महासमुंद, 22 अक्टूबर 2024 | पीएम जन-मन योजना अंतर्गत प्रधानमंत्री आवास योजना लोगों के जीवन में खुशियों की सौगात लेकर आई है। प्रधानमंत्री आवास योजना के माध्यम से समाज के कमजोर वर्गों को आज अपना खुद का मकान मिल रहा है। इसी कड़ी में महासमुंद विकासखंड के ग्राम साल्हेभांठा की निवासी श्रीमती सीमा कमार का परिवार वर्षों से एक पक्के घर का सपना देख रहा था।
श्रीमती सीमा ने बताया कि वे पति श्री रमेश कमार, सास और दो छोटे बच्चों के साथ एक कच्चे मकान में रह रही थीं। इस मकान में हर मौसम की मार ने उनके जीवन को बेहद कठिन बना दिया था। उनके पति मजदूरी करके परिवार का पालन-पोषण कर रहे है, लेकिन आर्थिक तंगी के चलते वे कभी पक्का मकान बनवाने का सपना पूरा नहीं कर सके। सीमा का हमेशा से सपना था कि उनका भी एक पक्का और सुरक्षित घर हो, जहां वह अपने परिवार के साथ सुकून से रह सकें। एक दिन उनके पति को प्रधानमंत्री आवास योजना के बारे में जानकारी मिली, जिसके तहत बेघर और कच्चे मकानों में रहने वालों को पक्के मकान दिए जा रहे थे। उन्होंने तुरंत आवेदन किया। सर्वेक्षण के बाद अधिकारियों ने उनके परिवार को इस योजना के लिए पात्र पाया, और जल्द ही उनके खाते में आवास निर्माण के लिए धनराशि स्थानांतरित कर दी गई। सीमा ने अपने सपने को हकीकत में बदलने के लिए खुद निर्माण कार्य में योगदान दिया और मजदूरी भी की। उन्होंने बताया कि, “पहले तो ये सब मुझे एक सपने जैसा लगता था, लेकिन अब हमारा पूरा परिवार पक्के मकान में सुरक्षित और खुशी से रह रहा है।
प्रधानमंत्री आवास योजना के साथ ही प्रधानमंत्री जनमन योजना के तहत उनके परिवार के सभी सदस्यों के आधार कार्ड, आयुष्मान कार्ड और बैंक खाते भी बनाए गए। बैंक खाता खोलने से परिवार को आर्थिक प्रबंधन में सुविधा मिली, और अब वे छोटी-छोटी बचत कर अपने बच्चों के बेहतर भविष्य के लिए योजनाएं बना रहे हैं। इस योजना ने केवल उन्हें एक घर नहीं दिया, बल्कि आत्मनिर्भरता की दिशा में भी प्रेरित किया है। सीमा कमार ने प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी और प्रदेश के मुख्यमंत्री श्री विष्णु देव साय का आभार व्यक्त करते हुए कहा कि यह योजना उनके परिवार के लिए एक वरदान साबित हुई है।
रायपुर, 22 अक्टूबर 2024 | मोतियाबिंद के ऑपरेशन से दृष्टि वापस पाना वाकई में एक नया जीवन मिलने जैसा है। मोतियाबिंद, जिसे कैटरेक्ट भी कहा जाता है, एक ऐसी स्थिति है जिसमें आंख का प्राकृतिक लेंस धुंधला हो जाता है, जिससे दृष्टि धुंधली हो जाती है। सर्जरी के दौरान, धुंधले लेंस को निकालकर उसकी जगह एक कृत्रिम लेंस लगाया जाता है। यह प्रक्रिया आमतौर पर सुरक्षित और प्रभावी होती है, जिससे मरीज की दृष्टि में काफी सुधार होता है।
मुख्यमंत्री श्री विष्णुदेव साय के पहल पर जशपुर जिले में मोतियाबिंद का सफल ऑपरेशन किया जा रहा है। मुख्यमंत्री ने लोगों के बेहतर स्वास्थ्य सुविधा उपलब्ध कराने के निर्देश दिए हैं। जिसके तहत जशपुर जिला में मोतियाबिंद मुक्त अभियान अंतर्गत स्वास्थ्य विभाग द्वारा मोतियाबिंद के मरीजों के लिए विशेष सुविधा उपलब्ध कराते हुए उनका सफल ऑपरेशन किया जा रहा है।
