ब्रिटिश काल के दस्तावेजों में कुछ ऐसी घटनाओं का उल्लेख मिलता है जिनका विवरण इतिहास पुस्तकों में नगण्य। ऐसी ही एक घटना बैतूल जिले की है जब वनवासियों ने वनरक्षण और अपने वनाधिकार के लिये संघर्ष किया । इस संघर्ष में अनेक बलिदान हुये किन्तु ब्रिटिश सरकार के गजेटियर में एक बलिदान का उल्लेख है ।
केन्द्र सरकार के विभिन्न विभागों में अहम पदों को संभालने के लिए संघ लोक सेवा आयोग (यूपीएससी) ने हाल ही में लेटरल एंट्री या कहें कि पार्श्व प्रवेश के माध्यम से योग्य उम्मीदवारों के चयन के लिए एक विज्ञापन अखबारों में निकलवाया था। इसी को लेकर देशभर में गैर-जरूरी हंगामा खड़ा हो गया या निहित स्वार्थ से भरे लोगों द्वारा खड़ा कर दिया गया था। बहरहाल, प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के निर्देश पर केंद्र सरकार में लेटरल एंट्री पर रोक लगा दी गई है। यूपीएससी से कहा गया है कि वो लेटरल एंट्री से नियुक्ति न करे। कार्मिक विभाग के मंत्री जितेंद्र सिंह ने यूपीएससी चेयरमैन प्रीति सूदन को पत्र लिखकर कहा है कि इस नीति को लागू करने में सामाजिक न्याय और आरक्षण का ध्यान रखा जाना चाहिए।
बात बस इतनी सी थी कि संघ लोक सेवा आयोग ने एक विज्ञापन जारी कर कहा था कि केंद्र सरकार के विभिन्न विभागों में वरिष्ठ पदों पर काम करने के लिए "प्रतिभाशाली भारतीय नागरिकों" की तलाश है। इन पदों में 24 मंत्रालयों में संयुक्त सचिव, निदेशक और उप सचिव के शामिल हैं, जिनमें कुल 45 पदों पर भर्ती होनी है। इस विज्ञापन के छपने के बाद कांग्रेस के नेता राहुल गांधी सबसे ज्यादा हंगामा काट रहे थे। कह रहे थे कि केन्द्र सरकार सरकारी विभागों में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) से जुड़े लोगों को भर्ती करना चाहती है। हालांकि हमेशा की तरह राहुल गांधी ने आरोप लगाते हुए किसी तरह के प्रमाण देने की जरूरत तक नहीं महसूस नहीं की। वे वैसे भी राहुल गांधी हवाई बातें-दावे करने में माहिर हैं।
काश, राहुल गांधी को यह पता तो होगा ही कि देश के दस सालों तक प्रधानमंत्री रहे डॉ. मनमोहन सिंह को देश का वित्त सचिव तक लेटरल एंट्री के माध्यम से ही बनाया गया था। वह तो तब तक तो वे दिल्ली विश्वविद्यालय में पढ़ा रहे थे। इसी तरह से मंटेक सिंह आहलूवालिया को भी कांग्रेस सरकार ने ही योजना आयोग का चेयरमेन बना दिया था। उनकी नियुक्ति भी उसी तरह से हुई थी जिस तरह से डॉ. मनमोहन सिंह की खुद की हुई थी। इसलिए यह कहना सरासर गलत है कि मौजूदा सरकार कुछ विभागों के लिए बाहरी अभ्यर्थियों को नौकरी देकर गलत कर रही है।
ना जाने क्यों यूपीएससी के इस कदम ने नौकरशाही में लेटरल एंट्री पर बहस छेड़ दी। राहुल गांधी और कांग्रेस के कुछ नेता कह रहे थे कि यूपीएससी की भर्ती की यह प्रक्रिया "पीछे के दरवाजे से भर्ती" है। इसे अंग्रेजी में बैक एंट्री भी कहा जा रहा है। अब कांग्रेस के नेताओं से यह तो पूछा ही पूछा जाना चाहिए कि सैम पित्रोदा और रघुरामन राजन कौन थे ? उन्हें किस आधार पर सरकार में लेटरल एंट्री के तहत ऊंचे पदों पर नौकरी दी गई थी ?
अब जान लेते हैं कि लेटरल एंट्री होता क्या है? दरअसल नौकरशाही में लेटरल एंट्री का मतलब है कि भारतीय प्रशासनिक सेवा (आईएएस) जैसे पारंपरिक सरकारी सेवा कैडर के बाहर के व्यक्तियों को सरकारी विभागों में मध्यम और वरिष्ठ स्तर के पदों पर उनकी योग्यता और अनुभव के आधार पर भर्ती करना। इससे पहले लेटरल एंट्री के जरिए 2018 में पहली बार रिक्तियों की घोषणा की गई थी। लेटरल एंट्री करने वाले व्यक्तियों को आमतौर पर तीन से पांच साल के अनुबंध पर नियुक्त किया जाता है, जिसमें प्रदर्शन और सरकार की आवश्यकताओं के आधार पर विस्तार की संभावना होती है। इन व्यक्तियों से ऐसी विशेषज्ञता लाने की उम्मीद की जाती है जो शासन और नीति कार्यान्वयन में जटिल चुनौतियों का समाधान करने में मदद कर सके।
यूपीएससी के हालिया विज्ञापन से साफ था कि उसे तीन स्तरों पर योग्य उम्मीदवारों की तलाश थी- संयुक्त सचिव, निदेशक और उप सचिव। इन पदों पर तैनात अफसर अक्सर विभागों के भीतर विशिष्ट विंगों के प्रशासनिक प्रमुख या उनके सहायक के रूप में कार्य करते हैं और प्रमुख निर्णय लेने वाले होते हैं। लेटरल एंट्री के पीछे सरकार का तर्क यह रहा है कि नई प्रतिभा लाना और प्रशासन में कुशल जनशक्ति की उपलब्धता बढ़ाना।
