प्रात: काल सम्राट पुष्यमित्र के अश्वमेध की पूर्णाहुति हो चुकी थी | रात को अतिथियों के सत्कार में नृत्योत्सव था | जब यज्ञ के ब्रम्हा महर्षि पतंजलि उसमें उपस्थित हुए, उनके शिष्य चैत्र के मन में गुरु के व्यवहार के औचित्य के विषय में शंकाशूल चुभ गया | उस दिन से उसका मन महाभाष्य और योगसूत्रों के अध्ययन में नहीं रमा | अंत में एक दिन जब महर्षि चित्तवृत्ति- निरोध के साधनों पर प्रवचन कर रहे थे, चैत्र ने प्रासंगिक प्रश्न किया, “भगवन् ! क्या नृत्य गीत और रास-रंग भी चित्तवृति-निरोध में सहायक है ?”
पारदर्शी पतंजलि साभिप्राय मुसकराये और बोले, “वत्स ! वास्तव में तुम्हारा प्रश्न तो यह है कि क्या उस रात मेरा सम्राट के नृत्योत्सव में सम्मिलित होना संयम-व्रत के विरुद्ध नहीं था ? संयम के सच्चे अर्थ को तुम नहीं समझे | सुनो, आत्मा का स्वरूप है ‘रस’-रसो वै स:’ | उस रस को परिशुद्ध और अविकृत रखना ही संयम है | विकृति की आशंका से रस-विमुख होना ऐसा ही है, जैसे कोई गृहिणी भीखारियों के भय से खेती करना छोड़ दे | यह संयम नहीं, पलायन है- आत्मघात का दूसरा रूप है | आत्मा को रस-वर्जिंत बनाने का प्रयत्न ऐसा ही भ्रमपूर्ण है, जैसे जल को तरलता से अथवा अग्नि को ऊष्मा से वियुक्त करने का प्रयास |अतएव इस भ्रम में कभी न फंसो |”
