पंडित मदन मोहन मालवीय: एक महान राष्ट्रभक्त और शिक्षाविद् | The Voice TV

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पंडित मदन मोहन मालवीय: एक महान राष्ट्रभक्त और शिक्षाविद्

Date : 12-Nov-2025
पंडित मदन मोहन मालवीय का जन्म 25 दिसंबर 1861 को हुआ था। अपने पिता से उन्हें वाक्पटुता और अपनी धर्मपरायण माता से उद्देश्य निष्ठा और आत्मा की शुद्धता प्राप्त हुई। अपने माता-पिता की ही नहीं, बल्कि भारत माता की सेवा में भी वह सच्चे सपूत साबित हुए। विशाल हृदय, कुशाग्र बुद्धि और सहृदयता के प्रतीक, उन्होंने कभी तुच्छ वस्तुओं की कामना नहीं की और न ही तुच्छ भावनाओं को अपने मन में स्थान दिया। इसी कारण उन्हें ‘महामना’ की उपाधि दी गई।

मदन मोहन मालवीय बाल्यावस्था से ही अत्यंत प्रतिभाशाली छात्र थे। उन्हें अंग्रेजी के उच्चारण और लेखन पर दक्षता प्राप्त थी। संगीत में उनकी गहरी रुचि थी और वह कुशल गायक तथा सितार वादक भी थे। पिता से सीखी इस कला के माध्यम से उन्होंने कई भक्ति गीत और ‘मकरंद’ के छद्म नाम से रोमानी एवं व्यंग्य काव्य की रचना की। विद्यालय में उन्होंने सार्वजनिक वक्ताओं की एक सोसाइटी की स्थापना की और गृहनगर प्रयाग (इलाहाबाद) के सामाजिक जीवन में सक्रिय भूमिका निभाई, जिससे उन्हें समाज का सम्मान प्राप्त हुआ।

सन् 1884 में उन्होंने कलकत्ता विश्वविद्यालय से बी.ए. की परीक्षा उत्तीर्ण की। पारिवारिक उत्तरदायित्व के कारण आगे की पढ़ाई जारी नहीं रख सके और अपने विद्यालय में शिक्षक बन गए। शिक्षक के रूप में उनकी सफलता का मुख्य कारण धर्मग्रंथों की गहन जानकारी और अंग्रेजी, संस्कृत, हिन्दी तथा फारसी का शुद्ध उच्चारण था। 1891 में उन्होंने कानून की पढ़ाई पूरी की और शीघ्र ही वकील के रूप में प्रतिष्ठित हुए।

मदन मोहन मालवीय पत्रकारिता को एक कला मानते थे। उन्होंने हिन्दी प्रेस की नींव रखी और इसे भारतीय जनता की सेवा का माध्यम बनाया। ‘अखिल भारतीय सम्पादक सम्मेलन’ की स्थापना करके उन्होंने प्रेस की स्वतंत्रता के लिए कार्य किया। ‘हिन्दुस्तान’ और ‘अभ्युदय’ जैसी पत्रिकाओं के सम्पादन और प्रकाशन में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका रही। वर्ष 1909 में उन्होंने अंग्रेजी दैनिक ‘दि लीडर’ की शुरुआत की। इसके अतिरिक्त ‘मर्यादा’ नामक मासिक पत्रिका के प्रकाशन में भी उनका योगदान महत्वपूर्ण था।

मालवीय जी ने शिक्षा के क्षेत्र में भी अमूल्य योगदान दिया। उनके जीवन का सपना था कि ऐसी संस्था स्थापित की जाए जहाँ सभी छात्रों को, चाहे किसी भी जाति, धर्म या राष्ट्रीयता के हों, सभी विषयों की शिक्षा उपलब्ध हो। यह सपना बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय के रूप में साकार हुआ। वर्ष 1904 में काशी में हुई बैठक में उन्होंने विश्वविद्यालय स्थापना का प्रस्ताव रखा। 1 जनवरी 1906 को इसकी सार्वजनिक घोषणा की गई और 4 फरवरी 1916 को इसका आधारशिला रखी गई।

राजनीति में भी मालवीय जी की महत्वपूर्ण भूमिका रही। भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के लाहौर अधिवेशन (1909) में उन्होंने राष्ट्र की नियति मार्गदर्शित की। प्रथम विश्व युद्ध (1914) के दौरान उन्होंने आर्थिक बहिष्कार और होम रूल आंदोलन का समर्थन किया। 1916 में उन्होंने ‘मेमोरेन्डम ऑफ नाइन्टीन’ पर हस्ताक्षर करके अंग्रेज़ी हुकूमत की नीतियों की निंदा की और स्वतंत्रता की मांग की।

मालवीय जी ने स्वदेशी आंदोलन को भी बढ़ावा दिया। उन्होंने स्वदेशी निर्माण केंद्र स्थापित किए और 1932 में ‘अखिल भारतीय स्वदेशी संघ’ की स्थापना की। सक्रिय राजनीति से सन्यास लेने के बाद भी उन्होंने स्वतंत्रता संग्राम में योगदान दिया। कम्यूनल अवार्ड की आलोचना कर उन्होंने राष्ट्रीय एकता और संवैधानिक सुधारों के प्रति अपनी प्रतिबद्धता दिखाई।

पंडित मदन मोहन मालवीय का निधन 12 नवंबर 1946 को हुआ। उनके निधन पर महात्मा गांधी ने कहा कि भारत ने अपना सबसे वरिष्ठ एवं अप्रतिम सेवक खो दिया। पंडित जवाहरलाल नेहरू ने उन्हें आधुनिक भारतीय राष्ट्रवाद के स्थापकों में गिना और उनके योगदान को अत्यंत मूल्यवान बताया।

उनकी निःस्वार्थ सेवाओं और आधुनिक भारत के निर्माण में योगदान के सम्मान में पंडित मदन मोहन मालवीय को 24 दिसंबर 2014 को ‘भारत रत्न’ से सम्मानित किया गया।

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