आप गौर करें कि कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे जब बोलते हैं, वे तब सरकार को सदैव कोसते ही रहते हैं। लोकतंत्र में सदा स्वस्थ्य वाद-विवाद और सार्थक संवाद जारी रहना चाहिए। हमेशा ही बेवजह विवाद नहीं खड़े करने चाहिए। खरगे कह रहे हैं कि लेटरल एंट्री से सरकारी नौकरियों में हाशिये पर रहने वाले समुदायों को नुकसान होगा। राष्ट्रीय जनता दल के तेजस्वी यादव और उत्तर प्रदेश की पूर्व मुख्यमंत्री मायावती को भी लेटरल एंट्री पर आपत्ति है। अब इन ज्ञानी नेताओं को कोई बताए कि लेटरल एंट्री का विचार तो सर्वप्रथम कांग्रेस के नेतृत्व वाली संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (यूपीए) सरकार के दौरान ही विकसित किया गया था। लेटरल एंट्री पर महाभारत करने वालों को पता होना चाहिए कि यूपीएससी की भर्ती प्रक्रिया पारदर्शी है। इसलिए इस मसले पर विवाद खड़ा करने का कोई ठोस आधार नहीं है। ऐसा करने वाले संवैधानिक संस्थानों पर आघात कर रहे हैं। दरअसल यह तो कहना पड़ेगा देश में सियासत के संसार का माहौल बहुत विषाक्त हो चुका है। सरकार के हरेक कदम का विपक्ष माखौल उड़ाता रहता है या उसमें कमियां निकालने की कोशिश करता रहता है। अगर यही रणनीति विपक्ष अपनाता रहा तो सरकार अपना कोई काम कर ही नहीं सकेगी। यकीन मानिए कि विपक्ष से यह कोई नहीं कह रहा है कि वह सरकार को उसकी किसी जनविरोधी नीतियों पर न घेरे। अवश्य घेरे और उसकी जितनी चाहे निंदा करे। पर विपक्ष को सरकार के फैसलों की सोच-समझकर ही आलोचना करनी चाहिए। अगर उसने यह न किया तो उसकी जनता के बीच छवि तार-तार हो जाएगी और वह एक जिम्मेदार विपक्ष की भूमिका निभाने से वंचित हो जाएगा।
लेखक:- आर.के. सिन्हा
भारत के पूर्वोत्तर राज्य मणिपुर, पड़ोसी देश म्यांमार और बांग्लादेश की घटनायें एक-दूसरे से संबंधित है। यह सभी घटनायें एक बड़े षड्यंत्र का हिस्सा है। अमेरिकी सरकार ने बांग्लादेश के राजनीतिक मामलों में हस्तक्षेप किया, लोकतंत्र और स्वतंत्र चुनाव को बढ़ावा देने की आड़ में कई सारे प्रतिबंध लगाए। यह कार्रवाई बांग्लादेश में राजनीतिक परिदृश्य को प्रभावित करने का एक रणनीतिक हिस्सा है। बांग्लादेशी अधिकारियों ने दावा किया है कि उनके पास बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (बीएनपी) के कार्यवाहक प्रमुख और खालिदा जिया के बेटे तारिक रहमान और सऊदी अरब में आईएसआई अधिकारियों के बीच बैठकों के सबूत हैं।
बांग्लादेश की पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना ने भी दावा किया था कि बांग्लादेश और म्यांमार के कुछ हिस्सों को काटकर एक नया ईसाई देश बनाने की साजिश रची जा रही है। अमेरिका उनसे एक हवाई पट्टी बनाने की मांग भी कर रहा था। अमेरिका ने बांग्लादेश नेशनल पार्टी और उसके सहयोगी जमात-ए-इस्लामी को भी समर्थन दिया था। जमात-ए-इस्लामी, बांग्लादेश बनने के बाद से ही कई तरह की अस्थिर गतिविधियों में शामिल रहा है और कहीं ना कहीं पाकिस्तान का समर्थक भी है।
बांग्लादेश की सबसे बड़ी समस्या अस्थिरता और अराजकता रही है। बांग्लादेश बनने के बाद से कभी भी सरकार पूर्ण मजबूती के साथ स्थिरता से नहीं चल पाई। मुजीबुर रहमान ने भारत के सहयोग से मुक्ति वाहिनी बनाई और बांग्लादेश का गठन किया। परंतु सेना में गुटबाजी और महत्वाकांक्षाएं होना के कारण वह तीन साल बाद ही लगभग पूरे परिवार सहित सेना द्वारा मार दिए गए। मुजीबुर्रहमान की दो बेटियां शेख हसीना और उनकी बहन शेख रिहाना ही बचीं, जो उस समय देश से बाहर थीं। जिया उर रहमान मिलिट्री कमांडर थे, जिसने शेख मुजीबुर्रहमान का आजादी के संग्राम मे साथ दिया। शेख मुजीब की हत्या के बाद उन्होंने देश का शासन संभाला। वह ही शेख हसीना को बांग्लादेश वापस लेकर आया और उसे राजनीति में स्थापित किया। बाद में उसने अपनी पत्नी बेगम खालिदा जिया को भी राजनीति में उतार दिया और 1977 में राष्ट्रपति बन बैठा और चार साल बाद 1981 में उनकी भी सैन्य तख्तापलट में हत्या कर दी गई।
इसके बाद बांग्लादेश के सैन्य प्रमुख मोहम्मद इरशाद ने देश की सत्ता पर कब्जा कर लिया। इरशाद को हटाने के लिए हसीना और जिया दोनों साथ आईं और जीत भी हासिल की, परंतु इरशाद के हटने के बाद वे एक दूसरे के खिलाफ हो गईं। खालिदा को शेख हसीना के खिलाफ करने में उस समय सीआईए का बहुत बड़ा हाथ था। वहाँ के कट्टर मुस्लिमों का एक धड़ा पाकिस्तान समर्थक है, जो भारत विरोधी हैं। वहाँ पर अरब देशों से पेट्रो-डॉलर फंडिंग वाले कट्टरपंथी तब्लीगियों का भी अच्छा प्रभाव बनता जा रहा है। जमात-ए-इस्लामी भी विदेशी फंडिंग पाती है, साथ ही वह आईएसआई और सीआईए के संपर्क सहयोग में भी है।
