जयंती विशेष:- अशफ़ाक उल्ला खां क्रांतिकारी कैसे बने ?
Date : 22-Oct-2024
अशफ़ाक़ उल्ला ख़ाँ (22 अक्टूबर 1900 – 19 दिसंबर 1927) बीर शहीदों में से एक बीर नाम है इनकी सहादत हम कभी नही भूल सकते। भारतीय स्वतन्त्रता आन्दोलन के स्वतंत्रता सेनानी थे। देश के लिए शहादत देने वाले अशफाक उल्ला खां हिंदू-मुस्लिम एकता के प्रबल समर्थक थे | ब्रिटिश शासन के खिलाफ भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन में एक स्वतंत्रता सेनानी और हिंदुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन के सह-संस्थापक थे | अशफाक उल्ला खां: वो क्रांतिकारी जिन्होंने अंग्रेजों की नाक के नीचे से लूटा था खजाना, महज 27 साल की उम्र में देश के लिए हंसते हुए सूली पर चढ़ गए |
जन्म
अशफ़ाक उल्ला खां का जन्म 22 अक्टूबर 1900 में उत्तरप्रदेश के शाहजहांपुर स्थित शाहिदगढ़ में हुआ था | उनके पिता का नाम मोहम्मद शरीफ उल्ला खान और उनकी माँ का नाम मजहूरुनिशा बेगम था | उनके परिवार में लगभग सभी सरकारी नौकरी में थे |
शिक्षा
बचपन से ही पढाई में उनका मन नही लगता था | उनकी रूचि निशानेबाजी, घुड़सवारी, तैराकी और उन्हें कविताएँ शायरी लिखने का काफी शौक था, जिसमे वे उपनाम हसरत लिखते थे |
अशफ़ाक उल्ला खां क्रांतिकारी कैसे बने
देश में चल रहे आंदोलनों और क्रांतिकारी घटनाओं को देखते हुए वे प्रभावित हुए और अशफ़ाक उल्ला खां के मन में क्रांतिकारी का भाव जागा उसी समय उनकी मुलाकात मैनपुरी षड्यंत्र के मामले में शामिल रामप्रसाद बिस्मिल से हुई तभी से अशफ़ाक क्रांति की दुनिया में शामिल हुए | 1924 में अशफाकउल्ला खान ने समान विचारधारा वाले स्वतंत्रता सेनानियों के साथ मिलकर एक संगठन बनाया जिसका नाम हिंदुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन रखा गया। इस संगठन का उद्देश्य स्वतंत्र भारत के लिए सशस्त्र क्रांति का आयोजन करना था।
काकोरी कांड
अशफ़ाक उल्ला खां एतिहासिक काकोरी कांड में सहभागी रहे इसमें लगभग 10 लोग शामिल थे जिसमे अशफ़ाक उल्ला खां, रामप्रसाद बिस्मिल, राजेंद्र लाहिड़ी, रोशन सिंह, सचींद्र बख्शी आदि थे | अपने आंदोलन को बढ़ावा देने और अपनी गतिविधियों को अंजाम देने के लिए हथियार और गोला-बारूद खरीदने के लिए, राम प्रसाद बिस्मिल सहित हिंदुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन HSRA के क्रांतिकारियों ने 9 अगस्त, 1925 को लखनऊ के पास काकोरी में ब्रिटिश सरकार के पैसे ले जा रही ट्रेन को लूट लिया। बिस्मिल को पुलिस ने पकड़ लिया और अशफाकउल्ला खान एकमात्र ऐसे व्यक्ति थे, जिनका पुलिस पता नहीं लगा पाई।
इस घटना के बाद अशफ़ाक छिप गए और बिहार से बनारस गये और वहा इंजीनियरिंग कंपनी में काम करना शुरू किया | कमाए गए पैसे से उन्होंने अपने क्रांतिकारी साथियों की मदद भी की | उन्होंने 10 महीने तक इंजीनियरिंग कंपनी में काम किया | अशफ़ाक को काम के संबंध बाहर ( दिल्ली ) जाना था तो उन्होंने अपने पठान मित्र जो की उनके सहपाठी थे उन से मदद ली और उनके मित्र ने उनके साथ छल किया उनके बारे में पुलिस को गुप्त रूप से सूचना दी जिसके बाद उनको पुलिस ने पकड़ लिया | अशफ़ाक़ उल्ला ख़ान को फैज़ाबाद की जिला जेल में रखा गया था | काकोरी डकैती का मुकदमा बिस्मिल, अशफाक उल्ला खान और कुछ अन्य लोगों को मौत की सजा देकर समाप्त किया गया।
मृत्यु
अशफ़ाक़ उल्ला ख़ान, काकोरी ट्रेन डकैती कांड में शामिल थे. इस कांड में शामिल होने के लिए ब्रिटिश सरकार ने उन्हें 19 दिसंबर, 1927 को फैजाबाद जेल में फ़ांसी पर लटका दिया था | मातृभूमि के प्रति अपने प्रेम, अपनी स्पष्ट सोच, अडिग साहस, दृढ़ता और निष्ठा के कारण यह क्रांतिकारी व्यक्ति अपने लोगों के बीच शहीद हो गये |