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दिल्ली के सफदरजंग अस्पताल में 11 साल के बच्चे का सफल किडनी ट्रांसप्लांट

Date : 25-Nov-2025

नई दिल्ली, 25 नवंबर। वर्धंमान महावीर मेडिकल कॉलेज( वीएमएमसी) और सफदरजंग अस्पताल ने किडनी ट्रांसप्लांट कार्यक्रम के तहत एक नया मुकाम हासिल किया है। सफदरजंग अस्पताल अब बच्चों में किडनी ट्रांसप्लांट करने वाला केन्द्र सरकार का पहला अस्पताल बन गया है। 19 नवंबर को अस्पताल के डॉक्टरों ने उत्तर प्रदेश के रहने वाले 11 साल के बच्चे का सफल किडनी ट्रांसप्लांट कर उसे नई जिंदगी दी। बच्चे को बाइलेटरल हाइपो-डिसप्लास्टिक किडनी नामक एक दुर्लभ बीमारी के कारण उसकी दोनों किडनी फेल हो चुकी थी। बच्चे की मां ने अपनी किडनी दी जिसके सफल प्रत्यारोपण के कारण उसे नई जिंदगी मिली।

सफदरजंग अस्पताल में मंगलवार को पत्रकार वार्ता में बाल विभाग की टीम का नेतृत्व पीडियाट्रिक नेफ्रोलॉजी विभाग के डायरेक्टर डॉ. शोभा शर्मा ने बताया कि यह बीमारी लगभग डेढ़ वर्ष पहले पता चली, जब बच्चे को गंभीर हालत में सफदरजंग अस्पताल के बाल विभाग में लाया गया था और उसे कार्डियक अरेस्ट के बाद बचाया गया। उस समय किडनी फेल्योर की पहचान हुई थी और तब से बच्चा पीडियाट्रिक नेफ्रोलॉजी की देखरेख में नियमित डायलिसिस पर था।

सर्जिकल ट्रांसप्लांट टीम का नेतृत्व करने वाले यूरोलॉजी एवं रीनल ट्रांसप्लांट के विभागाध्यक्ष डॉ. पवन वासुदेवा ने बताया कि पेडियाट्रिक किडनी ट्रांसप्लांट एक बड़ी सर्जिकल चुनौती होती है और यह वयस्क ट्रांसप्लांट से कई मामलों में अलग होती है जिसमें बच्चे में बड़ी रक्त वाहिकाओं से डोनर किडनी को जोड़ना तथा बच्चे के शरीर में वयस्क किडनी के लिए पर्याप्त स्थान बनाना शामिल होता है।

इस मामले में डोनर बच्चे की 35 वर्षीय मां थीं। उन्होंने खुशी व्यक्त की कि प्रत्यारोपित किडनी ने अच्छी तरह कार्य शुरू कर दिया है और किडनी की कार्यक्षमता सामान्य हो चुकी है। बच्चा अब डायलिसिस से मुक्त है, उसकी रिकवरी सफल रही और उसे जल्द ही छुट्टी दे दी जाएगी।वीएमसीसी के निर्देशक डॉ. संदीप बंसल ने कहा कि सफदरजंग अस्पताल बिना किसी भेदभाव के सभी नागरिकों को मुफ्त और उच्च गुणवत्ता वाली स्वास्थ्य सेवाएं उपलब्ध कराने के लिए प्रतिबद्ध है। यह देखना संतोषजनक है कि उत्तर प्रदेश के सुल्तानपुर से आए एक दिहाड़ी मजदूर परिवार का बच्चा अब डायलिसिस से मुक्त होकर स्वस्थ है।

यह उस परिवार के लिए एक सपना पूरा होने जैसा है, क्योंकि निजी क्षेत्र में ऐसी सर्जरी का खर्च लगभग 15 लाख रुपये होता।

मेडिकल सुपरिटेंडेंट डॉ. चारु बंबा ने बताया कि अस्पताल बच्चे को इम्यूनोसप्रेसिव दवाइयाँ, जो महंगी होती हैं और किडनी ट्रांसप्लांट मरीजों के लिए जीवनभर जरूरी होती हैं, मुफ्त में उपलब्ध कराएगा।

सर्जिकल ट्रांसप्लांट टीम का नेतृत्व डॉ. पवन वासुदेवा ने किया, जिसमें डॉ. नीरज कुमार, प्रोफेसर यूरोलॉजी भी शामिल थे।

बाल विभाग की टीम का नेतृत्व डायरेक्टर प्रोफेसर और इंचार्ज, पीडियाट्रिक नेफ्रोलॉजी, डॉ. शोभा शर्मा ने किया, जिसमें डॉ. श्रीनिवासवरदान, असिस्टेंट प्रोफेसर तथा प्रोफेसर और हेड ऑफ पेडियाट्रिक्स डॉ. प्रदीप के देबाता के निर्देशन में कार्य हुआ।

एनेस्थीसिया टीम का नेतृत्व डॉ. सुशील ने किया, जिसमें डॉ. ममता और डॉ. सोनाली शामिल थीं।


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