वर्तमान में केवल शेख हसीना ही भारत समर्थक और सहयोगी हैं और अमेरिकन डीप स्टेट को नापसंद है। अब अंतरिम सरकार प्रमुख मोहम्मद यूनुस को बनाया गया है, जिन्होंने 1984 में माइक्रोफाइनेंस स्कीम के नाम पर गरीब बांग्लादेशी नागरिकों को विदेशी पैसे बांटकर उनका दोहन किया। बांग्लादेश की गरीबी में कोई सुधार नही आया, परंतु विदेशी धन के माध्यम से बांग्लादेश के लोगों और अर्थव्यवस्था को नियंत्रित करने का प्रयास किया, जिसकी शेख हसीना प्रबल विरोधी है। इन पर टैक्स चोरी और अत्यधिक ब्याज से लोगों के दोहन के आरोप लगते रहे, साथ ही यह विदेशी प्रतिनिधित्व के प्रबल समर्थक हैं।
म्यांमार का संघर्ष राज्य बनाने वाले बर्मी बहुसंख्यकों व अल्पसंख्यकों के मध्य है। अल्पसंख्यक मुख्य रूप से सीमावर्ती क्षेत्रों में स्थित हैं, जबकि बर्मी देश के मध्य और दक्षिणी हिस्सों पर हैं। कई अल्पसंख्यक समूह प्राकृतिक संसाधनों, जुए, ड्रग्स या विदेशी सहायता (खासकर मिशनरीज) के माध्यम से खुद को बनाए रखते हैं। वह अक्सर चीनी और अमेरिकन हथियारों की सहायता से संघर्ष को कम तीव्रता पर जारी रखते हैं, जिससे इसकी निरंतरता बनी रहती है। ऐसा करने के पीछे ड्रग्स और जंगल पहाडों पर मिलने वाले आर्थिक संसाधन के माध्यम से होने वाली आय भी कारण है।
शेख हसीना, जिस ईसाई-यहूदी लोगों का एक स्वतंत्र राष्ट्र बनाने के प्रयासों की ओर इशारा कर रही थीं, वह वहाँ रहने वाले ईसाई धर्म में परिवर्तित हो चुके समूहों की पुरानी मांग है। ईसाई राष्ट्र “जोगाम”, जिसे “जालेंगम” (स्वतंत्रता की भूमि)की तर्ज पर कहा जाता है, एक प्रस्तावित कुकी राज्य है। इस अलग राष्ट्र में म्यांमार के सागाइंग डिवीजन और चिन राज्य के बड़े हिस्से, भारतीय राज्य मिज़ोरम और मणिपुर के कुकी-बसे हुए इलाके और बांग्लादेश के चटगांव डिवीजन के बंदरबन जिले और आस-पास के इलाके शामिल करने का विचार है। अमेरिका समेत यूरोपियन समुदाय इस मांग को हवा देता रहता है और कुकी समुदाय का सहायक भी है।
यह क्षेत्र कुकी-चिन आतंकवादी समूहों के उग्रवाद से जूझ रहा है जिसमे ज़ोमी, चिन-कुकी-मिज़ो जातीय समूह शामिल है। भारत, म्यांमार और बांग्लादेश के पहाड़ी क्षेत्रों में रहने वाले एक जातीय समूह हैं। उनकी उत्पत्ति म्यांमार की चिन पहाड़ियों और भारत में मणिपुर, मिज़ोरम और नागालैंड के आस-पास के क्षेत्रों से जुड़ी हुई है। जहाँ वो बाहर से धीरे धीरे इन क्षेत्रों में प्रवास करके बस गए और अलग-अलग समुदायों का निर्माण किया।
शेख हसीना के साथ सीआईए बांग्लादेश को अमेरिकी सेना के लिए दक्षिण एशिया को नियंत्रित करने के लिए एक सैन्य हवाई पट्टी बनाने में विफल रही। इस सैन्य अड्डे और कुकी चिन के अपने समर्थकों के साथ अमेरिका बहुत आसानी से दक्षिण पूर्व एशिया के साथ भारत और चीन को भी नियंत्रित कर सकता है। यही कारण रहा मणिपुर भी पिछले डेढ़ दो साल से अशांत बना हुआ है।
भारत सरकार ने मणिपुर में अवैध ड्रग्स की खेती पर लगाम लगाई और व्यापार को बंद करने के उद्देश्य से वहाँ फसल को आग लगा दी। इसके बाद ही वहाँ पर चीन और अमेरिका प्रायोजित हिंसा भड़क उठी। सेना की कार्रवाई में कुकी उग्रवादियों की भी काफी कमर टूटी है, इसलिए मणिपुर को अशांत किया गया। वहाँ पर नेहरू ने भारतीय साधुओं के प्रवेश पर रोक लगा दी थी और यूरोपीय मूल के वेरियर एल्विन को उत्तर पूर्वी मामलों पर सलाहकार नियुक्त किया था। आज, नागालैंड में लगभग 90% ईसाई हैं। दूसरी कसर पूर्वोत्तर में इनर लाइन परमिट लगाकर उस हिस्से को भारत से लगभग अलग थलग कर दिया।
ऐसे समय में भारत की क्या भूमिका होनी चाहिए। मेघालय ने बांग्लादेश के साथ अंतरराष्ट्रीय सीमा पर तत्काल प्रभाव से रात्रि कर्फ्यू लगा दिया है। बीएसएफ ने 4,096 किलोमीटर लंबी भारत-बांग्लादेश सीमा पर अपनी सभी संरचनाओं में “हाई अलर्ट” जारी किया जहाँ एक ओर मणिपुर समस्या है, वहीं चिकन नैक का स्थाई समाधान भी बांग्लादेश के माध्यम से निकल सकता है। दूसरी ओर त्रिपुरा तथा बांग्लादेशी शरणार्थियों की भी समस्याएं हैं, जो कि शेख हसीना और उनके नेटवर्क के माध्यम से सुलझ सकती हैं।
लेखक:- अभिषेक अग्रवाल
