भारत में पिछले कुछ वर्षों से "आत्मनिर्भर भारत" (Self-Reliant India) की बात लगातार हो रही है, और यह केवल एक राजनीतिक नारा नहीं बल्कि एक मजबूत और प्रगति-उन्मुख दृष्टिकोण है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा 12 मई 2020 को COVID-19 महामारी के दौरान यह विचार प्रकट किया गया था, जब उन्होंने देशवासियों से आत्मनिर्भर बनने का आह्वान किया।

आत्मनिर्भरता का अर्थ केवल आर्थिक या उत्पादन क्षमता में वृद्धि से नहीं है, बल्कि इसका व्यापक अर्थ है कि एक देश व राज्य अपनी आवश्यकताओं के लिए बाहरी दुनिया पर कम से कम निर्भर रहे। इसका उद्देश्य घरेलू उद्योगों, कृषि, और तकनीकी क्षेत्र में सुधार लाना है, ताकि भारतीय उत्पाद और सेवाएं वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धी बन सकें और देश व राज्यों के नागरिकों को रोजगार, स्वावलंबन और आर्थिक सुरक्षा मिल सके|

आत्मनिर्भरता की बात को साक्षात् रूप से मुख्यमंत्री श्री विष्णु देव साय प्रदेश की महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाने के सार्थक प्रयास कर रहे हैं। जिला मुख्यालय जशपुर से लगभग 60 किलोमीटर की दूरी पर स्थित कुनकुरी विकासखंड में ग्राम बोडाटांगरी को शासकीय टसर विस्तार केन्द्र वर्ष-2001-02 स्थापित किया गया है।
रेशम विभाग के द्वारा शासकीय टसर विस्तार केन्द्र बोडाटांगरी अन्तर्गत 20 हेक्टयर वनभूमि में साजा, अर्जुना पौधरोपण कराया गया है। यह क्षेत्र आदिवासी बाहुल्य क्षेत्र है। इसी ग्राम के 20 हितग्राही टसर कीट पालन कर अपना स्थिति सुधार कर अच्छा आमदनी प्राप्त कर रहे हैं। वर्ष 2023-24 में ग्राम बोडाटोंगरीं सी.एस.बी. मधुपुर जिला देवघर (झारखण्ड) के द्वारा यहाँ के हितग्राहियों को अच्छे स्व. डिम्ब समूह प्रदाय किया जाता है, जिससे यहाँ के हितग्राहियों को अच्छा आमदनी तथा उत्पादन भी भारी मात्रा में होता है। आदिवासियों के उत्थान एवं रोजगार मूलक कार्य हेतु रेशम उत्पादन का कार्य प्रारंभ किया गया है। जिससे जुडकर आज एक अच्छी जिन्दगी जी रहे है।
जिला प्रशासन के मार्गदर्शन में ग्राम बोड़ाटोगरी के निवासी श्रीमती बसंती मिंज द्वारा कोसा पालन कार्य किया जाता है। उन्होंने बताया कि वर्तमान में कोसा उत्पादन कार्य में सतुष्ट है एवं गरीब परिस्थिति व पारिवारिक जिम्मेदारियों के कारण अपना सपना पूरा नहीं कर पाते थे छोटी-मोटी जरूरतों पर दूसरों के आगे हाथ फैलाना पड़ता था, कृषि भूमि भी कम होने के कारण अनाज का भी उत्पादन ज्यादा नहीं हो पाता था। परन्तु रेशम विभाग से जुड़कर उनकी आर्थिक स्थिति मजबुत हो गई है खेती किसानी के अलावा अतिरिक्त आय अर्जित कर पाते हैं। बंसती ने बताया कि उनकी वार्षिक आय लगभग 01 लाख तक हो जाती है। जिससे अपने बच्चों को अच्छे स्कूलों में शिक्षा दिला रहे तथा अपनी छोटी-मोटी जरूरतों को पूरा कर पा रही है। उन्होने बताया कि रेशम विभाग अधिकारी द्वारा रोजगार हेतु अथक प्रयास कर उन्नत किस्म के स्व.डिम्ब समूह प्रदाय करते है। ताकि हमारी आमदनी अधिक से अधिक हो तथा आर्थिक स्थिति पर सुधार हो सके और जिस प्रकार से विभाग की पहल से हमारे जैसे दूरवर्ती क्षेत्र में बसे लोगों तक शासन का योजना का लाभ पहुंचा रहे हैं निश्चित तौर पर आने वाले पीढ़ियों को रोजगार हेतु किसी अन्यत्र राज्य में पलायन नहीं करना पडे़गा। स्वरोजगार का माध्यम रेशम विभाग से बेहतर कोई नही होगा।
