प्रत्येक वर्ष 11 अप्रैल को महान भारतीय समाज सुधारक, क्रांतिकारी विचारक और दार्शनिक महात्मा ज्योतिबा फुले (1827-1890) की जयंती को संपूर्ण राष्ट्र द्वारा 'सामाजिक न्याय दिवस' के रूप में अत्यंत श्रद्धा, गौरव और नई प्रेरणा के साथ मनाया जाता है। उन्हें आधुनिक भारत में स्त्री शिक्षा की सुदृढ़ नींव रखने और सदियों से व्याप्त जातिगत भेदभाव तथा अस्पृश्यता के विरुद्ध सबसे सशक्त एवं तर्कसंगत आवाज़ उठाने वाले 'क्रांतिसूर्य' के रूप में पहचाना जाता है। उनके जीवन को एक ऐसी महान वैचारिक यात्रा के रूप में देखा जाता है, जहाँ मानवता की सेवा को ही ईश्वर की वास्तविक आराधना माना गया। उनके द्वारा प्रतिपादित समानता, बंधुत्व और तर्कवाद के सिद्धांतों ने भारतीय समाज की जड़ता को तोड़ने में ऐतिहासिक भूमिका निभाई। महात्मा फुले के कार्यों को केवल सुधारवादी आंदोलन नहीं, बल्कि एक संपूर्ण 'सांस्कृतिक पुनर्जागरण' के रूप में स्वीकार किया गया है, जिसने शोषितों और वंचितों के भीतर स्वाभिमान की ज्योति प्रज्वलित की।
ऐतिहासिक पृष्ठभूमि की दृष्टि से, ज्योतिबा फुले का जन्म 11 अप्रैल, 1827 को महाराष्ट्र के सातारा जिले में एक माली (फुले) परिवार में हुआ था। उनके द्वारा शिक्षा के महत्व को बहुत कम आयु में ही समझ लिया गया था, किंतु तत्कालीन रूढ़िवादी समाज में शिक्षा प्राप्त करना उनके लिए एक बड़ी चुनौती थी। उनके व्यक्तित्व के विकास में थॉमस पेन की प्रसिद्ध कृति 'राइट्स ऑफ मैन' का गहरा प्रभाव देखा जाता है, जिससे उनके भीतर मानवाधिकारों और न्याय के प्रति एक अटूट संकल्प का उदय हुआ। उनके द्वारा समाज की उन कुरीतियों को बहुत करीब से अनुभव किया गया, जहाँ जन्म के आधार पर मनुष्य का भाग्य और उसका सम्मान निर्धारित किया जाता था। इन्हीं अनुभवों ने उन्हें एक ऐसे मार्ग पर चलने के लिए प्रेरित किया, जहाँ सत्य की खोज ही जीवन का अंतिम लक्ष्य बन गई।
ज्योतिबा फुले के क्रांतिकारी कार्यों में स्त्री शिक्षा के क्षेत्र में किए गए सुधारों को सर्वोच्च स्थान प्रदान किया गया है। उनके द्वारा दृढ़तापूर्वक यह माना गया कि यदि समाज का विकास करना है, तो आधी आबादी का शिक्षित होना अनिवार्य है। इसी महान उद्देश्य की पूर्ति हेतु, उनके द्वारा वर्ष 1848 में पुणे के भिडेवाड़ा में लड़कियों के लिए देश का पहला स्कूल खोला गया। इस साहसिक कदम को तत्कालीन कट्टरपंथी समाज द्वारा घोर विरोध और अपमान का सामना करना पड़ा, किंतु उनके संकल्प को हिलाया नहीं जा सका। उनके द्वारा अपनी धर्मपत्नी माता सावित्रीबाई फुले को स्वयं शिक्षित किया गया और उन्हें देश की पहली महिला शिक्षिका के रूप में तैयार किया गया। सावित्रीबाई द्वारा स्कूल जाते समय लोगों द्वारा फेंके गए पत्थर और कीचड़ को सहन करते हुए भी शिक्षा की लौ को जलाए रखा गया, जो उनके निस्वार्थ सेवा भाव का प्रमाण है।
सामाजिक न्याय के क्षेत्र में उनके द्वारा स्थापित 'सत्यशोधक समाज' (24 सितंबर, 1873) को भारतीय इतिहास की एक युगांतरकारी घटना माना जाता है। इस समाज की स्थापना का मुख्य उद्देश्य दलितों, पिछड़ों और शोषितों को मानसिक तथा सामाजिक दासता से मुक्त कराना था। 'सत्यशोधक समाज' के माध्यम से उनके द्वारा यह संदेश प्रसारित किया गया कि ईश्वर की आराधना के लिए किसी मध्यस्थ (पुरोहित) की आवश्यकता नहीं है और प्रत्येक मनुष्य को अपने अधिकारों के लिए स्वयं जागृत होना होगा। उनके द्वारा आयोजित किए गए विवाह संस्कार (सत्यशोधक विवाह), जो बिना ब्राह्मण और आडंबरों के संपन्न होते थे, ने समाज में एक नई चेतना का संचार किया। इस संगठन को शोषितों के अधिकारों की रक्षा के लिए एक वैचारिक क्रांति और लोकतांत्रिक मूल्यों के सशक्त आधार के रूप में देखा जाता है।