भारत में आज भी देश की लगभग 60 प्रतिशत आबादी ग्रामीण इलाकों में निवास कर रही है और वह अपने रोजगार के लिए सामान्यतः कृषि क्षेत्र पर निर्भर है तथा देश की कुल अर्थव्यवस्था में कृषि क्षेत्र का योगदान केवल 16-18 प्रतिशत के आसपास बना रहता है। अब यदि देश की 60 प्रतिशत आबादी देश के सकल घरेलू उत्पाद में केवल 16-18 प्रतिशत तक का योगदान दे पा रही है तो स्वाभाविक रूप से इस क्षेत्र में गरीबी तो बनी ही रहेगी। परंतु, यह स्थिति अब धीरे धीरे बदल रही है क्योंकि हाल ही के वर्षों में भारत के विनिर्माण क्षेत्र का योगदान देश के सकल घरेलू उत्पाद में बढ़ता जा रहा है, जिसके चलते ग्रामीण इलाकों के नागरिक शहरी क्षेत्रों में स्थापित की जा रही विनिर्माण इकाईयों में रोजगार के नए अवसर प्राप्त करने के उद्देश्य से शहरों की ओर पलायन कर रहे हैं। विनिर्माण क्षेत्र में कई ऐसे नए क्षेत्र भी उभरकर सामने आए हैं जिन क्षेत्रों में भारत में उत्पादन बहुत कम मात्रा में होता रहा है। उदाहरण के लिए रक्षा क्षेत्र, दवा क्षेत्र, सेमी-कंडक्टर निर्माण क्षेत्र एवं आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस का क्षेत्र आदि का वर्णन यहां प्रमुख रूप से किया जा सकता है।
वित्तीय वर्ष 2023-24 के दौरान भारत में स्वदेशी रक्षा के क्षेत्र में उत्पादन की मात्रा 1.27 लाख करोड़ रुपये की रही है जो पिछले वर्ष की तुलना में उल्लेखनीय 16.7 प्रतिशत अधिक है। यह भारत सरकार द्वारा देश में उत्पादन के विभिन्न क्षेत्रों में आत्मनिर्भरता को बढ़ावा देने के उद्देश्य से सरकारी नीतियों और सरकार के प्रयासों की प्रभावशीलता को रेखांकित करता है। वर्तमान में रक्षा के क्षेत्र में उत्पादन करने वाली इकाईयों में सरकारी क्षेत्र की कम्पनियों एवं निजी क्षेत्र की कम्पनियों द्वारा संयुक्त रूप से प्रयास किए जा रहे हैं। वित्तीय वर्ष 2023-24 के दौरान उक्त वर्णित उत्पादन में सरकारी क्षेत्र की कम्पनियों का योगदान 79.2 प्रतिशत का रहा है जबकि निजी क्षेत्र की कम्पनियों का योगदान 20.8 प्रतिशत का रहा है। हर्ष का विषय तो यह भी है कि रक्षा के क्षेत्र में भारत में निर्मित किए जा रहे उत्पादों की अन्य देशों में भारी मांग निर्मित होती जा रही है और इन उत्पादों का निर्यात भी लगातार बढ़ रहा है। वित्तीय वर्ष 2023-24 में 21,083 करोड़ रुपये के मूल्य का निर्यात भारत से विभिन्न देशों में किया गया है जो पिछले वर्ष की तुलना में 32.5 प्रतिशत अधिक है और यह भारत में रक्षा के क्षेत्र में हुए कुल उत्पादन का लगभग 20 प्रतिशत है।
निर्यात में यह वृद्धि न केवल वैश्विक रक्षा बाजार में भारत के बढ़ते पदचिन्हों को दर्शाती है, बल्कि आत्मनिर्भरता और नवाचार के प्रति इसकी प्रतिबद्धता को भी दर्शाती है। भारत में विनिर्माण इकाईयों की स्थापना को बढ़ावा देने के उद्देश्य से हाल ही के समय में कई रणनीतिक पहल भी केंद्र सरकार द्वारा की गई है, जैसे, मजबूत नीतिगत ढांचे को विकसित करना, सार्वजनिक एवं निजी क्षेत्र की भागीदारी को बढ़ावा देना, अनुसंधान एवं विकास कार्यों में पर्याप्त निवेश को बढ़ावा देना, आदि शामिल हैं। स्वदेशीकरण की नीति के अनुपालन का असर भी रक्षा के क्षेत्र में उत्पादन एवं निर्यात में हो रही भारी भरकम वृद्धि के रूप में दिखाई देने लगा है। रक्षा के क्षेत्र में उपयोग होने वाले सैकड़ों उत्पादों के आयात पर रोक लगाकर इन उत्पादों का उत्पादन भारत में ही करने के निर्णय का असर भी अब धरातल पर स्पष्ट रूप से दिखाई देने लगा है। रक्षा के क्षेत्र में विभिन्न उत्पादों का उत्पादन भारत में ही करने की नीति को लागू करने से देश में न केवल राष्ट्रीय सुरक्षा को बढ़ावा मिलेगा बल्कि देश में आर्थिक प्रगति, तकनीकी उन्नति एवं रोजगार सृजन को भी बढ़ावा मिलेगा।
रक्षा क्षेत्र की तरह ही, हाल ही के समय में भारत ने उत्पादन के कई नए क्षेत्रों में प्रवेश किया है। कुछ वर्ष पूर्व तक दवा निर्माण के क्षेत्र में उपयोग किए जाने वाले एपीआई (ऐक्टिव फार्मास्यूटिकल इंग्रीडीयंट) नामक कच्चे माल का लगभग पूरे तौर पर चीन से आयात किया जाता था। परंतु, कोरोना महामारी के दौरान भारत को यह अहसास हुआ कि यदि चीन इस कच्चे माल का निर्यात भारत को करना कम कर दे अथवा बंद कर दे तो भारत में तो दवा उद्योग की इकाईयों में निर्माण कार्य ही ठप्प पड़ जाएगा। इसके बाद केंद्र सरकार ने एपीआई के उत्पादन को भारत में ही करने का फैसला लिया, आज स्थितियां पूर्णत: बदल गई है एवं एपीआई का निर्माण भारत में ही किया जाने लगा है। सम्भव है कि आगे आने वाले कुछ समय में एपीआई के निर्माण के क्षेत्र में भी भारत आत्मनिर्भरता हासिल कर लेगा। भारत आज एपीआई के उत्पादन के क्षेत्र में विश्व में तीसरा सबसे बड़ा उत्पादक देश बन गया है एवं भारत की वैश्विक एपीआई उद्योग में 8 प्रतिशत की हिस्सेदारी बन गई है। आज भारत में 500 से अधिक प्रकार के विभिन्न एपीआई का उत्पादन किया जा रहा है।
