काठमांडू, 14 मई । नेपाल के विपक्षी दलों द्वारा आठों अध्यादेशों को अस्वीकृत करने संबंधी सूचना संघीय संसद के दोनों सदनों में दर्ज कराए जाने के बाद सत्तापक्ष कानूनी और राजनीतिक दबाव में आ गया है। सरकार द्वारा लाए गए अध्यादेशों को राष्ट्रीय सभा से विफल कराने की रणनीति के तहत विपक्षी दलों ने यह कदम उठाया है। बुधवार को सीपीएन-यूएमएल ने आठ, नेकपा ने चार और नेपाली कांग्रेस ने दो अध्यादेशों को अस्वीकार करने की सूचना दर्ज कराई।
अध्यादेश अस्वीकृत होने पर भी प्रधान न्यायाधीश की सिफारिश और रद्द की गई नियुक्तियां वापस नहीं होंगी। हालांकि, नई नियुक्तियां पुराने कानून के अनुसार ही होंगी। कानूनी विशेषज्ञों का कहना है कि यदि अध्यादेश निष्क्रिय हो जाते हैं तो प्रतिनिधि सभा में लगभग दो-तिहाई बहुमत रखने वाली रास्वपा भी राष्ट्रीय सभा में अपनी शून्य उपस्थिति के कारण मनमानी नहीं कर सकेगी।
नेपाल के संविधान की धारा 114 की उपधारा 2 के खंड ‘क’ के अनुसार सरकार द्वारा लाए गए अध्यादेशों को संघीय संसद के दोनों सदनों से स्वीकृति मिलना आवश्यक है। यदि किसी एक सदन ने भी अस्वीकार कर दिया तो अध्यादेश स्वतः निष्क्रिय हो जाएगा। संविधान में कहा गया है, “अध्यादेश जारी होने के बाद संघीय संसद के दोनों सदनों में पेश किया जाएगा और यदि दोनों सदनों से स्वीकृति नहीं मिली तो वह स्वतः निष्क्रिय हो जाएगा।”
यदि अध्यादेश निष्क्रिय हो जाते हैं तो अध्यादेशों के माध्यम से संशोधित कानूनी प्रावधान फिर पुराने स्वरूप में लौट आएंगे। प्रतिनिधि सभा में सत्तारूढ़ रास्वपा के मजबूत बहुमत के कारण वहां अध्यादेश आसानी से पारित हो सकते हैं लेकिन राष्ट्रीय सभा में उसकी उपस्थिति नहीं होने से विपक्षी दल वहीं से उन्हें अस्वीकार कराने की रणनीति अपना रहे हैं।
राष्ट्रीय सभा से स्वीकृत अध्यादेशों पर ही सरकार 60 दिनों के भीतर प्रतिस्थापन विधेयक लाने की प्रक्रिया आगे बढ़ा सकती है। अस्वीकृत अध्यादेशों के मामले में उन्हीं प्रावधानों को लागू करने के लिए नया विधेयक लाना पड़ेगा। यदि ऐसा नहीं किया गया तो सर्वोच्च अदालत के स्थापित नजीरों के अनुसार पुराने कानून फिर प्रभावी हो जाएंगे।
सामान्य विधायी प्रक्रिया से आने वाले विधेयकों के मामले में सरकार को अध्यादेशों की तरह दोनों सदनों से अनिवार्य स्वीकृति लेने की बाध्यता नहीं होती। राष्ट्रीय सभा द्वारा संशोधन विधेयक अस्वीकार किए जाने पर भी प्रतिनिधि सभा से दोबारा पारित होने के बाद उन्हें प्रमाणीकरण के लिए राष्ट्रपति के पास भेजा जा सकता है।
सरकार द्वारा लाए गए आठ अध्यादेशों को सामूहिक रूप से अस्वीकार किया जाए या कुछ को चुनकर, इस विषय पर कांग्रेस, एमाले और नेकपा के बीच अभी तक साझा सहमति नहीं बन सकी है। कांग्रेस ने केवल संवैधानिक परिषद और कुछ नेपाल कानून संशोधन संबंधी अध्यादेशों को अस्वीकार करने की सूचना दर्ज कराई है।
