"हरियाली अमावस्या को शिव शंकरी का प्राकट्य और भारतीय पर्यावरण दिवस"
Date : 04-Aug-2024
श्रावण कृष्ण पक्ष की उदया तिथि हरियाली अमावस्या तद्नुसार 4 अगस्त को सादर समर्पित
श्रावण कृष्ण पक्ष की उदया तिथि हरियाली अमावस्या तद्नुसार 4 अगस्त को सादर समर्पित
संत गहिरा गुरु जी छत्तीसगढ़ के 14वीं-15वीं सदी एक प्रसिद्ध संत और समाज सुधारक थे।
संत गहिरा गुरु जी ने अपने शिक्षाओं और भक्ति के माध्यम से समाज में सुधार लाने की कोशिश की। वे भक्ति और साधना के मार्ग को अपनाने के पक्षधर थे और उन्होंने सामाजिक कुरीतियों के खिलाफ संघर्ष किया। उनके उपदेशों में सरलता, सच्चाई और सामाजिक समानता की बात की जाती है।
उनका जन्म 4 अगस्त 1905 को रायगढ़ जिले में हुआ था। वे अक्सर जंगलों में एकांत में ध्यान और चिंतन किया करते थे। उन्होंने लोगों को दैनिक स्नान, घर में तुलसी लगाने और उसे पानी देने, श्वेत वस्त्र पहनने, गांजा, मासाहार और शराब का सेवन छोड़ने, गोसेवा और खेती करने, और रात में सामूहिक नृत्य के साथ रामचरितमानस की चौपाई गाने की प्रेरणा दी। प्रारंभ में उन्हें कई कठिनाइयों का सामना करना पड़ा, लेकिन धीरे-धीरे लोग उनकी बात मानने लगे और उन्हें ‘गहिरा गुरुजी’ के नाम से सम्मानित किया। वे अक्सर यह सूत्र वाक्य दोहराते थे: "चोरी, दारी, हत्या, मिथ्या का त्याग करें, सत्य, अहिंसा, दया और क्षमा का पालन करें।"
"सनातन धर्म सन्त समाज" की स्थापना कर दिन दुखियो और गरीब, असहाय लोगो की निश्चल भाव से सेवा करते थे | महान व्यकतित्व के धनी थे जिन्होंने अपना सम्पूर्ण जीवन लोगो की सेवा में बिताया |
श्रावन मास की आमावाश्या , सन 1943 में गहिरा गुरु जी ने गहिरा ग्राम में सनातन धर्म संत समाज की स्थपना की | सुदूर वन क्षेत्रो में उनकी ख्याति ऐसी हो गयी की वनवासी उन्हें भगवन की तरह पूजने लगे थे | वनवासी समाज को सनातन धर्म के दैनिक संस्कारों से परिचित कराने का कार्य भी किया और 16 संस्कारो , वैदिक विधि से विवाह करना , शुभ्र ध्वज लगाना और उसे प्रति माह बदलना ,यह गहिरा गुरु द्वारा स्थापित सनातन धर्म संत समाज क्र प्रमुख सूत्र है|
राष्ट्रिय स्वयंसेवक से सम्बन्ध :-
संत गहिरा गुरु का राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से पहला परिचय अंबिकापुर के प्रचारक श्री भीमसेन चोपड़ा के माध्यम से हुआ। श्री भीमसेन चोपड़ा का अध्यात्म से जुड़ाव भी गहिरा गुरु के कारण ही हुआ था। गहिरा गुरु ने रायपुर, कांपु, मुंडेकेला, सीतापुर, प्रतापगढ़, कोतवा और अन्य कई स्थानों पर हजारों शिष्य बनाए। उनकी शिक्षाओं से प्रभावित होकर उन्होंने दो लाख से अधिक अनुयायी जुटाए।
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के द्वितीय सरसंघचालक पूज्य श्री माधवराव सदाशिवराव गोलवलकर "श्री गुरुजी" से गहिरा गुरु का प्रथम परिचय जशपुर में कल्याण आश्रम के नए भवन के उद्घाटन के अवसर पर हुआ। इस बैठक के बाद, उनके बीच अच्छे संबंध स्थापित हुए, और गहिरा गुरु ने अपना जीवन समाज सेवा के लिए समर्पित कर दिया।
गहिरा गुरु जी का आश्रम :-