भारत में एपीआई का महत्व इसलिए भी बढ़ जाता है क्योंकि पिछले कुछ वर्षों में भारतीय दवा उद्योग में तेज गति से वृद्धि दृष्टिगोचर हुई है और आज यह देश के सकल घरेलू उत्पाद में 1.72 प्रतिशत का योगदान देने लगा है एवं दवा उद्योग आज देश में रोजगार के करोड़ों अवसर निर्मित कर रहा है। भारतीय दवा उद्योग के वर्ष 2024 के अंत तक 6,500 करोड़ अमेरिकी डॉलर से बढ़कर वर्ष 2030 तक 13,000 करोड़ अमेरिकी डॉलर तक पहुंचने की उम्मीद की जा रही है। वर्ष 2013-14 के बाद से वर्ष 2021-22 तक भारतीय दवा निर्यात में 103 प्रतिशत की वृद्धि अंकित की गई है। जेनेरिक दवाओं के वैश्विक निर्यात में भारत की हिस्सेदारी 20 प्रतिशत हो गई है, जिससे भारत को अब “विश्व का फार्मेसी हब” भी कहा जाने लगा है। केंद्र सरकार एपीआई के उत्पादन को भारत में बढ़ाने के उद्देश्य से एक समग्र एवं अनुकूल पारिस्थितिकीय तंत्र का निर्माण करने पर जोर दे रही है।
वर्ष 2020 में केंद्र सरकार ने एपीआई के घरेलू विनिर्माण को बढ़ावा देने के लिए उत्पादन लिंक्ड प्रोत्साहन योजना के लिए 6,940 करोड़ रुपये की राशि निर्धारित की थी। 35 सक्रिय दवा सामग्री का विनिर्माण, जो एपीआई का लगभग 67 प्रतिशत है, जिसके लिए भारत की 90 प्रतिशत आयात पर निर्भरता है, भारत में PLI योजना के तहत प्रारम्भ किया जा चुका है। वर्ष 2022 के बाद से भारत के फार्मास्यूटिकल व्यवसाय में जबरदस्त बदलाव आया है एवं भारत अब वॉल्यूम उत्पादक से एक मूल्यवान आपूर्तिकर्ता देश बन गया है। दवाई के क्षेत्र में भारत अब वैश्विक स्तर पर अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाने को तैयार हो गया है।
लगभग चार वर्ष पूर्व वैश्विक स्तर पर ऑटोमोबाइल विनिर्माण के क्षेत्र में सेमीकंडक्टर की उपलब्धतता में आई भारी कमी के चलते वाहनों के उत्पादन को भारी मात्रा में घटाना पड़ा था। परंतु, इसके बाद केंद्र सरकार ने यह बीड़ा उठाया था कि सेमीकंडक्टर के निर्माण के क्षेत्र में भारत को वैश्विक हब बनाया जाएगा। भारत में सेमीकंडक्टर का बाजार 2,400 करोड़ अमेरिकी डॉलर का है जो वर्ष 2025 तक बढ़कर 10,000 करोड़ अमेरिकी डॉलर का हो जाने की सम्भावना है। इस संदर्भ में केंद्र सरकार ने कई कदम उठाए हैं एवं सेमीकंडक्टर की विनिर्माण इकाईयां भारत में अधिक से अधिक संख्या में स्थापित हों इसके लिए भी केंद्र सरकार द्वारा गम्भीर प्रयास किए जा रहे हैं। भारत द्वारा सेमीकंडक्टर उत्पादन में वैश्विक नेतृत्व हासिल किया जा सकता है। भारत के प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी तो वैश्विक स्तर पर कई प्रौद्योगिकी फर्म से भारत में सेमीकंडक्टर उद्योग लगाने के लिए सीधे ही चर्चा भी कर चुके हैं। काउंटरपोईंट रिसर्च और इंडिया इलेक्ट्रॉनिक्स ऐंड सेमीकंडक्टर एसोसीएशन की एक रिपोर्ट के अनुसार भारत का सेमीकंडक्टर बाजार वर्ष 2026 तक लगभग 6,400 करोड़ अमेरिकी डॉलर का हो जाएगा जो वर्ष 2019 के बाजार से तीन गुना अधिक होगा।
इसी प्रकार, भारत में आज आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के क्षेत्र में भी बहुत अधिक शोध चल रहा है ताकि आगे आने वाले समय में पूरे विश्व में भारत ही इस क्षेत्र में अपनी सर्वश्रेष्ठता सिद्ध कर सके। इस क्षेत्र में कार्य करने वाली अमेरिका की कुछ बहुराष्ट्रीय कम्पनियां तो बैंगलोर में आकर इस क्षेत्र के इंजीनियरों की भर्ती हेतु प्रयास भी करती दिखाई दे रही हैं। कुल मिलाकर अब यह कहा जा सकता है कि भारत आज विनिर्माण क्षेत्र के कई ऐसे क्षेत्रों में कार्य करता हुआ दिखाई दे रहा है जिनमे कभी भारत का प्रभुत्व ही नहीं रहा है। इससे भारत में रोजगार के लाखों नए अवसर निर्मित हो रहे हैं एवं ग्रामीण क्षेत्रों पर नागरिकों का दबाव भी कम हो रहा है।
लेखक:- प्रहलाद सबनानी
मधुर गणेश भजन - सुखकर्ता दुखहर्ता वार्ता विघ्नचि - हजारों भक्तों द्वारा गाया जाता है। हालांकि, बहुत से लोग यह नहीं जानते होंगे कि एक प्रेरित संत समर्थ रामदास, जो एक राम भक्त थे, ने मयूरेश्वर की प्रार्थना करने के बाद इस सुंदर गणेश भजन की रचना की थी। मोरेगांव गणेश मंदिर में स्थापित, यह स्थल भगवान गणेश के भक्तों के लिए प्रसिद्ध अष्टविनायक तीर्थयात्रा की शुरुआत का भी प्रतीक है। पुणे के पास भगवान गणेश के आठ मंदिरों का एक समूह, यह तीर्थयात्रा पूजा का एक क्रम निर्धारित करती है जिसे एक बार में पूरा किया जाना चाहिए। बेशक, रुकने की अनुमति है। हालाँकि भक्त को घर नहीं लौटना चाहिए। और यात्रा वहीं समाप्त होनी चाहिए जहाँ से यह शुरू हुई थी - मोरेगांव गणेश मंदिर में।