स्वास्थ्य विभाग के सार्थक पहल पर जिला मुख्यालय के मधुवनटोली में निवासरत् मोतियाबिंद से पीड़ित मरीज रिक्शा चालक ईश्वर राम यादव की आंखों में रोशनी लौटी और उन्हें नया जीवन मिला है। ईश्वर राम यादव ने बताया कि मैं रिक्शा चलाता हूं और एक दिन मुझे थोड़ा धुंधला-धुंधला दिखाई पड़ने लगा, तब मैने मोबाईल मैडिकल यूनिट में जाकर डॉक्टर को दिखाया। डॉक्टर ने जांच करने बाद मोतियाबिंद का ऑपरेशन करने की सलाह दी। उसके बाद मेरे मोतियाबिंद का ऑपरेशन जिला अस्पताल में किया गया। ऑपरेशन के बाद अब सब अच्छे से दिखने लगा है। उन्होंने उन जैसे कई मोतियाबिंद के मरीजों का ईलाज में सहयोग करने के लिए मुख्यमंत्री को धन्यवाद दिया है।
हमारे यहां नियम है कि जब कोई परिचित के यहां कोई बीमार या तकलीफ में हो तो लोग उससे मिलने जरूर जाते हैं और उसका हाल-चाल पूछते हैं उसे कहते हैं कि अगर कोई आवश्यकता हो तो निसंकोच बताना।

जनकल्याण के उद्देश्य को संचालित करते हुए छत्तीसगढ़ सरकार ने राज्य के अंत्योदय परिवारो को उचित स्वास्थ्य सुविधा उपलब्ध कराने तथा दुर्लभ बिमारियो के इलाज मे होने वाले व्यय से बचाने के लिए मुख्यमंत्री विशेष स्वास्थ्य सहायता योजना को शुरू किया गया है। इस योजना के माध्यम से राज्य के अंत्योदय परिवारो को चिन्हित दुर्लभ बिमारियो के इलाज के लिए अधिकतम 25 लाख रूपेय का स्वास्थ्य बीमा प्रदान किया जाएगा। जिसमे राज्य के पात्र परिवारो को जटिल से जटिल बिमारी के इलाज के लिए 25 लाख रूपेय तक के फ्री इलाज की सुवधा प्रदान की गई है। छत्तीसगढ़ पहला ऐसा राज्य है जो इतनी बड़ी राशी अपने राज्य के नागरिको के इलाज के लिए उपलब्ध करा रहा है।
श्री विष्णुदेव साय के मार्दर्शन में राज्य मे स्वास्थ्य सुविधाओं में लगातार हो रहा है इजाफा मुख्यमंत्री श्री विष्णु देव साय राज्य में स्वास्थ्य सुविधाओं की बेहतरी के लिए प्रतिबद्ध हैं। उनके मार्गदर्शन में राज्य की स्वास्थ्य सुविधाओं में लगातार इजाफा किया जा रहा है और मरीजों का विशेष ध्यान रखा जा रहा है। ऐसे मरीज जिन्हें गंभीर बीमारी है और जो इलाज करा पाने में समर्थ नहीं है उनके लिए मुख्यमंत्री विशेष स्वास्थ्य सहायता योजना के अंतर्गत 25 लाख रूपए तक की आर्थिक मदद प्रदान की जा रही है।
इसी योजना के अंतर्गतत 9 माह में 1211 मामलों में मिली सहायता, 43 करोड़ 16 लाख रूपए की आर्थिक सहायता की स्वीकृती की गए है |
श्री विष्णु देव साय राज्य के नागरिकों को बेहतर स्वास्थ्य सुविधा उपलब्ध कराने के उद्देश्य से मुख्यमंत्री विशेष स्वास्थ्य सहायता योजना के अंतर्गत जरूरतमंद लोगों के लिए आर्थिक सहायता की स्वीकृति दे रहे हैं। गंभीर तथा दुर्लभ बीमारियों के इलाज में होने वाले खर्च से बचाने के लिए संजीवनी सहायता कोष का विस्तार करते हुये मुख्यमंत्री विशेष स्वास्थ्य सहायता योजना संचालित की जा रही है । इस योजना से प्रदेश के नागरिक लाभान्वित हो रहे है।

