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अटलजी ने जब कहा, 'तुम्हें दवा की पड़ी है, बालक बहुत दूर से मिलने आए हैं...'

Date : 25-Dec-2025

कोलकाता, 25 दिसंबर । देश के पूर्व प्रधानमंत्री और भारत रत्न अलट बिहारी वाजपेयी की जयंती पर देश के लगभग हर हिस्से में लोग उन्हें अपनी तरह से याद कर रहे हैं। इनमें वरिष्ठ पत्रकार सीताराम अग्रवाल भी हैं। वह अटलजी को याद करते वक्त भावुक हो गए। चर्चा के दौरान एक बार तो उनकी आंखें नम हो गईं। वह अटल जी से पहली मुलाकात का जिक्र करते हैं। कहते हैं कि अटलजी बहुत सरल स्वभाव के थे। अगर आपकी बातें उन्हें भाने लगीं तो वह सबकुछ भूल जाते। बीच में दवा खाने को अगर कोई याद दिलाता तो कहते रुको थोड़ी देर।

अग्रवाल ने कहा कि पत्रकार से राजनेता बने भावुक ह्रदय कवि अटल जी से पहली मुलाकात का किस्सा काफी रोचक है। उन्होंने कहा कि करीब 60 वर्ष पहले की बात है। तिथि मुझे ठीक से याद नहीं। मैं वाजपेयी जी के भाषणों की भाषा-शैली का कायल था। राजनीतिक समझ उतनी नहीं थी। उनका एक कार्यक्रम सेन्ट्रल एवेन्यू स्थित महाजाति सदन सभागार में था।

सीताराम अग्रवाल ने कहा, '' जनसंघ समर्थक एक मित्र ने मुझसे कार्यक्रम में चलने का आग्रह किया तो मैं तत्काल तैयार हो गया। पास ही में खड़े एक और मित्र ( वे कांग्रेस समर्थक थे ) ने भी जाने की उत्सुकता दिखाई। उनके पास गाड़ी भी थी। बस हम लोग कमरहट्टी (कोलकाता-58) स्थित अपने-अपने घरों से रवाना हो गए। इस बीच और एक मित्र साथ हो लिए। हम चारों करीब 11 किलोमीटर का फासला तय कर महाजाति सदन पहुंचे। हम चारों किशोरों ने रास्ते में ही तय कर लिया था कि कार्यक्रम के बाद यदि संभव हुआ तो वाजपेयी जी से मिला जाएगा। कार्यक्रम सम्पन्न होने के बाद हम बाहर उनके निकलने का इंतजार करते रहे।''

उन्होंने कहा कि उन दिनों सुरक्षा का कोई खास ताम-झाम नहीं था। हमने अपनी कार उनकी गाड़ी के थोड़ा पीछे लगा दी। हालांकि वाजपेयी जी महाजाति सदन के सामने ही श्री घनश्याम बेरीवाल के मकान में ही रुके थे। पर उस समय हमें इस बारे मे कोई जानकारी नहीं थी। ट्रैफिक के कारण हमारी कार थोड़ी पीछे रह गई। खैर थोड़ी खोज-बीन के बाद हम बेरीवाल जी के मकान के सामने पहुंचे। हमने अंदाजा लगाया कि वाजपेयी जी इसी मकान में ही रुके हैं।

अग्रवाल ने कहा, '' थोड़ी सी झिझक के बाद हम लोगों ने मकान में प्रवेश किया। दोपहर का समय था। आश्चर्य की बात थी कि कहीं कोई नहीं मिला, जिससे हम पूछते। पर वाजपेयी जी से मिलने के अपने इरादे पर हम अडिग थे। हिम्मत करके दूसरा तल्ला (फर्स्ट फ्लोर) पार कर तीसरे तल्ले पर पहुंचे। अभी हम लोग चौथे तल्ले पर जाने की सोच ही रहे थे कि ऊपर से एक सज्जन उतरते नजर आये। उन्होंने पूछा-कहां जायेंगे। एक मित्र ने कहा-वाजपेयी जी से मिलने। उन्होंने कहा- नहीं मिल सकते। अभी वे आराम कर रहे हैं। थोड़ी देर तक अनुनय-विनय होती रही। कहा गया- हम लोग बड़ी दूर से आए हैं। उन्हें परेशान नहीं करेंगे। सिर्फ दूर से देख कर चले जाएंगे।''

उन्होंने कहा कि पर उन सज्जन के कानों पर जूं तक नहीं रेंगी। लम्बे तथा अच्छी कद-काठी वाले ये सज्जन किसी भी तरह हमें जाने नहीं दे रहे थे। अब तक मैं चुपचाप था। वैसे भी चारों में मैं सबसे छोटा था। जब मैंने देखा कि अब हमें वापस जाना ही होगा, तो मैंने एक आखिरी कोशिश की। भाषण देने की आदत स्कूल में वाद-विवाद प्रतियोगिताओं के दौरान बन चुकी थी। मैंने ऊंची आवाज में कहना शुरू किया- आप जैसे लोग ही अनावश्यक रूप से लोकप्रिय नेताओं व जनता के बीच दीवार बन कर खड़े हो जाते हैं। इससे न सिर्फ नेता की छवि खराब होती है, बल्कि पार्टी भी कमजोर होती है। और न जाने क्या-क्या।

सीताराम अग्रवाल कहते हैं, '' इस बीच ऊपर से आवाज आती है-इन बालकों को ऊपर आने दो। मैंने पीछे घूम कर देखा तो स्वयं वाजपेयी जी चौथे तल्ले के बरामदे में रेलिंग पर झुके हुए बोल रहे थे। और वे मेरी ओर ही देख रहे थे। शायद वे बहुत देर से हमारी बातें सुन रहे थे। मैं तो खुशी के मारे ऐसा उछला, मानो कारू का खजाना मिल गया हो। सभी का एक ही हाल था। अब उस सज्जन को हमें पहुंचाने के सिवा चारा नहीं था। इसके बाद वाजपेयी जी ने पिता जैसा स्नेह देते हुए हमारा परिचय पूछा। प्यार भरी बातें की। बातों का सिलसिला चलता ही रहा।''

उन्होंने कहा कि इस बीच एक डाक्टर साहब आए और उन्हें समय का ध्यान दिलाते हुए दवा लेने का आग्रह किया। वाजपेयी जी ने एक तरह से झिड़कते हुए कहा-तुम्हें दवा की पड़ी है। देखो ये बच्चे कितनी दूर से मुझसे मिलने आए हैं। वे बेचारे चले गए। कहां तो हम सिर्फ दो- तीन मिनट के लिए मिलने आये थे, वहां करीब आधा घंटा हो चला था। पता नहीं ये सिलसिला और कितनी देर चलता, पर कई बुलावा आने के बाद इच्छा न रहते हुए भी मैं उठ खड़ा हुआ और चरण स्पर्श करते हुए जाने की आज्ञा मांगी। और हम सभी चल पड़े। मुझे ऐसा आभास हो रहा था कि वे अभी और बतरस के मूड में थे। शायद राजनीतिक बातों से इतर हम लोगों के साथ वार्तालाप उन्हें आनन्दित कर रहा था। सो- ऐसे थे कवि ह्रदय हमारे-आपके सबके वाजपेयी जी।


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