मुख्यमंत्री श्री विष्णु देव साय की सरकार ने छत्तीसगढ़ राज्य में किसानों की सुख-शांति और समृद्धि को ध्यान में रखते हुए कई पहलें की हैं। इन पहलों में से एक प्रमुख पहल है धान उपार्जन के लिए समर्थन मूल्य पर चाक-चौबन्ध व्यवस्था, जिसने किसानों के लिए न केवल धान बेचना सरल बना दिया है, बल्कि उन्हें धान बेचने के बाद अपनी कमाई को सुरक्षित और आसानी से निकालने की सुविधा भी प्रदान की है। यह कदम न केवल किसानों के आर्थिक स्थिति को सुधारने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है, बल्कि यह राज्य के ग्रामीण इलाकों में आर्थिक गतिविधियों को भी बढ़ावा दे रहा है। छत्तीसगढ़ सरकार की किसान हितैषी नीतियों के कारण, राज्य के किसानों को देशभर में सबसे अधिक प्रति क्विंटल धान का मूल्य प्राप्त हो रहा है, जिससे उनके जीवन स्तर में सुधार आया है और कृषि क्षेत्र में नए उत्साह का संचार हुआ है।
छत्तीसगढ़ देश का ऐसा एकमात्र राज्य है जहां किसानों को प्रति क्विंटल धान के लिए 3100 रूपए तक का समर्थन मूल्य दिया जा रहा है। यह न केवल किसानों के लिए एक आश्वासन है, बल्कि उनकी मेहनत को भी उचित मूल्य मिलता है, जिससे उनके आत्मविश्वास में भी वृद्धि हो रही है। समर्थन मूल्य पर धान की खरीदी के दौरान किसानों को उनके उत्पाद का सही मूल्य मिलता है, जो उन्हें आर्थिक रूप से सशक्त बनाता है। इसके साथ ही, धान बेचने के बाद किसानों को तुरंत पैसे निकालने की सुविधा दी गई है, जिससे उनकी समस्याओं का समाधान हुआ है। पहले किसानों को अपनी कमाई को प्राप्त करने के लिए बैंक या अन्य वित्तीय संस्थानों का चक्कर लगाना पड़ता था, लेकिन अब वे सीधे खरीदी केन्द्रों से ही अपने पैसे प्राप्त कर सकते हैं, जिससे उनके समय और मेहनत दोनों की बचत होती है।

मुख्यमंत्री श्री विष्णु देव साय की सरकार ने इस सुविधा को लागू करने में एक और महत्वपूर्ण कदम उठाया है, जिससे किसानों के जीवन में बदलाव आया है। यह सुविधा है माइक्रो एटीएम की, जो धान खरीदी केन्द्रों में उपलब्ध करवाई गई है। इस पहल के जरिए किसानों को न केवल अपनी बिक्री का पैसा निकालने की सुविधा मिली है, बल्कि यह सुविधा उन्हें पूरी तरह से नकद राशि निकालने में सक्षम बनाती है। अब किसानों को एटीएम या बैंक की कतारों में खड़े होने की कोई आवश्यकता नहीं है, क्योंकि वे सीधे खरीदी केन्द्र पर मौजूद माइक्रो एटीएम से 10 हजार तक की राशि निकाल सकते हैं। इससे उनके दैनिक कार्यों में गति आई है, क्योंकि उन्हें अपनी परिवहन लागत और श्रमिकों की मजदूरी तत्काल रूप से चुकाने में कोई परेशानी नहीं हो रही है।

