मोहम्मद रफ़ी एक महान पार्श्व गायक थे, जिन्होंने लगभग 40 वर्षों के करियर में 25,000 से अधिक गाने रिकॉर्ड कियेI मुहम्मद रफ़ी का जन्म 24 दिसम्बर, 1924 को अमृतसर ज़िला, पंजाब में हुआ था। रफ़ी ने कम उम्र से ही संगीत में रुचि दिखानी शुरू कर दी थी। बचपन में ही उनका परिवार ग्राम से लाहौर आ गया था। रफ़ी के बड़े भाई उनके लिए प्रेरणा के प्रमुख स्रोत थे। रफ़ी के बड़े भाई की अमृतसर में नाई की दुकान थी और रफ़ी बचपन में इसी दुकान पर आकर बैठते थे। उनकी दुकान पर एक फ़कीर रोज आकर सूफ़ी गाने सुनाता था। सात साल के रफ़ी साहब को उस फ़कीर की आवाज़ इतनी भाने लगी कि वे दिन भर उस फ़कीर का पीछा कर उसके गाए गीत सुना करते थे। जब फ़कीर अपना गाना बंद कर खाना खाने या आराम करने चला जाता तो रफ़ी उसकी नकल कर गाने की कोशिश किया करते थे। वे उस फ़कीर के गाए गीत उसी की आवाज़ में गाने में इतने मशगूल हो जाते थे कि उनको पता ही नहीं चलता था कि उनके आसपास लोगों की भीड़ खड़ी हो गई है। कोई जब उनकी दुकान में बाल कटाने आता तो सात साल के मुहम्मद रफ़ी से एक गाने की फरमाईश जरुर करता।
एक बार संगीतकार पंडित जीवनलाल नाई की दुकान पर पहुंचे. जब उन्होंने गुनगुनाते हुए रफी को बाल काटते हुए सुना तो बेहद खुश हुए. रफी को रेडियो चैनल के ऑडीशन में बुलाया गया, जिसे उन्होंने आसानी से पार कर लिया. जीवनलाल ने ही रफी को गायिकी की ट्रेनिंग दी और वो रेडियो में गानों को आवाज देने लगे. 1937 की बात है जब स्टेज में बिजली ना होने पर पॉपुलर सिंगर कुंदनलाल सहगल ने स्टेज पर गाने से इनकार कर दिया.आयोजकों ने यहां 13 साल के रफी को मौका दिया. दर्शकों के बैठे केएल सहगल ने हुनर भांपते हुए कहा कि देखना ये लड़का एक दिन बड़ा सिंगर बनेगा. के एल सहगल की बात सालों बाद सच साबित हुई.
मोहम्मद रफ़ी का पहला गाना : उनका पहला गाना 1944 एक पंजाबी फिल्म "गुलबालोच" की थी उस गाने के बोल थे - "सोणी हीरीए तेरी याद ने बहुत सताया"। ज़ीनत बेगम के साथ संगीतकार श्याम सुंदर के संगीत निर्देशन में यह उनका पहला गाना था। उसके बाद श्याम सुंदर बंबई में थे और उन्होंने रफी को जीएम दुर्रानी के साथ एक युगल गीत गाने का मौका दिया , "अजी दिल हो काबू में तो दिलदार की ऐसी तैसी...," गांव की गोरी के लिए 1945, जो रफी का हिंदी फिल्म में पहला रिकॉर्ड किया गया गीत बन गया। इसके बाद अन्य गाने भी आए उन्होंने आसामी, कोकणी, पंजाबी, उड़िया, मराठी, बंगाली के साथ साथ स्पेनिश और अंग्रेजी में भी गाने गाए थे
अपने शुरुआती करियर में रफ़ी कई समकालीन संगीत निर्देशकों के साथ जुड़े, जिनमें सबसे उल्लेखनीय नौशाद अली थे । 1950 और 1960 के दशक के अंत में, उन्होंने ओपी नैयर , शंकर जयकिशन , एसडी बर्मन और रोशन जैसे उस दौर के अन्य संगीतकारों के साथ काम किया ।
नौशाद साहब के संगीत निर्देशन में मोहम्मद रफ़ी का आखिरी गाना अली सरदार जाफरी द्वारा लिखित फिल्म "हब्बा खातून" के लिए था। गाने के बोल थे -'जिस रात के ख्वाब आए वह रात आई' ।
पुरुस्कार एवं सम्मान : मोहम्मद रफ़ी जी को एक राष्ट्रिय और 6 फिल्मफेयर पुरुस्कार मिला I
राष्ट्रीय फिल्म पुरुस्कार : क्या हुआ तेरा वादा ( हम किसी से कम नही )1977
फिल्मफेयर पुरुस्कार : "चौदहवीं का चाँद हो" (चौदहवीं का चाँद) 1960, "तेरी प्यारी प्यारी सूरत को"(ससुराल)1961, “चाहूंगा मैं तुझे” (दोस्ती)1964, "बहारो फूल बरसाओ"(सूरज)1966, "दिल के झरोके में"(ब्रम्हचारी)1968, "क्या हुआ तेरा वादा"( हम किसी से कम नही)1977
वर्ष 1948 में भारतीय स्वतंत्रता दिवस की पहली वर्षगांठ पर मोहम्मद रफी को भारतीय प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू द्वारा एक रजत पदक मिला था।
वर्ष 1967 में मोहम्मद रफी को भारत सरकार द्वारा पद्म श्री से सम्मानित किया गया था।
4 साल तक लता के साथ नहीं किया काम :- लता मंगेशकर और मोहम्मद रफ़ी ने साथ में सैकड़ो गाने गए थे, लेकिन एक वक़्त ऐसा भी आया था जब उन्होंने रफ़ी साहब के से बातचीत बंद कर दी थी. दरअसल लता गानों पर रॉयल्टी चाहती थी , जबकि मोहम्मद रफ़ी ने कभी भी रॉयल्टी की मांग नहीं की . दोनों का विवाद इतना बढ़ा की मोहम्मद रफ़ी और लता के बीच बातचीत बंद हो गयी थी . इस कारण दोनों ने एक साथ गाना गाने से भी इंकार कर दिया था. कहा जाता है की लता ने इंडस्ट्री में सभी सिंगर्स की आवाज़ उठाते हुए उनके लिए रॉयल्टी की मांग की थी. सभी गायकों ने मीटिंग रखी, लेकिन रफ़ी साहब , लता और रॉयल्टी मांग रहे सभी सिंगर्स की सोच के खिलाफ थे. हालाँकि, चार साल बाद मशहूर एक्ट्रेस नरगिस की कोशिश से दोनों ने एक साथ एक कार्यक्रम में ‘दिल पुकारे’ गाना गया था.