राष्ट्रीय सभा में कांग्रेस संसदीय दल की नेता कमला पन्त, सचेतक पदम परियार सहित उपस्थित सभी सांसदों के हस्ताक्षर से बृहस्पतिवार को यह सूचना दर्ज की गई। उधर, एमाले सांसदों ने आठों अध्यादेशों को अस्वीकार करने की सूचना दर्ज कराई है, जबकि नेकपा ने केवल चार अध्यादेशों के खिलाफ सूचना दी है।
सरकार ने पहले से आहूत संघीय संसद के दोनों अधिवेशन स्थगित कर संवैधानिक परिषद, सार्वजनिक पदाधिकारियों की पदमुक्ति, सार्वजनिक खरीद, सहकारी, विश्वविद्यालय, स्वास्थ्य विज्ञान प्रतिष्ठान, संपत्ति शुद्धीकरण तथा कुछ नेपाल कानूनों में संशोधन संबंधी अध्यादेश जारी किए थे।
एमाले का मानना है कि पहले से बुलाए गए संसद अधिवेशन को स्थगित कर अध्यादेश लाना प्रक्रियागत रूप से गंभीर त्रुटि है, इसलिए सभी अध्यादेशों को अस्वीकार किया जाना चाहिए। राष्ट्रीय सभा में एमाले संसदीय दल के नेता प्रेम प्रसाद दंगाल ने कहा कि सहकारी, सार्वजनिक खरीद और संपत्ति शुद्धीकरण अध्यादेशों पर लचीलापन दिखाया जा सकता है लेकिन प्रक्रियागत त्रुटि के कारण सभी को एक साथ अस्वीकार करने की सोच के तहत सूचना दर्ज कराई गई है।
उन्होंने कहा, “इस बीच हम अन्य दलों के साथ साझा धारणा बनाने की कोशिश करेंगे। यदि सहमति नहीं बनी तो कुछ मामलों पर विचार किया जा सकता है। गंभीर प्रकृति वाले सभी अध्यादेशों को अस्वीकार करेंगे और इस विषय में तीनों दल एक साथ रहेंगे।”
राष्ट्रीय सभा में नेकपा संसदीय दल के नेता झक्कु प्रसाद सुवेदी के अनुसार संवैधानिक परिषद, कुछ नेपाल कानून संशोधन, सार्वजनिक पदाधिकारियों की पदमुक्ति और विश्वविद्यालय संबंधी अध्यादेशों को अस्वीकार करने की सूचना दर्ज कराई गई है। उन्होंने कहा कि तीनों दल साझा धारणा बनाकर आगे बढ़ेंगे।
विपक्षी दलों ने अलग-अलग तरीके से सूचना दर्ज कराई है, लेकिन संवैधानिक परिषद और कुछ नेपाल कानून संशोधन संबंधी अध्यादेशों को लेकर तीनों प्रमुख दलों के बीच समान राय बन चुकी है। कांग्रेस संसदीय दल की नेता कमला पन्त ने बताया कि अन्य अध्यादेशों पर भी चर्चा कर एक साझा दृष्टिकोण बनाने की कोशिश की जाएगी। उन्होंने कहा कि केवल तीन बड़े दल ही नहीं बल्कि राष्ट्रीय सभा में प्रतिनिधित्व करने वाले राष्ट्रीय जनमोर्चा, जसपा नेपाल और लोसपा को भी सहमति में लाने का प्रयास किया जा रहा है।
राष्ट्रीय सभा में जनमोर्चा और लोसपा के एक-एक तथा जसपा नेपाल के दो सांसद हैं। यदि छोटे विपक्षी दल भी सहमत हो जाते हैं तो सर्वसम्मति से अध्यादेश अस्वीकार होने की संभावना बढ़ जाएगी। विपक्ष का मुख्य निशाना संवैधानिक परिषद संबंधी अध्यादेश है। सरकार ने संवैधानिक परिषद (कार्य, कर्तव्य, अधिकार और कार्यविधि) संबंधी कानून, 2066 में संशोधन के लिए लाए गए अध्यादेश में परिषद की बैठक के कोरम और निर्णय प्रक्रिया में बदलाव किया है।