माइक्रो एटीएम की सुविधा किसानों के लिए अत्यंत लाभकारी साबित हुई है। पहले जहां किसानों को अपनी मेहनत की कमाई को निकालने के लिए घंटों बैंकों की लाइनों में खड़ा होना पड़ता था, अब वे खरीदी केन्द्रों पर ही अपनी आवश्यकता के अनुसार राशि निकाल सकते हैं। इस प्रणाली ने किसानों को वित्तीय स्वतंत्रता दी है और उन्हें तत्काल अपने कामों को पूरा करने में मदद की है। जैसे ही किसान अपनी उपज को बेचते हैं, वे तुरंत माइक्रो एटीएम के माध्यम से अपनी कमाई को निकाल सकते हैं और विभिन्न खर्चों को आसानी से पूरा कर सकते हैं। इससे उन्हें उधारी लेने या बैंकों का चक्कर लगाने की आवश्यकता नहीं पड़ती, जो पहले एक बड़ी समस्या थी।
उदाहरण के लिए, श्री राकेश कुर्रे, जो चिल्हाटी के निवासी हैं, ने मोपका धान खरीदी केन्द्र में 62.80 क्विंटल धान बेचा और वहीं माइक्रो एटीएम के जरिए 1000 रुपये की नगद राशि निकाली। उन्होंने बताया कि यह सुविधा उनके लिए बहुत ही उपयोगी साबित हुई है। पहले उन्हें अपने धान के परिवहन के लिए मेटाडोर, ट्रेक्टर या छोटे हाथियों का किराया चुकाना पड़ता था और श्रमिकों की मजदूरी भी देनी होती थी। लेकिन अब वे बिना किसी परेशानी के, खरीदी केन्द्र से ही राशि निकालकर तुरंत इन खर्चों को पूरा कर सकते हैं। इससे उनका समय और ऊर्जा दोनों बचते हैं और उन्हें किसी से उधार भी नहीं लेना पड़ता। श्री कुर्रे का कहना है कि माइक्रो एटीएम का उपयोग बहुत ही सरल है। आधार नंबर और फिंगरप्रिंट के माध्यम से, किसान आसानी से अपनी राशि निकाल सकते हैं। यह प्रक्रिया बहुत ही त्वरित और पारदर्शी है, जो किसानों को वित्तीय तनाव से मुक्त करती है।

इस सुविधा के लाभों को देखते हुए, छत्तीसगढ़ राज्य के अन्य किसानों ने भी इस व्यवस्था की सराहना की है और इसे अपनी दिनचर्या का हिस्सा बना लिया है। वे अब किसी भी प्रकार की कठिनाई के बिना अपनी कमाई को प्राप्त कर सकते हैं और खेती-बाड़ी के अन्य खर्चों को तत्काल निपटा सकते हैं। यह पहल विशेष रूप से उन किसानों के लिए फायदेमंद है जो अपने कृषि उत्पाद को बेचने के बाद तुरंत अपनी दैनिक आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए नकद राशि की आवश्यकता महसूस करते हैं।
सरकार की इस पहल ने न केवल किसानों के आर्थिक जीवन को सरल और पारदर्शी बनाया है, बल्कि इसके माध्यम से उन्हें एक नई दिशा भी दी है। अब छत्तीसगढ़ के किसान न केवल अपनी उपज का सही मूल्य प्राप्त कर रहे हैं, बल्कि उनकी वित्तीय जरूरतों को भी तत्काल पूरा किया जा रहा है। यह पहल किसानों की वित्तीय स्वतंत्रता को बढ़ावा देती है और राज्य में कृषि क्षेत्र को और अधिक सशक्त बनाती है। इस तरह की सुविधाएं राज्य के कृषि क्षेत्र में वृद्धि और समृद्धि का मार्ग प्रशस्त करती हैं, जिससे छत्तीसगढ़ राज्य का किसान न केवल अपने काम में आत्मनिर्भर होता है, बल्कि उसे राज्य सरकार के प्रति आभार भी होता है।