9 माह के भीतर योजना के अंतर्गत 1211 मामलों में जरूरतमंदों को सहायता मिली है और इस दौरान उन्हें 43 करोड़ 16 लाख रूपए की आर्थिक सहायता स्वीकृत की गयी है।
इसी योजना के अंतर्गत सक्ती जिले के मालखरौदा विकासखंड अंतर्गत आने वाले ग्राम परसा निवासी श्रीमती उर्मिला देवी सिदार पति स्व. श्री केदारनाथ सिदार का नि:शुल्क कैंसर का इलाज चल रहा है। श्रीमती उर्मिला ने बताया कि उनके पति के मृत्यु हो जाने के बाद घर की आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं होने के कारण वह अपनी इस गंभीर बीमारी का इलाज नहीं करा पा रही थी। एक तरह से उन्होंने भी जीने की उम्मीद छोड़ दी थी। शुरुआती दौर में उन्होंने आयुष्मान कार्ड योजना से प्राप्त राशि से अपना इलाज कराया। लेकिन उन्हें कैंसर की बीमारी के इलाज के लिए और भी अधिक राशि की आवश्यकता थी। फिर उन्हें मुख्यमंत्री विशेष स्वास्थ्य सहायता योजना की जानकारी मिली। जिस पर उन्होंने मुख्यमंत्री विशेष स्वास्थ्य सहायता योजना का लाभ लेने के लिए आवेदन किया और जुलाई 2024 में सहायता राशि स्वीकृत हुई।

वर्तमान मे योजना के अंतर्गत उनका इलाज मेकाहारा हॉस्पिटल, रायपुर में निःशुल्क किया जा रहा है। श्रीमती उर्मिला देवी सिदार ने बताया कि उनके कैंसर के इलाज के लिए प्रत्येक 21 दिनों में कीमोथेरेपी किया जा रहा है साथ ही अन्य दवाईयां भी दी जा रही है। उन्होंने बताया कि यदि उन्हें मुख्यमंत्री विशेष स्वास्थ्य सहायता योजना का लाभ नहीं मिल पाता तो शायद ही वह अपनी इस गंभीर बीमारी का इलाज करा पाती।
श्रीमती उर्मिला ने उनके जीवन में आए इस कठिन समय में छत्तीसगढ़ शासन द्वारा उन्हें इस योजना के माध्यम से सहयोग प्रदान करने के लिए धन्यवाद दिया है। उन्होंने प्रदेश के मुख्यमंत्री श्री विष्णु देव साय का हृदय से आभार व्यक्त किया है।
उल्लेखनीय है कि मुख्यमंत्री विशेष स्वास्थ्य सहायता योजना के अंतर्गत चिन्हित दुर्लभ बीमारियों के ईलाज के लिए राज्य के पात्र परिवारों को अधिकतम 25 लाख रूपए तक के निःशुल्क इलाज की सुविधा प्रदान की जा रही है। छत्तीसगढ़ ऐसा पहला राज्य है, जो इतनी बड़ी राशि राज्य के नागरिकों के इलाज हेतु प्रदान कर रही है, जिससे नागरिकों को बेहतर स्वास्थ्य सुविधाएं मिल रही हैं तथा स्वस्थ और बेहतर छत्तीसगढ़ का निर्माण किया जा रहा है।
नेशनल एलिजिबिलिटी टेस्ट (यूजीसी नेट या एनटीए-यूजीसी-नेट) कॉलेज और विश्वविद्यालय स्तर के लेक्चररशिप के लिए योग्यता और भारतीय नागरिकों के लिए जूनियर रिसर्च फेलोशिप के पुरस्कार के लिए निर्धारित करने के लिए एक परीक्षा है। इसका उद्देश्य शिक्षण व्यवसायों और अनुसंधान में प्रवेशकों के लिए न्यूनतम मानक सुनिश्चित करना है। विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) की राष्ट्रीय परीक्षण एजेंसी (एनटीए) सहायक प्रोफेसर के लिए पात्रता या केवल जूनियर रिसर्च फेलोशिप और सहायक प्रोफेसर की योग्यता के लिए भारतीय विश्वविद्यालयों और कॉलेजों दोनों में भारतीय नागरिकों की पात्रता निर्धारित करने के