कलकत्ते में एक नाग महाशय रहते थे ,वे दया की मूर्ति के रूप में विख्यात थे | उनके घर के सामने से मछुए यदि मछली लेकर निकलते थे , तो वे उनसे सारी मछलियाँ खरीद लेते और फिर उनको तालाब में डाल देते | एक दिन एक सर्प उनके बगीचे में आ गया | पत्नी डर गयी और उनको पुकार कर कहने लगी –“बगीचे में काला साँप हैं , लाठी लेकर इधर आओ |”
नाग महाशय खाली हाथ बाहर आये | साँप को देखकर बोले –“जंगल का सर्प किसी को हानि नहीं पहुँचाता | यह तो मन का सर्प है जो मनुष्य को मार डालता हैं |”
वे सर्प के कुछ और निकट आये और बोले –“हे देव ! आपको देखकर लोग डर रहे हैं | कृपा करके आप यहाँ से पधारे |”
नाग महाशय बाहर को निकले , तो नाग सर्प भी उनके पीछे –पीछे निकल जंगल में प्रविष्ट हो गया |
