इन दिनों ग्रामीण क्षेत्रों में रबी की फसलों की कटाई शुरू हो चुकी है। फसल बुआई व कटाई भारतीय ग्रामीण व कृषि संस्कृति में एक उत्सव व त्यौहार की तरह होता है लेकिन देखने में आता है कि वर्तमान में लोग छोटी छोटी बातों पर विवाद कर लेते हैं और वह भी कृषि कार्य के लिए एक खेत में से दूसरे खेत में जाने जैसी सामान्य गतिविधि में विवाद होता है। इस समय में प्रतिवर्ष ग्रामीण क्षेत्रों में कृषि कार्य के समय एक खेत से दूसरे खेत में जाने के लिए मार्गों(रास्तों) को लेकर अक्सर ग्रामीण क्षेत्रों में किसानों के बीच रास्ते के मामले में विवाद बढ़ जाते हैं। यह देखने में आया है कि ग्रामीण भारत में हर पांच आपराधिक घटनाओं में से तीन आपराधिक घटनाएं रास्ते व कृषि भूमि के विवाद से संबंधित होती है। लेकिन हर अपराध को पुलिस व न्यायपालिका सामान्य घटना मानकर उसपर कार्यवाही करते है ना की मूल समस्या में जाकर न्याय करें व सरकार को उचित दिशानिर्देश भी दे। यहां एक समस्या यह भी है कि कृषि, कृषि व्यवस्था व राजस्व जैसे विषय संविधान के अंतर्गत राज्य सूची में आते हैं। इसलिए हर राज्य ने इन विषयों में अपने अपने अनुसार विधि बनाई हुई है। लेकिन यह समस्या भारत के अधिकांश ग्रामीण क्षेत्रों में आसानी से देखी जा सकती हैं। ये विवाद बहुत बार खूनी संघर्ष का रूप ले लेते हैं और कितनी ही हत्याएं ग्रामीण क्षेत्रों में रास्तों व जमीन के विवाद को लेकर हो जाती है।
कृषि कार्य के समय रास्तों के विवादों में सरकार उचित ध्यान दे।
अधिकांश राज्यों व अपराध के राष्ट्रीय आंकड़ों में रास्तों के मामलों में छोटे मोटे विवादों की तो कोई निश्चित गिनती ही नहीं है। शुरुआत में रास्तों से संबंधित विवाद सामान्य दिखते हैं लेकिन आगे चलकर ये विवाद बड़ी घटना का रूप ले लेते हैं और फिर अंत में अपराध बन जाते हैं। ऐसे में राजस्व विभाग व कृषि मामलों से जुड़े जिम्मेदार अधिकारियों को इस मामले में व फसल बुआई व कटाई के समय ऐसे मामलों को लेकर विशेष सतर्कता व ध्यान देना चाहिए। यदि उचित हो तो राज्य सरकारों व राजस्व विभाग को भू- राजस्व संहिता में भी उचित संशोधन व बदलाव करना चाहिए। कृषि कार्य के दौरान किसान व कृषि मशीनों के स्वतंत्र आवागमन पर एक राष्ट्रीय आदेश व नीति निर्धारित की जाना चाहिए। क्योंकि यह एक गंभीर व बड़ी ग्रामीण जनता के अधिकारों से जुड़ी समस्या है। यह समस्या सिर्फ एक राज्य में ही नहीं बल्कि देश के अन्य कृषि प्रधान राज्यों में भी बड़े स्तर पर घटित होती हैं। राष्ट्रीय स्तर पर इस तरह के विवादों के समाधान के लिए कोई एक स्पष्ट नीति व विधान नहीं है। यहां तक कि राष्ट्रीय अपराध आंकड़ों में भी इस तरह के अपराध व घटना पर कोई स्पष्ट शोध नहीं हुआ है। यहां तक कि विधानसभाओं व संसद में भी इस तरह की समस्या पर कोई गंभीर चर्चा करते हुए नहीं देखा गया है।
वैसे अधिकांश राज्यों ने भू राजस्व संहिता कानूनों में जरूर रास्तों के संबंध में प्रावधान किए हैं लेकिन धरातल पर उसका कोई प्रभाव नहीं है। राजस्व के बड़े अधिकारी ग्रामीण क्षेत्रों में कम ही जाते हैं तथा इस तरह के विवाद पर अपना निर्णय व आदेश पटवारी की रिपोर्ट पर ही देते हैं जो कि अधिकांश समय संदिग्ध रहती हैं। वहीं वरिष्ठ व बड़े राजस्व अधिकारी इस समस्या पर कम ही ध्यान दे पाते है क्योंकि उन्हें अधिकांश समय राजनीतिक दलों की सरकारी प्राथमिकताओं वाले कार्य पहले करने होते हैं। एक विडंबना यह भी है कि सरकारें इस समस्या को न्यायालय का कार्य मानती है वहीं व्यवहार व दंड न्यायालय इस तरह के विवादों को राजस्व न्यायालय के पास भेज देती है। जिससे कि पीड़ित किसान सरकारों, राजस्व विभाग व न्यायालयों के चक्कर काटते काटते इतना पीड़ित व परेशान हो जाता है कि वह अंत में बड़ा अपराध तक कर बैठता है। जिसमें हत्या, आपराधिक मानववध, आत्महत्या, गंभीर अपराध आदि जैसी अपराध की घटनाएं हो जाती है।
पंचायती राज आने के बाद ग्रामीण भारत में रास्तों से संबंधित विवादों के निपटारे के लिए पंचायत स्तर पर कुछ समितियां बनाई जाती है लेकिन उनकी बात का प्रभाव इस तरह के पक्षकारों पर नहीं के बराबर रहता है। ये समितियां व ग्रामीण न्यायालय अब तक गाँवों में प्रभावी व शक्तिशाली नहीं है। जिससे कि शहरी क्षेत्र में पीड़ितों को जाना पड़ता है और वहां तक जाते जाते न्याय मिलने में बहुत देर हो जाती है।
अब जबकि हमने विकसित भारत @2047 का लक्ष्य निश्चित कर लिया है जो कि ग्रामीण भारत में शांति स्थापित करें बगैर विकसित भारत का लक्ष्य प्राप्त नहीं माना जाऐगा। ऐसे में भारतीय ग्रामीण समाज व सरकारों को भी इस गंभीर विषय पर भी विशेष ध्यान देना होगा तथा इस तरह के विवादों के समाधान के लिए एक राष्ट्रव्यापी नीति व विधान बनाना होगा। ग्रामीण व सामाजिक न्याय की दृष्टि से यह भी बहुत जरूरी कार्य है। कृषक समाज को भी आपसी सहयोग व प्रेम बनाये रखना चाहिए तथा इस तरह के छोटे मामलों में धन व समय खराब नहीं करना चाहिए। जिससे कि कृषि व ग्रामीण क्षेत्रों में शांति से कृषि कार्य हो व ग्रामीण समाज शांतिपूर्वक रहे। ऐसे विवाद कम होने से पुलिस विभाग व न्यायपालिका पर भी कार्य का दबाव कम होगा। वहीं विकसित ग्रामीण भारत की गौरवशाली परंपरा व संस्कृति पुनः अपने गौरव को प्राप्त करेगी।
लेखक - भूपेन्द्रसिंह परिहार
