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लखनऊ में पांडुलिपियों की महत्ता पर 13 मई को होगा राष्ट्रीय विमर्श

Date : 11-May-2026

 लखनऊ, 11 मई । ऐतिहासिक और सांस्कृतिक धरोहर को सहेजने की दिशा में उत्तर प्रदेश राजकीय अभिलेखागार अपना 77वां स्थापना दिवस मनाने जा रहा है। इस अवसर पर 13 मई को लखनऊ स्थित शहीद स्मृति भवन में 'भारतीय ज्ञान परम्परा में पाण्डुलिपियों का महत्व एवं भावी पीढ़ी के लिए उपयोगिता’ विषय पर राष्ट्रीय संगोष्ठी और अभिलेख प्रदर्शनी का आयोजन किया जाएगा। इस कार्यक्रम में इतिहास, संस्कृति और अभिलेख संरक्षण से जुड़े कई विद्वान अपने विचार साझा करेंगे।

कार्यक्रम के मुख्य अतिथि ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती भाषा विश्वविद्यालय, लखनऊ के कुलपति प्रो. अजय तनेजा होंगे, जबकि विशिष्ट अतिथि शकुन्तला मिश्रा पुनर्वास विश्वविद्यालय के सेवानिवृत्त अधिष्ठाता प्रो. अविनाश चन्द्र मिश्रा रहेंगे। संगोष्ठी में बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय, लखनऊ विश्वविद्यालय, बाबा साहेब भीमराव अंबेडकर विश्वविद्यालय और अन्य संस्थानों के विशेषज्ञ पाण्डुलिपियों, अभिलेखों और भारतीय ज्ञान परंपरा पर अपने व्याख्यान देंगे।

पांडुलिपियों और इतिहास पर होगा विशेष मंथन

संगोष्ठी के पहले सत्र में पाली एवं बौद्ध अध्ययन, राजनीति विज्ञान और इतिहास विषयों के विशेषज्ञ भारतीय ज्ञान परंपरा और पाण्डुलिपियों की उपयोगिता पर चर्चा करेंगे। वहीं दूसरे सत्र में प्राचीन इतिहास, संस्कृत और आधुनिक इतिहास के विद्वान अभिलेखों के संरक्षण और शोध में उनकी भूमिका पर अपने विचार रखेंगे। कार्यक्रम के अंत में प्रतिभागियों को प्रमाण पत्र भी वितरित किए जाएंगे।

पर्यटन एवं संस्कृति मंत्री जयवीर सिंह ने साेमवार काे बताया कि उत्तर प्रदेश राजकीय अभिलेखागार की स्थापना 2 मई 1949 को इलाहाबाद में ‘सेंट्रल रिकॉर्ड्स ऑफिस’ के रूप में की गई थी। बाद में वर्ष 1973 में इसे लखनऊ स्थित स्थायी भवन में स्थानांतरित किया गया। वर्तमान में यह संस्था संस्कृति विभाग के अधीन कार्य करते हुए प्रदेश की अभिलेखीय विरासत के संरक्षण, प्रबंधन और उपयोग के लिए लगातार प्रयास कर रही है।

उन्होंने बताया अभिलेखागार का मुख्य उद्देश्य प्रदेश के विभिन्न विभागों और जिला कार्यालयों में सुरक्षित ऐतिहासिक अभिलेखों को संरक्षित करना और उन्हें शोध एवं जनहित के लिए उपयोगी बनाना है। इसके तहत 30 वर्ष पुराने महत्वपूर्ण अभिलेखों का संग्रह, उनका वैज्ञानिक संरक्षण, सूचीकरण और शोधार्थियों को आवश्यक सुविधाएं उपलब्ध कराई जाती हैं। साथ ही दुर्लभ पाण्डुलिपियों, पुस्तकों और दस्तावेजों को संरक्षित करने का कार्य भी किया जाता है।

इसके अलावा अभिलेखों के प्रति जनजागरूकता बढ़ाने के लिए समय-समय पर अभिलेख प्रदर्शनियों और प्रशिक्षण कार्यक्रमों का आयोजन भी किया जाता है। उन्होंने बताया इस तरह के आयोजन नई पीढ़ी को अपनी ऐतिहासिक विरासत और भारतीय ज्ञान परंपरा से जोड़ने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं।


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