लिए परीक्षा आयोजित करती है। पारंपरिक रूप से जूनियर रिसर्च फेलोशिप (जेआरएफ) और सहायक प्रोफेसरशिप पात्रता के लिए उपयोग की जाने वाली राष्ट्रीय पात्रता परीक्षा (एनईटी) अब भारत में पीएचडी प्रवेश के लिए एक प्रमुख मानदंड बन गई है। इस बदलाव ने अकादमिक समुदाय के भीतर इस चिंता के कारण नई बहस छेड़ दी है कि क्या परीक्षण वास्तविक शोध क्षमता की पहचान करने के लिए उपयुक्त है। नेट एक बहुविकल्पीय प्रश्न (एमसीक्यू) आधारित परीक्षा है जो मुख्य रूप से स्मृति और याददाश्त जैसी निचले क्रम की संज्ञानात्मक क्षमताओं का आकलन करती है। ये क्षमताएं कुछ संदर्भों में उपयोगी हैं लेकिन डॉक्टरेट स्तर के अनुसंधान के लिए आवश्यक महत्वपूर्ण सोच, रचनात्मकता और विश्लेषणात्मक कौशल का मूल्यांकन करने में कम पड़ जाती हैं।
पीएचडी अनुसंधान जटिल विचारों, मौजूदा ज्ञान के महत्वपूर्ण विश्लेषण और मूल अंतर्दृष्टि में योगदान करने के लिए रचनात्मकता की मांग करता है, विशेष रूप से साहित्य, सामाजिक विज्ञान और मानविकी जैसे विषयों में तथ्यात्मक स्मरण और तुच्छ प्रश्नों पर नेट का ध्यान उम्मीदवारों की प्रदर्शन करने की क्षमता को कमजोर करता है। सूक्ष्म तर्क विकसित करने और व्यापक सैद्धांतिक अवधारणाओं के साथ जुड़ने की उनकी क्षमता। नेट स्कोर पर निर्भरता से हाशिये पर रहने वाले समुदाय असमान रूप से प्रभावित होते हैं। इन छात्रों को अकसर प्रणालीगत बाधाओं का सामना करना पड़ता है, जैसे संसाधनों तक सीमित पहुंच और उच्च लागत वाली कोचिंग, जो नेट पास करने के लिए तेजी से आवश्यक होती जा रही हैं। परिणामस्वरूप, इन पृष्ठभूमि के प्रतिभाशाली व्यक्तियों को उनकी बौद्धिक क्षमता के बावजूद पीएचडी कार्यक्रमों से बाहर रखा जा सकता है।
नेट के माध्यम से पीएचडी प्रवेश के केंद्रीकरण से उच्च शिक्षण संस्थानों की स्वायत्तता को खतरा है। परंपरागत रूप से, विश्वविद्यालयों को अपने शोध प्रस्तावों, साक्षात्कार और अनुशासन-विशिष्ट परीक्षणों के आधार पर उम्मीदवारों का चयन करने की स्वतंत्रता है। यह स्वायत्तता संस्थानों को उन उम्मीदवारों को भर्ती करने की अनुमति देती है जो उनकी विशिष्ट आवश्यकताओं के अनुरूप होते हैं। एक आकार-सभी के लिए उपयुक्त दृष्टिकोण के माध्यम से प्रवेश को केंद्रीकृत करने से उच्च गुणवत्ता वाले शैक्षणिक अनुसंधान के लिए महत्वपूर्ण विविधता और नवाचार के क्षीण होने का जोखिम होता है, जैसे कि सामान्य विश्वविद्यालय प्रवेश परीक्षा (सीयूईटी) ने पहले ही भारत की उच्च शिक्षा प्रणाली में संस्थागत स्वायत्तता के क्षरण के बारे में चिंता जताई है।
