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भारत की परम्परा को समझने के लिए संस्कृत जानना अनिवार्य - डॉ. मोहन भागवत

Date : 20-Apr-2026

 नई दिल्ली, 20 अप्रैल । राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत ने संस्कृत वाणी को मनुष्य का कभी क्षय न होने वाला आभूषण बताया। उन्होंने कहा कि संस्कृत केवल एक भाषा नहीं, बल्कि भारत की प्राचीन परंपरा, ज्ञान और जीवनदृष्टि की आधारशिला है। संस्कृत के माध्यम से ही भारत की सांस्कृतिक धरोहर को सही रूप में समझा और आगे बढ़ाया जा सकता है। संघ प्रमुख ने सोमवार को पंडित दीनदयाल उपाध्याय मार्ग स्थित संस्कृत भारती के केन्द्रीय कार्यालय ‘प्रणव’ का उदघाटन करते हुए यह विचार व्यक्त किए।

अक्षय तृतीया के प्रातःकाल शुभ मुहूर्त में विधिविधान पूर्वक कार्यालय के उद्घाटन के बाद उपस्थित जनसमूह को संबोधित करते हुए संघ के सरसंघचालक डॉ. भागवत ने इसे अत्यंत शुभ और प्रेरणादायक क्षण बताया। उन्होंने कहा कि इस दिन प्रारंभ होने वाले कार्य अक्षय रहते हैं, इसलिए यह कार्यालय संस्कृत के प्रसार में दीर्घकालीन भूमिका निभाएगा। उल्लेखनीय है कि ‘प्रणव’ नाम सृष्टि के मूल नाद का प्रतीक है।

उन्होंने स्पष्ट किया कि भवन और संसाधन कार्य के कारण बनते हैं, न कि कार्य इनसे चलता है। कार्यकर्ताओं की निष्ठा और समर्पण ही किसी संगठन की वास्तविक शक्ति है। कार्यालय का निर्माण कार्य की प्रगति का संकेत है, लेकिन इसे उद्देश्य नहीं बल्कि साधन के रूप में देखना चाहिए।

उन्होंने कहा कि भारत केवल एक भौगोलिक इकाई नहीं, बल्कि एक जीवंत परंपरा है। इस परंपरा को समझने और आगे बढ़ाने के लिए संस्कृत का ज्ञान अनिवार्य है। संस्कृत भारती का कार्य केवल भाषा सिखाना नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति और मूल्यों को समाज में स्थापित करना है। संघ प्रमुख ने अपने अनुभव साझा करते हुए कहा कि संस्कृत को कठिन मानना एक भ्रम है। भाषा सीखने का सबसे सहज तरीका संभाषण है। संस्कृत भारती द्वारा चलाए जा रहे संभाषण शिविरों ने अल्प समय में लोगों में संस्कृत के प्रति रुचि जागृत की है और यह कार्य आगे भी बढ़ाया जाना चाहिए।

अपने संबोधन में उन्होंने कहा कि संस्कृत भारत की सभी भाषाओं को जोड़ने वाली कड़ी है। हर भारतीय भाषा में संस्कृत के शब्द विद्यमान हैं, जिससे यह भाषा एकता और समन्वय का आधार बनती है। संस्कृत का प्रसार अन्य भाषाओं को कमजोर नहीं करता, बल्कि उन्हें समृद्ध करता है। उन्होंने कार्यकर्ताओं से अपेक्षा व्यक्त की कि यह कार्यालय संस्कृत संभाषण का केंद्र बने, जहां आने वाला प्रत्येक व्यक्ति भाषा सीखने और उससे जुड़ने के लिए प्रेरित हो। उन्होंने कहा कि ऐसा वातावरण तैयार किया जाए, जिससे अधिक से अधिक लोग संस्कृत से जुड़ें और यह भाषा पुनः जन-जन की भाषा बन सके। उन्होंने विश्वास व्यक्त किया कि कार्यकर्ताओं के प्रयासों से संस्कृत भारती का यह कार्य निरंतर विस्तार पाकर अपने लक्ष्य को अवश्य प्राप्त करेगा।

इस अवसर पर अखिल भारतीय संस्कृत भारती अध्यक्ष प्रो. रमेश कुमार पाण्डेय और संस्कृत भारती न्यास दिल्ली प्रान्त के अध्यक्ष प्रणीव कान्त उपस्थित रहे। प्रस्ताविका अखिल भारतीय संगठन मंत्री जयप्रकाश गौतम ने प्रस्तुत की।


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