सहायक संचालक रेशम जशपुर ने बताया कि जिले के सभी कोसा कृमिपालक को अच्छी आमदनी हो सके इसके लिए विभाग द्वारा निरंतर प्रयास किया जाता है। इसके लिए अन्य राज्यों से अण्डे मंगाकर वितरण किया गया है। वर्तमान में इस पहल से जिले के सभी कृमिपालकों को अच्छी उन्नत कोसा बीज अन्य राज्यों से मंगाकर लगभग 1 लाख डीएफएल्स वितरण कराया गया है। जिससे लगभग 60-70 लाख कोसा उत्पादन होने की सम्भावना है।
कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।
मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते सङ्गोऽस्त्वकर्मणि॥
भगवत गीता में एक यह प्रसिद्ध श्लोक हैं , इसका अर्थ है, "हे धनंजय! (अर्जुन) केवल कर्म पर ही तुम्हारा अधिकार है, कर्म के फलों में नहीं। इसलिए कर्म करते रहो और फल की चिंता मत करों"
छत्तीसगढ़ के वर्तमान मुख्यमंत्री श्री विष्णु देव साइन ने इस श्लोक को चरितार्थ कर लिया है। नई सरकार के कमान संभालते ही मुख्यमंत्री श्री विष्णु देव साय ने अपना कर्म करते हुए राज्य की अर्थव्यवस्था को सुदृढ़ बनाने के साथ-साथ वनाचलों में विकास की किरणें फैलाने और प्रशासन में सुधार लाने का संकल्प लिया है। उन्होंने राज्य की समग्र प्रगति के लिए ठोस कदम उठाने की आवश्यकता पर जोर दिया, जिससे हर वर्ग को लाभ मिल सके। मुख्यमंत्री ने आश्वासन दिया कि उनकी सरकार ग्रामीण और आदिवासी क्षेत्रों में बुनियादी सुविधाओं का विकास करेगी, ताकि वहां के निवासियों का जीवन स्तर बेहतर हो सके। मुख्यमंत्री ने यह भी कहा कि राज्य में शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार के क्षेत्रों में विशेष ध्यान दिया जाएगा, जिससे युवाओं को बेहतर अवसर मिल सकें। उनकी प्राथमिकता होगी कि सभी योजनाओं का लाभ सीधे लोगों तक पहुंचे और राज्य का समग्र विकास हो।
प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी ने कहा था कि युवाओं के भविष्य के साथ खिलवाड़ करने वाले बख्शे नहीं जाएंगे। मुख्यमंत्री ने मोदी की इस गारंटी पर त्वरित अमल करते हुए पिछले सरकार के कार्यकाल में राज्य सिविल सेवा परीक्षा (पीएससी) 2021 में हुई गडबड़ी और अनियमितता की जांच का काम सीबीआई को सौंप दिया है। राज्य सरकार ने जनहित को देखते हुए महादेव सट्टा एप केस भी सीबीआई को सौंपा। इसके अलावा बेमेतरा जिले के बिरनपुर प्रकरण की भी सीबीआई जांच कराने का भी निर्णय लिया है। विष्णु देव सरकार ने मोदी की गारंटी के अनुरूप श्री रामलला दर्शन योजना शुरूआत की है। भारत में अपने आप में यह एक अनूठी और अनुकरणीय योजना है। इस योजना में श्रद्धालुओं को सरकारी खर्च में अयोध्या धाम का दर्शन कराया जा रहा है। प्रभु श्री राम का ननिहाल छत्तीसगढ़ माना गया है। इस कारण वे हमारे लिए और अधिक पूजनीय है। अपने भांचा राम के दर्शन के लिए छत्तीसगढ़ का हर नागरिक उत्सुक है।