31 जुलाई 1980 को रात करीब 10ः25 बजे मोहम्मद रफी ने हार्ट अटैक से दम तोड़ दिया। अगली सुबह इन्हें जुहू के कब्रिस्तान में दफनाया गया। उनके अंतिम दर्शन में करीब 10 हजार लोग शामिल हुए थे। भारत सरकार ने रफी के निधन पर दो दिनों का सार्वजनिक शोक अनाउंस किया था।
हिंदी साहित्य जगत के अद्वितीय लेखक व उपन्यास सम्राट कहे जाने वाले मुंशी प्रेमचंद थे, जिन्होंने कुल 300 से ज़्यादा कहानियां , 3 नाटक, 15 उपन्यास, 10 अनुवाद , 7 बाल-पुस्तकें लिखीं । मुंशी प्रेमचंद ने अपने साहित्य और लेखों के माध्यम से समाज और राजनीति पर गहरा प्रभाव डाला । उनका जन्म 31 जुलाई 1880 को बनारस के पास लमही में हुआ था। पिता का नाम अजायब राय था और वे डाकखाने में मामूली नौकरी करते थे। उनका असली नाम “धनपत राय श्रीवास्तव ” था | उर्दू रचनओं में उन्हें “नवाब राय“ कहा जाता था । 13 साल की उम्र से ही प्रेमचन्द ने लिखना शुरू कर दिया था । शुरुआत में कुछ नाटक लिखे और बाद में उर्दू में उपन्यास लिखा। इस तरह उनका साहित्यिक सफर शुरु हुआ , इन रचनाओ के साथ- साथ उन्होंने कहानी, निबंध लिखी उन्होंने प्रेमचंद आज़ादी से पहले के समय के समाज और अंग्रेज़ी शासन के बारे में लिख रहे थे। उन्होंने जनता के शोषण, दुख, दर्द और उत्पीड़न को बहुत बारीकी से महसूस किया और उसे लिखा ।
प्रेमचंद की पहली प्रकाशित कृति उर्दू में थी और इसका नाम “सोजे-वतन” था । लेकिन अंग्रेज़ी हुकूमत को ये गवारा नहीं था । 1910 में उनकी रचना सोजे़-वतन (राष्ट्र का विलाप) के लिए हमीरपुर के जिला कलेक्टर ने तलब किया और उन पर जनता को भड़काने का आरोप लगाया । उस समय वे नवाबराय के नाम से लिखते थे। उनकी खोज हुई और उनकी आंखों के सामने सोजे़-वतन की सभी प्रतियां जला दी गईं। कलेक्टर ने उन्हें बिना अनुमति के लिखने पर भी पाबंदी लगा दी।
उन्होंने ‘माधुरी’ और ‘मर्यादा’ जैसी पत्रिकाओं का संपादन किया तथा ‘हंस’ और ‘जागरण’ समाचार पत्र भी प्रकाशित किये । 20वीं सदी में उर्दू में प्रकाशित होने वाली 'ज़माना' पत्रिका के संपादक और प्रेमचंद के घनिष्ठ मित्र मुंशी दयानारायण निगम ने उन्हें प्रेमचंद नाम से लिखने की सलाह दी। इसके बाद नवाबराय हमेशा के लिए प्रेमचंद हो गए और इसी नाम से लिखने लगे । प्रेमचंद के पहले उपन्यास का नाम सेवासदन था। सेवासदन 1918 में प्रकाशित हुआ था। यह उपन्यास मूल रूप से ‘बाजारे-हुस्न’ नाम से पहले उर्दू में लिखा गया लेकिन इसका हिन्दी रूप ‘सेवासदन’ पहले प्रकाशित हुआ । 1921 में किसान जीवन पर उनका उपन्यास 'प्रेमाश्रम' प्रकाशित हुआ। अवध के किसान आंदोलनों के दौर में 'प्रेमाश्रम' किसानों के जीवन पर लिखा हिंदी का पहला उपन्यास है । फिर 'रंगभूमि', 'कायाकल्प', 'निर्मला', 'गबन' और'कर्मभूमि' से होता हुआ उपन्यास लिखने का उनका यह सफर 1936 में 'गोदान' तक पहुंचा ।
इसके अलावा सैकड़ों लेख, संपादकीय लिखे जिसकी गिनती नहीं है। हालांकि उनकी कहानियां और उपन्यास उन्हें प्रसिद्धि के जिस मुकाम तक ले गए वो आज तक अछूता है। प्रेमचंद के उपन्यासों में 'गोदान' सबसे ज़्यादा मशहूर हुआ और विश्व साहित्य में भी उसका बहुत महत्वपूर्ण स्थान है । प्रेमचंद ने कई कहानियो का अनुवाद भी किया हैं जैसे “टोल्त्स्टॉय की कहानियाँ “ (1923) , गाल्स्वर्दी के तीन नाटको का अनुवाद (1924), चांदी कि डिबिया(1931) , न्याय(1931) नाम से अनुवाद किया | कफन, पूस की रात, पंच परमेश्वर, बड़े घर की बेटी, बूढ़ी काकी, दो बैलों की कथा आदि तीन सौ से अधिक कहानियाँ लिखीं। उनका रतननाथ के उर्दू उपन्यास “फ़सान- ए –आज़ाद” का हिन्दी अनुवाद आज़ाद कथा बहुत प्रसिद्ध हुआ | उन्होंने कई कहानियाँ भी लिखी जैसे राष्ट्र का सेवक , बंद दरवाजा, यह भी नशा वह भी नशान , देवी, कश्मीरी सेब आदि रचनाये की |
