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बाल दिवस : बचपन और भारत का भविष्य

Date : 12-Nov-2025

गिरीश्वर मिश्र

भारतीय समाज में प्राचीन काल से बच्चों की निराली छवि संजोई जाती रही है। बाल गोपाल की नटखट लीलाओं का आकर्षण अब भी है। कई घरों में लड्डू गोपाल की पूजा भी होती है। वैसे भी बच्चों की उपस्थिति, उनके हाव-भाव, किलकारी, खेल-कूद में भावनाओं की जिस ऊष्मा से भर देने वाले होते हैं वह अलौकिक यानी ईश्वरीय ही होती है। निश्छल, स्वाभाविक और सहज बच्चे मन के सच्चे होते हैं। पर आम जन जो संतान की चाहत रखते हैं वे समझदार हो गए हैं और परिवार का आकार सीमित रखने की कोशिश करते हैं। शिक्षित प्रौढ़ अधिक सचेत हैं और वे सीमित परिवार की ओर अग्रसर हो रहे हैं। इस बदलाव का प्रमुख कारण संयुक्त परिवारों का टूटना, अपने मूल स्थान से विस्थापन और तेजी से बढ़ती मँहगाई का अनिवार्य दबाव है। साथ ही वैश्वीकरण के दौर में आकांक्षाओं को भी पर लग गया है और नई-नई संभावनाओं के द्वार खुलते जा रहे हैं जो जीवन की वरीयताओं को उलट-पलट रहे हैं। परिवार ही सबसे पहले उनकी भेंट चढ़ रहा है। कई अत्याधुनिक लोग परिवार को वैकल्पिक मानने लगे हैं । कुल मिला कर आज के कठिन समय में मध्य और उच्च मध्य वर्ग के परिवारों में विशेष रूप से बच्चों का पालन-पोषण और शिक्षा-दीक्षा को अच्छी तरह से अंजाम देना चुनौती भरा होता जा रहा है।

देश के स्तर पर समस्याएं विराट हैं। आज विश्व की कुल जनसंख्या का छठाँ भाग भारत में रहता है। इसमें बच्चे अर्थात् 18 साल तक की आयु वाले लगभग 39 प्रतिशत हैं। एक अनुमान के हिसाब से भारत में 253 मिलियन किशोर हैं। देश में निःसंदेह आर्थिक प्रगति दर्ज हुई है पर उसके अनुपात में जीवन की गुणवत्ता सबके लिए ख़ास तौर पर बच्चों और स्त्रियों के लिए उतनी नहीं बढ़ी है जितनी अपेक्षित है । वस्तुत: भारत वर्ष में बच्चों की स्थिति गंभीर विचार का विषय हो कर भी प्राय: हाशिये पर ही रहती रही है हालांकि कुछ मामलों में प्रगति दर्ज हुई है। उदाहरण के लिए शिशु मृत्यु दर और स्कूल छोड़ने की दर घटी है। परंतु बाल विवाह, कुपोषण और गरीबी से अभी भी छुटकारा नहीं मिल सका है। गौर तलब है कि आज भी हज़ार बच्चों में 95 बच्चे अपना पाँचवाँ जन्म दिवस मनाने के पहले ही काल कवलित हो जाते हैं। आज भी 4 वर्ष से 14 वर्ष की आयु वर्ग के स्कूल जाने वाले बच्चों का एक बड़ा हिस्सा, आधे से कुछ कम, प्राइमरी शिक्षा पूरी नहीं कर पाता । भारत के आधे बच्चे आज भी कुपोषण के शिकार हो रहे हैं। एक अध्ययन के हिसाब से हर दो लड़कियों में एक कुपोषित मिलती है। तीन महीने तक की आयु के बच्चों में 74 प्रतिशत न्यून या अल्प पोषण पाते हैं। शहरी इलाकों में, खास तौर पर अनौपचारिक हलकों, में ग़रीबी निश्चित रूप से बाल-विकास के मार्ग में बहुत बड़ी बाधा है। आज भी श्वास रोग और डायरिया (उल्टी दस्त) शिशु मृत्यु का एक बड़ा कारण बना हुआ है। अन्य दक्षिण पूर्व एशियाई देशों की तुलना में बाल-विवाह यानी 18 वर्ष की उम्र के पहले विवाह की दर आज भी भारत में सबसे ज़्यादा है। इसी तरह देश के कुछ भागों में अभी भी पुत्र की पसंद पुत्रियों की अपेक्षा ज़्यादा है जिससे जेंडर से जुड़े भेद-भाव की गुंजाइश बढ़ती है ।