संत श्री संत गहिरा गुरु जी ने जशपुर में एक आश्रम बनाया था जिसे आज कैलाश गुफा या गहिरा गुरु गुफा के नाम से जाना जाता है | अम्बिकापुर नगर से पूर्व दिशा में 60 किलोमीटर की दुरी पर स्थित सामरबार नामक स्थान है जहा पर प्राकृतिक वन सुषमा के बिच कैलाश गुफा स्थित है | इसी संत गहिरा गुरु जी ने पहाड़ी चट्टानों को तरासकर बनाया था | यहाँ पर महाशिवरात्रि के दिन महा मेले का आयोजन होता है | यहाँ पर संस्कृत का पाठशाला है , यहाँ शिवमंदिर और पार्वती का मंदिर भी स्थित है |
उनके जीवन और उपदेश आज भी छत्तीसगढ़ और आसपास के क्षेत्रों में श्रद्धा और सम्मान के साथ याद किए जाते हैं। संत गहिरा गुरु जी की शिक्षाओं का प्रभाव आज भी लोगों के जीवन में दिखाई देता है।
ऋषि दधीचि से गाँधी जी तक मिली हमें जो दीक्षा है,
बंधु जनो प्रस्तुत हो उसकी फिर आ गई परीक्षा है
पड़ोसी चीन अचानक होकर लोभ-पाप में लीन,
चला हमारी भूमि छीनने तन का मोटा, मन का हीन
राष्ट्र- संघ में शुद्ध भाव से हमने जिन का पक्ष लिया,
हमें उसी के लिए उन्होंने देखो क्या उपहार दिया
ठोकर मार चिता दो उन को देख रहे हैं जो सपने,
भूले नहीं प्रताप, शिवाजी, गुरुगोविंद हमें अपने
हिन्दू संस्कृति में पर्यावरण सरंक्षण का विशेष महत्व रेखांकित करती श्रावणी अमावस
भारत सरकार की महत्वााकांक्षी योजना 'विकसित भारत-2047’ पर देश में हर जगह चर्चा हो रही है। चर्चाओं का केंद्र अगले कुछ वर्षों में 7 प्रतिशत सालाना से अधिक औसत आर्थिक वृद्धि दर हासिल करना है। इस समय भारत और चीन की तुलना करना उपयोगी हो सकता है। विश्व बैंक के आंकड़ों के मुताबिक 1991 में दोनों देशों में कृषि में रोजगार का प्रतिशत आसपास ही था। चीन में यह 60 प्रतिशत तथा भारत में 63 प्रतिशत था, किंतु विश्व बैंक के अनुसार करीब 30 साल बाद चीन में यह तेजी से कम होकर 23 प्रतिशत रह गया, जो भारत के 44 प्रतिशत आंकड़े से बहुत कम है। इन 30 साल के भीतर चीन में लगभग 20 करोड़ कृषि श्रमिक उद्योग और सेवा क्षेत्रों में चले गए। विश्व बैंक के आंकड़ों के मुताबिक भारत में भी काफी संख्या में श्रमिक खेती से बाहर चले गए मगर इसी दौरान कृषि में रोजगार पाने वालों की संख्या 3.5 करोड़ बढ़ गई।
भारत को मौजूदा निम्न-मध्यम आय स्तर से उच्च आय स्तर या उच्च मध्यम आय स्तर तक लाने के लिए जरूरी बदलाव पर भी सबका ध्यान केंद्रित है । यह बदलाव रोजगार के ढांचे में होना है, जिसके तहत कृषि क्षेत्र से जुड़ा रोजगार घटना चाहिए और उद्योग तथा सेवा क्षेत्र का रोजगार उतना ही बढ़ना चाहिए। वैसे भारत 2047 तक विकसित देशों की श्रेणी में शामिल होने की आकांक्षा रखता है और इन देशों की अर्थव्यवस्थाओं में कृषि रोजगार के प्रतिशत की बात करें तो आर्थिक सहयोग एवं विकास संगठन (ओईसीडी) देशों में यह लगभग 5 प्रतिशत है जो भारत में कृषि में वर्तमान रोजगार के प्रतिशत का लगभग आठवां हिस्सा है।
उच्च-मध्यम आमदनी वाले देशों में भी कृषि में रोजगार की हिस्सेदारी आज भारत की तुलना में केवल आधी है। विकसित देशों की श्रेणी में शामिल कृषि वस्तुओं के प्रमुख निर्यातक जैसे न्यूजीलैंड या ब्राजील में भी कृषि में रोजगार की हिस्सेदारी केवल 6-8 प्रतिशत के भीतर है। अगर भारत को 2047 तक उच्च आमदनी वाले देश का दर्जा हासिल करना है या उच्च-मध्यम आय के स्तर तक पहुंचना है तो उसे कृषि से बड़ी संख्या में श्रमिक उद्योग और सेवा क्षेत्र की ओर भेजने होंगे। इससे भी ज्यादा नाटकीय मामला वियतनाम का है, जहां 1991 में रोजगार में कृषि की हिस्सेदारी 75 प्रतिशत थी मगर 2021 में घटकर 29 फीसदी रह गई। इसका बड़ा कारण यह है कि चीन और वियतनाम में इन वर्षों के दौरान अधिक निर्भरता विनिर्माण में रोजगार सृजन और निर्यात बढ़ाने वाली वृद्धि पर रही है।
