- डॉ. मयंक चतुर्वेदी
देश भर में इस समय 'इलेक्टरोल बॉन्ड' पर राजनीति हो रही है। भारतीय जनता पार्टी को घेरने के लिए कांग्रेस समेत तमाम राजनीतिक दल इसे चंदे में सबसे बड़ा घोटाला बता रहे हैं। किंतु यह जानकर बड़ा ही आश्चर्य होता है कि जो सत्ता में नहीं हैं, उन्हें सत्ताधारी भाजपा से अधिक संयुक्त राशि मिली है। उसके बाद भी ये राजनीतिक दल पारदर्शिता की बात कर रहे हैं और हल्ला मचा रहे हैं!
21 मार्च को वैश्विक स्तर पर मनाया जाने वाला वानिकी दिवस पेड़ पौधों को संरक्षित करने के लिए समर्पित है | इस दिन सभी लोगों को वनों और पेड़ पौधों के महत्व के बारे में बताया और अनेक कार्यक्रम के माध्यम से पर्यावरण संरक्षण के प्रति जागरूकता उत्पन्न किया जाता है | उन्हें पेड़ों को काटने से रोकने और नए पौधे लगाने के लिए प्रेरित किया जाता है।
प्रतिवर्ष विश्व वानिकी दिवस एक नई थीम के साथ मनाया जाता है। पिछले वर्ष साल 2023 में “वन और स्वास्थ्य” था। इस साल विश्व वानिकी दिवस की थीम फॉरेस्ट एंड इनोवेशन (Forest and Innovation) रखी गई है। इसका हिंदी अर्थ है “वन एवं नवाचार।”
अंतर्राष्ट्रीय वानिकी अनुसंधान केंद्र (CIFOR) ने 2012 में छह वन दिवस शुरू किए | पहला वन दिवस 2007 में संयुक्त राष्ट्र फ्रेमवर्क कन्वेंशन ऑन क्लाइमेट चेंज (यूएनएफसीसीसी) में बाली, इंडोनेशिया में आयोजित किया गया था | दूसरा वन दिवस 2008 में पोलैंड में आयोजित किया गया था | इसमें 900 से अधिक प्रतिभागियों ने जलवायु परिवर्तन पर चर्चा की थी | तीसरा वन दिवस डेनमार्क के कोपेनहेगन में आयोजित किया गया | इस बार हितधारकों की संख्या 1500 थी जिसमें 500 गैर सरकारी संगठन के सदस्य शामिल थे | चौथा वन दिवस मेक्सिको के कैनकन में आयोजित किया गया | विषय को 'कार्य करने का समय' चुना गया था | पांचवां आयोजन डरबन, दक्षिण अफ्रीका में हुआ जिसमें 80 देशों के 1000 से अधिक लोगों ने भाग लिया | छठा वन दिवस 2012 में दोहा, कतर में आयोजित किया गया था | अनुकूलन और मरुस्थलीकरण के लिए वित्तपोषण जैसे मुद्दों पर चर्चा की गई थी | छह अंतर्राष्ट्रीय वन दिवसों के बाद 2012 को संयुक्त राष्ट्र महासभा में अंतर्राष्ट्रीय वन दिवस या विश्व वानिकी दिवस घोषित किया गया |
अंतर्राष्ट्रीय वन दिवस मनाने का मूल उद्देश्य लोगों को पेड़ों के महत्व के बारे में बताना है। दुनिया आजकल जिस सबसे नाजुक दौर से गुजर रही है वह जलवायु परिवर्तन के रूप में एक जटिलता है। ओजोन का अनुपात खतरनाक स्तर तक कम हो गया है जबकि इसके पीछे एकमात्र कारण पृथ्वी पर मानवीय गतिविधियों के परिणामस्वरूप प्रदूषण है। वैकल्पिक साधन होने के बावजूद, ऑक्सीजन के ये उत्पादक और प्रदाता बुरी तरह प्रभावित हैं और औद्योगिक और घरेलू उपयोग के लिए विस्थापित हो रहे हैं। तापमान में खतरनाक वृद्धि और मौसमी चक्र में प्रतिकूलता हमारे ग्रह पर कमजोर विनाश और जीवन की गिरावट का एक स्पष्ट संकेत है। संयुक्त राष्ट्र के अनुपालन के अन्य उद्देश्यों में, इस समय जलवायु परिवर्तन से निपटना प्रारंभिक श्रेणियों में आता है और यही इस दिन को अधिक जुनून, उत्साह और दृढ़ संकल्प के साथ मनाने का प्रतीक है। इस दिन का उद्देश्य प्रत्येक व्यक्ति से आग्रह करना है कि वह अपनी ओर से इस ग्रह को सुरक्षित करने में अपना योगदान दे।
भारत के सन् 1857 के स्वतंत्रता संग्राम में संपूर्ण भारत में किसी भी राजघराने परिवार से प्रथम महिला बलिदान 20 मार्च सन् 1858 वीरांगना क्षत्राणी..रानी अवंतीबाई लोधी का रहा है....(क्योंकि झाँसी की वीरांगना रानी लक्ष्मीबाई का बलिदान 18 जून 1858 को और बेगम हजरत महल की मृत्यु 7 अप्रैल 1879 को हुई थी ) आज उनके बलिदान दिवस पर शत् शत् नमन है |
अब हकीकत क्या है?
