फलता चुनाव परिणाम से मिले नए राजनीति समीकरण के संकेत, निष्प्रभावी हुआ डायमंड हार्बर मॉडल | The Voice TV

Quote :

“स्वयं जैसे हो वैसे ही रहो; बाकी सब तो पहले से ही कोई और बन चुके हैं।” ― ऑस्कर वाइल्ड

National

फलता चुनाव परिणाम से मिले नए राजनीति समीकरण के संकेत, निष्प्रभावी हुआ डायमंड हार्बर मॉडल

Date : 25-May-2026

 कोलकाता, 25 मई। पश्चिम बंगाल के फलता विधानसभा क्षेत्र में हुए पुनर्मतदान के नतीजों ने राज्य की राजनीति में नए समीकरणों की चर्चा तेज कर दी है। इस नतीजे से स्पष्ट हो गया कि तृणमूल कांग्रेस का मजबूत पक्ष माना जाने वाला अल्पसंख्यक वोट आधार अब विभिन्न दलों में बंटता दिखाई दे रहा है। इन दलों में माकपा, कांग्रेस, इंडियन सेक्युलर फ्रंट और हुमायूं कबीर की आमजनता उन्नयन पार्टी जैसे छोटे दल भी शामिल हैं।

माकपा नेता सुजन चक्रवर्ती ने दावा किया कि अल्पसंख्यक समुदाय अब नया राजनीतिक सहारा तलाश रहा है, क्योंकि उसे भाजपा के खिलाफ तृणमूल की लड़ाई पर भरोसा कम होता दिख रहा है। उन्होंने कहा कि जब बंगाल में भाजपा एक मजबूत वास्तविकता बन चुकी है और लोग तृणमूल को प्रभावी विपक्षी शक्ति के रूप में नहीं देख रहे, तब स्वाभाविक रूप से वे दूसरे विकल्पों की ओर जा रहे हैं।

वहीं तृणमूल कांग्रेस नेता कुणाल घोष ने इन दावों को खारिज करते हुए कहा कि केवल एक चुनाव के आधार पर व्यापक राजनीतिक बदलाव का निष्कर्ष निकालना उचित नहीं है। उन्होंने दावा किया कि भाजपा के खिलाफ तृणमूल ही सबसे बड़ी और प्रभावी राजनीतिक ताकत बनी हुई है।

फलता के नतीजों के बाद भाजपा ने भी तृणमूल के तथाकथित “डायमंड हार्बर मॉडल” पर हमला तेज कर दिया है। भाजपा नेताओं का कहना है कि इस परिणाम ने अभिषेक बनर्जी के राजनीतिक प्रभाव वाले इलाके में संगठनात्मक अजेयता के दावों को कमजोर कर दिया है।

भाजपा नेता अमित मालवीय ने फलता के नतीजों को “डायमंड हार्बर मॉडल का पतन” बताया। उन्होंने आरोप लगाया कि यह परिणाम वर्षों से जारी भय, हिंसा और राजनीतिक दबाव की राजनीति के खिलाफ जनता का जवाब है। मालवीय ने कहा कि अब अभिषेक बनर्जी के पास डायमंड हार्बर का प्रतिनिधित्व करने का नैतिक अधिकार नहीं बचा है।

उधर अभिषेक बनर्जी, जिन्होंने चुनाव प्रचार से दूरी बनाए रखी थी, ने मतगणना प्रक्रिया पर सवाल उठाते हुए निर्वाचन प्रक्रिया की विश्वसनीयता पर संदेह जताया। उन्होंने आरोप लगाया कि मतगणना में अनियमितताएं हुईं और चुनाव आयोग ने डराने-धमकाने तथा कथित चुनावी गड़बड़ियों की शिकायतों पर पर्याप्त कार्रवाई नहीं की।

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि अब बड़ा सवाल यह नहीं रह गया है कि फलता का परिणाम अपवाद था या नहीं, बल्कि यह है कि क्या यह केवल तृणमूल की स्थानीय कमजोरी का मामला है या फिर बंगाल की राजनीति में बड़े पुनर्संरचना की शुरुआती झलक।

विश्लेषकों के अनुसार भाजपा की बंगाल रणनीति लंबे समय से दो आधारों पर टिकी रही है, हिंदू मतों का ध्रुवीकरण और तृणमूल के सामाजिक गठजोड़ में सेंध। फलता के परिणामों ने संकेत दिया है कि पहला लक्ष्य काफी हद तक हासिल हो चुका है, जबकि दूसरा भी अब तेजी से आगे बढ़ता दिखाई दे रहा है। उल्लेखनीय है कि रविवार को हुई मतगणना में भाजपा उम्मीदवार देवांशु पांडा ने एक लाख आठ हजार मतों के भारी अंतर से जीत दर्ज की है।


RELATED POST

Leave a reply
Click to reload image
Click on the image to reload
Advertisement









Advertisement