आज वैश्विक स्तर पर भारत के विरुद्ध कई झूठे विमर्श गढ़े जा रहे हैं। हाल में इस प्रक्रिया ने कुछ रफ्तार पकड़ी है। विमर्श के माध्यम से जनता के मानस को प्रभावित करने का प्रयास किया जाता है। विमर्श सत्य, अर्द्धसत्य अथवा झूठ भी हो सकता है। यह, विमर्श गढ़ने वाले व्यक्ति द्वारा किन उद्देश्यों की प्राप्ति हेतु इसे गढ़ा जा रहा है, पर निर्भर करता है। उदाहरण के लिए कुछ देशों के सम्बंध में प्रायः कुछ विमर्श गढ़े गए हैं जैसे, अमेरिका के बारे में कहा जाता है कि वहां सामान्यतः व्यापार पर अधिक ध्यान दिया जाता है। ब्रिटेन के बारे में धारणा है कि वहां राजनीति पर अधिक ध्यान दिया जाता है। जर्मनी के सम्बंध में कहा जाता है कि वहां युद्ध कौशल के बारे में अधिक चर्चा की जाती है। इसी प्रकार, भारत के बारे में पूरे विश्व में धारणा है कि यहां आध्यात्मिकता की पराकाष्ठा रही है। परंतु, अब पूरे विश्व में विशेष रूप से भारत के संदर्भ में पुराने विमर्श टूट रहे हैं और नित नए विमर्श गढ़े जा रहे हैं। भारत चूंकि, हाल ही के समय में वैश्विक स्तर पर एक मजबूत आर्थिक ताकत बन कर उभर रहा है, भारत की यह प्रगति कुछ देशों को रास नहीं आ रही है एवं ये देश भारत के सम्बंध में झूठे विमर्श गढ़ रहे हैं।
भारत की प्रगति को रोकने, कम करने अथवा प्रभावित करने के उद्देश्य से दरअसल, चार शक्तियों ने हाथ मिला लिए हैं। ये चार शक्तियां हैं, कट्टरवादी इस्लाम, प्रसारवादी चर्च, सांस्कृतिक मार्क्सवाद एवं वैश्विक बाजार शक्तियां। हालांकि उक्त चारों शक्तियों की अन्य देशों में आपसी लड़ाई है परंतु भारत के मामले में यह एक हो गई हैं और भारत में यह आपस में मिलकर भारत के हितों के विरुद्ध कार्य करती हुई दिखाई दे रही हैं।
पश्चिमी एवं भारतीय विचारधारा में जमीन आसमान का अंतर है। जैसे भारत में व्यापार के मामले में “शुभ-लाभ” की विचारधारा पर कार्य किया जाता है। परंतु, पश्चिमी देशों में पूंजीवाद का अनुसरण करते हुए व्यापार में अधिक से अधिक लाभ अर्जित करने का प्रयास किया जाता है इसके लिए चाहे सामान्यजन को कितना ही नुक्सान क्यों नहीं उठाना पड़े, इसे “शुद्ध लाभ” की संज्ञा दी जाती है। और, इसी प्रकार, वामपंथी विचारधारा में अप्रत्यक्ष रूप से “शून्य लाभ” के लिए कार्य होता दिखाई देता है जिससे अंततः व्यापार ही समाप्त होने की ओर आगे बढ़ जाता है। पश्चिमी एवं अन्य कई देशों में आज पूंजीवाद की विचारधारा को ही अपना लिया गया है। जिसके परिणामस्वरूप केवल लाभ को बढ़ाने के उद्देश्य से व्यापार करने वाली अमेरिकी कम्पनियों की सम्पत्ति आज कई देशों के सकल घरेलू उत्पाद से भी अधिक हो गई है।
सूचना प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में कार्य करने वाली माइक्रोसॉफ्ट नामक बहुराष्ट्रीय कम्पनी की सम्पत्ति 3.126 लाख करोड़ अमेरिकी डॉलर की हो गई है। एप्पल नामक बहुराष्ट्रीय कम्पनी की सम्पत्ति 2.65 लाख करोड़ अमेरिकी डॉलर की है। एमेजोन नामक बहुराष्ट्रीय कम्पनी की सम्पत्ति 1.87 लाख करोड़ अमेरिकी डॉलर की है। इसी प्रकार, मेटा नामक अमेरिकी कम्पनी की सम्पत्ति 1.23 लाख करोड़ अमेरिकी डॉलर की है। अमेरिका ने अधिकतम लाभ अर्जन को मुख्य उद्देश्य मानकर पूंजीवाद को बढ़ावा दिया जिससे आज अमेरिका कई अरबपति बहुराष्ट्रीय कम्पनियों का स्वर्ग बन गया है और आज इन अमेरिकी बहुराष्ट्रीय कम्पनियों की सम्पत्ति कई देशों के सकल घरेलू उत्पाद से भी अधिक हो गई है।