रानी अवंतीबाई लोधी ने अंग्रेजों से लगातार 9 माह संघर्ष किया है.. जिसमें 6 प्रमुख युद्ध लड़े(देवहारगढ़ के जंगलों में छापामार युद्धों के अतिरिक्त) .. जिसमें 5 युद्धों में अंग्रेजों के धूल चटाई.. 4 माह तक मंडला डिप्टी कमिश्नरी में अंग्रेजों को अपदस्थ कर शासन चलाया। 20 मार्च 1858 को छठवें प्रमुख युद्ध में अपनी अंगरक्षिका गिरधाबाई के साथ स्वत:प्राणोत्सर्ग कर स्वतंत्रता संग्राम में पूर्णाहुति दी..अद्भुत एवं अद्वितीय प्रकाशन के लिए लिए नई दुनिया समाचार पत्र का आभार..नई दुनिया समाचार पत्र के वरेण्य पत्रकार श्रीयुत तरुण मिश्रा एवं उदीयमान पत्रकार श्रीयुत दीपक जैन जी का अनंत कोटि आभार। विस्तार से आलेख अविलंब आज ही प्रेषित होगा।
लेखक:- डाॅ आनंद सिंह राणा
महाशिवरात्रि और होली में बीच में आने वाला आमलकी एकादशी व्रत का सनातन धर्म में विशेष महत्व है | यह फाल्गुन शुक्ल पक्ष को मनाई जाती है | इस दिन भगवान विष्णु के साथ आंवला के पूजा अर्चना का विधान है | धार्मिक मान्यताओं के अनुसार आंवला के वृक्ष की उत्पत्ति भगवान विष्णु के मुख से हुई थी इसलिए इस पेड़ को भगवान विष्णु का प्रिय माना जाता है | इस दिन भगवान विष्णु और आंवला का विधि विधान और सच्चे मन से आराधना करने से जीवन के सारे दुख दूर होते हैं और मोक्ष की प्राप्ति होती है |
आमलकी एकादशी की तिथि
आमलकी एकादशी की शुरुआत 20 मार्च, 2024 दोपहर 12 बजकर 21 मिनट से होगी, वहीं आमलकी एकादशी का समापन 21 मार्च, 2024 को 02 बजकर 22 मिनट पर होगा।
हे धात्री! तुम ब्रह्मस्वरूप हो, तुम ब्रह्माजी द्वारा उत्पन्न हुए हो और समस्त पापों का नाश करने वाले हो, तुमको नमस्कार है। अब तुम मेरा अर्घ्य स्वीकार करो। तुम श्रीराम चन्द्रजी द्वारा सम्मानित हो, मैं आपकी प्रार्थना करता हूं, अत: आप मेरे समस्त पापों का नाश करो। उस मंदिर में सब ने रात्रि को जागरण किया।
रात के समय वहां एक बहेलिया आया, जो अत्यंत पापी और दुराचारी था। वह अपने कुटुम्ब का पालन जीव-हत्या करके किया करता था। भूख और प्यास से अत्यंत व्याकुल वह बहेलिया इस जागरण को देखने के लिए मंदिर के एक कोने में बैठ गया और विष्णु भगवान तथा एकादशी माहात्म्य की कथा सुनने लगा। इस प्रकार अन्य मनुष्यों की भांति उसने भी सारी रात जागकर बिता दी।
प्रात:काल होते ही सब लोग अपने घर चले गए तो बहेलिया भी अपने घर चला गया। घर जाकर उसने भोजन किया। कुछ समय बीतने के पश्चात उस बहेलिए की मृत्यु हो गई।
मगर उस आमलकी एकादशी के व्रत तथा जागरण से उसने राजा विदूरथ के घर जन्म लिया और उसका नाम वसुरथ रखा गया। युवा होने पर वह चतुरंगिनी सेना के सहित तथा धन-धान्य से युक्त होकर 10 हजार ग्रामों का पालन करने लगा।