नेट प्रणाली छात्रों को डॉक्टरेट अनुसंधान की कठोरता के लिए तैयार नहीं करती है। पीएचडी उम्मीदवारों से अपेक्षा की जाती है कि वे मूल अंतर्दृष्टि प्रदान करें, सहकर्मी-समीक्षित पत्रिकाओं में प्रकाशित करें और विद्वानों के प्रवचन में संलग्न हों-प्रतिभाषाली छात्रों का विदेश में पलायन पीएचडी कार्यक्रमों के लिए संस्थानों को घरेलू प्रणाली की सीमाओं के लिए जिम्मेदार ठहराया जा सकता है, जहां मानकीकृत परीक्षण पर जोर को रचनात्मकता और आलोचनात्मक सोच को दबाने के रूप में देखा जाता है। नेट पर बढ़ती निर्भरता अनजाने में भारत में शोध के दायरे को सीमित कर सकती है। अनुसंधान विचार, कार्यप्रणाली और परिप्रेक्ष्य की विविधता पर पनपता है। नेट जैसे मानकीकृत परीक्षण, जो आलोचनात्मक सोच पर याद रखने को प्राथमिकता देते हैं, ऐसे विद्वान पैदा कर सकते हैं जो परीक्षा उत्तीर्ण करने में माहिर हैं लेकिन ज्ञान की सीमाओं को आगे बढ़ाने की क्षमता का अभाव है, पूछताछ की यह संकीर्णता नवाचार और मूल विचारों के विकास, दोनों को सीमित कर सकती है शैक्षणिक क्षेत्रों में प्रगति के लिए महत्वपूर्ण हैं।
संयुक्त राज्य अमेरिका और कनाडा के कई शीर्ष विश्वविद्यालय पीएचडी प्रवेश के लिए समग्र दृष्टिकोण का उपयोग करते हैं। इसमें उम्मीदवार के शोध प्रस्ताव, व्यक्तिगत बयान, अनुशंसा पत्र और अकादमिक इतिहास की विस्तृत समीक्षा शामिल है। जर्मनी में छात्र स्नातक अध्ययन से सीधे पीएचडी कार्यक्रमों में प्रवेश कर सकते हैं, बशर्ते वे असाधारण शोध क्षमता और अकादमिक प्रदर्शन प्रदर्शित करें) ) विभिन्न शैक्षणिक पृष्ठभूमि वाले उम्मीदवारों को पीएचडी कार्यक्रमों के लिए आवेदन करने के लिए प्रोत्साहित करना। आवेदकों का मूल्यांकन अनुसंधान में विभिन्न दृष्टिकोण लाने की उनकी क्षमता के आधार पर किया जाता है, जिसे अंतःविषय अध्ययन के लिए मूल्यवान माना जाता है। स्वीडन, फिनलैंड और डेनमार्क जैसे देशों में, विश्वविद्यालय यह सुनिश्चित करने के लिए उद्योग भागीदारों के साथ सहयोग करते हैं कि पीएचडी उम्मीदवार वास्तविक दुनिया के साथ अनुसंधान परियोजनाओं पर काम कर रहे हैं। नेशनल यूनिवर्सिटी ऑफ सिंगापुर (एनयूएस) उन छात्रों को प्रदर्शन-आधारित फेलोशिप प्रदान करता है जो अपने अकादमिक रिकॉर्ड, साक्षात्कार और प्रकाशनों के माध्यम से मजबूत शोध का वादा दिखाते हैं।
शिक्षा और अनुसंधान में भारत की वैश्विक आकांक्षाओं के लिए पीएचडी प्रवेश के लिए अधिक समग्र दृष्टिकोण की आवश्यकता है-जो रचनात्मकता, आलोचनात्मक सोच और अकादमिक अनुसंधान में योगदान करने की क्षमता को महत्व देता है। व्यापक प्रवेश प्रक्रिया को अपनाकर, भारत अपने प्रतिभाशाली दिमागों को बरकरार रख सकता है। उच्च शिक्षा तक समावेशी पहुंच सुनिश्चित कर सकता है और अकादमिक अनुसंधान में विश्वस्तर पर प्रतिस्पर्धी बना रह सकता है। वैश्विक मंच पर प्रतिस्पर्धी बने रहने के लिए, भारत को एक समग्र प्रवेश प्रक्रिया अपनानी होगी जो अनुसंधान में नवाचार, रचनात्मकता और विविध दृष्टिकोण को प्रोत्साहित करती है।
लेखिका:- प्रियंका सौरभ