ब्रिटेन, कनाडा, फ्रान्स आदि जैसी विश्व की बड़ी अर्थव्यवस्थाओं का सकल घरेलू उत्पाद लगभग 3 लाख करोड़ अमेरिकी डॉलर के आसपास है। भारतीय परम्परा में व्यापार में शुभ लाभ इसलिए कहा गया है क्योंकि भारतीय शास्त्रों में वर्णन मिलता है कि व्यापार में होने वाले लाभ को 7 हिस्सों में बांटकर समाज में अति पिछड़ा वर्ग की मदद हेतु भी एक हिस्सा उपलब्ध कराया जाना चाहिए ताकि अति गरीब वर्ग भूखा न रहे। यह संस्कार भारतीय नागरिकों में “वसुधैव क़ुटुम्बकम” की भावना का संचार करते है। इसी कारण से आज विश्व भर में फैले आतंकवाद से निपटने में केवल भारतीय सनातन संस्कृति ही सक्षम दिखाई देती है। अतः भारतीय सनातन संस्कृति को पूरे विश्व के हितार्थ समस्त देशों को अपनाना चाहिए, आज यह विमर्श खड़ा किए जाने की सख्त आवश्यकता है।
पश्चिमी देशों के नागरिकों के लक्ष्य भौतिक (जड़) हो रहे हैं और चेतना कहीं पीछे छूट रही है। केवल आर्थिक विकास अर्थात अर्थ का अर्जन करना ही जैसे इस जीवन का मुख्य उद्देश्य हो। परंतु, भारत के नागरिक सनातन संस्कृति का अनुसरण करते हुए समाज के प्रति अपनी जिम्मेदारी के अहसास के प्रति भी सजग दिखाई देते हैं, अर्थात उनमें चेतना के दर्शन भी होते हैं। इसीलिए भारत ने विश्व में दिलों को जीता है एवं कभी भी किसी देश पर आक्रमण करते हुए उनकी भूमि के एक इंच हिस्से पर भी अपना कब्जा नहीं जमाया है। साथ ही, भारत में “संयुक्त परिवार ही भारतीय नागरिकों के सुख का आधार है।”
पश्चिमी देशों में तो आज संयुक्त परिवार दिखाई ही नहीं देते हैं और इसके दुष्परिणाम के रूप में वहां पर सामाजिक ताना-बाना छिन्न-भिन्न होता दिखाई दे रहा है। इन देशों में तलाक की दर बहुत अधिक है और इन देशों में नागरिक एक जीवन में 7 शादियां तक कर लेते हैं जबकि भारत में शादी को एक पवित्र बंधन मानते हुए पति-पत्नी के लिए विवाह नामक संस्था को 7 जन्मों का बंधन माना जाता है। एक से अधिक शादियां करने के चलते पश्चिमी देशों में बच्चों को अपने पिता के बारे में ही जानकारी नहीं रह पाती है। बुजुर्ग दम्पति अपने अंतिम समय पर बहुत पीड़ादायी जीवन जीने को मजबूर हैं। बच्चों में हिंसा की प्रवृति बढ़ रही है एवं छोटे-छोटे बच्चे डिप्रेशन का शिकार हो रहे हैं। उक्त प्रकार की कई सामाजिक बुराइयों ने इन देशों में अपना घर बना लिया है। “भारत ने विश्व का दिल जीता है” एवं “भारतीय संयुक्त परिवार ही सुख का आधार है”, “सेवा कार्य भारतीय नागरिकों के डीएनए में है” जैसे विमर्श आज हम भारतीयों को गढ़ने की जरूरत है।
पश्चिमी विचारधारा में उत्पादों के अधिकतम उपभोग को जगह दी गई है। आज को अच्छी तरह से जी लें, कल किसने देखा है, यह पश्चिमी सोच, चर्च की प्रेरणा एवं भौतिकवाद पर आधारित है। इस्लाम एवं ईसाईयत में पुनर्जन्म पर विश्वास नहीं किया जाता है। जो कुछ भी करना है वह इसी जन्म में करना है। इसके ठीक विपरीत भारतीय सनातन संस्कृति पुनर्जन्म में विश्वास करती है इससे भारतीय नागरिकों द्वारा उपभोग में संयम बरता जाता है एवं उत्पादन में बहुलता होने की विचारधारा पर कार्य करते हुए दिखाई देते हैं। ईश्वर से प्रार्थना की जाती है कि “प्रभु इतना दीजिए कि मैं भी भूखा ना रहूं और अन्य कोई भी भूखा ना सोय”, यह भारतीय विचारधारा है। हिंदू एक जीवन पद्धति है इसे धर्म से नहीं जोड़ा जाना चाहिए। धर्म का आश्य अपने कर्तव्यों का निर्वहन करने से है। जबकि कई बार हिंदू शब्द को धर्म से जोड़ दिया जाता है और हिंदू को एक अलग धर्म मान लिया जाता है। हिंदू राष्ट्र भारत की संकल्पना है।