वह तेज में सूर्य के समान, कांति में चन्द्रमा के समान, वीरता में भगवान विष्णु के समान और क्षमा में पृथ्वी के समान था। वह अत्यंत धार्मिक, सत्यवादी, कर्मवीर और विष्णु भक्त था। वह प्रजा का समान भाव से पालन करता था। दान देना उसका नित्य कर्तव्य था।
एक दिन राजा शिकार खेलने के लिए गया। दैवयोग से वह मार्ग भूल गया और दिशा ज्ञान न रहने के कारण उसी वन में एक वृक्ष के नीचे सो गया। थोड़ी देर बाद पहाड़ी म्लेच्छ वहां पर आ गए और राजा को अकेला देखकर मारो, मारो शब्द करते हुए राजा की ओर दौड़े। म्लेच्छ कहने लगे कि इसी दुष्ट राजा ने हमारे माता, पिता, पुत्र, पौत्र आदि अनेक संबंधियों को मारा है तथा देश से निकाल दिया है अत: इसको अवश्य मारना चाहिए |
महर्षि वशिष्ठ बोले कि हे राजन्! यह आमलकी एकादशी के व्रत का प्रभाव था। जो मनुष्य इस आमलकी एकादशी का व्रत करते हैं, वे प्रत्येक कार्य में सफल होते हैं और अंत में विष्णुलोक को जाते हैं।
आमलकी एकादशी का व्रत अपने आप में बहुत फलदायी होता है। आमलकी का व्रत करने के पहले दिन व्रती को दशमी की रात्रि में एकादशी व्रत के साथ भगवान विष्णु का ध्यान करते हुए सोना चाहिए। जिसके बाद अगले दिन यानि आमलकी एकादशी के दिन सुबह स्नान करके भगवान विष्णु की प्रतिमा के समक्ष हाथ में तिल, कुश, मुद्रा और जल लेकर संकल्प करें कि मैं भगवान विष्णु की प्रसन्नता एवं मोक्ष की कामना से आमलकी एकादशी का व्रत रखता/रखती हूं। मेरा यह व्रत सफलतापूर्वक पूरा हो इसके लिए श्रीहरि मुझे अपनी शरण में रखें। तत्पश्चात भगवान विष्णु का ध्यान कर मंत्र का उच्चारण करना चाहिए। भगवान की पूजा के पश्चात पूजन सामग्री लेकर आंवले के वृक्ष की पूजा करनी चाहिए। सबसे पहले वृक्ष के चारों ओर की भूमि को साफ करें और उसे गाय के गोबर से पवित्र करें। पेड़ की जड़ में एक वेदी बनाकर उस पर कलश स्थापित करें। इस कलश में देवताओं, तीर्थों एवं सागर को आमंत्रित करें। कलश में सुगंधी और पंच रत्न रखें। इसके ऊपर पंच पल्लव रखें फिर दीप जलाकर रखें। कलश पर श्रीखंड चंदन का लेप करना और वस्त्र पहनाना चाहिए। अंत में कलश के ऊपर श्री विष्णु के छठे अवतार परशुराम की मूर्ति स्थापित करें और विधिवत रूप से परशुरामजी की पूजा करें। रात्रि में भगवत कथा व भजन-कीर्तन करते हुए प्रभु का स्मरण करें। द्वादशी के दिन सुबह ब्राह्मण को भोजन करवा कर दक्षिणा दें साथ ही परशुराम की मूर्ति सहित कलश ब्राह्मण को भेंट करना चाहिए। इन क्रियाओं के पश्चात उपवास खोल कर अन्न जल ग्रहण करना चाहिए।
