दीपोत्सव के पाँच दिन
Date : 29-Oct-2024
व्यक्ति, परिवार और समाज ही नहीं राष्ट्र और पर्यावरण की समृद्धि का संदेश
तीसरा दिन दीपावली का है । इसी दिन भगवान राम चौदह वर्ष वनवास के बाद अयौध्या लौटे थे । उनके आगमन के आनंद में दीपोत्सव हुआ । इस परंपरा के पालन में इस तिथि को दीपावली मनाई जाती है। दीपोत्सव के लिये इस तिथि का निर्धारण भी समाज को एक से अधिक संदेश भी है । सबसे पहला तो यही है कि दुष्टों के सक्रिय रहते किसी को सुख नहीं मिलता । आनंद में डूबना है तो पहले दुष्टों का अंत करना होगा । जैसा रामजी ने किया था । रामजी चाहते तो युद्ध के बिना ही हनुमान जी माता सीता को लेकर आ जाते । पर रामजी ने अयोध्या लौटने से पहले दुष्टों का अंत करना ही मानवता का हित समझा । यह दीपावली का वास्तविक आनंद है । साथ ही एक वैज्ञानिक दर्शन भी है । वर्ष में कुल बारह अमावस होतीं हैं। सभी बारह अमावस में कार्तिक की यह अमावस अपेक्षाकृत अधिक अंधकार मय होती है । चंद्रमा स्वयं प्रकाशमान ग्रह नहीं है । वह सूर्य के प्रकाश को परावर्तित करता है । चूंकि दोनों गृह सतत गतिमान हैं, इसलिये हमें दिन और रात दोनों में प्रति क्षण प्रकाश की प्रदीप्ता में अंतर दिखाई देता है । प्रकाश के स्तर एक क्षण भी स्थिर नहीं रहता । इसलिये प्रत्येक पूर्णिमा और अमावस पर प्रकाश और अंधकार दोनों की प्रदीप्ता और अंधकार के अनुपात में अंतर होता है । कार्तिक अमावस पर दोनों ग्रहों की स्थिति कुछ ऐसी बनती है, या दोनों कुछ ऐसे कोण पर स्थित होते हैं कि इस अमावस की रात के अंधकार में अधिक गहरापन होता है । अंधकार की गहनता ही प्राणी को एक चुनौती होती है । वह अंधकार प्रकाश के अभाव का हो अथवा ज्ञान के अभाव में अज्ञान रूपी अंधकार। दोनों की गहनता को परास्त करने केलिये पुरुषार्थ और पराक्रम युक्त संकल्प चाहिए । इसी संकल्प का प्रकटीकरण है दीप मालिका । इससे संसार अमावस की घनघोर रात्रि में भी प्रकाशमान हो उठता है । दीपोत्सव यह संदेश भी है कि परिस्थिति कितनी भी विषम हों, अंधकार कितना ही गहन हो, यदि उचित दिशा में उचित प्रयत्न किया जाय तो अनुकूल आनंद हो सकता है । अंधकार भी प्रकाश में परिवर्तित हो सकता है । पुरुषार्थ से अंधकार सदैव परास्त होता है । पुरुषार्थ की दिशा में सतत प्रयत्नशील रहने का संदेश भी दीपावली में है । इस रात पहले लक्ष्मीजी का पूजन होता है । फिर घर के भीतर और बाहर दीप जलाये जाते हैं। लक्ष्मी पूजन के लिये पहले आरती केलिये एक दिया जलाया जाता है फिर अन्य दीपक। घर के भीतर हर कौने में और घर के बाहर द्वार पर और आँगन में दिये रखे जाते हैं, पड़ौस में भी दिये प्रसाद भेजे जाते हैं । यह संदेश गृहलक्ष्मी से जुड़ा है । ध्यान देने की बात यह है कि समुद्र मंथन से देवी लक्ष्मी तो अष्ठमी को प्रकट हुईं थीं। उस तिथि को महालक्ष्मी पूजन भी हो गया है । फिर पुनः कार्तिक अमावस को लक्ष्मी पूजन होता है वस्तुतः कार्तिक अमावस की इस पूजन