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भले ही सुप्रीम कोर्ट का निर्णय जो भी हो, किंतु योगी सरकार की इन दलीलों को नकारा नहीं जा सकता

Date : 27-Jul-2024

कांवड़ यात्रा के दौरान 'नाम नहीं बताएंगे' वाले मामले पर सुप्रीम कोर्ट का निर्णय जो भी रहे, किंतु जो उत्‍तर उच्‍चतम न्‍यायालय में  उत्तर प्रदेश सरकार ने दिया है। उसे कोई चाहकर भी नकार नहीं सकता है। वस्‍तुत: योगी आदित्यनाथ सरकार ने सर्वोच्च न्यायालय के सामने यह साफ कर दिया है कि आखिर इस तरह के निर्णय की जरूरत सरकार को पड़ी ही क्‍यों! इसमें बताया गया है कि कांवड़ यात्रा मार्ग पर स्थित दुकानों पर मालिकों के नाम प्रदर्शित करने का आदेश यह सुनिश्चित करने के लिए दिया गया है कि कांवड़ियों की धार्मिक भावनाओं को, "गलती से भी" ठेस न पहुंचे, तथा यह "शांति और सौहार्द" बनाए रखने के लिए भी है। यह निर्देश दुकानों और भोजनालयों के नामों के कारण उत्पन्न भ्रम के संबंध में कांवड़ियों से प्राप्त शिकायतों के जवाब में जारी किया गया है।

यूपी सरकार ने यहां बताया है कि "अतीत की घटनाओं से पता चला है कि बेचे जा रहे खाद्य पदार्थों के प्रकार के बारे में गलतफहमी के कारण तनाव और अशांति पैदा होती रही है। ये निर्देश ऐसी स्थितियों से बचने के लिए एक सक्रिय उपाय हैं।" यूपी सरकार ने कहा कि यह आदेश खाद्य विक्रेताओं के व्यापार या व्यवसाय पर कोई प्रतिबंध नहीं लगाता है, मांसाहारी भोजन की बिक्री पर प्रतिबंध को छोड़कर और दुकानदार अपना व्यवसाय सामान्य रूप से करने के लिए स्वतंत्र हैं।" वास्‍तव में कावड़ यात्रा के मार्ग में मालिकों के नाम प्रदर्शित करने का निर्देश पारदर्शिता सुनिश्चित करने और किसी भी संभावित भ्रम को दूर रखने के लिए "केवल एक अतिरिक्त उपाय" है।
वस्‍तुत: यह अनेक अवसरों पर काबड़ यात्रा के दौरान देखने में आता रहा है कि कैसे छोटी-छोटी बातें बाद में बड़े सांप्रदाय‍िक झगड़े में बदलती रही हैं। उदाहरणस्‍वरूप मुज़फ्फर नगर को ले सकते हैं, यहां पर 42 फीसद मुस्लिम आबादी है, वहां पहले भी साम्‍प्रदायिक दंगे होते देखे गए हैं, ऐसे में यह सरकार की जिम्‍मेदारी बनती है क‍ि पूरा आयोजन शांत‍ि के साथ सम्‍पन्‍न कराए। यहां योगी सरकार ने कहा भी है कि कांवड़ियों को परोसे जाने वाले भोजन से संबंधित "छोटी-मोटी भ्रांतियां" भी "उनकी धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचा सकती हैं और इससे तनाव बढ़ सकता है। खासकर मुजफ्फरनगर जैसे सांप्रदायिक रूप से संवेदनशील क्षेत्र में ये फैसला एहतियातन लिया गया है।" इसलिए "यह ध्यान देने योग्य है कि निर्देश धर्म, जाति या समुदाय के आधार पर कोई भेदभाव नहीं करता है। मालिकों के नाम और पहचान प्रदर्शित करने की आवश्यकता कांवड़ यात्रा मार्ग पर सभी खाद्य विक्रेताओं पर समान रूप से लागू होती है, चाहे उनका धार्मिक या सामुदायिक जुड़ाव कुछ भी हो।"

वास्‍तविकता में इस कावड़ यात्रा और योगी सरकार से जुड़ा सही तथ्‍य यही है कि इस आदेश का उद्देश्य कांवड़ यात्रा के दौरान सार्वजनिक सुरक्षा और व्यवस्था सुनिश्चित करना है, क्योंकि इस तीर्थयात्रा में बड़ी संख्या में सनातन धर्म को माननेवाले हिन्‍दू भक्‍त शामिल होते हैं। योगी सरकार ने शीर्ष अदालत से कहा, "शांतिपूर्ण और सौहार्दपूर्ण तीर्थयात्रा सुनिश्चित करने के लिए निवारक उपाय करना अनिवार्य है।"

वस्‍तुत: अब ऐसे में कहना यही होगा कि अब भले ही इस मामले में सुप्रीम कोर्ट कांवड़ यात्रा के लिए 'नेमप्लेट' लगाने के आदेश पर रोक लगा दे और यह कहे कि नाम लिखना या नहीं लिखना दुकानदार की अपनी इच्‍छा पर निर्भर है, क‍िंतु यह भी सच है कि जो योगी सरकार कह रही है, वह भी एक सच्‍चाई है, जिसे कि किसी भी हाल में नकारा नहीं जा सकता है। अभी कुछ बुरी घटना घट जाएगी तो पूरा ठीकरा योगी सरकार के माथे फोड़ा जाएगा। मीडिया एवं समाज का एक बहुत बड़ा वर्ग बड़े-बड़े शीर्षक लिखकर सिर्फ यूपी सरकार को कटघरे में खड़ा करने का काम करता दिखेगा। स्‍वभाविक है, सरकार क‍िसी भी प्रकार का फसाद नहीं चाहती है। इसलिए सरकार ने जो निर्णय लिया, एक नजर में तो वह सही निर्णय ही समझ आता है।  

अब न्यायमूर्ति ऋषिकेश रॉय और न्यायमूर्ति एसवीएन भट्टी की पीठ उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड और मध्य प्रदेश की सरकारों को खूब नोटिस जारी करे, उनसे पूछे, सवाल-जवाब करे, किंतु न्‍यायालय भी यह समझेगा जरूर कि आखिर किसी एक मत, पंथ, मजहब के मौलिक अधिकार और उसकी श्रद्धा के ब‍िन्‍दू नहीं होते। दूसरे के भी हैं, जिनकी रक्षा करने का अधिकार हर भारतीय को भारतीय संविधान देता है और न्‍यायालय उसी संविधान में वर्णि‍त नियमों के संरक्षण के लिए है। अब उम्‍मीद करें कि जो हलाल के नाम पर गैर मुसलमानों को मीट परोसा जाता है, साथ ही जो शकाहारी खाद्य सामग्री एवं वस्‍त्र, इत्‍यादि अन्‍य आवश्‍यक वस्‍तुओं को देश्‍ भर में बेचा जा रहा है, उसे भी न्‍यायालय संज्ञान में लेकर बंद कराएगा। क्‍योंकि भावनाएं तो हिन्‍दू समाज की भी आहत होती हैं, जोकि इस देश का बहुसंख्‍यक समाज है।



लेखक:- डॉ. मयंक चतुर्वेदी 

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