सवा सेर गेहूं , पूस की रात जैसी लघु कथाएँ और गोदान जैसे उपन्यास समाज में शोषणकारी स्थितियों को दर्शाते हैं | प्रेमचंद ने तीन नाटको कि रचना कि कर्बला,संग्राम, प्रेमकी वेदी (1933)अत्यंत प्रसिद्ध हुई थी | प्रेमचंद कि रचानाओ को आज भी यादकिया जाता हैं | साहित्य जगत में उनका योगदान आद्वितीय हैं |
प्रेमचंद की कई रचनाओं का उनकी मृत्यु के बाद रूसी और अंग्रेजी में अनुवाद किया |
पुरस्कार :- उन्हें कभी किसी पुरस्कार से सम्मानित नहीं किया गया था । लेकिन महाराष्ट्र राज्य हिन्दी साहित्य अकादमी की ओर से साहित्य के क्षेत्र में उल्लेखनीय कार्य करने वाले साहित्यकार को प्रेमचंद पुरस्कार दिया जाता है। पुरस्कार में 25,000 रुपये नकद, स्मृति चिह्न, शॉल और श्रीफल प्रदान किए जाते हैं एवं उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान द्वारा भी एक साहित्य पुरस्कार "प्रेमचंद स्मृति पुरस्कार" नाम से प्रदान किया जाता है । मुंशी प्रेमचंद की स्मृति में भारतीय डाक विभाग की ओर से 31 जुलाई, 1980 को उनकी जन्मशती के अवसर पर 30 पैसे मूल्य का एक डाक टिकट जारी किया गया था । गोरखपुर के जिस स्कूल में वे शिक्षक थे, वहाँ प्रेमचंद साहित्य संस्थान की स्थापना की गई है।
मृत्यु :-
प्रेमचंद को 1936 में लखनऊ में प्रगतिशील लेखक संघ के पहले अध्यक्ष के रूप में चुना गया था। कई दिनों की बीमारी के बाद और पद पर रहते हुए 8 अक्टूबर वर्ष 1936 को बनारस में उनकी मृत्यु हो गई थी।
शिक्षा हमें प्रकाशवान बनाती है। हमारे अंतस में प्रज्ञा लाती है। हम संस्कारवान शिक्षा से सामाजिक बनते हैं। प्रज्ञावान व्यक्ति सुंदर समाज का निर्माण करते हैं। शिक्षा सदाचारी व शीलवान बनाती है। शिक्षा हमें सत्य और सन्मार्ग पर ले जाती है। शिक्षा के ज्ञान से हम अनेक समाज और राष्ट्रों के विषय में अध्ययन कर पाते हैं । संस्कृतियों, सभ्यताओं को जानने-समझने का माध्यम शिक्षा ही है। हमारे अंतस में तरह-तरह की शक्तियों के प्रकट होने में शिक्षा ही हमारी सहायक होती है। शिक्षा हमें नैतिक और उच्च आदर्शों की ओर ले जाती है। भारत में शिक्षा के पूर्व विद्या शब्द है। विद्या को ज्ञान कहते हैं । ज्ञान को प्रकाश रूप में हम सब जानते हैं ।
पश्चिमी देश प्रकाश को लाइट कहते हैं। हम भारत में किसी ज्ञानवान व्यक्ति को विद्वान, प्रज्ञावान, विद्यावान कहते हैं। अब तक जो व्यक्त किया जा रहा है, जो व्यक्त हो चुका है, वह किसी अन्य के भीतर घटित हुआ है ,उसकी प्रतीति और अनुभव उसके हैं। दूसरा नहीं जान सकता है जो किसी ने जाना- समझा। जिसके अंतस में ऋषित्व घटित हुआ, वही उसका अधिकारी है । दृष्टा है। उसके अनुभव और जानकारी उसी की है। पढ़ने वाले ,विद्या ग्रहण करने वाले उपासक-आराधक की नहीं है। उसका बताया हुआ हम उसे दोहरा सकते हैं। समाज, व्यक्ति, राष्ट्र के लिए उसका उपयोग कर सकते हैं, पर जो किसी द्रष्टा ने जाना, वह उसके द्वारा उसके सूत्रों से ही प्रकट होता है।
हम सब लगातार प्रयास करते हैं, कि विद्यावान बनें। समाज के लिए उपयोगी बनें, मगर दूसरे के अनुभव हमें प्राय: कठिनाई में डालते हैं । वह उधार के होते हैं। व्यक्ति किसी विशेष शिक्षा के अध्ययन के लिए जाता है, उसे स्मृति में लेकर लगातार प्रयास करता है। वह सफल या असफल होता है । वह किसी बड़ी-छोटी नौकरी में जाता है, मगर वह शिक्षित होकर भी सबके काम नहीं आता है। वह व्यक्तिगत ही रह जाता है। समाज राष्ट्र के निमित्त की बात नहीं करता, जबकि विद्यावान होने का मतलब सर्वजन हिताय होना चाहिए।