654 किलोमीटर लंबा यह पूजा मार्ग गुफाओं, पहाड़ों और नदियों के किनारों से होकर गुजरता है। बेहतर बुनियादी ढांचे और सुविधाओं के कारण यह तीर्थयात्रा दो-तीन दिनों में पूरी हो जाती है। हालांकि, कोई व्यक्ति अधिक समय भी ले सकता है। हालांकि, महाराष्ट्र के इन आठ शानदार गणेश मंदिरों में पूजा करते समय समय का कोई महत्व नहीं होना चाहिए। आखिर कौन समझ सकता है कि एक भक्त की प्रार्थना और आस्था क्या होती है? एक अद्भुत, अवर्णनीय अनुभव जो व्यक्ति के साथ रहता है और श्रोता को प्रेरित करता है।
भगवान गणेश के इन प्रसिद्ध मंदिरों से जुड़ी किंवदंतियाँ भी उतनी ही रोचक हैं। और मंदिर और भगवान गणेश के साथ एक बंधन बनाती हैं। यहाँ महाराष्ट्र के इन प्रसिद्ध आठ भगवान गणेश मंदिरों के माध्यम से मंत्रों और किंवदंतियों की एक संक्षिप्त यात्रा है।
मोरेश्वर
अष्टविनायक यात्रा में पहला मंदिर, तीर्थ यात्रा पूरी करने के लिए दोबारा यहां आएं
निजे भुस्वानंदजदभारत भूमिया परतरे
तुरीयोस्तिरे परमसुखदेवता निवाससि
मयूराय नाथ स्तवामासिच
अतस्व संध्याये शिवहरिणी ब्रह्माजनकम्
हे! मोरगाँव के मयूरेश्वर भगवान्, आप जड़भरत ऋषि की भूमि पर, करहा नदी के तट पर, जो भुस्वनंद (भूमि पर सुख) के नाम से प्रसिद्ध है, निवास करें। तीन गुणों से दूर, स्वयंभू, निराकार, ओंकार के समान, सदैव योग की चतुर्थ अवस्था में रहने वाले तथा मयूर पर सवार श्री मोरेश्वर, आप मेरा नमस्कार स्वीकार करें।
अष्टविनायक तीर्थस्थल का सबसे महत्वपूर्ण मंदिर माना जाने वाला मयूरेश्वर (मोर पर सवार भगवान गणेश) ने इसी स्थान पर राक्षस सिंधुरासुर का वध किया था। तीन आंखों वाली मूर्ति, जिसकी सूंड बाईं ओर मुड़ी हुई है, उसकी रक्षा एक नागराज कर रहा है। मूर्ति में सिद्धि (क्षमता) और बुद्धि (बुद्धि) की दो अन्य मूर्तियाँ भी हैं।
हालाँकि, यह मूल मूर्ति नहीं है, जिसके बारे में कहा जाता है कि भगवान ब्रह्मा ने इसे दो बार प्रतिष्ठित किया था।
किवदंती: अपने बच्चों से जुड़ी एक घटना के बाद अपनी पत्नी विनीता को सांत्वना देने के लिए ऋषि कश्यप ने उसे पक्षी के रूप में एक और पुत्र होने का वरदान दिया। जब भगवान गणेश ने अंडा तोड़ा तो बच्चा अजन्मा था और उसमें से एक मोर निकला। दोनों के बीच द्वंद्व हुआ। व्याकुल विनीता ने बीच-बचाव किया और युद्ध समाप्त हो गया। उसके मोर पुत्र ने भगवान गणेश का वाहन बनना चुना और एक अनोखी शर्त रखी: भगवान गणेश को उनके नाम से जाना जाना चाहिए। इस प्रकार मयूरेश्वर या मोरेश्वर नाम की उत्पत्ति हुई।
सिद्धिविनायक-
सिद्धियाँ प्राप्त करने के लिए एक पवित्र मंदिर, अष्टविनायक यात्रा का दूसरा पड़ाव
स्थितो भीमातिरे जगद्वान कामेन हरिणा
विजेतु दैत्यो तचुति मालभावौ कैताभमधु
महाविघ्नर्तेन प्रखर तपसा सीतपदो
गणेश सिद्धिशो गिरिवरपु पंचजनक
भयंकर विपत्तियों से घिरे भगवान विष्णु ने भीमा नदी के तट पर सिद्धटेक पर्वत पर तपस्या की। भगवान गणेश से वरदान प्राप्त कर भगवान विष्णु ने मधु और कैटभ नामक दो राक्षसों का वध किया। हे सिद्धेश्वर श्री गणेश, मेरा प्रणाम स्वीकार करें।
यह अष्टविनायक तीर्थस्थल में एकमात्र मूर्ति है जिसकी सूंड दाईं ओर है। भगवान विष्णु द्वारा बनाया गया मूल मंदिर गिर गया और बाद में एक चरवाहे को भगवान गणेश का रूप दिखाई दिया। उसने अन्य लोगों के साथ मिलकर उस स्थान पर पूजा करना शुरू कर दिया। सालों बाद, पेशवाओं के शासन के दौरान एक मंदिर बनाया गया।
किवदंती: भगवान विष्णु मधु और कैटभ नामक राक्षसों के साथ 1000 वर्षों तक युद्ध में लगे रहे। भगवान गणेश की प्रार्थना करने पर, ब्रह्मांड के पालनहार - भगवान विष्णु - को सिद्धियाँ प्राप्त हुईं । और उन्होंने राक्षसों पर विजय प्राप्त की। भगवान विष्णु ने एक चार-दरवाजे वाला मंदिर बनाया और भगवान गणेश की एक मूर्ति स्थापित की। चूँकि भगवान विष्णु ने यहाँ सिद्धि प्राप्त की थी, इसलिए हाथी के सिर वाले भगवान को सिद्धिविनायक कहा जाता था। सिद्धटेक या सिद्धक्षेत्र इस स्थान का नाम बन गया।
बल्लालेश्वर
अष्टविनायक यात्रा के तीसरे मंदिर में स्वयंभू मूर्ति आपकी प्रतीक्षा कर रही है
वेदो संस्तुवैभावो गजमुखो भक्ताभिमानी यो
बल्लालेरव्य सुभक्तपाल नरात्; ख्यात् सदा तिष्ठति।
