किसानों के नाम पर कहीं अराजकता फैलाकर प्रगति अवरुद्ध करने का प्रयास तो नहीं..?
Date : 15-Feb-2024
इस आँदोलन के लिये तिथियों का निर्धारण और यह अवसर भी साधारण नहीं है । यह एक ऐसा समय है जब भारत एक नई करवट ले रहा है । प्रगति की ऊँचाइयाँ छूने की ओर तो बढ़ ही रहा है । साथ ही सामाजिक सद्भाव और समन्वय का भाव भी प्रगाढ़ हुआ है । यही नहीं प्रधानमंत्री श्रीनरेंद्र मोदी ने भारत के भावी विकास का जो "ज्ञान का सम्मान" मंत्र दिया है इसमें अन्नदाता अर्थात किसान प्रमुख है । उनकी कुछ नीतियों में प्रत्यक्ष और कुछ नीतियों में परोक्ष रूप से किसानों का हित चिंतन स्पष्ट दिखता है । यह केन्द्र और राज्य सरकारों की किसान हितैषी नीतियों का ही परिणाम है कि आज भारत कृषि उत्पाद का निर्यातक देश बना । अपनी इसी नीति से एक कदम आगे भारत सरकार ने अपने समय के किसान नेता चौधरी चरण सिंह और कृषि विकास केलिये नीतियाँ बनाने का सुझाव देने वाले स्वामीनाथन को भारत रत्न सम्मान दिया गया । किसान आँदोलन के समय का चयन ही नहीं आँदोलन करने का तरीका भी वातावरण बिगाड़कर सरकार के प्रयासों पर पानी फेरने वाला है । अभी आरंभिक दिनों में आँदोलन का जो स्वरूप सामने आया है यह केवल अपनी माँगों की ओर ध्यानाकर्षक करना भर नहीं लगता । इससे पूरी दिल्ली का जन जीवन अस्त व्यस्त होने लगा है । यदि दिल्ली और आसपास का जीवन अस्त व्यस्त हुआ । गति में अवरोध आया तो निसंदेह यह विकासगति को अवरुद्ध करेगा । आँदोलन की तैयारी और तरीके से ही यह प्रश्न खड़ा होता है कि यह इसमें वे तत्व तो शामिल नहीं हो गये जो अराजकता फैलाकर देश की प्रगति अवरुद्ध करना चाहते हैं।
किसी भी परिवार, समाज या देश की प्रगति सभी स्वजनों को परस्पर सद्भाव के साथ कंधे से कंधा मिलाकर चलने की आवश्यकता होती है । इसके अतिरिक्त एक सावधानी की भी आवश्यकता होती है । जब भी कोई देश प्रगति की दिशा में आगे बढ़ता है तब ईर्ष्यालु शक्तियाँ आन्तरिक अशांति पैदा करके अवरोध उत्पन्न करने का षड्यंत्र करती हैं। भारत ने अपनी प्रगति का एक अति महत्वाकांक्षी लक्ष्य निर्धारित किया है । प्रधानमंत्री श्री नरेंद्रमोदी ने वर्ष 2047 तक भारत को विश्व की सर्वश्रेष्ठ आर्थिक शक्ति बनने का संकल्प व्यक्त किया है । यह असंभव भी नहीं है । आज दुनियाँ के अधिकांश देश आर्थिक मंदी के दौर में हैं, भारत के लगभग सभी पड़ौसी देश घोर आर्थिक संकट के दौर में हैं वहीं भारत में आर्थिक स्थिरता और प्रगति की रफ्तार बढ़ीं है । यह तथ्य संसार की उन सभी शक्तियों की नींद उड़ाने वाला है जो भारत की प्रगति से ईर्ष्या करते हैं। वे दोनों दिशाओं में षड्यंत्र कर सकतीं है । भारत का सामाजिक वातावरण बिगाड़ने की दिशा में भी और अराजकता पैदा कर प्रगति की गति अवरुद्ध करने की दिशा में भी ।
अपनी माँगों के प्रति सरकार और समाज का ध्यानाकर्षक करना एक बात है लेकिन व्यवस्था का विध्वंस करना बिल्कुल दूसरी बात है । किसान आँदोलन की यह शैली दो वर्ष पहले देशवासी देख चुके हैं। उस आँदोलन में वे चेहरे भी प्रमुखता से देखे गये थे जो खालिस्तान के नाम पर देश में अशान्ति फैलाने में सक्रिय रहे हैं और वे चेहरे भी देखे गये थे जो जेएनयू में कुख्यात आतंकवादी अफजल गुरु के समर्थन में निकाले गए जुलूस में दिखे थे । पिछले किसान आँदोलन के समर्थन में कनाडा, अमेरिका, ब्रिटेन और ऑस्ट्रेलिया जैसे देशों में निकाली गईं रैलियों के आयोजकों में कौन थे यह भी किसी से छिपा नहीं है । पिछले किसान आँदोलन की जो आरंभिक तैयारी पिछली बार देखी गई थी । इसबार भी यह तैयारी हूबहू वैसी ही है । इसलिये इस आशंका से इंकार नहीं किया जा सकता कि इस आँदोलन में भी पर्दे के पीछे वही आँदोलन जीवी हों। जो पिछली बार थे । उनमें कुछ चेहरे ऐसे भी थे जिनके एनजीओ को विदेशी फंडिंग होती हैं और जिनकी सतत गतिविधि भारत के मूल चिति से मेल नहीं खाती।
लेखक - रमेश शर्मा