प्राचीन यूनानी दार्शनिक प्लेटो को व्यापक रूप से पश्चिमी शिक्षा का जनक माना जाता है। अंग्रेजी में शिक्षा को एजुकेशन कहा जाता है। एजुकेशन शब्द की उत्पत्ति लैटिन भाषा के एजुकेटम शब्द से मानी जाती है, जिसका अर्थ बताया गया है कि आंतरिक को बाहर लाना। आखिर सनातन धर्म में कैसे खोजें कि भारत में प्रज्ञावान , मेधावान बनाने का आरंभ कब हुआ। भारत हमेशा से है। आदि-अनादि है। यहां विद्या का नाम धर्म भी है। अध्यापन भी है। जो विद्या धर्म के मार्ग पर नहीं ले जाती है, वह विद्या नहीं है। कुमार्ग है। शिक्षा का अर्थ है सीखना और जानना। जाने हुए को अन्य को बताना। अब विद्या और शिक्षा को एक समझना और भी लगता है कि द्वंद्व भरा है। हम देख रहे हैं कि लगातार व्यापार या नौकरी के लिए कई दशक से कौशल शब्द का प्रयोग किया जा रहा है। सरकारें कौशल मिशन पर जोर दे रही हैं। विद्यावान व्यक्ति को भारत में बगैर नौकरी चाकरी ही बड़ा माना जाता है। अनेक विद्यावान ऋतम्भरा वाले महापुरुषों की जन्म तिथि नहीं है। सर्टिफिकेट नहीं है। तो भी वे स्मरणीय हैं। उपासना के सुयोग्य हैं।
भारत में सुबह हनुमान चालीसा पाठ अनेक परिवारों में किया जाता है । हनुमान चालीसा में हनुमान को विद्यावान गुनी अति चातुर, राम काज करिबे को आतुर वर्णित है। अब हनुमान जी अपने निजी काम से नहीं है। राम काज में हैं। लोक मंगल में हैं। इसका सीधा अर्थ है कि विद्या हम सबको भव्य और दिव्य बनाती रही है। वह राष्ट्रोन्मुखी है। विद्या दूसरे के जैसा नहीं। प्रत्येक को अपने जैसा निर्मित करती है। महाभारत युद्ध में जब अर्जुन विचलित होकर कहते हैं कि हम युद्ध नहीं करेंगे। हे, केशव आप हमें प्रकाशित करें । यहां पर प्रकाशित अर्थात हमें मार्ग बताएं । ज्ञान और सद्बुुद्धि से भर दें। विद्यावान बनाने की कार्रवाई करें। तब श्री कृष्ण विराट रूप का दर्शन अर्जुन को कराते हैं। सरस्वती विद्या और बुद्धि की देवी हैं। वे हंस पर विराजमान हैं। उन्हें भारतीय वाग्देवी, महाश्वेता, वीणापाणि ज्ञानदा नामों से जाना और आराधन किया जाता है । कवि साहित्यकार, पत्रकार, लेखक सरस्वती की उपासना वंदना अपने गद्य-पद्य की रचना के पूर्व करते हैं। वैदिक साहित्य में विद्या के दो रूप बताए गए हैं। पहली है अपरा विद्या जिसे निम्न श्रेणी में रखा गया है। दूसरी है पराविद्या इसी को आत्म विद्या या ब्रह्म विद्या भी कहा जाता है ।
दयानंद सरस्वती के अनुसार जिस पदार्थ के यथार्थ रूप का ज्ञान हो, उसे विद्या कहते हैं। शिक्षा की समस्या पुस्तक में पृष्ठ 57 में, महात्मा गांधी एक विद्यार्थी के प्रश्न के उत्तर में कहते हैं कि आज हम गुलाम हैं, जिन्होंने हमको पराधीन कर रखा है, उनके फायदे की दृष्टि से हमारी पढ़ाई का कार्यक्रम रखा गया है। हमारे शासकों ने आजकल की शिक्षा के सिलसिले में अनेक प्रलोभन पैदा कर रखे हैं। इसमें संदेह नहीं कि आज के सरकारी शिक्षण में भी कुछ अच्छाई है तो भी सब मिलकर हम चाहें या न चाहें ,उसका उपयोग अनिष्टकारी हो जाता है। धन और पद के लोभ में गुलामी प्यारी लगने लगती है। सा विद्या या विमुक्तये। विद्या वही है जो मुक्त करें । मुक्ति से मतलब इस जीवन में सब तरह की गुलामी से छुटकारा पाना । गांधी ने यह हरिजन सेवक में 1946 में लिखा है। गांधी भी विद्या को मुक्ति का मार्ग बता रहे हैं । आज की शिक्षा हमें मुक्त नहीं करती। वह नौकरी, धन, शासन करने की ओर ले जाती है।
राधाकृष्णन ने शिक्षा का केंद्र विद्यार्थी को माना है। विद्यार्थी में नैतिक, बौद्धिक आध्यात्मिक, सामाजिक आर्थिक व्यावसायिक मूल्यों का संरक्षण करने का प्रयास करना चाहिए । वह कहते हैं प्रेम एवं मानवता का समन्वय होना चाहिए। उनका मानना था कि सही शिक्षा से समाज की अनेक बुराइयों को मिटाया जा सकता है। उन्होंने कहा कि दुनिया के इतिहास को देखेंगे तो पाएंगे कि सभ्यता का निर्माण महान ऋषियों- वैज्ञानिकों के हाथों हुआ है । जो स्वयं विचार करने की सामर्थ्य रखते हैं।ज्ञान हमें शक्ति देता है। प्रेम पूर्णता देता है। वे कहते हैं शिक्षा में न केवल बुद्धि का प्रशिक्षण शामिल होना चाहिए बल्कि हृदय का परिष्कार और आत्मानुशासन भी होना चाहिए।
