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आधुनिकता की चकाचौंध में बदला दीपावली का महत्व

Date : 30-Oct-2024

 हमीरपुर। दीपावली के इस पर्व पर सबसे अधिक महत्व दीपों का होता है। यह त्यौहार दीपों का ही त्यौहार है। परंतु आज के इस युग में दीपों की सुध कोई नहीं लेता। बाजारों में बिकने वाली रंग बिरंगी, मोमबत्ती, झालरों, चाइनीस दीपों, रेडीमेड दीप आदि ने दीपों के त्यौहार को बेरंग करके रंग दिया।

आधुनिकता की चकाचौंध में लोग अपनी संस्कृति को लगभग भूल ही चुके है। इसका खामियाजा इन मिट्टी के दीप बनाने वाले लोगों को चुकाना पड़ा। जिनका मुख्य व्यवसाय ही मिट्टी के दीपक बनाना था। आज यह भुखमरी की कगार पर पहुंच चुके हैं। वह अपने व परिवार के भरण पोषण के लिए सरकार की ओर टकटकी भरी निगाह से देख रहे हैं। हिंदू धर्म में दीपावली पर्व का बड़ा ही महत्व है। दीपावली हिंदू धर्म के मुख्य त्यौहार में से एक है। पुराने काल के अनुसार जब पुरुषोत्तम भगवान राम रावण का वध करके अयोध्या वापस लौटे थे। तब अवधवासियों ने अपने-अपने घरों की साफ सफाई कर अपने प्रत्येक घर मुहल्ले में दीपों को जलाया था। दीपों की जगमगाहट ऐसी लगी रही थी। जैसे मानो दीपों की अवली हो, जिसे देखकर भगवान राम ने इस त्यौहार को दीपावली कहकर संबोधित किया था। दीपावली यानी दीपों की अवली अर्थात च्दीपों का त्यौहारज् तब से लेकर अब तक दीपावली का त्योहार लगातार मनाया जाता है परंतु आधुनिकता के इस दौर में दीपों के इस त्यौहार का रूप रंग दोनों ही बदल गए। आधुनिकता के इस दौर में दीपों के स्थान पर मोमबत्तियां, चाइनीस दीपक आदि ने ले लिया है। जिस कारण दीपावली का महत्व ही बदल गया है।

आधुनिकता के दौर में अब बदल गए दीयें के त्योहार के रंग

आधुनिकता के इस दौर में दीपों के स्थान पर मोमबत्तियां, चाइनीस दीपक आदि ने ले लिया है। जिस कारण दीपावली का महत्व ही बदल गया है। प्रत्येक घरों में दीपावली पर्व पर मिट्टी के दीपकों में तेल या घी भरकर अपने घर के प्रत्येक कोने आंगन छतों आदि पर जलाया जाता था। जिससे नकारात्मक शक्तियां भय खाकर वहां से भाग जाती थी, और दीपों की ऐसी श्रृंखला जगमगाती थी मानो कि भगवान राम आज ही अयोध्या आए हो। आधुनिकता ने त्योहार के रंग को तो फीका किया ही है। सैकड़ो लोगों की रोजी-रोटी भी छीन ली है।

मिट्टी के दीयें बनाने वालों को नहीं मिल रहे खरीददार

मिट्टी के दीपक बनाकर अपना व परिवार का भरण पोषण करने वाले सैकड़ो परिवारों से उनकी रोजी-रोटी छीन ली। प्रजापति समाज के लोग दीपावली पर्व का इंतजार करते थे और लगभग दो माह पहले से ही वह स्वयं और उनके परिवार के सदस्य दीपक बनाना प्रारंभ कर देते थे। परंतु आज के इस दौर में दीपक को खरीदने के लिए खरीददार भी नहीं मिल रहे हैं। पहले जहां पर दीपक बनाकर पूरे साल के लिए अपने परिवार की रोजी-रोटी की व्यवस्था कर लेते थे। वहीं आज के दौर में उनका मेहनताना भी नहीं निकल रहा है।


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