कुल मिलाकर, मुख्यमंत्री श्री विष्णु देव साय की सरकार द्वारा प्रदान की गई माइक्रो एटीएम सुविधा ने किसानों के जीवन में एक बड़ा बदलाव लाया है। इस सुविधा से किसानों को उनके पैसे निकालने में आसानी हो रही है और वे बिना किसी परेशानी के अपने कार्यों को गति दे पा रहे हैं। इस पहल से न केवल छत्तीसगढ़ राज्य के किसानों की आर्थिक स्थिति मजबूत हो रही है, बल्कि यह देशभर में एक आदर्श मॉडल के रूप में स्थापित हो रहा है, जिसे अन्य राज्यों में भी लागू किया जा सकता है।
गौतम बुद्ध एक बार अव्वाली ग्राम गये | वहाँ उनका उपदेश सुनने के लिए सहस्त्र ग्रामीण उपस्थित हुए | ग्राम का एक दरिद्र किंतु कर्मठ कृषक भी उनके पास आया |उसने उन्हें प्रणाम किया बुद्धदेव का उपदेशामृत पान करने की उसकी बड़ी इच्छा थी, किंतु दुर्भाग्यवश उसका एक बैल खो गया था | वह उसी चिंता में था | वह धर्मसंकट में पड़ गया कि वह बुद्धदेव उपदेश सुने या बैल को ढूंढे | अन्तत: उसने सर्वप्रथम बैल ढूंढने का निश्चय किया और वह वहां से चला गया |
संध्या समय बैल मिल जाने पर थका और भूखा-प्यासा वह कृषक उसी स्थान से निकला | उसने पुन: बुद्धदेव के चरण छुए | इस बार उसने उनका उपदेश सुनने का ही निश्चय किया | बुद्धदेव ने कुछ क्षण उसके थके-मांदे चेहरे को निहारा, फिर भिक्षुओं से बोले,”सर्वप्रथम इसे भोजन कराओ |”
उसकी उदर-ज्वाला शांत होने पर बुद्धदेव ने उपस्थित जन-समुदाय को संबोधित किया | कृषक ने एकाग्र मन से उपदेश सुना और वह अपने घर चला गया | उसके चले जाने पर बुद्धदेव ने अपने शिष्यों में इस आशय की कानाफूसी देखी कि उस कृषक के लिए बुद्धदेव ने विलम्ब कराया | बुद्धदेव तब शांत स्वर में बोले, “भिक्षुकगण, उस कृषक को मेरा उपदेश सुनने की तीव्र इच्छा थी, किन्तु इससे उसके कार्यों में बाधा आ पड़ती, अत: वह सुबह मजबूर होकर यहां से लौट गया था | वह अपने लोक-कर्म के पालन हेतु सारे दिन भटका और क्षुधित होते हुए भी मेरा उपदेश सुनने चला आया | यदि मैं उस भूखे को उपदेश करने लगता, तो वह उसे गहन न कर पाता याद रखो, क्षुधा के समान कोई भी सांसारिक व्याधि नहीं | अन्य रोग तो एक बार चिकित्सा करने से शांत हो जाते हैं, किंतु क्षुधा-रोग तो ऐसा है कि उसकी चिकित्सा मनुष्य को प्रतिदिन करनी पड़ती है |”
वैसे तो साय सरकार छत्तीसगढ़ को ऊँचाइयों में ले जाने के लिए अनेकों प्रयास कर रहे हैं | उन्हीं प्रयासों में से एक, बिलासपुर केरिवर व्यू पर श्री रामसेतु मार्ग का उद्घाटन मुख्यमंत्री श्री विष्णुदेव साय ने किया। श्री रामसेतु मार्ग के उद्घाटन को लेजर शो और आतिशबाजी के माध्यम से मनाया गया, जो बिलासपुर विकास दीप महोत्सव भी था। 10 हजार दीपक इस अवसर पर अरपा नदी में छोड़े गए। इस मौके पर, शहर के दोनों छोरों को जोड़ने वाले अरपा के दोनों पुलों को आकर्षक रोशनी से सजाया गया था।
