शारदीय नवरात्रि का आरंभ 22 सितंबर से हो चुका है, और आज, यानी 23 सितंबर को इस पावन पर्व का दूसरा दिन है। यह दिन मां दुर्गा के दूसरे स्वरूप – मां ब्रह्मचारिणी को समर्पित है। मां ब्रह्मचारिणी को तप और साधना की देवी माना जाता है। इनकी आराधना से जीवन में संयम, आत्मबल और सफलता प्राप्त होती है, साथ ही कुंडली में मौजूद मंगल दोष का भी निवारण होता है।
पूजन के दौरान मां ब्रह्मचारिणी की कथा का पाठ अवश्य करना चाहिए। यह न केवल आध्यात्मिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है, बल्कि जीवन को सकारात्मक दिशा देने में भी सहायक है। आइए जानें मां ब्रह्मचारिणी की प्रेरणादायक कथा।
मां ब्रह्मचारिणी की कथा
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, देवी ब्रह्मचारिणी का जन्म राजा हिमालय और रानी मेना की पुत्री के रूप में हुआ था। बाल्यकाल से ही उनमें अध्यात्म और भक्ति की गहरी रुचि थी। उन्होंने भगवान शिव को पति रूप में प्राप्त करने का निश्चय किया और इस लक्ष्य को पाने के लिए उन्होंने कठोर तपस्या का मार्ग चुना।
हजारों वर्षों तक उन्होंने केवल फल-फूल खाकर जीवन व्यतीत किया। फिर कई वर्षों तक केवल जड़ी-बूटियों पर ही निर्भर रहीं। इसके बाद टूटे हुए बेलपत्रों का सेवन करते हुए उन्होंने तप जारी रखा। अंत में, उन्होंने अन्न और जल का भी त्याग कर दिया और पूर्ण समर्पण के साथ भगवान शिव की उपासना करती रहीं।
उनकी इस कठिन साधना से प्रसन्न होकर देवताओं और सप्तऋषियों ने उन्हें आशीर्वाद दिया और "अपर्णा" नाम से पुकारा। अंततः उन्हें भगवान शिव का साथ प्राप्त हुआ और उनकी तपस्या सफल हुई।
इस कथा से क्या सीख मिलती है?
मां ब्रह्मचारिणी की कथा यह संदेश देती है कि जीवन में चाहे कितनी भी कठिनाइयाँ क्यों न आएं, हमें धैर्य और संयम बनाए रखना चाहिए। कठोर परिश्रम, संकल्प और आस्था के बल पर हर मनोकामना पूर्ण हो सकती है।
नवरात्रि के इस दिव्य अवसर पर मां ब्रह्मचारिणी की पूजा और उनकी कथा का पाठ करने से व्यक्ति के भीतर की नकारात्मकता दूर होती है और आत्मबल का विकास होता है।