में देवी लक्ष्मी तो एक प्रतीक रूप में हैं। वास्तव में यह दिन तो गृहलक्ष्मी के लिये समर्पित है । गृहलक्ष्मी अर्थात गृह स्वामिनी। भारतीय चिंतन में घर गृहस्थी का स्वामी पुरूष या पति नहीं होता । पत्नि होती है, नारी होती है । नारी को ही गृहलक्ष्मी, गृह स्वामिनी या घरवाली कहा गया है । पुरुष को गृहविष्णु या गृहदेवता नहीं कहा जाता । नारी के नाम के आगे "देवी" उपाधि स्वाभाविक रूप से लगती है । इससे कोई अंतर नहीं पड़ता कि नारी विवाहित है, अविवाहित है, परित्यक्ता है, विधवा है, बालिका है या वृद्ध है । वह किसी भी स्थिति या आयु में हो सकती है । उसके नाम के आगे "देवी" सदैव लगाया जाता है । नारी की संतुष्टि या आवश्यकता पूर्ति की बात ही दीपावली की तैयारी में है । दीपावली पर सदैव घर गृहस्थी की वस्तुएँ ही क्रय की जातीं हैं। वस्त्र, आभूषण, श्रृंगार सामग्री सब का संबंध नारी से होता है । नारी की पसंद या आवश्यकता से ही धनतेरस या दीपावली के आसपास वस्तुएँ क्रय की जातीं हैं । एक और बात महत्वपूर्ण है । दीपावली से पहले गुरु पूर्णिमा, रक्षाबंधन, पितृपक्ष आदि तिथियाँ निकल चुकीं होतीं हैं। इन तिथियों पर गुरु केलिये बहन के लिये, वरिष्ठ जनों के लिये यहाँ तक कि पितृपक्ष में पुरोहित जी के लिये भी वस्त्र या अन्य प्रकार की भेंट भोजन का दायित्व पूरा हो जाता है इसलिये कार्तिक मास की अमावस की तिथि गृहस्वामिनी या गृह लक्ष्मी के लिये निर्धारित है । इसमें जहाँ परिवार जनों में गृह स्वामिनी के माध्यम से परिवार समाज की समृद्धि के उपाय का संदेश है वहीं गृह स्वामिनी को यह संदेश भी है कि वह पहले परिवार समाज के हित की चिंता करे फिर अपनी इच्छा पूर्ति का प्रयास करे । ऋग्वेद से लेकर अनेक पुराण कथाओं तक समाज को यह स्पष्ट संदेश है कि वही घर प्रकाशमान होगा जहाँ नारी संतुष्ट और प्रसन्न है । उसी घर में देवता रमण करते हैं जहाँ नारी का सम्मान जनक स्थान होता है । घर की देवी यदि अपनी पसंद और आवश्यकता पूर्ति से संतुष्ट है तभी घर प्रकाशमान होता है । यह सामर्थ्य नारी में ही है कि वह सबसे अंधेरी अमावस की रात्रि को भी प्रकाशमान बना सकती है । दीपावली के दिन वही दीपों से पूरे घर को प्रकाशमान करती है इसलिये यह त्यौहार देवी लक्ष्मी के पूजन प्रतीक रूप में गृहलक्ष्मी को ही समर्पित है । यदि गृहलक्ष्मी प्रसन्न है, संतुष्ट है तो पूरा परिवार एक सूत्र में बंधा रहता है । एक बात और, दीपावली के दिन पूरा परिवार मिलकर लक्ष्मी पूजन करता है । जैसा अयोध्या में रामजी और सभी भाइयों एवं उनके पूरे परिवार ने मिलकर दीपावली पूजन किया था । इसलिए यह दीपावली पूजन पूरे परिवार की एकजुटता और पड़ौस के समन्वय का प्रतीक है । पड़ौस में दिये भेजना अर्थात पूरे मोहल्ले को एक जुट रखना है। यदि बाहरी असामाजिक तत्वों के उत्पात पर तभी नियंत्रण होगा जब पूरे मोहल्ले में समन्वय होगा । इसीलिए लक्ष्मी पूजन के बाद पड़ौस में दिये भेजे जाते हैं।