अतः आज यदि कुछ विदेशी शक्तियां भारत के विरुद्ध झूठे विमर्श गढ़ने में व्यस्त हैं तो भारत को भी अपने बारे में सत्य पर आधारित विमर्श गढ़ने की महती आवश्यकता है। भारतीय सनातन संस्कृति तो इस धरा पर उपस्थित समस्त जीवों के भले की बात करती है, इसीलिए भारत में पर्वत, नदी, पेड़, पौधों, जंतुओं आदि को भी पूजा जाता है। भारतीय संस्कृति में हिंसा के लिए कोई जगह नहीं है। परंतु, दुर्भाग्य से आज पूरे विश्व में हिंसा व्याप्त है। इस हिंसा को केवल और केवल भारतीय सनातन संस्कृति के संस्कारों को अपना कर ही रोका जा सकता है। भारत के बारे में वास्तविक एवं सत्य पर आधारित विमर्श को गढ़कर, इस विमर्श के माध्यम से विश्व के अन्य देशों के नागरिकों को भारतीय सनातन संस्कृति की ओर आकर्षित किया जा सकता है।
लेखक:- प्रहलाद सबनानी
भगवान् राम जब शबरी से मिलने के लिए गए, तो उन्होंने देखा कि वहां के सारे फूल खिले हुए हैं, उनमें से एक भी कुम्हलाया नहीं है तथा प्रत्येक से मधुर भीनी-भीनी सुगंध निकल रही है | उन्होंने जिज्ञासावश शबरी से इनका करण पूछा, तो वह बोली, “भगवन, इसके पीछे एक घटना है| यहां बहुत समय पूर्व मातंग ऋषि का आश्रम था, जहाँ बहुत से ऋषि-मुनि और विद्यार्थी रहा करते थे | एक बार चातुर्मास के समय आश्रम में ईंधन समाप्त- प्राय था | वर्षा प्रारंभ होने के पूर्व ईंधन लाना जरुरी था | प्रमादवश विद्यार्थी लकड़ी लाने नहीं जा रहे थे | तब एक दिन स्वयं वृद्ध मातंग ऋषि अपने कंधे पर कुल्हाड़ी रखकर लकड़ियाँ काटी और उन्हें बांध-बांध कर वे लोग आश्रम की ओर लौटने लगे | हे राम ! वृद्ध आचार्य के शरीर से श्रम-बिंदु निकलने लगे थे | विद्यार्थी भी पसीने से तर- बतर हो गए थे | तब जहाँ-जहाँ वे श्रमबिंदु गिरे थे, वहां-वहां सुंदर फूल खिल उठे, जो बढ़ते-बढ़ते आज सारे वन में फ़ैल गए हैं | यह उनका पुण्य प्रभाव ही है कि वे ज्यों के त्यों बने हुए हैं, कुम्हला नहीं रहे हैं |” तात्पर्य यह कि भली प्रकार से किये गए कार्य मधुर सुगंध देते हैं और मिट्टी पर ही खिलते हैं | श्रमजीवी के शरीर से निकलनेवाला पसीना ही संसार का पोषण करता है और जीवन जीने की अनुकूल स्थिति पैदा करता है |
सपने हों जब हकीकत में बदल,
सीखें वो हर नया हुनर,
उठें कदम, बढ़ाएं हौंसला,
आत्मनिर्भर बनें, हर एक नज़र।
भारत सरकार की एक महत्वपूर्ण योजना लखपति दीदी, जिसका उद्देश्य महिलाओं को आर्थिक रूप से सशक्त बनाना और उन्हें स्वरोजगार के अवसर प्रदान करना है। यह योजना विशेष रूप से ग्रामीण क्षेत्रों की महिलाओं के लिए बनाई गई है, ताकि वे आत्मनिर्भर बन सकें और अपने परिवारों की आर्थिक स्थिति में सुधार कर सकें।
बीते दिनों अपने लखपति दीदी लाभार्थी मनकुंवरी बाई का नाम खूब सुना होगा |आपको बता दे छत्तीसगढ़ मुख्यमंत्री विष्णु देव साय के गृह जिले जशपुर की लखपति दीदी लाभार्थी मनकुंवरी बाई से बीते 2 अक्टूबर को गांधी जंयती के उपलक्ष पर आयोजित पीएम जनमन मेगा इवेंट में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मनकुंवरी बाई ने बात की.
