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मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने किया कुम्हरार पार्क का निरीक्षण, सौंदर्यीकरण के दिए निर्देश

Date : 02-Jan-2026

 पटना, 02 जनवरी । बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने शुक्रवार को पटना स्थित ऐतिहासिक एवं पुरातात्विक स्थल कुम्हरार पार्क का निरीक्षण किया। इस दौरान उन्होंने पार्क परिसर में संरक्षित मगध साम्राज्य काल से जुड़े स्तम्भों और अन्य पुरावशेषों का अवलोकन किया। मुख्यमंत्री ने बुलंदीबाग उत्खनन, कुम्हरार उत्खनन और मौर्यकालीन अस्सी स्तम्भों वाले विशाल सभागार से संबंधित जानकारियों के लिए लगाए गए सूचना बोर्डों को भी देखा।

निरीक्षण के दौरान मुख्यमंत्री ने अधिकारियों को निर्देश दिया कि कुम्हरार पार्क के बेहतर विकास और सौंदर्यीकरण के लिए केंद्र सरकार को पत्र लिखा जाए। उन्होंने कहा कि कुम्हरार पार्क अत्यंत प्राचीन और ऐतिहासिक महत्व का स्थल है, जिसका सीधा संबंध मगध साम्राज्य से है।

मुख्यमंत्री ने कहा कि यह पार्क काफी विस्तृत है और बड़ी संख्या में लोग यहां भ्रमण के लिए आते हैं। ऐसे में पार्क परिसर, प्रदर्शों और पुरावशेषों का उचित रखरखाव और विकास आवश्यक है।

नीतीश कुमार ने कहा कि इस स्थल से जुड़ी ऐतिहासिक जानकारियों को समझने के लिए इतिहास के विद्यार्थी और शोधकर्ता देश के विभिन्न हिस्सों के साथ-साथ विदेशों से भी यहां आते हैं। इसे ध्यान में रखते हुए कुम्हरार पार्क का सुनियोजित सौंदर्यीकरण और संरक्षण बेहद जरूरी है।

संरक्षण और विकास पर सरकार का फोकस

मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने स्पष्ट किया कि कुम्हरार पार्क जैसे ऐतिहासिक स्थलों का संरक्षण और विकास राज्य की प्राथमिकता है, ताकि आने वाली पीढ़ियां बिहार के गौरवशाली अतीत को जान और समझ सकें।

मौर्यकालीन विशाल सभागार का ऐतिहासिक महत्व

दरअसल, वर्ष 1912-15 और 1951-55 के दौरान हुई खुदाई में यहां 80 स्तम्भों वाला मौर्यकालीन विशाल सभागार प्रकाश में आया था। इस सभागार में स्तम्भों की 10 पंक्तियां पूरब से पश्चिम और 8 पंक्तियां उत्तर से दक्षिण की ओर थीं। स्तम्भों के बीच लगभग 15 फीट का अंतराल था और सभागार दक्षिणाभिमुख था।

हालांकि, आसपास हुए विकास कार्यों और भू-जल स्तर में वृद्धि के कारण यह पुरास्थल जलमग्न हो गया, जिससे स्तम्भों और अवशेषों के अस्तित्व पर खतरा उत्पन्न हो गया। इसके बाद विशेषज्ञ समिति की अनुशंसा पर वर्ष 2005 में इस स्थल को मिट्टी और बालू से ढक दिया गया, ताकि अवशेष सुरक्षित रह सकें।

पाटलिपुत्र का गौरवशाली इतिहास

प्राचीन काल में आधुनिक पटना को पाटलिपुत्र के नाम से जाना जाता था। छठी शताब्दी ईसा पूर्व में जब भगवान बुद्ध ने इस क्षेत्र का भ्रमण किया था, तब पाटलिग्राम एक छोटा सा गांव था। उस समय मगध के राजा अजातशत्रु ने वैशाली के लिच्छवियों से सुरक्षा के लिए यहां किले का निर्माण कराया था।

मेगास्थनीज और चीनी यात्रियों का उल्लेख

चंद्रगुप्त मौर्य के दरबार में आए यूनानी राजदूत मेगास्थनीज ने अपनी पुस्तक ‘इंडिका’ में पाटलिपुत्र (पालिबोथरा) का विस्तृत वर्णन किया है। उनके अनुसार, यह नगर गंगा नदी के किनारे 14 किलोमीटर लंबा और 3 किलोमीटर चौड़ा था, जिसका परिमाप लगभग 36 किलोमीटर था। शहर को लकड़ी के खंभों वाली चारदीवारी और गहरी खाई से सुरक्षित किया गया था।

प्रसिद्ध चीनी यात्री फाह्यान ने पाटलिपुत्र को समृद्ध और शिक्षा का प्रमुख केंद्र बताया, जबकि ह्वेनसांग (वेनत्सांग) ने सातवीं शताब्दी में यहां के खंडहरों का उल्लेख किया। पाटलिपुत्र पाल शासकों की भी राजधानी रहा और बाद में राजधानी का दर्जा खोने के बावजूद यह एक महत्वपूर्ण केंद्र बना रहा।-


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