वाराणसी,01 फरवरी । उत्तर प्रदेश की धार्मिक नगरी वाराणसी (काशी)में माघ मास के प्रमुख स्नान पर्व माघ पूर्णिमा पर रविवार को लाखों श्रद्धालुओं ने पुण्य सलिला गंगा नदी में पूरे आस्था के साथ पुण्य की डुबकी लगाई। स्नान ध्यान के बाद गंगाघाटों पर श्रद्धालुओं ने दानपुण्य कर श्री काशी विश्वनाथ दरबार में हाजिरी लगाई। महास्नान पर्व पर गंगा किनारे सुरक्षा का व्यापक प्रबन्ध किया गया। प्रयागराज से पलट प्रवाह (काशी आ रहे श्रद्धालुओं)की सुरक्षा को लेकर पूरे शहर में जगह-जगह बैरिकेडिंग और यातायात प्रतिबंधित किया है। पवित्र गंगा नदी में विशेष नौकाओं पर सवार जल पुलिस,पीएसी,गोताखोरों के साथ एनडीआरएफ के जवान चक्रमण कर रहे है।
महास्नान पर्व पर प्रमुख गंगाघाटों पर लाखों श्रद्धालु शनिवार शाम को ही पहुंच गए थे। भोर में लगभग तीन बजे से गंगा में डुबकी लगाने का सिलसिला शुरू हो गया। शहरी और आसपास के श्रद्धालु गंगाघाटों की ओर भोर से ही नंगे पाव पहुंचते रहे। माघी पूर्णिमा पर खास संयोग में आस्था की डुबकी लगाने के लिए श्रद्धालुओं में होड़ मची रही। गंगा स्नान के लिए प्राचीन दशाश्वमेध घाट, शीतलाघाट, पंचगंगा, अहिल्याबाई, अस्सी, तुलसीघाट, खिड़किया घाट, भैेसासुर,सामने घाट पर सर्वाधिक भीड़ रही।
उधर,संत रविदास के जन्मस्थली सीरगोवर्धनपुर में आयोजित जयन्ती समारोह में भाग लेने आये लाखों रैदासी श्रद्धालुओं ने सामने घाट,अस्सी घाट पर आस्था की डुबकी लगाई। उनके स्नान ध्यान का सिलसिला दिन चढ़ने तक चलता रहा ।
गौरतलब हो माघी पूर्णिमा पर गंगा सहित पवित्र नदियों में स्नान करने से श्रद्धालुओं को माघ मास के स्नान के बराबर पुण्यफल मिलता है। सनातन धर्म में मान्यता है माघ पूर्णिमा पर भगवान विष्णु स्वयं गंगाजल में निवास करते हैं। इसलिए गंगाजल में स्नान और आचमन करना फलदायी होता है। वाराणसी स्थित सम्पूर्णानन्द संस्कृत विश्वविद्यालय,के कुलपति प्रो. बिहारी लाल शर्मा के अनुसार माघी पूर्णिमा का पर्व धार्मिक आस्था, सांस्कृतिक चेतना तथा सामाजिक समरसता का एक अत्यन्त महत्वपूर्ण एवं पुण्यदायक पर्व है। यह पर्व माघ मास के पुण्यकाल में सम्पन्न होता है, जिसे शास्त्रों में ‘माघमासो महापुण्यप्रदायकः’ कहकर विशेष महिमा प्रदान की गई है। कुलपति प्रो. शर्मा ने कहा कि माघी पूर्णिमा न केवल गंगा-स्नान, दान, जप, तप एवं व्रत का विशिष्ट अवसर है, अपितु यह पर्व भारतीय लोकजीवन में करुणा, दया, सेवा एवं समत्व की भावना को सुदृढ़ करता है। धर्मशास्त्रों के अनुसार माघी पूर्णिमा को किया गया स्नान-दान सहस्रगुणित फल प्रदान करता है। विशेषतः अन्नदान, वस्त्रदान, तिलदान, घृतदान एवं स्वर्णदान का अत्यधिक महत्त्व बताया गया है। यह पर्व साधना, संयम एवं आत्मानुशासन की परम्परा को पुष्ट करता है।
ज्योतिषविद रविन्द्र तिवारी बताते है कि सनातन धर्म में माघ की पूर्णिमा के नहान का विशेष महत्व होता है। जो श्रद्धालु प्रयागराज संगम तट पर स्नान नहीं कर पाते हैं, वो काशी में स्नान का दान पुण्य करते हैं। हिन्दू पंचांग के अनुसार यह पूर्णिमा चंद्रमास का आखिरी दिन होता है। सनातन धर्म में पौष पूर्णिमा से शुरू होकर माघ पूर्णिमा तक पवित्र नदियों में स्नान की परम्परा है।