वर्तमान में भाजपा के नेतृत्व वाली केंद्र की एनडीए सरकार ने 29 जुलाई 2020 को नई शिक्षा नीति बनाई थी। भारत के केंद्रीय मंत्रिमंडल ने स्कूलों से लेकर कॉलेज तक भारतीय शिक्षा प्रणाली में आधुनिक सुधार लाने के उद्देश्यों के आलोक में नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति की स्वीकृति दी थी। साथ ही सरकार ने मानव संसाधन विकास मंत्रालय का नाम भी बदलकर शिक्षा मंत्रालय करने की मंजूरी दी थी। सरकार का कहना था कि पूर्व की शिक्षा नीति में कई खामियां थीं। नई शिक्षा नीति में मातृभाषा में पढ़ाई पर जोर दिया जा रहा है। नई शिक्षा नीति यह मानती है कि बच्चे मूल भाषा को तेजी से समझते हैं। पूर्व में एक समान प्रणाली नहीं थी । उसे अब समाप्त किया गया है। सरकार का दावा है कि नई व्यवस्था में अधिक पारदर्शिता है और देश में शिक्षा प्रणाली की एक ही एजेंसी काम करेगी। इसरो के पूर्व प्रमुख के कस्तूरीरंगन के नेतृत्व में विशेषज्ञों के एक समूह ने भारतीय शिक्षा प्रणाली की कठिनाइयों को देखते हुए यह प्रस्ताव किया था। बाद में मंत्रालय ने मंजूरी दी थी। नई शिक्षा नीति में छात्रों के समग्र विकास के लिए पाठ्यक्रम तैयार करने के साथ उन्हें 21वी सदी के कौशल से लैस किया जाना है। आलोचनात्मक सोच पर जोर देना है। सरकार ने इस बात की चिंता की है कि पिछले कुछ वर्षों में बहुत कम छात्रों ने उच्च शिक्षा का विकल्प चुना। सरकार की नई शिक्षा नीति से शिक्षाविद् और प्रबुद्ध जन आशान्वित हैं कि इससे पूरी शिक्षा प्रणाली के दूरदर्शी परिणाम होंगे।
लेखक:- अरुण कुमार दीक्षित
यह देखकर तथागत उन सबसे बोले, "श्रावकों आप लोगों को आश्चर्य है कि मैंने गणिका के घर कैसे भोजन किया | उसका कारण यह है कि वह यद्यपि गणिका है, किन्तु उसने अपने को पश्चाताप की अग्नि में जलाकर निर्मल कर लिया है | जिस धन को पाने के लिए मनुष्य मनौतियां करता है और न जाने क्या-क्या तरीके इस्तेमाल करता है, उसी को आम्रपाली ने तुच्छ मानकर लात मारी है और अपना घृणित जीवन त्याग दिया है | क्या अब भी उसे हेय माना जाये ? यह सुन सभी शिष्यों को पश्चाताप हुआ और उन्होंने तथागत से क्षमा मांगी|
दिल्ली के एक आईएएस कोचिंग सेंटर में पानी भरने से हुई तीन छात्रों की मौत ने शिक्षण संस्थाओं की कार्यशैली पर फिर बड़ा सवाल खड़ा किया है। सवाल ऐसा जिसका जवाब शायद वो कभी न दे पाएं। क्योंकि ऐसे सवाल हर ऐसी घटना के बादवर्षों से पूछे जा रहे हैं। देशभर के छात्र अपना भविष्य बनाने की चाह लेकर कोचिंग सेंटरों में पहुंचते हैं। भारी भरकम फीस भरते हैं, लेकिन सुविधाओं के नाम पर सिर्फ हादसे और मौत? राजस्थान का कोटा शहर तो हादसों के लिए कुख्यात है ही, उस रास्ते पर अब दिल्ली भी चल पड़ी है। दिल्ली में सिविल सेवाओं की तैयारी का गढ़ माना जाता है। मुखर्जी नगर और राजेंद्र नगर में सालाना हजारों की संख्या में छात्र तैयारी करने जाते हैं। ज्यादातर कोचिंग सेंटर किराये के मकानों में संचालित हैं जिनमें जरूरत की सुविधाएं बिल्कुल भी नहीं होतीं।
