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दीर्घकालिक तनाव हृदयरोग, मधुमेह और कैंसर का बना कारण

Date : 21-Feb-2024

 वाराणसी। हाल के वर्षों में, दीर्घकालिक मनोवैज्ञानिक तनाव हृदय रोग, मधुमेह और कैंसर जैसे विभिन्न रोगों के कारक के रूप में उभरा है। लेकिन अब तक दीर्घकालिक मनोवैज्ञानिक तनाव का सम्बन्ध कैंसर की प्रगति में अच्छी तरह से स्थापित नहीं हुई है। इस दिशा में, बीएचयू के वैज्ञानिकों ने तनाव के साथ ट्यूमर को बढ़ावा देने वाली क्रिया विधि को पता लगाने की दिशा में बड़ी सफलता हासिल की है।

शोध दल के अध्ययन और प्रयोग एपिनेफ्रिन या एड्रिनल जो कि एक महत्वपूर्ण तनाव मध्यस्थ है कि टी सेल लिंफोमा को बढ़ने में महत्वपूर्ण भूमिका होने के संकेत देते हैं। शोध टीम के अनुसार टी सेल लिंफोमा हेमटोलॉजिकल मूल का एक दुर्लभ कैंसर है। शोध टीम ने टी सेल लिंफोमा-असर वाले चूहों के रक्त में एपिनेफ्रिन व एड्रेनालाईन का स्तर काफी बढ़ा पाया है। साथ ही साथ टी लिंफोमा कोशिकाओं में एड्रीनर्जिक रिसेप्टर्स मूलतः बी2 और बी 3 रिसेप्टर्स की अधिकता को भी नोट किया है।

दिलचस्प बात यह है कि जब टीम ने टी सेल लिंफोमा वाले चूहों में प्रोप्रानोलॉल (जो की एक बीटा-एड्रेनर्जिक रिसेप्टर्स प्रतिरोधी है) अकेले एवं सिस्प्लेटिन (एक एंटी कैंसर दवा) के साथ दिया तो पाया की प्रोप्रानोलॉल अकेले ट्यूमर के बढ़ाव को घटाने में सक्षम था। साथ ही साथ प्रोप्रानोलॉल सिस्प्लेटिन की ट्यूमर विरोधी क्षमता को भी बढ़ाया। इसके अलावा प्रोप्रानोलोल ने कैंसर वाले चूहों की दबी हुई प्रतिरक्षा को पुनः सक्रिय किया। कैंसर के कारण हुए यकृत और गुर्दे पर हुए विषाक्त प्रभाव को भी कम कर दिया। यह अध्ययन सहायक प्रोफेसर जूलॉजी विभाग, विज्ञान संस्थान डॉ. अजय कुमार, बीएचयू की देखरेख में हुई है।

यह अध्ययन राजन कुमार तिवारी की पीएचडी थीसिस का भी हिस्सा हैं। टीम में राजन कुमार तिवारी, शिव गोविंद रावत, डॉ. प्रदीप कुमार जैसवारा, डॉ. विशाल कुमार गुप्ता और डॉ. अजय कुमार शामिल रहे।

यह पूरा अध्ययन दो भागों में प्रकाशित

पूरा अध्ययन दो भागों में प्रकाशित किया गया है। पहले भाग में, एपीनेफ्रीन की टी सेल लिंफोमा को बढ़ाने वाली क्षमता का अन्वेषण किया गया है। जांच का यह हिस्सा अंतरराष्ट्रीय स्तर की प्रतिष्ठित Q1 जर्नल, केमिको-बायोलॉजिकल इंटरेक्शन्स जर्नल में प्रकाशित हुआ है। दूसरे भाग में, टीम ने बीटा-अड्रेनर्जीक रिसेप्टर्स के प्रतिरोधी, प्रोप्रनोलो को कैंसर चिकित्स्कीय प्रभाव का परीक्षण किया गया है। यह भाग अंतर्राष्ट्रीय ख्याति प्राप्त Q1 जर्नल इंटरनेशनल इम्यूनोफार्माकोलॉजी में प्रकाशित हुआ है।


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