अरपा नदी के समागम निर्धारण के पूर्व मान्यताओं के अनुसार पुराणों में वर्णित कृपा नदी को अरपा नाम से पहचानी गई है। पुराणों में कृपा नदी का उद्गम शुक्तिमत पर्वत (मेकल श्रेणी) में उल्लेखित किया गया है जो इस नदी के मुख या समागम स्थल से सबसे दूर का स्थान है। अरपा नदी का उद्गम पेण्ड्रा पठार की पहाड़ी से हुआ है। यह महानदी की सहायक नदी है। यह बिलासपुर जिला में प्रवाहित होती है और बरतोरी के निकट ठाकुर देवा नामक स्थान पर शिवनाथ नदी में मिल जाती है।
अरपा की लंबाई लगभग 147 किमी है और औसत जल प्रवाह 400 मीटर है। अरपा नदी का जलग्रहण क्षेत्र 2022 वर्ग किमी है। नदी अपने किनारे के कई नदी समुदायों को आजीविका प्रदान करती है, और इसका पानी पीने, सिंचाई, मत्स्य पालन और औद्योगिक उपयोग के लिए व्यापक रूप से उपयोग किया जाता है।
देवी, देवताओं की तरह नदियों की अपनी खासियत होती है। प्रकृति की अनुपम कृति, वरदान मानी जाती हैं नदियां। पेड़, पौधों से लेकर जीव, जंतुओं और मानव जीवन के लिए यह संजीवनी है। बगैर पानी के कुछ नहीं हो सकता। भगीरथ ने धरती पर लोगों के कल्याण के लिए गंगा को लाया। अमरकंटक की नर्मदा भगवान शिव के स्वेद से उत्पन्न हुई और हमारी अरपा अन्न उपजाने वाले खेत से निकली। आप समझ सकते हैं कि अरपा जिले भर के लिए साक्षात अन्नपूर्णा से कम नहीं है। अरपा की कहानी दुखांत मोड़ पर पहुंच गई है। उसकी यह दशा उस पर आश्रित आबादी ने की है। बेटा जब अपनी मां की भावनाओं का निरादर करता है, तो वह उसकी वृष्टि छाया से वंचित हो जाता है। यही हालत पेंड्रा से बिलासपुर तथा संगम मंगला पासीद तक आने वाले शहर, गांवों में निवास करने वाले लाखों लोगों की है। यही हालत पेंड्रा से बिलासपुर तथा संगम मंगला पासीद तक आने वाले शहर, गांवों में निवास करने वाले लाखों लोगों की है।
अरपा में घाट की संस्कृति आबादी, बसाहट की तरह पुरानी है। घाट व्यवस्था सामाजिक तौर पर की जाती थी। पचरीघाट के पास जनकबाई घाट अपनी पुरातन संस्कृति की याद दिलाती है। हालांकि इसके लोकार्पण का पत्थर गायब हो चुका है। वक्त के निर्मम थपेड़ों ने घाट को जीर्ण जीर्ण दशा में पहुंचा दिया है। ब्रितानीराज में इसकी स्थापना शंकर राव बापते, गोविंद राव बापते(अब स्वर्गीय) के परिवार ने की। इसके लोकार्पण पर अरपा तट की साज सज्जा की तस्वीर बापते परिवार के पास वर्षों तक रही। दिनचर्या से लेकर समस्त संस्कारों के दौरान जमाने से यह घाट एक समाज के मिलन स्थल बने रहे। पचरीघाट जूना बिलासपुर की स्थाई पहचान बन चुका है। जिस नदी के घाट लोगों को मिलाने का काम करते रहे हों, उसकी सुरक्षा तो लोग ही करेंगे।