राजधानी के ओल्ड राजेंद्र नगर में जिस कोचिंग सेंटर में हादसा हुआ है, वह भी किराये पर था। बेसमेंट में बारिश का पानी हमेशा से भरता रहता था, जिसे सेंटर वालों ने कभी गंभीरता से नहीं लिया। आस-पड़ोस और चश्मदीदों ने बताया कि सेंटर में पानी जमा होने की समस्या पुरानी है। ड्रेनेज की सही व्यवस्था नहीं है और साफ-सफाई भी नियमित रूप से नहीं होती। स्टूडेंट्स के रहने की व्यवस्था भी ठीक नहीं थी। जगह-जगह पर बिजली के तार भी गिरे रहते हैं, जिससे किसी को भी करंट लग सकता है। पिछले सप्ताह दिल्ली में अच्छी बारिश हुई जिसका पानी हादसे वाली राव कोंचिंग में इतना भर गया कि तीन होनहार बच्चे डूबकर मर गए। घटना के वक्त छात्र बेसमेंट में केबिन के भीतर पढ़ाई में मग्न थे, लेकिन उन्हें क्या पता था आज की पढ़ाई उनकी अंतिम होने वाली है। पानी के रूप में बेसमेंट में मौत प्रवेश कर चुकी है। छात्रों को नहीं पता था कि अंदर पानी भर आया है, क्योंकि बेसमेंट में रिसप्शन भी था, सेंटरकर्मी भी कई मौजूद थे, लेकिन अंदर पानी भरता देख वह छात्रों की सहायता करने के बजाय भाग खड़े हुए। घटना के वक्त राव कोचिंग का मुख्य संचालनकर्ता भी मौजूद था, वो भी भाग निकला। अगर ये लोग बच्चों को बचाने का प्रयास करते तो शायद उनकी जान बच जाती। लेकिन उन्होंने ऐसा करना मुनासिब नहीं समझा।
दिल्ली में कुकुरमुत्तों की भांति अब कोचिंग सेंटर संचालित हो चुके हैं। यूपीएससी, बैंकिंग, एनडीए, सैनिक, डिफेंस अकादमी आदि परीक्षाओं की तैयारी करने विभिन्न राज्यों से बच्चे दिल्ली पहुंचते हैं। दिल्ली में कोचिंग सेंटरों में छात्रों के हताहत होने की ये पहली घटना नहीं है, पूर्व में भी कई ऐसी घटनाएं हुईं, लेकिन पूर्ववर्ती घटनाओं से न प्रशासन ने कुछ सीखा और न ही कोचिंग संचालनकर्ताओं ने कुछ सबक लिया। सेंटर छात्रों से मोटी फीस वसूलते हैं, यूपीएससी के छात्रों से तो मुंह मांगा? छात्र और उनके परिजन उज्ज्वल सपनों का ख्याल करते हुए सभी मांगे पूरी करते हैं। पर, कोचिंग वालों को पढ़ाई के अलावा सुरक्षा संबंधित जो सुविधाएं बच्चों को मुहैया करवानी चाहिए, वो नहीं करते। कोचिंग वालों को सिर्फ शिक्षा के नाम पर धंधा करना होता है। इनके तार पुलिस और सफेदपोशों तक होते हैं ताकि कोई अनहोनी घटना होने पर सुलझा लिया जाए। दिल्ली की घटना के बाद हादसा करने वाला कोचिंग सेंटर का मालिक भी इसी के जुगत में है। उसके संबंध विभिन्न राजनीतिक दलों से बताए गए हैं, स्थानीय पुलिस में भी उसकी अच्छी सांठगांठ है।
बहरहाल, मन को झकझोर देने वाली घटना ने पूरे देश में कोहराम मचाया हुआ है। घटना से आक्रोशित सैकड़ों छात्र घटनास्थल पर धरने पर हैं। उनका दर्द शायद कोई समझ पाए, क्योंकि उन्होंने अपने तीन साथियों को खोया है। मृतक छात्रों के परिवारों को देखकर रूह कांपने लगती है। परिजन दिल्ली पहुंचकर बिलख रहे हैं। उन्होंने अपने दिल के टुकड़ों को भविष्य बनाने के लिए दिल्ली भेजा था, लेकिन प्रभु की लीला देखो, अपने कलेजे के टुकड़ों के शव लेकर घरों को लौट रहे हैं। हताहतों में एक छात्रा यूपी के अंबेडकरनगर और दूसरी तेलंगाना की तो वहीं तीसरा छात्र केरल के एर्नाकुलम का था। उत्तर प्रदेश की छात्रा श्रेया यादव के पिता दूध बेचते हैं, उनका सपना था बेटी अफसर बने।
दिल्ली सरकार ने घटना के संबंध में बेशक मजिस्ट्रेट जांच के आदेश दिए हों, लेकिन मृतक छात्रों के साथी चीख-चीख बोल रहे हैं कि घटना कोचिंग वालों की लापरवाही से हुई। घटना की सच्चाई एकदम सामने है। घटना बीते शनिवार को उस वक्त घटी जब कुछ छात्र पढ़ाई में मग्न थे, तभी बेसमेंट में पानी घुसा। बेसमेंट से निकलने का एक ही रास्ता था, जहां से पानी अंदर आया। दूसरा कोई रास्ता नहीं था। पानी घुसता देख कोचिंग कर्मी खुद की जान बचाकर भाग निकले, लेकिन बेसमेंट के केबिन में पढ़ रहे छात्रों को नहीं बचाया। मृतकों के नाम श्रेया यादव, तान्या सोनी और निविन हैं, तीनों यूपीएससी की तैयारी करते थे। पुलिस ने कोचिंग सेंटर के संचालकों पर गंभीर धाराओं में मुकदमा दर्ज किया है और दिल्ली की मंत्री अतिशी ने घटना पर दुख जताते हुए, दोषियों पर कड़ी कार्रवाई का आश्वासन दिया है। लेकिन ये सब उस जख्म को कभी नहीं भर सकते जो मृतकों के परिवारों को मिल चुके हैं। कोचिंग सेंटरों को अपनी कार्यशैली बदलनी होगी, सिर्फ कमाई का जरिया सेंटरों को नहीं समझना चाहिए। छात्रों की सुरक्षा और सुविधाओं पर ध्यान देना होगा।