क्षेत्रे पल्लीपुरे यथा कृतयुगे चास्मिथा लौकिके
भक्तर्भविते मूर्तिमान गणपति सिद्धिश्वर तम भजे
मैं भगवान गणेश की पूजा करता हूं, जो हाथी के सिर वाले हैं, जिनकी स्तुति वेदों में की गई है, जो अपने भक्त (बल्लाल) के नाम से प्रसिद्ध हैं, जो अपने भक्तों की रक्षा करते हैं और जो इस कृतयुग में पल्लीपुर या पाली में निवास करते हैं।
बल्लालेश्वर की तीन फुट ऊंची मूर्ति में भगवान गणेश ब्राह्मण के कपड़े पहने हुए दिखाई देते हैं। दिलचस्प बात यह है कि मंदिर का आकार देवनागरी लिपि में श्री अक्षर जैसा है।
किवदंती: कल्याणशेठ नामक एक चिंतित पिता ने अपने छोटे बेटे बल्लाल को भगवान गणेश की निरंतर पूजा करने के लिए डांटा। एक दिन, गुस्से में आकर पिता ने बल्लाल को जंगल के एक पेड़ से बांध दिया और उसे भगवान गणेश से अपने बचाव के लिए प्रार्थना करने को कहा। लड़के ने प्रार्थना की और भगवान गणेश स्वयं एक ब्राह्मण के रूप में प्रकट हुए। जैसे ही उन्होंने लड़के को मुक्त किया, बल्लाल ने भगवान से इस क्षेत्र में निवास करने की प्रार्थना की। प्रसन्न भगवान गणेश सहमत हो गए और एक पत्थर में निवास करने लगे, जिसे बल्लालेश्वर विनायक की मूर्ति माना जाता है।
धन्यवाद गणपति
अष्टविनायक यात्रा के चौथे पड़ाव में दो गणेश प्रतिमाओं को प्रणाम करें
भक्ताभिमानी गणराज एकम
क्षेत्रे मधख्ये वरदं
प्रसन्नं यस्तिष्ठति श्री वरदो गणेशम्
विनायकस्ता प्रणामामि भक्तम्
मैं भगवान गणराज को नमस्कार करता हूँ जो गणों के नेता हैं, जिन्हें अपने भक्तों पर गर्व है, जो महाड में रहते हैं तथा जिनका स्वरूप मनोहर है।
मूल गणेश प्रतिमा 1600 के दशक के अंत में एक झील में डूबी हुई पाई गई थी। 1725 में कल्याण के सूबेदार ने मंदिर का फिर से निर्माण करवाया।
किंवदंती: एक विद्वान गृत्समव एक बार अपने मूल के बारे में सुनकर दुखी हो गया (वह जन्म से ब्राह्मण नहीं था)। गृत्समव पुष्पक वन में चला गया और कठोर तपस्या करने लगा। भगवान गणेश ने उसकी प्रार्थना सुनी और उसके सामने प्रकट हुए। गृत्समव ने ब्राह्मण के रूप में पहचाने जाने के लिए कहा और फिर उसने भगवान गणेश से पुष्पक वन में निवास करने के लिए कहा। भगवान गणेश ने दोनों इच्छाएँ पूरी कीं। गृत्समव ने भगवान गणेश को - वरद विनायक, सभी इच्छाओं को पूरा करने वाला - बुलाया और महाड में एक मंदिर बनवाया।
चिंतामणि, थेउर
शांति और आध्यात्मिक प्राप्ति के लिए अष्टविनायक यात्रा के इस 5वें मंदिर में करें प्रार्थना
ब्रह्मा सृष्ट्यादिसक्त स्थिरहितं पिडितो विघ्नसंदे
आक्रांतो भूतिरक्य कृतिगनरजस जीवित त्यक्तु मिश्चिन
स्वात्मनां सर्वयक्त गणपतिमल सत्यचिंतमण्यम
मुक्ता स्थापयंत स्थिरमसुखदं स्थावरे धूधि मिधे
जो मनुष्य सुख की खोज में है, जो समस्त विपत्तियों के बीच में है, उसे स्थावर (थेऊर) जाकर श्री चिंतामणि की पूजा करनी चाहिए और समस्त (चिंताओं) तथा विपत्तियों से छुटकारा पाना चाहिए।
यह मंदिर अद्वितीय है क्योंकि यह ध्यान के लिए आरक्षित है , जो प्राचीन मंदिरों में एक सामान्य विशेषता थी।
किवदंती: भगवान गणेश द्वारा लालची गुण से उनकी कीमती चिन्तामणि रत्न वापस पाने पर ऋषि कपिला प्रसन्न हुए। ऋषि ने भगवान गणेश को चिन्तामणि विनायक नाम देकर रत्न की माला पहनाई। यह घटना एक कदम्ब वृक्ष के नीचे घटी थी, इसलिए थेउर को कदम्बनगर के नाम से जाना जाता है।
गिरिजात्मज, लेन्यान्द्री
अष्टविनायक यात्रा का एकमात्र मंदिर पहाड़ी पर स्थित
मयासा भुवनेश्वरी शिवस्ति देहाश्रित सुंदर
विग्नेशं सुतमप्तुकं संहिता कुर्वेतापो
दुष्करं तख्य भूतप्रकट प्रसन्न वर्दो तिष्ठतया स्थापितं
वंदे गिरिजात्मज परमज तम लेखनादृषितम्
जगत जननी, भगवान शिव की सुन्दर पत्नी , देवी पार्वती ने श्री गणेश की घोर तपस्या की और अन्त में श्री गणेश को पुत्र रूप में प्राप्त किया। मैं गिरिजा पार्वती के पुत्र गिरिजात्मज को प्रणाम करता हूँ जो लेखनाद्रि (लेण्याद्रि) पर्वत पर रहते हैं।
यह मंदिर बौद्ध धर्म से संबंधित 18 गुफाओं के एक परिसर के बीच स्थित है। आठवीं गुफा में भगवान गणेश का यह प्रसिद्ध मंदिर स्थापित है।
किंवदंती: देवी पार्वती ने भगवान गणेश की माँ बनने के लिए लेण्याद्री पर्वत की गुफा में कठोर तपस्या की थी। प्रसन्न होकर भगवान गणेश ने वचन दिया कि वे उनके पुत्र के रूप में जन्म लेंगे। भाद्रपद की चतुर्थी को, उन्होंने अपने शरीर के मैल से एक मूर्ति बनाई। भगवान गणेश ने मूर्ति में प्रवेश किया और मूर्ति जीवित हो गई - छह भुजाओं और तीन आँखों वाला एक छोटा बालक। माना जाता है कि भगवान गणेश पंद्रह वर्षों तक लेण्याद्री में रहे।