डा. पालेश्वर शर्मा अपने जीवनकाल में अरपा की कहानी लिखते वह इसकी चिंता कर गए कि जीवनदायिनी अरपा मैंया कहीं कहानियों में न रह जाए। 2001 में डा.सोमनाथ यादव द्वारा प्रकाशित पुस्तिका” बिलासा और बिलासपुर ’में डा.शर्मा ने अरपा के बारे में छत्तीसगढ़ी लोककथा का जिक्र किया। इसके अनुसार जेठ की तपती दोपहर में एक स्त्री अपने शिशु के साथ भाठा जमीन को पार कर रही थी। भयानक तपन से उसके पांव जल रहे थे। फफोले फूटने पर उसे सहन नहीं हुआ, तो उसने नन्हें शिशु को कंधे से नीचे उतारकर उसे तपती हुई धरती पर रखकर उस पर खड़ी हो गई। उसी समय पार्वती मां ने उस स्त्री को क्रोधवश श्राप दे दिया कि जा आज से तू नदी बन जा, किंतु तू मात्र नाम की नदी रहेगी। डा.शर्मा ने आगे लिखा कि लोककथा कुछ भी हो किंतु यह निर्विवाद सत्य है कि अरपा में हमेशा अपार जलराशि थी। उन्होंने आने वाली पीढ़ी के लिए अरपा को पुर्नजीवित करने का आह्वान किया था।
मुख्यमंत्री श्री विष्णुदेव साय ने बिलासपुर में ’श्री रामसेतु मार्ग’ के लोकार्पण के इस अवसर पर कहा कि बिलासपुर, छत्तीसगढ़ की राजधानी, के विकास के लिए आज का दिन बहुत महत्वपूर्ण है, जहां कई विकास कार्यों की घोषणा की गई है। इन क्रियाओं से बिलासपुर शहर की अधोसंरचना मजबूत होगी। इन सभी प्रयासों से बिलासपुर शहर की अधोसंरचना और नागरिक सुविधाओं को बल मिलेगा।
मुख्यमंत्री ने कहा कि अरपा मइया छत्तीसगढ़ की संस्कृति की धारा है, न सिर्फ एक नदी। अरपा मइया को बचाने के लिए हम संकल्पित हैं। अरपा उत्थान और तट संवर्धन परियोजना के अंतर्गत आज श्रीराम सेतु मार्ग का उद्घाटन किया गया है। अरपा नदी को सुधारने के लिए और भी काम चल रहे हैं। इंदिरा सेतु से शनिचरी रपटा तक लगभग दो किलोमीटर की फोर लेन की सड़क दोनों किनारों पर बनाई जा रही है। नदी के किनारे एक नाला है, जो शहर के गंदे पानी को सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट तक ले जाता है।
मुख्यमंत्री ने कहा कि छत्तीसगढ़ का दूसरा सबसे बड़ा शहर बिलासपुर है। इस शहर को प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी के दिए लक्ष्य के अनुरूप विकसित भारत-विकसित छत्तीसगढ़ बनाने में महत्वपूर्ण योगदान देना होगा। इस दौरान, मुख्यमंत्री ने एक बड़ी घोषणा की: मल्हार महोत्सव को बिलासपुर में फिर से शुरू करने और 20 लाख रुपये का बजट देने की घोषणा की।
अरपा उत्थान और तट संवर्धन परियोजना के एक भाग के तहत, अरपा नदी के दांयी ओर की सड़क को रामसेतु मार्ग नाम दिया गया है। यह 49 करोड़ 98 लाख रुपये का खर्च करेगा, जिसमें फ़ुटपाथ, डिवाइडर, सड़क प्रकाश, रिटेनिंग वॉल और सौंदर्यीकरण कार्य शामिल हैं। इस सड़क के उद्घाटन से शहर में यातायात सुगम होगा। इससे शहरवासियों को नेहरू चौक से गोल बाजार-सदर बाजार और शनिचरी बाजार की ओर जाने के लिए एक सुविधाजनक विकल्प मिला है।