महात्मा फुले की साहित्यिक प्रतिभा को उनकी कालजयी कृति 'गुलामगिरी' (1873) के माध्यम से पहचाना जा सकता है। इस पुस्तक के माध्यम से उनके द्वारा समाज में व्याप्त ऊँच-नीच, पाखंड और अंधविश्वास पर अत्यंत तर्कपूर्ण और तीखा प्रहार किया गया। उनके द्वारा रचित 'शेतकऱ्याचा आसूड' (किसान का कोड़ा) में भारतीय किसानों की दुर्दशा और उनके शोषण के कारणों का गहराई से विश्लेषण किया गया है। उनके साहित्य को केवल शब्द नहीं, बल्कि अन्याय के विरुद्ध एक अमोघ शस्त्र माना जाता है। उनके द्वारा यह सिद्ध किया गया कि 'विद्या बिना मति गई, मति बिना नीति गई'—अर्थात शिक्षा के अभाव में ही मनुष्य का पतन होता है। उनके शब्दों ने करोड़ों मूक लोगों को अपनी पीड़ा व्यक्त करने और अधिकारों की मांग करने का साहस प्रदान किया।
मानवीय गरिमा की पुनर्स्थापना हेतु उनके द्वारा किए गए कार्यों में 'अस्पृश्यता निवारण' के प्रयास अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। उनके द्वारा अपने स्वयं के घर का पानी का टैंक (हौद) अछूतों के लिए खोल दिया गया, जो उस समय के समाज में एक अत्यंत क्रांतिकारी और विद्रोही कार्य था। उनके द्वारा विधवा विवाह का समर्थन किया गया और बाल विवाह जैसी कुप्रथाओं के विरुद्ध निरंतर अभियान चलाए गए। गर्भवती विधवाओं और उनके बच्चों की रक्षा के लिए उनके द्वारा 'बालहत्या प्रतिबंधक गृह' की स्थापना की गई, जो उनके करुणापूर्ण हृदय और व्यावहारिक सुधारवादी सोच का परिचायक है। उनके द्वारा समाज के उन वर्गों को 'महात्मा' की उपाधि से नवाजा गया जिन्होंने स्वयं को मानवीय मूल्यों के लिए समर्पित कर दिया था, और कालांतर में वर्ष 1888 में स्वयं उन्हें एक विशाल जनसभा में 'महात्मा' की उपाधि से अलंकृत किया गया।
वर्तमान आधुनिक समय (वर्ष 2026) के परिप्रेक्ष्य में, महात्मा ज्योतिबा फुले के विचार और भी अधिक प्रासंगिक हो गए हैं। आज जब भारत 'डिजिटल इंडिया' और 'विकसित भारत' के स्वप्न को साकार कर रहा है, तब उनके द्वारा दिए गए "शिक्षा की सार्वभौमिकता" और "सामाजिक समरसता" के सिद्धांत एक मार्गदर्शक ज्योति की भाँति कार्य करते हैं। महिला सशक्तिकरण के क्षेत्र में सरकार द्वारा संचालित अनेक योजनाओं (जैसे 'बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ') का मूल दर्शन महात्मा फुले और सावित्रीबाई फुले के संघर्षों में ही निहित है। उनके द्वारा प्रतिपादित वैज्ञानिक दृष्टिकोण और तर्कवाद को आज के युवाओं के लिए अंधविश्वास से मुक्त होने का एक सशक्त आधार माना जाता है।
विभिन्न शैक्षणिक संस्थानों, विश्वविद्यालयों और सामाजिक संगठनों द्वारा उनकी जयंती पर विशेष संगोष्ठियों, निबंध प्रतियोगिताओं और पुरस्कार वितरण समारोहों का आयोजन किया जाता है। उनके द्वारा स्थापित 'समतामूलक समाज' के स्वप्न को वास्तविक धरातल पर उतारने के लिए सामाजिक न्याय मंत्रालय द्वारा विभिन्न कल्याणकारी योजनाओं का क्रियान्वयन किया जाता है। उनकी प्रतिमाओं पर माल्यार्पण कर समाज के प्रबुद्ध वर्ग द्वारा यह संकल्प लिया जाता है कि शिक्षा के प्रकाश को समाज के अंतिम व्यक्ति तक पहुँचाया जाएगा। उनके जीवन से यह प्रेरणा प्राप्त की जाती है कि संसाधनों का अभाव या समाज का विरोध कभी भी बड़े लक्ष्यों की प्राप्ति में बाधक नहीं बन सकता यदि संकल्प में सच्चाई हो।
सामाजिक और सांस्कृतिक दृष्टि से महात्मा फुले को एक ऐसे युगपुरुष के रूप में याद किया जाता है, जिन्होंने डॉ. बी.आर. अंबेडकर जैसे महान चिंतकों के लिए एक वैचारिक पृष्ठभूमि तैयार की। बाबासाहेब अंबेडकर स्वयं ज्योतिबा फुले को अपना 'गुरु' मानते थे। उनके द्वारा शुरू किया गया आंदोलन आज भी करोड़ों लोगों के लिए आत्मसम्मान और समानता की लड़ाई का प्रेरणा स्रोत बना हुआ है। उनके द्वारा रचित गीतों (पोवाड़ा) और लेखों के माध्यम से आज भी ग्रामीण क्षेत्रों में सामाजिक चेतना जागृत की जा रही है। उनके पैतृक आवास 'फुले वाडा' (पुणे) को एक राष्ट्रीय स्मारक के रूप में संरक्षित किया गया है, जो प्रत्येक आगंतुक को उनके महान संघर्ष की याद दिलाता है।