भारत की जनसंख्या का यह एक सुखद पहलू यह है कि उसमें युवा वर्ग का प्रतिनिधित्व अधिक है। भारत अब विश्व में एक युवा-प्रधान देश हो गया है। देश में किशोरों की संख्या पूरे विश्व में सर्वाधिक है। उनके शिक्षा, स्वास्थ्य और कौशल-संवर्धन की ख़ास जरूरत है। ये सामाजिक, राजनैतिक और आर्थिक सभी दृष्टियों से भारत के विकास के लिए निश्चित रूप से लाभकारी सिद्ध होने वाले हैं बशर्ते वे सुरक्षित रहें, उनका स्वास्थ्य ठीक रहे, तथा वे सुशिक्षित और कौशल युक्त बन सकें । किशोरियों पर विशेष ध्यान देने की ज़रूरत है जिनके लिए कुपोषण और बाल-विवाह बड़ी मुसीबत है और उनको ज़्यादा प्रभावित होने की संभावना रहती है। किशोरियों के सशक्तीकरण के मार्ग में ये बड़ी बाधाएँ बनी हुई हैं। युवा वर्ग को प्रोत्साहित और विकास के मार्ग पर अग्रसर कराते हुए ही विकसित भारत-2047 की परिकल्पना साकार हो सकेगी। देश में बच्चों की सुरक्षा और उनके पालन-पोषण पर जोर देने वाली कई सरकारी नीतियां बनी हैं। इस सिलसिले में सरकार का ‘मिशन वात्सल्य’ बच्चों के स्वास्थ्य और बाल-कल्याण के लिए समर्पित है। कुछ संकेत सकारात्मक बदलाव बताते हैं पर स्वास्थ्य, शिक्षा और खुशहाली के प्रश्न अभी भी बरकरार हैं। गुणवत्तापूर्ण शिक्षा और और स्वास्थ्य की जरूरतें अभी भी संतोषजनक ढंग पूरी नहीं हो पा रही हैं। इसी तरह बाल-विवाह को रोकना आवश्यक है। पिछले दो दशकों में देश में निश्चित रूप से उल्लेखनीय प्रगति हुई है। अति गरीबी 21 प्रतिशत कम हुई है। इसी तरह अब 80 प्रतिशत बच्चों का जन्म स्वास्थ्य सुविधा केंद्रों पर होता है। तब भी ग्रामीण क्षेत्र, मलिन बस्ती, अनुसूचित जाति तथा जनजातियों की स्थिति चिंतनीय बनी हुई है ।विशेष रूप से वंचित समुदाय अनेक प्रकार के अभावों से ग्रस्त हैं। अच्छी स्वास्थ्य सुविधा की बड़ी कमी है। सभी क्षेत्रों में स्वच्छता और शुद्ध पेय जल की उपलब्धता सुनिश्चित किया जाना अभी भी एक चुनौती है। ऊपर से सूखा, बाढ़, भूकंप, भूस्खलन, जलवायु-परिवर्तन और शरणार्थी समुदायों का आना-जाना ऐसी आकस्मिक परिस्थितियाँ हैं जो विकास की गति को अचानक थाम लेती हैं।