डा.जे आर सोनी का कहना है कि बिलासपुर को बिलासा केंवटिन ने बसाया, लेकिन शहर बसने से पहले अरपा के तटवर्ती गांवों पर कई डोंगाघाट थे। वस्तुओं का आदान प्रदान इन्हीं के जरिए होता था। किसान अपनी उपज धान, चावल, तिवरा, कोदो, कुटकी, गन्ना, चना, मसूर, धनिया, सब्जियां, घी, दूध, चार, तेंदू, महुआ आदि के बदले जूना बिलासपुर से नमक, तेल, गुड़, कपड़े,सोने, चांदी, लोहे के सामान आदि का क्रय विक्रय करते थे। अरपा के तटवर्ती डोंगाघाट कोनी, चांटीडीह, जूना बिलासपुर, तोरवा दर्रीघाट और लालखदान के घाटों की नीलामी की जाती थी। इससे राजकीय कर प्राप्त होता था। अरपा नदी के डोंगाघाट एक व्यापारिक केंद्र के रूप में विकसित थे। अरपा नदी बिलासपुर से नीचे बहकर शिवनाथ नदी में मिल जाती है। शिवनाथ महानदी में और महानदी पश्चिम बंगाल की खाड़ी(महासागर) में मिलती है। जल मार्ग से बिलासपुर, उड़ीसा, आंध्रप्रदेश, पश्चिम बंगाल से व्यापारिक संबंध थे।
भारत के प्रसिद्ध भौतिकविद् तथा पादपक्रिया वैज्ञानिक जगदीश चंद्र बोस एक भारतीय प्लांट फिजियोलॉजिस्ट और भौतिक विज्ञानी भी थे, जिन्होंने बाहरी उत्तेजनाओं के लिए जीवित जीवों द्वारा सूक्ष्म प्रतिक्रियाओं का पता लगाने के लिए अत्यधिक संवेदनशील उपकरणों का आविष्कार किया था |
इन्होंने क्रेस्कोग्राफ का आविष्कार किया था जो पौधों की वृद्धि को मापने के लिये एक उपकरण है। उन्होंने पहली बार यह प्रदर्शित किया कि पौधों में भावनाएँ होती हैं।
जगदीश चंद्र बोस ने कई महान् ग्रंथ भी लिखे हैं, जिनमें से कुछ निम्नलिखित इन विषयों पर आधारित हैं, जैसे- सजीव तथा निर्जीव की अभिक्रियाएँ (1902), वनस्पतियों की अभिक्रिया (1906), पौधों की प्रेरक यांत्रिकी (1926) इत्यादि।
जन्म-जगदीश चंद्र बोस का जन्म 30 नवम्बर 1858 में ढाका जिले के फरीदपुर के माइमसिंह गांव में हुआ था, जो कि अब बंग्लादेश का हिस्सा है। इनकी माता का नाम बामा सुंदरी बोस और पिता भगवान चंद्र थे।
शिक्षा- ग्यारह वर्ष की आयु तक जगदीश चंद्र बोस जी ने गांव के ही एक विद्यालय में शिक्षा ग्रहण की। उसके बाद कलकत्ता आ गये और सेंट जेवियर स्कूल में प्रवेश लिया। जगदीश चंद्र बोस की जीव विज्ञान में बहुत रुचि थी भौतिकशास्त्र में बी. ए. की डिग्री प्राप्त करने के पश्चात 22 वर्षीय बोस चिकित्सा विज्ञान की पढ़ाई करने के लिए लंदन चले गए। उन्होंने यूनिवर्सिटी कॉलेज लंदन से BSc, जो वर्ष 1883 में लंदन विश्वविद्यालय से संबद्ध था और वर्ष 1884 में कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय से B.A (प्राकृतिक विज्ञान ट्राइपोस) किया था।