विघ्नेश्वर, ओझर
अष्टविनायक यात्रा के सातवें मंदिर में बाधाओं पर विजय पाने का आशीर्वाद प्राप्त करें
भक्तनुग्रहे गजमुखो विगेश्वरो ब्रह्मपम्
नाना मूर्ति धरोपि नैजमहिमा खंड सदात्मा प्रभु स्वेच्छा
विघ्नहर सदासुखकर सिद्ध कल्लो स्वेपं
क्षेत्रे चोजार्के नमोस्तु सततं तमसे परब्रह्मने
मेरा मन भगवान पर केन्द्रित हो, जो हाथी के सिर वाले, दयालु और विघ्नों को दूर करने वाले हैं। उन्होंने राक्षस विघ्नसुर को हराया था। वे स्वयं ब्रह्मा हैं। उनके विभिन्न रूपों में उनकी महानता अविचलित है। वे सबसे महान कलाकार हैं। वे अपने भक्तों को सुख देते हैं, जो ओजर में रहते हैं।
ऐसा माना जाता है कि स्वर्ण शिखर वाले इस मंदिर का निर्माण पेशवा राजा चिमाजी अप्पा ने 1700 के दशक के अंत में पुर्तगालियों को हराने के बाद कराया था।
किंवदंती: विघ्नासुर नामक राक्षस को देवताओं के राजा इंद्र ने राजा अभिनंदन द्वारा आयोजित प्रार्थना को नष्ट करने के लिए बनाया था। हालाँकि, राक्षस ने जंगली उत्पात मचाना शुरू कर दिया, संपत्ति को नष्ट कर दिया और लोगों को मार डाला। भगवान गणेश ने परेशान लोगों की प्रार्थना सुनी और विघ्नासुर को हरा दिया। पराजित राक्षस ने भगवान गणेश से दया दिखाने की विनती की। भगवान गणेश उसे एक शर्त पर जाने देने के लिए सहमत हुए: विघ्नासुर उस स्थान पर नहीं जाएगा जहाँ भगवान गणेश की पूजा की जाती है। तब राक्षस ने एक अनुरोध किया: उसका नाम भगवान गणेश के नाम से पहले लिया जाना चाहिए। इस प्रकार भगवान गणेश का एक और नाम विघ्नहर या विघ्नेश्वर ( विघ्न का अर्थ है बाधा या अपशकुन) पैदा हुआ।
महागणपति, रंजनगांव
अष्टविनायक यात्रा के अंतिम पड़ाव में महागणपति स्वरूप का करें अनुभव
श्री शम्भुवरप्रदा सुतपासा नम्ना सहस्त्र स्वकं
दत्वा श्री विजय पदम शिवकर तस्मे प्रसन्न प्रभु
तेन स्थापित एव सद्गुणवापु गणपति क्षेत्रे सदातिष्ठति
तम वन्दे मणिपुरके गणपति देवम महन्त मुद्रा
भगवान शिवशंकर ने भगवान श्रीगणेश को प्रसन्न करके वरदान प्राप्त किया था। मैं मणिपुर (रांजनगांव) में रहने वाले श्रीगणेश को नमस्कार करता हूँ, जिन्होंने भगवान शिव को वरदान दिया था, जिनका स्वरूप सुंदर और मनभावन है तथा जो सद्गुणों के प्रतीक हैं।
सूर्य की दक्षिण दिशा में गति के दौरान सूर्य की कोमल किरणें इस मूर्ति पर पड़ती हैं। इस मंदिर का निर्माण इसी तरह किया गया है। शायद यह उचित भी है - क्योंकि इस प्रतिमा को भगवान गणेश का सबसे शक्तिशाली और उग्र रूप माना जाता है।
किंवदंती: एक बार भगवान शिव त्रिपुरासुर से युद्ध कर रहे थे और उसे पराजित करने में असमर्थ थे। भगवान शिव, जिन्हें हिंदू देवताओं में ब्रह्मांड के विध्वंसक/परिवर्तक के रूप में जाना जाता है, को इसका कारण पता चला: उन्होंने भगवान गणेश को अपना सम्मान नहीं दिया था। उन्होंने भगवान गणेश को बुलाने के लिए षडाक्षर मंत्र का जाप किया, जो प्रकट हुए और युद्ध में भगवान शिव का मार्गदर्शन किया। भगवान शिव ने तब एक मंदिर बनाया जहाँ भगवान गणेश का आह्वान किया गया।
और हां, अष्टविनायक तीर्थयात्रा पूरी करने के लिए पहले मंदिर - मोरेश्वर - तक वापस जाना पड़ता है।
भगवान गणेश के इन प्राचीन मंदिरों में जाना एक खूबसूरत अनुभव है - चाहे आप आस्था, आकर्षण, इतिहास, रोमांच की भावना या फिर संदेह से प्रेरित हों। हालांकि, बुद्धिमानों ने कहा है कि प्रार्थना का एक सच्चा रूप समर्पण और विश्वास है। गुरुदेव श्री श्री रविशंकर कहते हैं: पूजा और प्रार्थना डर या लालच से नहीं, बल्कि प्रेम और भक्ति की शुद्ध भावनाओं से की जानी चाहिए। पूजा के दो रूप हैं। एक बाहरी पूजा है जो बाहरी रूप से की जाती है और दूसरी आंतरिक रूप है जो मन के भीतर की जाती है। पूजा का आंतरिक रूप श्रेष्ठ है और इसका अधिक महत्व है।”
गुरुदेव कहते हैं कि आदि शंकराचार्य द्वारा रचित सुंदर गणेश स्तोत्रम् के भाव पर ध्यान लगाएं:
जगत् कारणं कारणंणां रूपं
सुराधिम् सुखदिम गुणेसं गणेशं
जगत् वापिनं विश्व वंध्यं सुरेशम्
परा ब्रह्म रूपं गणेशम् भजे मां
वह परम चेतना जो पूरे ब्रह्मांड का कारण है, जिससे सब कुछ उत्पन्न हुआ है,
जिसके भीतर सब कुछ विद्यमान है और कायम है और उस दिव्य ऊर्जा के भीतर सब कुछ पुनः निमज्जित हो रहा है।
यह दिव्य ऊर्जा, जो सबके अस्तित्व का कारण है, उसे ही हम ईश्वर, परब्रह्म या परम चेतना कहते हैं, जो कोई और नहीं बल्कि गणेश हैं।
