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“भक्ति वह है जो ज्ञान उत्पन्न करती है; ज्ञान वह है जो स्वतंत्रता को गढ़ता है” – तुलसीदास

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कला एवं संस्कृति

Date : 24-Sep-2022

"किसी भी देश के विकास में कला एवं संस्कृति का महत्वपूर्ण योगदान होता है। यह दृष्टिकोण मुल्य प्रथा संव निश्चित लक्ष्य दिखाता है।" सभी आर्थिक, सामाजिक एंव अन्य गतिविधियों में संस्कृति एंव रचनात्मकता का समावेश होता है।, विविधताओं का देश, भारत अपनी विभिन्न संस्कृतियों के लिए जाना जाता है।

"भारत देश की असली पहचान उसकी विविध संस्कृति से है। भारत भवने गीत, संगीत, नृत्य, रंगमंच, लोक परम्पराओ, प्राचीन कला, संस्कार, अनुष्ठान, चित्रकला और लेखन के लिए 'पुरे विश्व में अमूर्त सांस्कृतिक विरासत के रूप में जाना जाता है इसलिए भारतीय कला और संस्कृति पुरी दुनिया में लोक प्रिय है।
"भारतीय संस्कृति का आदि स्त्रोत वैदिक दर्शन है, इसी दर्शन से संस्कृति का विकास हुआ है।
 
संस्कृति समाज और जीवन के विकास के मुल्यो का सम्यक संरचना है। यह समाज में अन्तर्निहित गुणो और उच्चतम आदर्शी के समग्र रूप का नाम है, जो उस समाज को सोचने-विचारने,कार्य करने,खाने- पीने,नृत्य, गायन, साहित्य कला, वास्तु, आदि में परिलक्षित होती है।"
 
"भारत की प्राकृतिक विविधता (हिमालय पर्वत, समुद्र संव रेगिस्तान) विश्व के अन्य देशो से नजदिकी सम्बन्ध बनाने में कभी बाधक नही बनी,भारतीय लोगो ने सुंदर देशों की यात्राएं की और वे जहां भी गये वहां उन्होने भारतीयसंस्कृति की अमिट छाप छोड़ी। विशेष रूप से इनका विस्तार मध्य एशिया, दक्षिणी-पूर्व एशिया, एव पूर्व एशिया आदि क्षेत्रों में हुआ।

  •  सांस्कृतिक स्थल के रूप में भारत के द वॉल्ड सिटी ऑफ जयपुर" को विश्व विरासत स्थल का दर्जा मिला है।

  • युनेस्को विश्व विरासत समिति" के 43वे सेशन के दौरान पिंक सिटी जयपुर को दर्जा मिला।

  • सांस्कृतिक विरासत के कुछ उदाहरण: ताज महल, दिलवाड़ा का जैन  मंदिर, निजामुद्दीन औलिया का दरगाह, अमृतसर का स्वर्ण मंदिर !

कला (Art) सिर्फ एक शब्द ही नही है, अपितु इसका व्यापक रूप से अनेक क्षेत्र है, भाषा, संस्कृति, इतिहास साहित्य और समाज में यह अनेक रूपों में स्थापित है।"भारत में कला के रूप में चित्रकला का विकास सर्वप्रथम पुरा पाषाण काल के अन्तिम चरणो में हुआ। इस काल में चित्रकला का उदाहरण- भीम वेटका और आदमगढ़ की गुफाओं में मिलता है।
 
वास्तु एवं स्थापत्य कला का उदभव एवं विकास का इतिहास भी उतन ही प्राचीन है जितना मानव सभ्यता का इतिहास है।
कला (Art) -
  • दृश्य कला वास्तु कला मूर्ति कला चित्रकला

  • निष्पादन कलाएँ शरीरै मुखमंडल भाव भंगिमा नृत्य संगीत

  • साहित्यिक कला भाषा लिपियां
 
भारतीय गणराज्य अपने नागरिकों द्वारा विभिन्न -देशो में किए गए विभिन्न उत्कृष्ट सृजन व राष्ट्र संव समाज के प्रति उनके द्वारा दिये गये अमुल्य योगदान के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करते है। प्रतिवर्ष ये सम्मान कला, समाजिक सेवा, लोक सेवा, जिज्ञासा, विज्ञान, चिकित्सा साहित्य, खेलकुद, आदि ऐसे क्षेत्रों में प्रदान किये जाते हैं।
"कला का विकास में योगदान स्थापत्य कला, वास्तुकला में स्तूप, चैत्य, बिहार, मंदिर, मस्जिद, गिरजाघर, गुरुद्वारा के दर्शन दिखाई पड़ते है। क्षेत्रीय स्थापत्य में जौनपुर स्थापत्य, सालता स्थापत्य, बंगाल, दक्खनी, मुगल साम्राज्य स्थापत्य कला. वास्तुकला के रूप में प्रसिद्ध बेकर का मूल्य सिद्धांत, भवनो को पर्यावरण के अनुकुल निर्मित करना था। इसमें जहां तक संभव हो सके, निर्माण को स्थानीय रूप से उपलब्ध सामाग्री से निर्मित करने पर बल दिया गया, उन्होने मकान के अंदर वायु संचार एव प्रकाश की उपलब्धता पर बल दिया था। इस निर्माण की प्रासंगिकता आज भी है। इस कारण इसे वास्तुकला की क्रांति के अग्रदूत के रूप में जाना जाता है।"
 
"मूर्तिकला की हमें अनेक शैली दिखाई देती है। जिसमें गंधार शैली मथुरा शैली, अमरावती शैली प्रमुख हैं|
 
भारत में कला के रूप में चित्रकला का विकास सर्वप्रथम पुरापाषाण काल से चला आ रहा है। इस काल में चित्रकला का उदाहरण- भीम बेटका एंव आदमबाढ़ की गुफाओं में मिलता है। हड़प्पा, चित्रकला अनंता, मुगल चित्रकला प्रमुख हैं|
 
"नृत्यकला का विकास भी दो रूपों में देखने को मिलता है। तांडव नृत्यकला के रूप में भारतीय, नृत्य का विकास धर्म और दर्शन से जुड़ा है। नृत्य, ईश्वर और मनुष्य के आपसी प्रेम को दर्शाता है ,भरतभूमि के नाट्य शास्त्र में, नृत्य, नाटक, संगीत का उल्लेख मिलता है।"
 
" संगीत कला का जन्म, प्राचीनकाल से माना जाता है। इसका विकास ब्रम्हा, शिव, सरस्वती, से होते हुए नारद के माध्यम से पृथ्वी पर पहुंचा है। सामवेद को संगीत का प्राचीनतम ग्रंथ माना जाता है। "
 
"इस प्रकार भारतीय समाज (संस्कृति) में लोक नाट्य मंच का प्रमुख स्थान है। नाटक अपने आप में एक सम्पुर्ण कला के रूप में छाप छोड़ते हुए भारतीय संस्कृति की विविधता में एकता का प्रतीकात्मक रूप दिखाई पड़ता है।"
 
लेखक: प्रणय तिवारी 
 

 

 
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