कर दिया गया है, जिस पर अंतिम निर्णय एडीएम (एलआर) स्तर पर लिया जाएगा।

स्थानीय मजदूरों का कहना है कि उनके पूर्वजों के समय से यही आजीविका रही है और अचानक प्रतिबंध लगने से परिवार का पालन-पोषण कठिन हो गया है। बुधवार सुबह मजदूरों ने स्पष्ट किया कि ड्रेजिंग कार्य से उन्हें आपत्ति नहीं है, किंतु उनकी पारंपरिक आजीविका समाप्त न की जाए। आवश्यकता पड़ने पर वे बालू निकासी के लिए सरकार को राजस्व देने के लिए भी तैयार हैं।


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