मंदिर श्रृंखला :- श्री भरत मंदिर
Date : 20-Jan-2025
श्री भरत मंदिर, ऋषिकेश का धार्मिक और ऐतिहासिक महत्व अत्यधिक है। यह प्राचीन मंदिर स्कंद पुराण के केदारखंड, श्रीमद्भागवत, वामन पुराण, और नरसिंह पुराण में वर्णित है। मंदिर का इतिहास ऋषिकेश के इतिहास के साथ जुड़ा हुआ है, और यह स्थान धार्मिक दृष्टि से अत्यंत पवित्र माना जाता है।
"ऋषिकेश" शब्द "हृषिक" और "ईश" से मिलकर बना है। "हृषिक" का अर्थ है "इंद्रियाँ", और "ईश" का अर्थ है "स्वामी"। इसका अर्थ है वह स्वामी जिसने अपनी इंद्रियों पर विजय प्राप्त की हो, जैसे रैभ्य ऋषि ने भगवान विष्णु की पूजा करके अपनी इंद्रियों पर नियंत्रण पाया और उन्हें प्राप्त किया।
यह स्थान अग्निदेव से जुड़ी एक अन्य कथा से भी प्रसिद्ध है। कथानुसार, यहाँ भयंकर अग्नि भड़की थी और भगवान शंकर ने क्रोधित होकर अग्निदेव को श्राप दिया था। बाद में अग्निदेव ने यहाँ प्रायश्चित के रूप में तपस्या की, जिससे इस स्थान को "अग्नि तीर्थ" के नाम से भी जाना जाता है।
इतिहास और धार्मिक महत्व
ऋषिकेश का नाम रैभ्य ऋषि की तपस्या से जुड़ा हुआ है। भगवान विष्णु ने रैभ्य ऋषि और पंडित सोम शर्मा की कठोर तपस्या से प्रसन्न होकर उन्हें दर्शन दिए और वरदान दिया कि यहाँ उनका वास रहेगा। भगवान ने कहा, "तुमने अपनी इंद्रियों पर विजय प्राप्त की है, इसलिए इस स्थान को हृषिकेश कहा जाएगा और मैं कलियुग में भरत के नाम से जाना जाऊँगा। जो भी यहाँ गंगा स्नान करेगा और मेरे दर्शन करेगा, उसे मुक्ति मिलेगी।"
यह मंदिर लगभग 789 ई. में श्री आदि शंकराचार्य द्वारा पुनः स्थापित किया गया था। उन्होंने इस मंदिर में भगवान हृषिकेश नारायण भरत की शालिग्राम शिला से बनी मूर्ति की प्रतिष्ठापना की थी। तभी से हर वर्ष बसंत पंचमी के दिन भगवान की मूर्ति को मायाकुंड में गंगा स्नान के लिए ले जाया जाता है और पूरे शहर में जुलूस के रूप में घुमाया जाता है। साथ ही, अक्षय तृतीया के दिन 108 परिक्रमा करने से भक्तों की मनोकामनाएं पूरी होती हैं और उन्हें भगवान बद्रीनारायण के दर्शन का पुण्य प्राप्त होता है।
विस्तृत धार्मिक संदर्भ
मंदिर की महिमा केदारखंड में विस्तार से वर्णित है। भगवान विष्णु ने रैभ्य ऋषि से कहा था कि वह हृषिकेश के रूप में सदैव इस स्थान पर निवास करेंगे। इस क्षेत्र को प्राचीन काल में "कुब्जाम्रिक" (झुका हुआ आम का पेड़) के नाम से भी जाना जाता था, क्योंकि रैभ्य ऋषि की तपस्या के समय भगवान विष्णु आम के पेड़ पर प्रकट हुए थे।
पौराणिक कथाओं के अनुसार, रैभ्य ऋषि के पुत्र अर्वावसु ने अपनी तपस्या से भारद्वाज ऋषि को पुनः जीवित किया था। श्रीमद्भागवत में वर्णन है कि राजा दुष्यंत के पुत्र भरत ने यहाँ पर कई अश्वमेध यज्ञ और राजसूय यज्ञ किए थे।
ऋषिकेश को देवताओं का निवास स्थान और ऋषियों की तपस्या भूमि माना जाता है। यह स्थान गंगा के तट पर स्थित है, जो इसे एक विशेष आध्यात्मिक शक्ति प्रदान करता है। यहाँ भगवान विष्णु की पूजा से जुड़ी अनेक कथाएँ और घटनाएँ प्रचलित हैं।
इस स्थान की महिमा महाभारत में भी गाई गई है, और इसे हजारों गायों के दान के बराबर माना गया है। बद्रिकाश्रम की यात्रा पर जाते समय भक्त प्रह्लाद ने यहाँ भगवान हृषिकेश नारायण की पूजा की थी।
वर्तमान स्थिति
आजकल भी ऋषिकेश का धार्मिक महत्व अत्यधिक है। यह स्थान हर साल हजारों तीर्थयात्रियों और भक्तों के आगमन से भरा रहता है। समय-समय पर इस मंदिर का पुनर्निर्माण और जीर्णोद्धार भी हुआ है। मंदिर का इतिहास और यहाँ की धार्मिक महत्ता इस स्थान को एक अति पवित्र और आकर्षक तीर्थस्थल बनाती है, जहां आज भी लोग भगवान विष्णु की पूजा और ध्यान करते हैं।
इस मंदिर और स्थान की कथा आज भी भक्तों के लिए एक प्रेरणा और मोक्ष की राह दिखाने वाली है।