अब वैश्विक स्तर पर इस बात पर अधिकांश देशों में सहमति बन गई है कि बच्चों के अधिकारों को सुरक्षित रखना बेहद जरूरी है। बाल श्रम और उनके साथ होने वाले अत्याचार बंद होने चाहिए। परंपरागत रूप से बच्चों की देख-रेख और सुरक्षा परिवार और समुदाय की जिम्मेदारी रही है। पितृसत्तात्मक परिवेश में अक्सर यह भुला दिया जाता है कि बच्चे भी ‘व्यक्ति’ हैं और उनके भी अधिकार हैं।अब स्पष्ट रूप से बच्चों के अधिकारों में जीवन का अधिकार, शिक्षा, सुरक्षा, भागीदारी, विकास, स्वास्थ्य, कल्याण, पहचान, अभिव्यक्ति, भेदभाव से मुक्ति और सुरक्षित वातावरण के अधिकार शामिल किए गए हैं । परंतु गरीबी, भूख, पेय जल की उपलब्धता, रोग, शिक्षा की कमी, बच्चों के साथ दुर्व्यवहार, बच्चों से श्रम कराना, बच्चों के प्रति हिंसा और शोषण, तथा बाल-विवाह आदि ऐसे विकट संकट हैं जो बच्चों के जीवन, सुरक्षा और विकास में भागीदारी को नकारात्मक रूप से प्रभावित कराते हैं। कानून बच्चों के साथ दुर्व्यवहार, उनका शोषण और भेदभाव करने के विरुद्ध संरक्षण देता है और उसके उल्लंघन के लिए दंड का भी प्रविधान करता है। फिर भी देश में वंचित वर्ग के बच्चे बड़ी संख्या में कुपोषण के शिकार हैं। उनके आहार में कार्बोहाइड्रेट की अधिकता और प्रोटीन की कमी भी एक बड़ा कारण है । इस का परिणाम होता है अवरुद्ध विकास। एक अनुमान के अनुसार 6.1 करोड़ बच्चे भूख और ख़राब स्वास्थ्य से पीड़ित हैं। स्वच्छता और संतुलित आहार के लिए क़ानून, जागरण और सामाजिक सुधार सबकी जरूरत है। कानूनों के बावजूद आज भी बाल-श्रम जारी है। मासूम बच्चे कई शिफ्ट में काम करते हैं और उनको आराम नहीं दिया जाता । उल्टे उन्हें मानसिक और शारीरिक प्रताड़ना मिलती है। पौष्टिक भोजन और स्वच्छ पानी विकास की प्राथमिक आवश्यकता होती है।

संविधान के 86 वें संशोधन में 6 से 14 वर्ष तक की आयु के बच्चों के लिए निःशुल्क शिक्षा का प्रावधान किया गया है। बच्चों को जरूरत को ध्यान में रख कर नई शिक्षा नीति-2020 में भी कई प्राविधान किए गए हैं जो बच्चों की रुचि, प्रतिभा, मातृ भाषा और संस्कृति के आलोक में उनके समग्र विकास का लक्ष्य पाने के लिए अवसर पैदा कर रहे हैं। बच्चों के विकास के लिए कई ग़ैर सरकारी प्रयास, भी शुरू हुए हैं जो बच्चों के लिए प्राविधान, उनकी सुरक्षा और प्रतिभागिता सुनिश्चित करने की दृष्टि से काम कर रहे हैं। आम तौर पर भारतीय समाज में बच्चों के प्रति प्रेम के भाव प्रबल होते हैं। बच्चों से मिलना, उनसे बात करना और उनका कोमल स्पर्श प्रीतिकर होता है पर बदलती परिस्थितियों के दबाव के बीच बच्चों पर सकारात्मक रूप से ध्यान देना और उनकी अवस्था के अनुरूप अवसर उपलब्ध कराना परिवार, समुदाय और स्कूल जैसी संस्थाओं को पुनर्विचार के लिए आमंत्रित करता है। मीडिया की सकारात्मक भूमिका कैसे सुनिश्चित हो इस पर गंभीर विचार कर कदम उठाने की आवश्यकता है। बच्चे समाज के भविष्य को अनिवार्य रूप से गढ़ते हैं इसलिए उन पर ध्यान देना समाज के अस्तित्व का प्रश्न बन जाता है। बच्चों का पालन-पोषण दायित्व भी है और निर्माण का भी अवसर है।

(लेखक, महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा के पूर्व कुलपति हैं।)

 


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