कार्य क्षेत्र- कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय से डिग्री प्राप्त करने के बाद वह भौतिक विषय के सहायक प्राध्यापक के रूप में 'प्रेसिडेंसी कॉलेज' में अध्यापन करने लगे। यहाँ प्रोफेसर के रूप में उन्होंने 1885 से 1915 तक कार्य किया | बोस एक अच्छे शीक्षक भी थे, जो कक्षा में पढ़ाने के लिए बड़े पैमाने पर वैज्ञानिक प्रदर्शनों का उपयोग करते थे। बोस के ही कुछ छात्र जैसे सतेन्द्र नाथ बोस आगे चलकर प्रसिद्ध भौतिकशास्त्री बने।
आविष्कार एवं खोज
· क्रेस्कोग्राफ नामक एक उपकरण का आविष्कार किया जो पौधों में बहुत छोटी गति को माप सकता था और इसका उपयोग विभिन्न उत्तेजनाओं के संपर्क में आने से होने वाली पौधों की गति को मापने के लिए किया जाता था।
· जगदीश चंद्र बोस ने सूक्ष्म तरंगों (माइक्रोवेव) के क्षेत्र में वैज्ञानिक कार्य तथा अपवर्तन, विवर्तन एवं ध्रुवीकरण के क्षेत्र में अपने प्रयोग भी प्रारंभ कर दिये थे।
· लघु तरंगदैर्ध्य, रेडियो तरंगों तथा श्वेत एवं पराबैगनी प्रकाश दोनों के रिसीवर में गेलेना क्रिस्टल का प्रयोग जगदीश चंद्र बोस के द्वारा ही विकसित किया गया था।
· 1895 में कलकत्ता में, उन्होंने दुनिया में पहली बार कहीं भी विद्युत चुम्बकीय तरंगों के वायरलेस ट्रांसमिशन का सार्वजनिक रूप से प्रदर्शन किया, तरंगों का उपयोग करके दूर की घंटी बजाई और इस तरह कुछ बारूद को विस्फोटित किया।
· अभी के समय में प्रचलित बहुत सारे माइक्रोवेव उपकरण जैसे वेव गाईड, ध्रुवक, परावैद्युत लैंस, विद्युतचुम्बकीय विकिरण के लिये अर्धचालक संसूचक, इन सभी उपकरणों का उन्नींसवी सदी के अंतिम दशक में जगदीश चंद्र बोस ने अविष्कार किया और उपयोग किया था।
पुस्तकें
· रिस्पॉन्स इन द लिविंग एंड नॉन-लिविंग (1902)
· द नर्वस मैकेनिज्म ऑफ प्लांट्स (1926) शामिल हैं।
पुरस्कार व सम्मान
· वे भारत के पहले वैज्ञानिक थे जिन्होंने एक अमेरिकन पेटेंट प्राप्त किया।
· 1917 में जगदीश चंद्र बोस को "नाइट" (Knight) की उपाधि प्रदान की गई तथा शीघ्र ही भौतिक तथा जीव विज्ञान के लिए रॉयल सोसायटी लंदन के फैलो चुन लिए गए।
· बोस ने वायरलेस संचार की खोज की और उन्हें इंस्टीट्यूट ऑफ इलेक्ट्रिकल एंड इलेक्ट्रॉनिक्स इंजीनियरिंग द्वारा रेडियो साइंस के जनक के रूप में नामित किया गया।
· बोस को बंगाली साइंस फिक्शन का जनक माना जाता है। उनके सम्मान में चंद्रमा पर एक क्रेटर का नाम रखा गया है।
· बोस ने अपना पूरा शोधकार्य किसी अच्छे (महगें) उपकरण और प्रयोगशाला से नहीं किया था, इसलिये जगदीश चंद्र बोस एक अच्छी प्रयोगशाला बनाने की सोच रहे थे।
· 'बोस इंस्टीट्यूट' (बोस विज्ञान मंदिर) इसी विचार से प्रेरित है जो विज्ञान में शोध कार्य के लिए राष्ट्र का एक प्रसिद्ध केन्द्र है।
निधन
जगदीश चंद्र बोस जी का निधन 23 नवंबर 1937 को भारत के गिरिडीह शहर में दिल का दौरा पड़ने से हुई थी। मृत्यु के समय उनकी आयु 88 वर्ष थी।