करवा चौथ पर्व का हमारे देश में विशेष महत्व है क्योंकि विवाहित महिलाएं अपने पति की लंबी उम्र के लिए पूरे दिन व्रत रखती हैं और रात को चांद देखकर पति के हाथ से जल पीकर व्रत खोलती हैं। भारतीय समाज में वैसे तो महिलाएं विभिन्न अवसरों पर अनेक व्रत रखती हैं लेकिन पति को परमेश्वर मानने वाली नारी के लिए इन सभी व्रतों में सबसे अहम स्थान रखता है ‘करवा चौथ’ व्रत, जो इस वर्ष 20 अक्तूबर को मनाया जा रहा है। पति की दीर्घायु, स्वास्थ्य, सुख-समृद्धि, ऐश्वर्य तथा सौभाग्य के साथ-साथ जीवन के हर क्षेत्र में उसकी सफलता की कामना से सुहागिन महिलाओं द्वारा कार्तिक कृष्ण पक्ष की चतुर्थी को रखा जाने वाला यह व्रत अन्य सभी व्रतों से कठिन माना जाता है, जो सुहागिनों का सबसे बड़ा व्रत एवं त्यौहार है। महिलाएं अन्न-जल ग्रहण किए बिना अपार श्रद्धा के साथ यह व्रत रखती हैं तथा रात्रि को चन्द्रमा के दर्शन करके अर्ध्य देने के बाद ही व्रत खोलती हैं। यही वजह है कि अखण्ड सुहाग का प्रतीक यह व्रत अन्य सभी व्रतों के मुकाबले काफी कठिन माना जाता है।
कहा जाता है कि इस व्रत के समान सौभाग्यदायक अन्य कोई व्रत नहीं है और सुहागिनें यह व्रत 12-16 वर्ष तक हर साल निरन्तर करती हैं, उसके बाद वे चाहें तो इसका उद्यापन कर सकती हैं अन्यथा आजीवन भी यह व्रत कर सकती हैं। आजकल तो कुछ पुरूष भी पूरे दिन का उपवास रखकर पत्नी के इस कठिन तप में उनके सहभागी बनते हैं। दिनभर उपवास करने के बाद शाम को सुहागिनें करवा की कथा सुनती व कहती हैं तथा चन्द्रोदय के बाद चन्द्रमा को अर्ध्य देकर अपने सुहाग की दीर्घायु की कामना कर प्रण करती हैं कि वे जीवन पर्यन्त अपने पति के प्रति तन, मन, वचन एवं कर्म से समर्पित रहेंगी। पूजा-पाठ के बाद सुहागिनें अपनी सास के चरण स्पर्श कर उनसे सौभाग्यवती होने का आशीर्वाद प्राप्त करती हैं।
करवा चौथ पर्व के संबंध में वैसे तो कई कथाएं प्रचलित हैं लेकिन सभी कथाओं का सार पति की दीर्घायु और सौभाग्यवृद्धि से ही जुड़ा है। विभिन्न पौराणिक कथाओं के अनुसार ‘करवा चौथ’ व्रत का उद्गम उस समय हुआ था, जब देवों व दानवों के बीच भयंकर युद्ध चल रहा था और युद्ध में देवता परास्त होते नजर आ रहे थे। तब देवताओं ने ब्रह्माजी से इसका कोई उपाय करने की प्रार्थना की और ब्रह्मा जी ने उन्हें सलाह दी कि अगर सभी देवों की पत्नियां सच्चे एवं पवित्र हृदय से अपने पति की जीत के लिए प्रार्थना एवं उपवास करें तो देवता दैत्यों को परास्त करने में अवश्य सफल होंगे। ब्रह्मा जी की सलाह पर समस्त देव पत्नियों ने कार्तिक मास की कृष्ण पक्ष की चतुर्थी को यह व्रत किया और रात्रि के समय चन्द्रोदय से पहले ही देवता दैत्यों से युद्ध जीत गए। तब चन्द्रोदय के पश्चात् दिनभर की भूखी-प्यासी देव पत्नियों ने अपना-अपना व्रत खोला। ऐसी मान्यता है कि तभी से इसी दिन करवा चौथ का व्रत किए जाने की परम्परा शुरू हुई।
करवा चौथ के व्रत के संबंध में अनेक प्रचलित कथाओं में से एक महाभारत काल से जुड़ी है। कहा जाता है कि एक बार धनुर्धारी अर्जुन तप करने के उद्देश्य से नीलगिरी पर्वत पर गए तो द्रोपदी बहुत चिंतित हुई। उसने विचार किया कि यहां हर समय कोई न कोई संकट आता ही रहता है, इसलिए अर्जुन की अनुपस्थिति में इन संकटों से बचने के लिए क्या उपाय किया जाए? तब द्रोपदी ने भगवान श्रीकृष्ण का स्मरण किया और श्रीकृष्ण को अपने मन की व्यथा बताई। द्रोपदी की बात सुनकर भगवान श्रीकृष्ण ने कहा कि पार्वती देवी ने भी एक बार भगवान शिव से बिल्कुल यही प्रश्न किया था और तब भगवान शिव ने उन्हें कहा था कि करवा चौथ का व्रत गृहस्थी में आने वाली तमाम छोटी-बड़ी बाधाओं को दूर करता है। द्रोपदी ने श्रीकृष्ण से करवा चौथ के व्रत के संबंध में विस्तार से बताने का आग्रह किया तो श्रीकृष्ण ने द्रोपदी को इस व्रत के महत्व को दर्शाती कथा सुनानी आरंभ की।