घटना होने के बाद कोचिंग मालिकों और शिक्षकों का रवैया भी हैरान करता है। इतने बड़े हादसे के बाद भी एक भी शिक्षक छात्रों के समर्थन में खड़ा नहीं दिखाई दिया, सभी फरार हैं। कोचिंग सेंटरों में हादसे होने की एक बड़ी सच्चाई ये भी है, ज्यादातर सेंटर बेसमेंट में हैं और लाइब्रेरियां भी उन्हीं में है। ऐसा राजनीतिक नेताओं, एमसीडी अधिकारी और जमीन मालिकों के बीच सांठगांठ से संभव होता है। दिल्ली के करीब 90 फीसदी कोचिंग सेंटरों की लाइब्रेरी बेसमेंट में है। इसके अलावा कोचिंग में पढ़ने वाले छात्र छोटे-छोटे कमरों में रहते हैं जिनमें न खिड़कियां होती हैं और न घटना होने पर निकलने की कोई आपात सुविधाएं। दिल्ली में कोचिंग सेंटरों के पास उपयुक्त इन्फ्रॉस्ट्रक्चर नहीं हैं, उन्होंने सड़कों पर अतिक्रमण किया हुआ है। दीवारें होर्डिंग से पाट रखी हैं। क्या ये सब एमसीडी अधिकारियों को नहीं दिखाई देता? कुल-मिलाकर ऐसे हादसे राजनीतिक पहुंच, एमसीडी और कोचिंग संस्थानों के मालिकों के बीच गठजोड़ का ही नतीजा होते हैं। घटना के बाद कई कोचिंग सेंटरों को सील किया गया है, जांच के नाम पर धरपकड़ तेज हुई है। लेकिन ये तभी तक है जब तक घटना का शोर रहेगा, शोर शांत होते ही कोचिंग वाले फिर से एक्टिव हो जाएंगे। जनता और व्यवस्था नए हादसे का इंतजार करेगी।
लेखक :- डॉ. रमेश ठाकुर
ईश्वर चन्द्र विद्यासागर एक महान समाज सुधारक , विद्वान, लेखक , परोपकारी थे | अपनी आर्थिक स्थिति कमजोर होने के बावजूद उन्होंने अपनी मेहनत से छात्रवृत्ति प्राप्त की और एक संस्कृत महाविद्यालय में शिक्षा प्राप्त की , और अपनी मेहनत और लगन के कारण वह संस्कृत महाविद्यालय में प्राचार्य बने और प्राचार्य बनने के बाद उन्होंने शिक्षा और उसके माध्यम में कई महत्वपूर्ण बदलाव किये उन्होंने बंगाली और अंग्रेजी को भी शिक्षा का माध्यम बनाया|
जन्म :-
ईश्वर चंद्र का जन्म 26 सितंबर 1820 को मिदनापुर जिले के बिरसिंहा गांव में एक बहुत गरीब ब्राह्मण परिवार में हुआ था। उनके पिता श्री ठाकुरदास बंद्योपाध्याय थे । गांव की पाठशाला में प्रारंभिक स्कूली शिक्षा के बाद, उन्होंने 1829 में सरकारी संस्कृत कॉलेज में प्रवेश लिया। 1841 तक संस्कृत कॉलेज में उनका करियर संस्कृत अध्ययन की विभिन्न शाखाओं में उनकी अद्भुत उपलब्धियों के लिए जाना जाता है। वे आसानी से प्रथम स्थान पर थे और अपनी छात्रवृत्ति के लिए स्कूल में अनगिनत पुरस्कार जीते।
समाज मे योगदान :-
ईश्वर चन्द्र विद्यासागर जी ने महिलाओ के हित में कई कार्य किये उन्होंने उसी प्रकार विधवा पुनर्विवाह के लिए प्राचीन टिप्पणियों और धर्मग्रंथो का उपयोग किया था जिस प्रकार राजा राम मोहन रॉय ने सती प्रथा के उन्मूलन करने के लिए उपयोग किया था और विद्यासागर जी ने महिलाओ के लिए xv अधिनियम 1856 का प्रस्ताव रखा जिसमे बाल विवाह को समाप्त करने व विधवा पुनर्विवाह को बढ़ावा दिया गया था |
ईश्वर चंद्र विद्यासागर ने बहुविवाह का भी विरोध और आंदोलन किया 1857 में, बर्दवान के महाराजा ने कुलीन ब्राह्मणों में बहुविवाह पर प्रतिबंध लगाने की मांग करते हुए सरकार के समक्ष एक याचिका प्रस्तुत की, जिस पर 25,000 हस्ताक्षर प्राप्त हुए।सिपाहियों के विद्रोह के कारण इस याचिका पर कार्रवाई स्थगित करनी पड़ी, लेकिन विद्यासागर ने 1866 में एक नई याचिका प्रस्तुत की, इस बार 21,000 हस्ताक्षरकर्ताओं के साथ।प्रसिद्ध तर्कवादी विद्यासागर ने 1870 के दशक में बहुविवाह की दो उत्कृष्ट आलोचनाएँ लिखीं।उन्होंने सरकार से तर्क दिया कि चूंकि बहुविवाह को पवित्र ग्रंथों में मान्यता नहीं दी गई है, इसलिए इसे कानून बनाकर समाप्त करने पर कोई आपत्ति नहीं हो सकती।