जशपुर जिले में निवासरत विशेष पिछड़ी जनजाति पहाड़ी कोरवा के परिवारों को पीएम जनमन योजना का लाभ दिया जा रहा है. इसी कड़ी में जिले के बगीचा विकासखण्ड के ग्राम कुटमा निवासी मनकुंवारी कृषि कार्य के साथ ही अन्य गतिविधियों में जुड़कर अतिरिक्त आय अर्जित कर रही हैं. मनकुंवारी कृषि कार्य के साथ-साथ बत्तख पालन, तेंदूपत्ता, महुआ, चिरौंजी एवं साल बीज संग्रहण कर बिक्री का कार्य करती हैं|
वैसे लखपति दीदी एक स्वयं सहायता समूह की सदस्य होती है, जिसकी वार्षिक घरेलू आय एक लाख रुपये (1,00,000 रुपये) या उससे अधिक होती है। इस आय की गणना कम से कम चार कृषि मौसमों और/या व्यवसाय चक्रों के लिए की जाती है, जिसमें औसत मासिक आय दस हजार रुपये (10,000 रुपये) से अधिक होती है, ताकि यह टिकाऊ हो सके।
वे समुदाय के लिए प्रेरणास्रोत हैं, न केवल अपनी आय के लिए, बल्कि स्थायी आजीविका पद्धतियों (कृषि या गैर-कृषि या सेवा) को अपनाने, संसाधनों का प्रभावी प्रबंधन करने, तथा एक सभ्य जीवन स्तर प्राप्त करने के माध्यम से अपनी परिवर्तन यात्रा के लिए भी।
एसएचजी समूहों ने सामूहिक कार्रवाई और आपसी सहयोग को बढ़ावा दिया है, साथ ही महत्वपूर्ण वित्तीय साक्षरता, कौशल विकास और आजीविका सहायता के लिए माध्यम के रूप में भी काम किया है। उल्लेखनीय रूप से, फोकस केवल सामाजिक और वित्तीय समावेशन से आगे बढ़कर अब एसएचजी सदस्यों को उद्यमशील उपक्रमों को आगे बढ़ाने के लिए सशक्त बनाने पर केंद्रित है। उनके अंतर्निहित कौशल और क्षमता उन्हें उच्च आय वर्ग की ओर बढ़ने के लिए अच्छी स्थिति में रखती है। सरकार अब इस बदलाव और लखपति दीदी जैसी पहलों का सक्रिय रूप से समर्थन कर रही है।
छत्तीसगढ़ मुख्यमंत्री श्री विष्णु देव साय की पहल पर जिले में महिलाओं को सशक्त और आत्मनिर्भर बनाने के लिए प्रोत्साहित किया जा रहा है | इसी कड़ी में जशपुर कलेक्टर डॉ. रवि मित्तल के मार्गदर्शन में स्थानीय महिलाओं को स्वरोजगार के अवसर प्रदान किए जा रहे हैं। महिलाएं आर्थिक रूप से सशक्त हो इसके लिए स्व सहायता समूह गठित कर विविध गतिविधियों से जोड़कर नए नए रोजगार के अवसर उपलब्ध कराए जा रहे हैं। और जिले के महिला आर्थिक रूप से मजबूत बनकर लखपति दीदी के रूप में जाने जा रहे है।
यह कहानी एक ऐसी महिला की है जो करोड़पति बनने की राह पर अग्रसर है जिसने एक मिसाल कायम किया है और न जाने कितनों को प्रेरित कर रही है। अनिता साहू जशपुर जिले के काँसाबेल विकासखण्ड की नरियाड़ाँढ ग्राम पंचायत प्रगति महिला ग्राम संगठन में नारी शक्ति स्व सहायता समूह की सदस्य है और कल्पना संकुल संगठन चेतना के अंतर्गत एफएलसीआरपी के पद पर बिहान कार्यक्रम से जुड़ी हुई है। आज उद्यमिता विकास के क्षेत्र में इनका नाम सबसे आगे है, अपनी सोच की बदौलत इस मुकाम में पहुंची है। 