भगवान श्रीकृष्ण ने बताया कि इन्द्रप्रस्थ नगरी में वेद नामक एक धर्मपरायण ब्राह्मण के सात पुत्र व एक पुत्री थी। विवाह के बाद जब पुत्री पहली करवा चौथ पर मायके आई तो उसने मायके में ही करवा चौथ का व्रत रखा लेकिन चन्द्रोदय से पूर्व ही उसे भूख सताने लगी तो अपनी लाड़ली बहन की यह वेदना भाईयों से देखी न गई। उन्होंने बहन से व्रत खोलने का आग्रह किया पर वह इसके लिए तैयार न हुई। तब भाईयों ने मिलकर एक योजना बनाई। उन्होंने एक पीपल के वृक्ष की ओट में प्रकाश करके बहन को कहा कि देखो चन्द्रमा निकल आया है। बहन भोली थी, इसलिए भाईयों की बात पर विश्वास करके उसने उस प्रकाश को ही चन्द्रमा मानकर उसे ही अर्ध्य देकर व्रत खोल लिया लेकिन जब अगले दिन वह ससुराल पहुंची तो पति को बहुत बीमार पाया। दिन ब दिन पति की बीमारी बढ़ती गई और सारी जमा पूंजी पति की बीमारी में ही लग गई तो उसने मंदिर में जाकर गणेश जी की स्तुति करनी शुरू की। उसकी प्रार्थना पर प्रसन्न होकर गणेश ने उसके समक्ष प्रकट होकर कहा कि तुमने करवा चौथ का व्रत पूरे विधि विधान से नहीं किया, इसीलिए तुम्हारे पति की यह दशा हुई है। यदि तुम यह व्रत पूरे विधि विधान एवं निष्ठा के साथ करो तो तुम्हारा पति पूरी तरह ठीक हो जाएगा। उसके बाद उसने करवा चौथ का व्रत पूरे विधि विधान के साथ किया और इसके प्रभाव से उसका पति ठीक हो गया।
यह कथा सुनाने के बाद भगवान श्रीकृष्ण ने द्रोपदी से कहा कि यदि तुम भी इसी प्रकार विधिपूर्वक सच्चे मन से करवा चौथ का व्रत करो तो तुम्हारे समस्त संकट अपने आप दूर हो जाएंगे। तब द्रोपदी ने करवा चौथ का व्रत रखा और उसके व्रत के प्रभाव से महाभारत के युद्ध में पांडवों की विजय हुई। अतः करवा चौथ के व्रत के उद्गम को इस प्रसंग से भी जोड़कर देखा जाता है और कहा जाता है कि इसी के बाद सुहागिनें ‘करवा चौथ’ व्रत रखने लगी। इस पर्व से संबंधित और भी कई कथाएं प्रचलित हैं, जिनमें सत्यवान और सावित्री की कहानी तथा करवा नामक एक धोबिन की कहानी भी बहुत प्रसिद्ध हैं।
इस पर्व की शुरूआत एक बहुत अच्छे विचार पर आधारित थी मगर समय के साथ इस पर्व का मूल विचार और परिदृश्य बदल रहा है। पौराणिक कथाओं के अनुसार इस व्रत का फल तभी है, जब यह व्रत करने वाली महिला भूलवश भी झूठ, कपट, निंदा, अभिमान न करे। इस व्रत से जहां पति के प्रति पत्नी की निष्ठा एवं समर्पण भाव परिलक्षित होता है, वहीं यह पर्व दाम्पत्य जीवन में आपसी विश्वास और भरोसे को मजबूत करने तथा संबंधों में मधुरता घोलने का त्यौहार है। सही मायने में करवा चौथ दाम्पत्य जीवन में एक-दूसरे के प्रति समर्पण का अनूठा पर्व है।
लेखक:- योगेश कुमार गोयल