भारत के मामले में 1991 और 2021 के आंकड़ों की तुलना में एक अहम बिंदु छुप जाता है। कृषि की हिस्सेदारी में गिरावट और उद्योग तथा सेवाओं में वृद्धि मुख्य रूप से 1990-91 से 2014-15 के बीच यानी 25 वर्षों दौरान हुई। उसके बाद से विनिर्माण में वृद्धि की कई योजनाएं आने के बाद भी कोई बड़ा बदलाव नहीं देखा गया है। संभवत: कोविड के कारण ग्रामीण क्षेत्रों में लोगों की वापसी की वजह से भी कृषि क्षेत्र से रोजगार स्थानांतरित होने की रफ्तार धीमी रही है।भारत में राज्यों के बीच अंतर पर भी ध्यान दिया जाना चाहिए। अहम मुद्दा यह है कि हम किस दर पर उद्योग और सेवा क्षेत्र में बेहतर रोजगार सृजन कर सकते हैं ताकि कामकाजी उम्र वाले लोगों की बढ़ती संख्या और कृषि क्षेत्र से आने वाले लोगों को इसमें खप सके। 2047 तक कामकाजी उम्र वाली आबादी (15 से 59 वर्ष) का आधिकारिक पूर्वानुमान लगाएं और मान लें कि काम ढूंढने वालों में करीब 65 प्रतिशत हिस्सेदारी इसी समूह की होगी तो हमारे पास रोजगार ढूंढने वाले करीब 12 करोड़ नए लोग होंगे।
इसके अलावा सबसे मुश्किल पूर्वानुमान कृषि क्षेत्र से निकलने वाले श्रम बल के दूसरे क्षेत्रों में स्थानांतरण के मूल्यांकन का स्तर है। अगर हम विकसित या उच्च आमदनी वाला देश बनना चाहते हैं तब कृषि क्षेत्र में रोजगार का हिस्सा कम होकर 10 प्रतिशत के स्तर पर आना चाहिए। इसका मतलब है कि लगभग 15 करोड़ लोगों को कृषि क्षेत्र छोड़ना होगा। इस तरह उद्योग और सेवा क्षेत्रों में 27 करोड़ से अधिक नए रोजगार पैदा करने की आवश्यकता है ताकि रोजगार ढूंढने वाली आबादी और कृषि क्षेत्र छोड़ने वाली अतिरिक्त आबादी इसमें खप सके। अगले 25 वर्षों में यह तादाद सालाना 1 करोड़ से अधिक नई उद्योग एवं सेवा क्षेत्र की नौकरियां हैं। असली चुनौती यह है कि हमें 2047 तक विकसित भारत बनाने के लिए एक ऐसी योजना चाहिए जो उद्योग और सेवा क्षेत्र में रोजगार के बेहतर मौके तैयार करे, खासतौर से उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड, राजस्थान और मध्य प्रदेश जैसे राज्यों में, जहां आज भी औसतन करीब 55 प्रतिशत लोग खेती में रोजगार पाते हैं। अगले 25 साल में देश में जितने भी नए कामगार बढ़ेंगे, उनमें से लगभग 90 प्रतिशत इन पांच राज्यों से होंगे।
लेखक:- राकेश दुबे
यह समझना मुश्किल है कि कांग्रेस की विरासत ही कांग्रेस के विपरीत है या राहुल गांधी का फोकस कहीं और है। वैसे तो नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी को संसद में बजट पर बोलना था, लेकिन उन्होंने महाभारत कालीन चक्रव्यूह का नया रूपक ही गढ़ दिया। हजारों साल पुराने चक्रव्यूह में अभिमन्यु को घेर कर मार दिया गया था। उसका नियंत्रण द्रोणाचार्य, कृपाचार्य, कर्ण, कृतवर्मा, अश्वत्थामा और शकुनि के हाथों में था। राहुल गांधी के मुताबिक आज का चक्रव्यूह भी प्रधानमंत्री मोदी, गृह मंत्री अमित शाह, सरसंघचालक मोहन भागवत, राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजित डोभाल आदि आठ हाथों में है। दो शेष नाम देश के बड़े उद्योगपतियों के हैं, जिनका नाम सदन में नहीं लिया जा सकता था। स्पीकर ओम बिरला ने भी नियमों का हवाला दिया, लेकिन राहुल गांधी उनका एक बार नाम ले चुके थे। फिर उन्हें ए-1, ए-2 नामकरण दिया।