कृतिया :-
• ईश्वर चन्द्र विद्यासागर ने बंगाली भाषा मे कई रचनाये की हैं जिनमे से “बोर्नो परिचोय” एक ऐसी रचना हैं जिसमे बंगाली वर्णमाला का परिचय हैं और यह आज भी एक बंगाली बच्चे को सबसे पहले दी जाने वाली पहली पुस्तक हैं |
• विद्यासागर के सामाजिक सुधार कार्यों में विधवाओं पर ‘बिधोबाबिवाह’ में पुनर्विवाह का अधिकार, 1871 में बहुविवाह के निषेध पर ‘बाहुबिवाह’ और बाल विवाह की खामियों पर ‘बल्याबिवाह’ शामिल हैं।
• उपकारमोनिका और ब्याकरण कौमुदी उनकी दो पुस्तकें थीं जिन्होंने कठिन संस्कृत व्याकरण अवधारणाओं का बंगाली में अनुवाद किया।
• बंगाली वर्णमाला के पुनर्निर्माण का श्रेय उन्हीं को जाता है। उन्होंने संस्कृत स्वरों को समाप्त कर दिया और बंगाली टाइपोग्राफी को 12 स्वरों और 40 व्यंजनों में सरल बना दिया।
ईश्वर चन्द्र विद्यासागर का निधन 29 जुलाई 1891 को हुआ। विद्यासागर की मृत्यु के कुछ समय बाद, रवींद्रनाथ टैगोर ने उनके बारे में श्रद्धापूर्वक लिखा: "यह आश्चर्य की बात है कि भगवान ने चालीस मिलियन बंगालियों को पैदा करने की प्रक्रिया में एक आदमी को कैसे पैदा किया!" आज भी ईश्वर चन्द्र विद्यासागर
को बड़े ही सम्मन से याद किया जाता हैं |
हर साल लाखों कांवड़िए करते हैं जलाभिषेक
ऋषिकेश में स्थित नीलकंठ महादेव मंदिर भगवान शिव को समर्पित सबसे प्रतिष्ठ मंदिरों में से एक है। इस मंदिर तक पहुंचने के लिए कई तरह के पहाड़ और नदियों से होकर गुजरना पड़ता है। साथ ही यह मंदिर प्रमुख पर्यटन स्थल में से एक है। पौड़ी गढ़वाल जिले के मणिकूट पर्वत पर स्थित मधुमती और पंकजा नदी के संगम पर स्थित इस मंदिर के दर्शन करने के लिए सावन मास में हर साल लाखों शिवभक्त कांवड़ में गंगाजल लेकर जलाभिषेक के लिए पहुंचते हैं। मान्यता है कि सावन सोमवार के दिन नीलकंठ महादेव के दर्शन करने से मोक्ष की प्राप्ति होती है।
भगवान शिव ने किया विष का पान
इस मंदिर को लेकर पौराणिक कथा भी है। कथा के अनुसार, समुद्र मंथन से निकली चीजें देवताओं और असुरों में बंटती गईं लेकिन तभी हलाहल नाम का विष निकला। इसे न तो देवता चाहते थे और ना ही असुर। यह विष इतना खतरनाक था कि संपूर्ण सृष्टि का विनाश कर सकता था। इस विष की अग्नि से दसों दिशाएं जलने लगी थीं, जिससे संसार में हाहाकार मच गया। तभी भगवान शिव ने पूरे ब्रह्मांड को बचाने के लिए विष का पान किया। जब भगवान शिव विष का पान कर रहे थे, तब माता पार्वती उनके पीछे ही थीं और उन्होंने उनका गला पकड़ लिया, जिससे विष न तो गले से बाहर निकला और न ही शरीर के अंदर गया।
वृक्ष के नीचे समाधि में लीन हो गए महादेव
विष भगवान शिव के गले में ही अटक गया, जिसकी वजह से उनका गला नीला पड़ गया और फिर महादेव नीलकंठ कहलाएं। लेकिन विष की उष्णता (गर्मी) से बेचैन भगवान शिव शीतलता की खोज में हिमालय की तरफ बढ़ चले गए और वह मणिकूट पर्वत पर पंकजा और मधुमती नदी की शीतलता को देखते हुए नदियों के संगम पर एक वृक्ष के नीचे बैठ गए थे। जहां वह समाधि में पूरी तरह लीन हो गए और वर्षों तक समाधि में ही रहे
इस तरह जगह का नाम पड़ा नीलकंठ महादेव
माता पार्वती भी पर्वत पर बैठकर भगवान शिव की समाधि का इंतजार करने लगीं। लेकिन कई वर्षों बाद भी भगवान शिव समाधि में लीन ही रहे। देवी-देवताओं की प्रार्थना करने के बाद भोलेनाथ ने आंख खोली और कैलाश पर जाने से पहले इस जगह को नीलकंठ महादेव का नाम दिया। इसी वजह से आज भी इस स्थान को नीलकंठ महादेव के नाम से जाना जाता है। जिस वृक्ष के नीचे भगवान शिव समाधि में लीन थे, आज उस जगह पर एक विशालकाय मंदिर है और हर साल लाखों की संख्या में शिव भक्त इस मंदिर के दर्शन करने के लिए आते हैं।