2016 के सी आरपी राउंड मे समूह से जुड़ी और 2017 मे एफएलसीआरपी बनी। शिक्षक पति अपने अध्यापन कार्य मे वयस्त रहते थे अनीता ने सोचा क्यों नहीं छोटा-मोटा कार्य कर अपनी आय में वृद्धि की जाए, उसने यू ट्यूब देखा और फ्लाई एश ब्रिक्स बनाने का कार्य शुरू करने की सोची । 2017 में बैंक लिंगकिज के माध्यम से 1 लाख रुपये का लोन लिया एवं सीआइएफ से 60 हजार की राशि लेकर करीब डेढ़ लाख में फ्लाई एश ब्रिक्स बनाने का छोटा मशीन खरीदा और बिजनस शुरू किया। आस पास से मांग आने लगी और धीरे धीरे पहचान बनने लगी और लाभ होने लगा। समूह की अन्य 3 दीदियों को कार्य से जोड़ मांग की अधिकता एवं लाभ कमाने लगी और व्यापार मे इनकी सोंच बढ़ने लगी की और ज्यादा उत्पादन किया जाने लगा |
सकारात्मक सोच से अनिता की दशा दिशा बदल गई उसने 15 लाख का लोन लिया। 13 लाख का हीपकों फ्लाई एश ब्रिकक्स मशीन खरीदा 1.5 लाख मे 20 केवी का ट्रांसफार्मर लगाया और उत्पादन शुरू कर दिया। आज के दिनों मे 8 समूह सदस्य 3 पुरुष काम कर रहे हैं हैं और प्रतिदिन 10000 ईट का उत्पादन कर प्रतिदिन खर्च काट कर 10000 रु प्रतिदिन शुद्ध लाभ कमा रह है। महीने में 22-25 दिनों के कार्य से 2.2 लाख से लेकर 2.5 लाख की मासिक आमदनी हो रही है। शुद्ध करीब 10000 का मासिक विद्युत खर्च भी वहन कर रही है। राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन की टीम उनसे हिसाब किताब के बारे में जानकारी लेने गई थी।
शासकीय मांग के अनुसार प्रधानमंत्री आवास निर्माण में 8 इंच एवं 9 इंच ईट की आपूर्ति प्रतिदिन की जा रही है। कच्चा माल (एश) खरसिया रायगढ़ से आता है, हाइवा मे करीब 30 टन, 650 रु प्रति टन के हिसाब से खरीदा जाता है, जो मात्र ढुलाई खर्च होता है एश मुफ़्त मे मिलता है । इसके अतिरिक्त रेत एवं सिमेन्ट भी लगता है और केमिकल भी इस्तेमाल होता है। 1 ईट तैयार करने मे 3.20रु लगता है जो 4 रु से 4.25 रु तक बिकता है और भी तकनीकी पहलू हैं। परंतु यह ईट लोकप्रिय है, इसकी मांग पूर्ति पूरी नहीं हो पा रही है इसलिए प्रतिदिन उत्पादन बढ़ाने की सोंच अनीता साहू ने अपने जहन मे रखा है ।
अनीता साहू की बातों मे मेहनत और आत्मविश्वास की मुस्कान झलक रही थी, बहुत ही शालीनता से अपनी बात मनोरा से भ्रमण करने वाली समूह की दीदियों को बता रही थी । मनोरा की दीदियां भी उत्साहित है और फ्लाई एश ब्रिकक्स का व्यापार करने हेतु उद्योग विभाग से मिलने जा रही है, राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन जिला दल उनका सहयोग कर रहें हैं। अनीता साहू ने जिस तरह की मिसाल प्रस्तुत किया है उस से सभी बहुत प्रेरित है।
