हिंदू पंचांग के अनुसार, कार्तिक माह की पूर्णिमा तिथि को कार्तिक पूर्णिमा के रूप में मनाया जाता है। यह दिन धार्मिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है और भारत के विभिन्न हिस्सों में इसे बड़े उत्साह और श्रद्धा के साथ मनाया जाता है। यह त्यौहार भगवान कार्तिकेय के जन्म का स्मरण करता है, जिन्हें भारत में मुरुगन, स्कंद, सुब्रमण्य और अन्य कई नामों से जाना जाता है। भगवान कार्तिकेय, भगवान शिव और देवी पार्वती के पुत्र हैं।
इस दिन को विशेष रूप से “देव दीपावली” के नाम से भी जाना जाता है, खासकर वाराणसी जैसे प्रमुख तीर्थस्थलों में। मान्यता है कि इस दिन भगवान शिव, विष्णु, ब्रह्मा और अन्य देवताओं की पूजा की जाती है और उनके सम्मान में दीप जलाए जाते हैं।
कार्तिक पूर्णिमा का महत्व
कार्तिक पूर्णिमा अंधकार पर प्रकाश की विजय का प्रतीक है। आध्यात्मिक दृष्टि से यह दिन बहुत महत्वपूर्ण माना जाता है। ऐसा विश्वास है कि इस दिन पूजा करने से न केवल आत्मा शुद्ध होती है, बल्कि आंतरिक शांति और ज्ञान की प्राप्ति भी होती है।
हिंदू धार्मिक ग्रंथों में इस दिन सूर्योदय से पहले स्नान करने का विशेष महत्व बताया गया है। कार्तिक पूर्णिमा पर गंगा स्नान की परंपरा भी प्रचलित है। ऐसा माना जाता है कि गंगा में स्नान करने से शरीर और आत्मा दोनों शुद्ध होते हैं।
यह पर्व कृषि से भी जुड़ा हुआ है। कटाई के मौसम में इसे किसानों द्वारा अच्छी फसल के लिए भगवान को धन्यवाद देने के रूप में भी मनाया जाता है।
कार्तिक पूर्णिमा से जुड़ी पौराणिक कथा
राजर्षि सत्यव्रत किसी समय नदी में स्नान और ध्यान कर रहे थे। इसी दौरान उन्होंने भगवान भास्कर को अर्घ्य देने के लिए जल अपने अंजलि में लिया। तभी उनकी हथेली में एक छोटी मछली आकर बोली, “हे राजर्षि! कृपया मेरे प्राणों की रक्षा करें। मुझे बड़ी मछलियों से डर लगता है।”
राजर्षि ने उस मछली को अपने कमंडल में रख लिया। लेकिन कुछ समय बाद मछली इतनी बड़ी हो गई कि कमंडल में रहना असंभव हो गया। उन्होंने इसे मटके में रखा, पर रात्रि में मछली पुनः बड़ी हो गई। अंततः राजर्षि ने मछली को सरोवर में छोड़ दिया और सोचने लगे कि यह कोई सामान्य मछली नहीं है।
तभी भगवान विष्णु मत्स्य रूप में प्रकट हुए और बोले, “हे राजर्षि! असुर हयग्रीव ने वेदों की चोरी कर ली है और समुद्र में छिपा लिया है। इससे समस्त लोक त्राहिमाम में है। सृष्टि की रक्षा और असुर हयग्रीव का वध करने के लिए मैं मत्स्य रूप में अवतरित हुआ हूं। आज से सातवें दिन जलप्रलय से भूमंडल जल में डूब जाएगा।”