सवाल यह है कि राहुल गांधी ने यह रूपक क्यों गढ़ा? क्या आज का चक्रव्यूह भी किसी को हताहत करने को रचा गया है? संसद में ऐसी हिंसकवादी राजनीति के कोई मायने नहीं हैं, लिहाजा स्पीकर नेता प्रतिपक्ष को बार-बार सलाह देते रहे कि एक बार और सदन के नियमों को नेता प्रतिपक्ष पढ़ लें। जाहिर है कि राहुल गांधी बार-बार नियमों का उल्लंघन करते रहे हैं। बहरहाल नए चक्रव्यूह के संदर्भ में जवाब राहुल ही देंगे, लेकिन उनकी राजनीति समझ में जरूर आती है कि 2024 के आम चुनाव की तरह वह अब भी एक नेरेटिव देश में फैलाना चाहते हैं। वह नेरेटिव भाजपा के हिंदुत्व और सवर्णवाद की काट साबित हो सकता है, ऐसी राहुल गांधी की उम्मीद है। उनकी राजनीति जातीय जनगणना की है, जबकि कांग्रेस में उनके पुरखे ऐसे जातिवाद के खिलाफ थे और ऐसी जनगणना को कभी भी लागू नहीं किया।
उन्होंने अपने 46 मिनट के भाषण का सारांश यह रखा कि गरीब, पिछड़े, दलित, युवा, किसान समेत पूरा देश भय के चक्रव्यूह में है। अग्निवीरों को भी चक्रव्यूह में फंसाया गया है। प्रधानमंत्री जिस कमल के फूल (भाजपा का चुनाव चिह्न) को लहराते रहते हैं, उसी के आकार वाला चक्रव्यूह है। यहां नेता प्रतिपक्ष ने अपनी सियासत के मुताबिक हिंदू धर्म का अपमान किया है। भाजपा ने यूं पलटवार करते हुए कहा है कि जिस फूल को ब्रह्मा जी,देवी लक्ष्मी, देवी सरस्वती ने अपना आसन बनाया, पवित्रता के प्रतीक उसी फूल को राहुल गांधी ने ‘हिंसक’ करार दिया। यह धार्मिक अपमान राहुल की राजनीति के मुताबिक है।
नेता प्रतिपक्ष ने बजट पर संभवत: 2.5 प्रतिशत ही बोला। सिर्फ शिक्षा का आवंटन ही उन्हें याद रहा। बजट की ‘हलवा सेरेमनी’ में भी उन्होंने जातिवाद को घुसेड़ कर कहा कि जो 20 अधिकारी देश का बजट तैयार करते हैं, उनमें कोई भी ओबीसी, दलित या आदिवासी अफसर नहीं है,जबकि इन समुदायों की आबादी देश की 73 प्रतिशत है। सिर्फ 2-3 प्रतिशत लोग ही ‘हलवा’ बनाते हैं, वे ही बांटते हैं और वे ही खा जाते हैं। देश की 73 प्रतिशत आबादी को ‘हलवा’ नहीं मिल रहा है। राहुल का कथन देश के संसाधनों और शक्तियों की व्याख्या कर रहा है। उनका जातिवाद भी इसी आधार पर टिका है कि जो देश में बहुसंख्यक हैं, वे ही वंचित और विपन्न हैं। शायद राहुल गांधी को यह याद नहीं रहा कि बजट से जुड़ा ‘राजनीतिक हलवा’ तो बीते 70 सालों से अधिक समय से बांटा जा रहा है। इस दौरान सर्वाधिक सरकारें कांग्रेस की रही हैं।
कांग्रेस नेतृत्व की यूपीए सरकार के दौरान 2011 की जनगणना के साथ जातीय जनगणना भी कराई गई थी। उसके आंकड़े सार्वजनिक क्यों नहीं किए गए? कर्नाटक में जब सिद्धारमैया पहली बार मुख्यमंत्री बने थे, तब उन्होंने जातीय जनगणना कराई थी। आज भी वह मुख्यमंत्री हैं, लेकिन जातीय जनगणना के आंकड़े आज तक भी जारी नहीं किए गए। कांग्रेस या राहुल गांधी स्पष्ट कर सकते हैं कि उनके जातिवाद का यथार्थ क्या है? राहुल गांधी ने यह भी दावा किया है कि जो मध्यवर्ग प्रधानमंत्री मोदी की राजनीति का समर्थक था, आज वह ‘इंडिया’ की तरफ आ रहा है, क्योंकि मध्यवर्ग की पीठ और छाती में छुरा घोंपा गया है। सरोकार राहुल के चक्रव्यूह से है कि उसके मायने क्या हैं?
लेखक:- राकेश दुबे
