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मथुरा–काशी पर हिंदू समाज के आग्रह का सम्मान होना चाहिए : मोहन भागवत

Date : 28-Aug-2025

नई दिल्ली, 28 अगस्त। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक डॉ मोहन भागवत ने कहा कि मथुरा और काशी के प्रति हिंदू समाज के आग्रह का सम्मान होना चाहिए। उन्होंने स्पष्ट किया कि राम मंदिर आंदोलन में संघ ने सक्रिय भागीदारी की थी, लेकिन अब किसी अन्य आंदोलन में संगठन प्रत्यक्ष रूप से शामिल नहीं होगा।

भागवत गुरुवार को विज्ञान भवन में “100 वर्ष की संघ यात्रा : नए क्षितिज” विषय पर आयोजित तीन दिवसीय व्याख्यान शृंखला के समापन दिवस पर जिज्ञासा समाधान सत्र में प्रश्नों के उत्तर दे रहे थे। उन्होंने कहा, “राम मंदिर बनाने का आग्रह हमारा था और संघ ने इस आंदोलन का समर्थन किया। अब बाकी आंदोलनों में संघ नहीं जाएगा। लेकिन हिंदू मानस में काशी-मथुरा और अयोध्या का महत्व है। दो जन्मभूमि हैं और एक निवास स्थान है। यह स्वाभाविक है कि हिन्दू समाज इसका आग्रह करेगा।”

उन्होंने कहा कि संघ इस आंदोलन में प्रत्यक्ष रूप से शामिल नहीं होगा, लेकिन संघ के स्वयंसेवक यदि चाहें तो उसमें भाग ले सकते हैं क्योंकि वे भी हिंदू समाज का हिस्सा हैं। उन्होंने कहा, “हम कहते हैं कि बाकी जगह मंदिर और शिवलिंग मत ढूंढो। तीन का ही आग्रह है तो उसे स्वीकार कर लो। यह भाईचारे और सौहार्द्र की दिशा में एक बड़ा कदम होगा।”

नेताओं की सेवानिवृत्ति की आयु के प्रश्न पर सरसंघचालक ने कहा कि संघ में सेवानिवृत्ति की कोई अवधारणा नहीं है। उन्होंने कहा, “मैंने कभी नहीं कहा कि मैं किसी आयु में रिटायर हो जाऊंगा या किसी को होना चाहिए। संघ में हम सब स्वयंसेवक हैं। यदि मैं 80 वर्ष का हो जाऊं और मुझे शाखा चलाने का कार्य सौंपा जाए तो मुझे करना ही होगा। हम वही काम करते हैं जो संघ हमें सौंपता है। सेवानिवृत्ति का प्रश्न यहां लागू नहीं होता।”

उन्होंने कहा कि संघ में केवल एक व्यक्ति पर निर्भरता नहीं है। उन्होंने कहा, “मैं अकेला सरसंघचालक नहीं हूं, यहां 10 लोग और हैं जो यह दायित्व संभाल सकते हैं। हम जीवन में कभी भी सेवानिवृत्त होने को तैयार हैं और तब तक काम करने को भी जब तक संघ चाहेगा।”

महिलाओं की भूमिका पर भागवत ने कहा कि समाज संगठन के प्रयास में महिलाओं की सक्रिय भागीदारी है। उन्होंने कहा, “1936 में राष्ट्र सेविका समिति का गठन हुआ, जो महिला शाखाएं संचालित करती हैं। यह परंपरा आज तक चल रही है। संघ प्रेरित अनेक संगठनों का नेतृत्व महिलाएं ही करती हैं। महिलाएं और पुरुष हमारे लिए पूरक हैं।”

भागवत ने कहा कि संघ का कार्यक्षेत्र भारत तक केंद्रित है, लेकिन विदेशों में स्वयंसेवक वहां के कानूनों के अनुसार काम करते हैं।


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