वास्तविकता में इस कावड़ यात्रा और योगी सरकार से जुड़ा सही तथ्य यही है कि इस आदेश का उद्देश्य कांवड़ यात्रा के दौरान सार्वजनिक सुरक्षा और व्यवस्था सुनिश्चित करना है, क्योंकि इस तीर्थयात्रा में बड़ी संख्या में सनातन धर्म को माननेवाले हिन्दू भक्त शामिल होते हैं। योगी सरकार ने शीर्ष अदालत से कहा, "शांतिपूर्ण और सौहार्दपूर्ण तीर्थयात्रा सुनिश्चित करने के लिए निवारक उपाय करना अनिवार्य है।"
वस्तुत: अब ऐसे में कहना यही होगा कि अब भले ही इस मामले में सुप्रीम कोर्ट कांवड़ यात्रा के लिए 'नेमप्लेट' लगाने के आदेश पर रोक लगा दे और यह कहे कि नाम लिखना या नहीं लिखना दुकानदार की अपनी इच्छा पर निर्भर है, किंतु यह भी सच है कि जो योगी सरकार कह रही है, वह भी एक सच्चाई है, जिसे कि किसी भी हाल में नकारा नहीं जा सकता है। अभी कुछ बुरी घटना घट जाएगी तो पूरा ठीकरा योगी सरकार के माथे फोड़ा जाएगा। मीडिया एवं समाज का एक बहुत बड़ा वर्ग बड़े-बड़े शीर्षक लिखकर सिर्फ यूपी सरकार को कटघरे में खड़ा करने का काम करता दिखेगा। स्वभाविक है, सरकार किसी भी प्रकार का फसाद नहीं चाहती है। इसलिए सरकार ने जो निर्णय लिया, एक नजर में तो वह सही निर्णय ही समझ आता है।
अब न्यायमूर्ति ऋषिकेश रॉय और न्यायमूर्ति एसवीएन भट्टी की पीठ उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड और मध्य प्रदेश की सरकारों को खूब नोटिस जारी करे, उनसे पूछे, सवाल-जवाब करे, किंतु न्यायालय भी यह समझेगा जरूर कि आखिर किसी एक मत, पंथ, मजहब के मौलिक अधिकार और उसकी श्रद्धा के बिन्दू नहीं होते। दूसरे के भी हैं, जिनकी रक्षा करने का अधिकार हर भारतीय को भारतीय संविधान देता है और न्यायालय उसी संविधान में वर्णित नियमों के संरक्षण के लिए है। अब उम्मीद करें कि जो हलाल के नाम पर गैर मुसलमानों को मीट परोसा जाता है, साथ ही जो शकाहारी खाद्य सामग्री एवं वस्त्र, इत्यादि अन्य आवश्यक वस्तुओं को देश् भर में बेचा जा रहा है, उसे भी न्यायालय संज्ञान में लेकर बंद कराएगा। क्योंकि भावनाएं तो हिन्दू समाज की भी आहत होती हैं, जोकि इस देश का बहुसंख्यक समाज है।
लेखक:- डॉ. मयंक चतुर्वेदी
