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न्याय और लोककल्याण को बढ़ावा देना ही आदर्श नेतृत्व की पहचान: पीएम मोदी

Date : 11-Jun-2026

 11 जून। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने गुरुवार को सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर एक संस्कृत सुभाषितम साझा करते हुए जनप्रतिनिधियों के कर्तव्यों और आदर्श नेतृत्व की अवधारणा को रेखांकित किया। उन्होंने श्लोक ‘चातुर्वर्ण्यस्य धर्माश्च रक्षितव्या महीक्षिता। धर्मसंकररक्षा च राज्ञां धर्म: सनातन:॥’ साझा किया। इस श्लोक का हिंदी अर्थ बताते हुए कहा गया कि जनप्रतिनिधि का कर्तव्य है कि वह सेवा, समर्पण और कुशल नेतृत्व के माध्यम से समाज के सभी वर्गों में न्याय, समरसता और लोककल्याण को बढ़ावा दे तथा सामाजिक व्यवस्था, नैतिक मूल्यों और धर्म की रक्षा करे। वास्तव में यही आदर्श नेतृत्व की पहचान है।

जनसेवा को बताया सुशासन की कसौटी

इससे पहले 10 जून को प्रधानमंत्री मोदी ने एक अन्य सुभाषित साझा करते हुए कहा था कि जनसेवा ही सुशासन की सबसे बड़ी कसौटी है। उन्होंने लिखा था कि विनम्रता, समर्पण और कर्तव्यनिष्ठा के साथ निरंतर कार्य करने वाला व्यक्ति ही जनविश्वास अर्जित करता है। इस दौरान उन्होंने संस्कृत श्लोक ‘सदानुरक्तप्रकृतिः प्रजापालनतत्परः। विनीतात्मा हि नृपतिर्भूयसी श्रियमश्नुते॥’ भी साझा किया था।

जनहित और सुशासन पर दिया था संदेश

प्रधानमंत्री द्वारा साझा किए गए इस श्लोक का हिंदी अर्थ है कि जो जनप्रतिनिधि सेवा को अपना धर्म मानकर निरंतर जनहित में कार्य करता है, सुशासन के माध्यम से जनता की सुरक्षा और कल्याण सुनिश्चित करता है तथा विनम्रता और संयम के साथ विकास को लक्ष्य बनाकर समाज की उन्नति के लिए समर्पित रहता है, वास्तव में वही जनविश्वास, यश और समृद्धि प्राप्त करता है।

12 वर्ष पूरे होने पर साझा किया था विशेष सुभाषित

प्रधानमंत्री मोदी ने 9 जून को केंद्र सरकार में अपने नेतृत्व के 12 वर्ष पूरे होने के अवसर पर देशवासियों के साथ एक विशेष ‘सुभाषितम’ संदेश भी साझा किया था। इस संदेश में उन्होंने ‘राष्ट्र प्रथम’ और जनसेवा के प्रति अपनी प्रतिबद्धता दोहराते हुए कहा था कि राष्ट्र निर्माण के लिए समर्पण और सेवाभाव हमारी अमूल्य पूंजी रही है। बीते 12 वर्षों में ‘सबका साथ, सबका विकास’ की भावना से प्रेरित निरंतर प्रयासों के कारण ही आज भारत एक सशक्त और आत्मनिर्भर राष्ट्र बनने की दिशा में तेजी से आगे बढ़ रहा है।

श्रेष्ठ कर्म और लोककल्याण का संदेश

इस अवसर पर प्रधानमंत्री ने संस्कृत श्लोक ‘आर्यकर्मणि रज्यन्ते भूतिकर्माणि कुर्वते। हितं च नाभ्यसूयन्ति स वै पण्डित उच्यते॥’ भी साझा किया था। इस श्लोक का हिंदी अर्थ है कि जो व्यक्ति सदैव श्रेष्ठ एवं सदाचारपूर्ण कर्मों में संलग्न रहता है, निरंतर उन्नति और लोककल्याण के कार्य करता है तथा दूसरों के हितकारी विचारों और कार्यों का सम्मान करता है, उनसे द्वेष नहीं करता, वही वास्तव में बुद्धिमान कहलाता है। 


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